Zeeshan
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तेल के दाम के खेल में कई तरह के घालमेल: कैसे जगे लोगों का भरोसा
भारत में #Petrol-डीजल की कीमतें को लेकर हमेशा से विवाद के साथ ये लगता रहा है कि कहीं कुछ झोल है. हाल में पेट्रोलियम मंत्रालय ने बताया कि पेट्रोल और डीजल के दामों में करीब 7.5 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी के बाद सरकारी तेल कंपनियों को रोज़ाना करीब 600 करोड़ रुपये का घाटा हो रहा है. पहले ये नुकसान था रोज़ाना करीब 1,000 करोड़ रुपये. असल में, #Iran जंग और #StraitOfHormuz बंद होने की वजह से कच्चे तेल की कीमतों में 50% उछाल आया.
वैसे 2025-26 में #IndianOil, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम के कुल 'शुद्ध लाभ' में 130% की बड़ी बढ़त हुई. यानी 2024-25 के ₹33,601.5 करोड़ रुपये के मुकाबले इन सरकारी कंपनियों ने 2025-26 में 77,280 करोड़ रुपये से ज्यादा का मुनाफा कमाया. और सबसे ख़ास बात, जनवरी-मार्च 2026 तिमाही में इन कंपनियों का फायदा 19,470 करोड़ रुपये रहा, जो कि पिछले साल की इसी तिमाही के मुकाबले 40% से ज्यादा है.
ऐसे में सवाल है कि जब कंपनियां इतना मुनाफा कमा रही हैं, तो महंगाई का बोझ जनता पर ही क्यों डाला जाना चाहिए,
पेट्रोल की कीमत में सिर्फ कच्चे तेल की लागत नहीं होती बल्कि इसमें डॉलर-रुपया exchange rate, रिफाइनिंग लागत, परिवहन खर्च, डीलर कमीशन और टैक्स भी शामिल होते हैं. कई बार पेट्रोल-डीजल की कीमतों में केंद्र और राज्य सरकारों के टैक्स का हिस्सा आधे से भी ज्यादा होता है. भारत में टैक्स का बोझ कई देशों की तुलना में ज्यादा माना जाता है. यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता होने पर भी जनता को राहत नहीं मिलती.
चुनावों के दौरान तेल कंपनियों को कीमतें बढ़ाने से रोका जाता है और चुनाव खत्म होने के बाद दाम बढ़ाए जाते हैं. इससे ये साफ होता है कि पेट्रोल-डीजल की कीमतें पूरी तरह से बाजार के दाम के हिसाब से नहीं चलती हैं. जबकि बार-बार ये मांग उठती रही है कि पेट्रोल-डीजल की कीमतें सरकार और कंपनियों की मनमानी से नहीं, बल्कि एक साफ़, पारदर्शी और नियम-आधारित व्यवस्था के तहत तय हों. ऐसा फार्मूला हो जिसमें कच्चे तेल की कीमत बढ़ने या घटने का असर सीधे दिखाई दे और टैक्स की जानकारी भी सार्वजनिक हो. इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और जनता का भरोसा मजबूत होगा. जब लोगों को साफ़-साफ़ समझ में आएगा कि वो किस चीज़ के लिए क्यों और कितना पैसा दे रहे हैं, तभी इस 'तेल के खेल' में सबका विश्वास कायम होगा.
क्या है आपकी राय

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@Swapnil35550095 कुछ लोगों ने गठबंधन और जोड़-तोड़ को ही
“अद्वितीय प्रशासनिक क्षमता” घोषित कर रखा है। 😄
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@ChekrishnaCk Party decision is practical and timely. Siddaramaiah has contributed immensely, but DK Shivakumar also deserves his chance after years of hard work for the party. Waiting till 2028 could have created bigger internal issues.
