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Shivam kumar
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Shivam kumar
@nextlvlshivam
अगर आप परफ़ेक्शन की तलाश में हैं, तो मैं वो नहीं हूँ। लेकिन अगर आप ईमानदारी और वफ़ादारी चाहते हैं, तो मैं वही हूँ। I explain what you read and watch. #meribaate
Dehradun, India Katılım Aralık 2024
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नेताओं के मैच में पिसता युवा
पेपर लीक महाराष्ट्र में हुआ, भुगत छात्र रहे हैं।
लेकिन देवेंद्र फडणवीस जी का ध्यान इस पर है कि राहुल गांधी सवाल भारत से पूछ रहे हैं या विदेश से।
साहेब, विपक्ष कहाँ बैठा है इससे हमारा चूल्हा नहीं जलेगा।
नेताओं के बयानों से नहीं, पारदर्शी तरीके से दोबारा परीक्षा कराने से छात्रों का भला होगा।
आम छात्रों को राजनीति नहीं, सिर्फ TET परीक्षा की नई तारीख चाहिए।

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@rajkalyan24 Ye phle ho chuka hai ,
Yaa abhi tak yahi ho raha hai kalyan ji
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कमांडर जीप भी विलुप्त हो चुकी है!
जब गांव में छोटी दूरी के लिए टमटम चलता था,लेकिन दूर जाने वालो के लिए महिंद्रा का कमांडर जीप चलता था।
इस जीप से उस वक्त बहुत कमाई होती थी,तब का सबसे तेज साधन था,जितना मर्जी फूल करो,इसकी सीट पर बैठने के लिए भी बुकिंग करना पड़ता था,क्योंकि बैठने वाले,लटकने वाले सब ज्यादा थे।
मेरे बड़े भैया के बारात में भी कमांडर गई थी। एक कमांडर में पंद्रह लोग बैठते थे,बीस लोग लटके रहते थे,दस लोग ऊपर बैठ जाते थे।

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@Apna_Thought @CommonBS786OM @LegalAdvisour @shaheena451 @SocialistSpirit @SandeshChaturv8 @ChanakyaSpeaksX @nkram99 @NewsBhukkad @Ansarigulamhusa @Satyanaray720 वरना बस रोटी ही मिलती है ,
ओर कभी वो भी नहीं ।
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@nextlvlshivam 3 इडियट्स तो kभी नहीं बोल पाएंगे ये अपना चतुर ही बोल दिया इसने हिम्मत दिखाई
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@yusufrazvi63 जा भी वे रहे है जिनकी बस की कुछ नहीं है करने को ।
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@nextlvlshivam हालत इनकी ठीक नहीं है
और बड़ी बात तो ये है कि कोई भी नेता उधर मुंह करने को तैयार नहीं है
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अजय देवगन की 'Raid' फिल्म का वो डायलॉग तो आपको याद ही होगा — इस घर में कोई सरकारी अफसर मच्छर मारने नहीं आ सकता, तुम रेड मारने आए हो!
यह कहानी थी उस दौर के भारतीय इतिहास की सबसे रसूखदार राजनेता और उद्योगपति सरदार इंदर सिंह की!
सरदार इंदर सिंह पहले पंजाब विधानसभा में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के विधायक रहे और बाद में राज्यसभा सांसद भी बने!
कानपुर में उनका इतना बड़ा साम्राज्य था कि उन्होंने देश की पहली स्टील री-रोलिंग मिल लगाई उत्तर भारत की सबसे बड़ी रेलवे वैगन फैक्ट्री खड़ी की और देखते ही देखते भारतीय रेलवे के सबसे बड़े सप्लायर बन गए!
कानपुर के एक बेहद आलीशान और विशाल महल में वह अपने पूरे परिवार के साथ पूरी ठाठ के साथ रहते थे!
लेकिन 16 जुलाई 1981 की वो सुबह उनके पूरे साम्राज्य को ढहने की शुरुआत थी!
90 जाबांज अफसर और 200 पुलिसवाले एक सुबह जब सांसद महोदय आराम से अपने महल में चाय की चुस्कियां ले रहे थे, अचानक इनकम टैक्स डिपार्टमेंट की पूरी फौज ने उनके सारे ठिकानों को एक साथ घेर लिया!
इस रेड के लिए 90 जाबांज अफसर और 200 से ज्यादा हथियारबंद पुलिसकर्मी तैनात थे।
दीवारों और गद्दों से निकला खजाना घर के अंदर जो तलाशी शुरू हुई, उसकी कल्पना देश के किसी बड़े से बड़े अफसर ने भी नहीं की थी!
दीवारों के खोखले हिस्सों, बिस्तरों के गद्दों, तहखानों और यहां तक कि रसोई के डिब्बों से इतना अंधाधुंध कैश निकला कि नोटों के पहाड़ खड़े हो गए!
आरबीआई मैनेजर को बुलाना पड़ा कैश का स्केल इतना बड़ा था कि लोकल अधिकारियों के हाथ खड़े हो गए!
नोट गिनने वाली मशीनें कम पड़ गई, जिसके बाद रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के मैनेजर को स्पेशल मशीनों और स्टाफ के साथ खुद मौके पर आना पड़ा!
45 लोग और 18 घंटे की नॉन-स्टॉप गिनती कुल 45 बैंक कर्मचारी लगातार 18 घंटे तक बिना एक पल रुके सिर्फ और सिर्फ नोट गिनते रहे, तब जाकर कैश का फाइनल आंकड़ा सामने आ पाया!
सोने और बेनामी संपत्तियों का अंबार कैश के अलावा 1000 तोले से भी ज्यादा शुद्ध सोने की ईंटें, बेशकीमती जेवरात, दर्जनों बैंक लॉकर्स और कई बेनामी संपत्तियों के दस्तावेज बरामद हुए!
1981 में ₹420 करोड़ की वैल्यू इस पूरी जब्ती की कुल कीमत उस जमाने में करीब ₹420 करोड़ आंकी गई थी!
अगर आज के वक़्त (साल 2026) के हिसाब से इसकी वैल्यू जोड़ी जाए, तो यह आंकड़ा हजारों करोड़ों रुपए से भी ऊपर बैठता है!
इस ऐतिहासिक रेड ने भारत के इतिहास में एक ऐसा रिकॉर्ड सेट किया जो आज 45 साल बीत जाने के बाद भी नहीं टूटा है!
यह भारतीय इतिहास की सबसे लंबे समय तक चलने वाली रेड थी, जो पूरे 3 दिन और 2 रातों तक बिना रुके लगातार चलती रही थी!
इतिहास गवाह है कि जब सियासत, व्यापार और रसूख का ऐसा गठजोड़ होता है, तो इंसान के भीतर एक अलग ही अहंकार आ जाता है!
उसे लगता है कि सरकार और कानून उसकी जेब में हैं!
लेकिन जब ईमानदार अफसर अपनी ड्यूटी पर आते हैं, तो बड़े से बड़े सूरमाओं के रसूख के किले भी ताश के पत्तों की तरह बिखर जाते हैं!

