Manoj Kumar Jha@manojkjhadu
बहुत पुराने समय की बात है। एक राजा था—लेकिन वह जन्म से राजा नहीं बना था, उसे उसकी प्रजा ने चुना था। यही बात वह बार-बार गर्व से दोहराता भी था। पर जो लोग उसे ध्यान से देखते थे, उन्हें कुछ और ही दिखाई देता था। जब वह प्रजा की बात करता, तो उसके शब्दों में मिठास होती; लेकिन जब वह स्वयं को देखता, तो उसकी आँखों में एक अलग ही चमक आ जाती। उसकी प्रजा के लिए प्रेम एक अभिनय था, अपने लिए प्रेम उसका सच।
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जब-जब प्रजा बेचैन होती—जब नौजवान रोजगार की बात करते, किसान अपनी फसल और कर्ज़ की चिंता जताते, मजदूर सम्मान और बराबरी की मांग करते—तब राजा उनके सवालों का जवाब नहीं देता। वह उनका ध्यान भटका देता।वह कहता, “आइए, देखिए हमने क्या बनाया है।”
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और फिर सामने खड़ी होती एक भव्य, विशाल इमारत—संगमरमर से चमकती, आसमान को छूती हुई, रोशनी और तालियों से गूंजती हुई। कुछ पल के लिए लोग सब भूल जाते—भूख, बेरोज़गारी, असमानता… सब धुंधला पड़ जाता। समय बीतता गया। हर बार जब सवाल उठते, एक नया तमाशा खड़ा कर दिया जाता—और ऊँची इमारत, और चौड़ी सड़क, और बड़ा उत्सव। प्रजा से कहा जाता—अपने जीवन को मत देखो, भव्य इमारतों को देखो।
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लेकिन धीरे-धीरे कुछ बदलने लगा। एक दिन एक छोटे बच्चे ने अपने पिता का हाथ पकड़कर उस नई इमारत को देखा और पूछा, “क्या इससे हमें खाना मिलेगा?” पिता के पास कोई जवाब नहीं था। एक बूढ़ी औरत, जो हर उद्घाटन में ताली बजाती थी, अब जाना बंद कर चुकी थी। उसने कहा,
“मैंने बहुत इमारतें देख लीं, पर मेरी छत अब भी टपकती है।”
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कुछ मजदूर, जिन्होंने इन इमारतों को अपने हाथों से बनाया था, आपस में कहने लगे,
“हमने ये दीवारें खड़ी की हैं, पर हम इनके बाहर ही क्यों खड़े हैं?” धीरे-धीरे, बहुत धीरे, वह जादू टूटने लगा। एक दिन राजा फिर से अपनी सबसे भव्य रचना का उद्घाटन करने आया। लेकिन इस बार कुछ अलग था। तालियाँ कम थीं। आँखें ऊपर नहीं, उसकी तरफ देख रही थीं—सीधी, सवाल करती हुई, बेखौफ।
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भीड़ में से एक आवाज़ उठी—धीमी, पर ठोस: “हमने आपको सपने दिखाने के लिए नहीं चुना था, अपनी ज़िंदगी बदलने के लिए चुना था।” पहली बार राजा ठिठक गया। क्योंकि इमारतें ध्यान भटका सकती हैं, लेकिन सम्मान नहीं दे सकतीं। तमाशा सवालों को दबा सकता है, लेकिन हमेशा के लिए नहीं।और उसी क्षण प्रजा को एक सच्चाई समझ में आने लगी—जो शासक समस्याओं का जवाब दिखावे से देता है, वह समाधान नहीं, सिर्फ जवाबदेही को टाल रहा होता है।
इस प्राचीन कहानी से नयी सीख:
जब समाज अपने सवालों को भव्यता के भ्रम के समक्ष भूल जाता है, तो वह अपनी आवाज़ खो देता है। लेकिन जब लोग उस दिखावे/भ्रम के पार देखना शुरू कर देते हैं, तो वे अपनी ताकत वापस पा लेते हैं। और वहीं से यह सिलसिला खत्म होना शुरू होता है —क्योंकि शासन आँखों को चकाचौंध करने के लिए नहीं, जीवन को गरिमा देने के लिए होता है।
जय हिन्द
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