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@Parth_Pareek20 अशोक गहलोत जी को कांग्रेस ने तीन बार मुख्यमंत्री बनाया, हर संकट में नेतृत्व ने उन पर भरोसा किया।
लेकिन पार्टी अगर कोई निर्णय ले और उसी समय शक्ति प्रदर्शन शुरू हो जाए, तो सवाल उठेंगे ही।
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सिद्धारमैया और अशोक गहलोत में तुलना करना प्रथम दृष्टया मूर्खता और छिछलापन है। एक ओर अशोक गहलोत जहां कांग्रेस की मूल वैचारिकी के पुरोधा और गाँधी के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी आचार्य विनोबा भावे की सलाह के कारण राजनीति में आये हैं दूसरी तरफ़ गाँधी जी के अनन्य शिष्य और प्रतिष्ठित गांधीवादी सुब्बाराव भाई जी द्वारा ट्रेंड गांधियन हैं। उन्होंने विनोबा के जाति उन्मूलन आंदोलन का राजस्थान में युवावस्था में नेतृत्व किया। जमींदारों के विरुद्ध भूमिहीनों की आवाज़ को बुलंद किया। शायद कुछ सामंती उस नफ़रत को अभी तक पाले हुए हैं। सिद्धारमैया भी कांग्रेस पार्टी के सदस्य हैं इसलिए उन पर कुछ नहीं कहूँगा वरना जनता दल के दौर के उनके कांग्रेस विरोधी के कई किस्से लिख सकता हूँ। किंतु कांग्रेस में रहकर कांग्रेस और कांग्रेस नेताओं पर हमला करना अप्रत्यक्ष तौर पर भाजपा की मदद करना ही है। किसी नेता के चक्कर में चंद रोज पहले कांग्रेसी हुए लोगों को शायद इस बात का अहसास नहीं है।
हम कांग्रेसी ग़ैर- कांग्रेसियों द्वारा ( सहयोगियों के वेश में) 2011 में मनमोहन सिंह जी का हश्र देख चुके हैं अशोक गहलोत साहब का वो हाल नहीं होने देंगे।
तुम्हारे लिए कांग्रेस का पुराना नारा दोहरा देता हूँ
सामंतवाद की दो दवाई
हाथ का पंजा और कांग्रेस ( आई)
Azaaad Gurjar@Azaad028
Obviously he is a mass leader and other one is just a piece of Haand Maans
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@ashutosh83B सत्ता बदलते ही कुछ लोगों की आवाज़ नहीं, रीढ़ की हड्डी भी गायब हो जाती है।
महंगाई वही है, बस अब चुप रहना ही करियर बचाने का तरीका बन गया है।
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@SrBachchan 2012 में 7 रुपये बढ़े तो व्यंग निकल आया था,
शायद अब स्क्रिप्ट में “महंगाई” वाला सीन ही नहीं बचा।
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@MediaHarshVT 2013 में सलाह देने वाले “देश बचा लेंगे” बोल रहे थे, और 2026 में वही लोग महंगाई को “बेहतर प्रबंधन” बताकर समझा रहे हैं।
लगता है सत्ता बदलते ही सिद्धांत भी पेट्रोल के दामों की तरह बदल जाते हैं।
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2013 की मेरी यह पोस्ट आज वायरल हो रही है। कई लोग पूछ रहे हैं कि, आज आपकी क्या राय है?
वहीं राय है जो 2013 में थी। अगर पेट्रोलियम मंत्री यह सलाह देने लगें कि, पेट्रोल पंप बंद करके पेट्रोल-डीजल और घाटा बचाएंगे तो आज भी यही कहूँगा कि, सरकार हट जाओ, हम देश बचा लेंगे।
फिलहाल इतने बड़े आपूर्ति संकट के बावजूद @narendramodi की सरकार ने कमाल का प्रबंधन किया है। लगभग आपूर्ति सुनिश्चित हो रही है। हाँ, तेल-गैस महंगा हो रहा है। उसे भी प्रबंधित किया जा सके तो बेहतर।
हर्ष वर्धन त्रिपाठी 🇮🇳Harsh Vardhan Tripathi@MediaHarshVT
सरकार कमाल हो गई है। पेट्रोलियम मंत्री की सलाह पेट्रोल पंप बंद करके पेट्रोल डीजल और घाटा बचाएंगे। सरकार हट जाओ हम देश बचा लेंगे।
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@yd_anu_4820 @garrywalia_ भाई, यही तो असली मुद्दा है। जब 90% लोग इतनी कमाई भी नहीं कर पाते, तब महंगाई और टैक्स का बोझ उनके लिए और ज्यादा भारी हो जाता है
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@mstfzeeshan @garrywalia_ Bhai 90 % Indian itna bhi nhi kama pate
Filipino

केजरीवाल ने तो गुजरात में आप की सरकार बनेगी लिखवाकर दिया था 😅