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दो शब्द आप सबने यहाँ देखे होंगे.
TMKC, TMKB
लोग इसका मतलब गाली निकालते हैँ
और अक्सर एक दूसरे को गाली देने में इन सांकेतिक शब्दों का उपयोग किया जाता है.
असल में ये दोनों शब्द गाली है ही नहीं.
इन शब्दों की उत्पति प्रसिद्ध टीवी सीरियल
तारक मेहता का उल्टा चश्मा के किरदार तारक मेहता के लिए हुई थी.
TMKC मतलब - तारक मेहता का चाचा
TMKB मतलब - तारक मेहता का बाप
राइटर तारक मेहता बचपन में अपने चाचा और बाप से बहुत गालियां खायी थी , इसलिए उन्होंने इन शब्दों का प्रयोग उनके लिए किया था
लोगों ने X पर इसको गाली बना दिया.
तो अगली बार कोई ये शब्द बोले तो उसको बोलो
तारक मेहता के 2014 से पहले वाले एपिसोड देख लीजियेगा. 😊

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दादी कहती थी कि बड़ों के मुद्दों में बच्चों को नहीं पड़ना चाहिए।
अब ये बच्चों का ब्लॉगर बड़ों के मुद्दों में कूदा तो दिख गए दिन में तारे....?
सौरव जोशी की अच्छी भली दुकान चल रही थी फैमिली ड्रामा दिखा कर।
लेकिन भाई को बनना था मसीहा।
लेकिन भाई को नहीं पता था कि ये बच्चों का खेल नहीं है।
भाई ने जोश जोश में आवाज उठा दी।
अब भाई को बैक फायर हुआ पहले IT cell का और फिर मर्सिडीज वाले एक्टिव हो गए।
अब भाई खेल रहे हैं माफी माफी।
आप लोगों को क्या लगता है ये माफीनामा मर्सिडीज वालों के दबाव में लिखा या इसके पीछे कोई ओर है?

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पता नहीं क्यों, लेकिन इस बार सोनम वांगचुक को देखकर बार-बार प्रो. जी. डी. अग्रवाल याद आ जाते हैं।
क्योंकि इस देश की एक पुरानी आदत है।
जब कोई आदमी ज़िंदा होता है, लड़ रहा होता है, तब उसकी आवाज़ सुनाई नहीं देती।
लेकिन वही आदमी चला जाए, तो श्रद्धांजलियों की कमी नहीं रहती।
प्रो. जी. डी. अग्रवाल इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं।शायद उन्हें उम्मीद थी कि कोई उनकी बात सुनेगा।
कोई उनसे बात करेगा। लेकिन इंतज़ार लंबा होता गया, और आखिरकार वे चले गए।
अफसोस, जो ध्यान उन्हें जीते जी मिलना चाहिए था, वह उनके जाने के बाद मिला।
शायद इसलिए आज सोनम वांगचुक को लेकर बेचैनी है।
ज़रूरी नहीं कि आप उनकी हर बात से सहमत हों। लेकिन कम से कम उनकी बात तो सुनी जानी चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि बाद में फिर सिर्फ़ अफसोस ही बचे।
मैं बस इतना नहीं चाहता कि कुछ साल बाद फिर किसी तस्वीर के नीचे यही लिखना पड़े...
काश, हमने उन्हें पहले सुना होता।


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अनपढ़ पार्टी के अपढ़ नेता,दिन रात हमें एक ही बताते है,कि देश मजबूत हाथों में है,डंकाफटी का डंका दुनिया में चहुंओर बज रहा है।
देश में जैसे ही कोई संकट आती है,उनकी नीतियों से जनता त्रस्त होती है,तो राजा बाबू विदेश विनोद करने चले जाते है,इधर प्रजा त्रस्त,उधर नेता मस्त!
फिर न्यूज चैनल वाले उस संकट को छोड़ कर राजा का दिया बाजा बजाने लगते है,ऐसा रागदरबारी गाते है, त्रस्त जनता भी भक्ति की शक्ति के साथ नारा लगाती है।
बेचारी अधकचरी जनता भूल जाती है।
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