JAK 😎@Dabang_khan5
Aisi Bakxodi Arvind Kejriwal Bhi Kar Raha Tha Delhi Election Ke Time 😂
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@yadavakhilesh अगर सच में जनता की लड़ाई लड़नी है, तो सड़क पर उतरकर लड़िए, सिर्फ पोस्ट डालकर नहीं
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तेल के बेतहाशा बढ़ते दामों के बीच भाजपा सरकार के पास बस एक ही तरीक़ा बचा है और वो है उनका पुराना ‘बोरी में चोरी वाला फ़ार्मूला’ मतलब तेल के दाम बढ़ाने के बजाय एक लीटर में तेल की मात्रा घटा दो।
तेल के दामों और भाजपा के कमीशन में सीधा संबंध है मतलब जितने दाम बढ़ेंगे उतना ही भाजपा का कमीशन बढ़ेगा।
तेल के दाम बढ़ाकर भाजपा दरअसल हालिया चुनाव में ख़र्च किये गये अपने पैसों की रिकवरी कर रही है। भाजपा का एक ही सिद्धांत है कि उसका और उसके लोगों का ख़ज़ाना खाली न हो, उसके लिए भले जनता की जेब पर डाका ही क्यों न डालना पड़े।

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@ArvindKejriwal एक जिले के नतीजों को पकड़कर पूरे गुजरात की सरकार बना लेने का दावा करना राजनीति नहीं, सीधा भ्रम फैलाना है। मुंगेरी लाल के हसीन सपने देखते रहो😂😂😂
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@KraantiKumar राजनीति में “खेला” शब्द नया नहीं है, फर्क बस इतना है कि हर कोई इसे अपने हिसाब से परिभाषित करता है
लेकिन असल सवाल यही है कि जनता ने जिस पार्टी को वोट दिया था, उसका जनादेश कहाँ खड़ा है
लोकतंत्र में ताकत सिर्फ संख्या नहीं होती, भरोसा भी होता है और वही सबसे पहले टूटता है
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तमिलनाडु में AIADMK के साथ खेला हो गया. AIADMK के तीन विधायकों ने पार्टी छोड़कर TVK पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली.
अब तमिलनाडु में चार सीटों पर उपचुनाव होगा. एक सीट विजय से छोड़ने से खाली हुई है. अगर चारो सीट TVK जीत गयी
तो उसके 112 विधायक हो जाएंगे जो बहुमत के काफी करीब है. अक्सर देखा गया है सत्ता में बैठी पार्टी दूसरी पार्टी के विधायकों को तोड़ लेती है.
लेकिन विजय ने ऐसा नही किया, उन्होंने AIADMK के विधायकों को इस्तीफा दिलवाया, फिर अपनी पार्टी में शामिल किया. जबकि चुनाव परिणाम के बाद AIADMK के 47 में से आधे से ज्यादा विधायक TVK को समर्थन देना चाहते थे.


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@ranvijaylive कच्चा तेल नीचे आता है तो भी आम जनता को उसका फायदा क्यों नहीं मिलता ये सवाल अब हर बार उठता है
जब दाम बढ़ाने का कारण तुरंत बता दिया जाता है, लेकिन घटने पर वही फायदा ट्रांसफर नहीं होता, तो भरोसा अपने आप कम हो जाता है
आख़िर नीति जनता के लिए है या सिर्फ वसूली के लिए ये साफ होना चाहिए
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मोदी सरकार ने पिछले 11 दिन में पेट्रोल-डीजल पर 8 रुपए बढ़ाए.
जबकि पिछले 11 दिन में कच्चे तेल का दाम भयंकर कम हो गया है.
• 15 मई: 109.26 डॉलर प्रति बैरल
• 25 मई: 97.78 डॉलर प्रति बैरल
मतलब कच्चे तेल का दाम कम होने के बाद भी पेट्रोल-डीजल महंगा हो रहा है.
मोदी सरकार ने कच्चे तेल के महंगे होने की बात कहकर ही वसूली शुरू की थी, लेकिन अब तो कच्चा तेल भी सस्ता मिल रहा है.
वहीं, ईरान ने भी कल कहा है कि Strait of Hormuz से गुजरने वाले जहाजों की संख्या 30 दिनों के अंदर युद्ध से पहले के स्तर पर लौट आएगी.
मतलब सब कुछ सामान्य हो जाएगा, पहले जैसा हो जाएगा. ऐसे में क्या मोदी सरकार बढ़े हुए पेट्रोल-डीजल के दाम वापस लेगी?
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@ArvindKejriwal अरे इन्हें अब जाकर पेपर लीक का पता चला है, बहुत जल्दी नींद से जाग गए हैं
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