Nisha Singh
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Nisha Singh
@nishasinghcms
नींद में भी बहस ख़तम न होती, मेरा शहर एक लम्बी बहस की तरह है… #अमृता_प्रीतम 🌸
Lucknow Katılım Kasım 2024
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लिखते रहिये ताकि लोग पढ़े और पढ़ते रहिये ताकि खुद को महसूस कर सके ✨🙏🏻
कुछ लोगों सिर्फ लिखते नहीं है, ऐसा लगता है मानो हमारी किसी कहानी को या कोई अधूरी ख्वाहिशों को बिना हमसे जाने ही शब्दों की मोतियों में पिरो देते है.
साधारण तो बिल्कुल भी नहीं होते है ऐसे लोग.दिल से भावुक और मॉं सरस्वती के आशीर्वाद से फलीभूत होते है.
जब भी मैं पढ़ती हूॅं किसी लेखक/लेखिका या आम आदमी को और उनकी लेखनी में जब जीवंत हो उठता है मेरा सुख:दुख:प्रेम:विरह उस क्षण मैं खुद को बहुत ही भाग्यशाली मानती हूॅं कि मुझे पढ़ने का सौभाग्य मिला।

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@chayisquerajnit @saurabhtop बहुत खूब! बेहतरीन लिखा है आपने। 👌✨
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“रात 10:28 पर लिखा गया सौरभ द्विवेदी के नाम एक ख़त।”
प्रिय सौरभ, @saurabhtop
रात के 10.28 हो रहे, और सच में 10.28 हो रहें, इसमें मेरी कोई कल्पना नहीं है। कल सुबह ये ख़त पोस्ट करूंगा, कल का समय नहीं मालूम। सोचा तो यही था, लेकिन अभी डाल रहा हूं, और अब 11.39 हो रहें। तुम जब भी देखो समझ लेना कि ये पोस्ट ताज़ा है अभी अभी लिखा गया है, नहीं भी देखो तो कोई बड़ी समस्या नहीं है, शायद तुम अभी भी चमारी में होंगे या लौट चुके होंगे, अब तुम्हारा ठिकाना भी नहीं मालूम।
पहले मालूम होता था कि तुम दिल्ली या नोएडा में ही होंगे लेकिन अब तुम्हारा ठिकाना मुंबई भी होगा शायद। लेकिन एक सेकेंड, तुम सोच रहे होंगे कि ये फालतू सा कौन आदमी है जो मुझे बार - बार तुम कह रहा है। दरअसल सौरभ ये हिम्मत मुझे तुम्हारे गांव की उस वीडियो से आई जहां तुम कह रहे थे कि कोई बच्ची आकर कहे कि मुझे जूता चाहिए तो ये मत सोचना कि तुम बड़े आदमी हो, या जो भी इस शब्द को चीजें मुझे नहीं याद, शायद इससे मिलता जुलता ही कुछ था।
खैर! आगे तुमने कहा कि भाग्यशाली को तुम कि कोई बच्ची तुम्हें हक़ के साथ कह रह रही है कि मुझे जूते चाहिए। मैं भी वही भाग्यशाली बनने का प्रयास कर रहा हूं, तुम का संबोधन करके, क्योंकि मुझे भी साहित्य का जूता चाहिए तुमसे।
क्योंकि मैं तुमपे अपना हक मानता हूं, मैं बड़े भाई से ज़्यादा दोस्त मानता हूं। इसलिए कभी तुम्हारी बुराई कर देता हूं, कभी तुम्हारे प्रेम में पागल हो जाता हूं और कभी तुमसे ज़्यादा उम्मीद के चक्कर में खुद का सत्यानाश कर लेता हूं। ये सब इतनी बार हो चुका है कि मानता हूं कि मुझे तुम्हें तुम कहने का अधिकार है।
झारखंड में सबसे पहले बच्चे तुम ही कहना सीखते है फ़िर उसमें संस्कार या झूठे दिखावटी संस्कार भरे जाते है तब वो आप कहने सीखते है, इसलिए मैं तुम्हें तुम ही कह रहा हूं क्योंकि मेरे में संस्कार की कमी है।
खैर! क्या लिखना चाह रहा हूं वहीं भूल गया। अब रुको याद कर रहा हूं। कर लिया याद और कसम से फिर 3 मिनट बाद इसको फिर से लिख रहा हूं।
यार क्या कमाल हो तुम।
जब भी तुम हिंदी बोलते हुए किसी का परिचय करवाते हो तो मुझे जलन होती है, लगता है कि मेरी प्रेमिका को मेरे से बेहतर कोई कैसे इस तरह चुंबन कर सकता है। और ये बात सत्य है कि जब तुम्हें स्क्रीन पर देखता हूं तो लगता है सौरभ हिंदी को चुंबन दे रहा। और जबरदस्ती होती तो दिल को मना भी लेता लेकिन महसूस होने लगता है कि हिंदी भी तुमसे लिपट गई है, और तुम्हारे चुम्मियों का पुरजोर साथ दे रही।
भैया, सौरभ ये ख़त यही ख़त्म कर रहा हूं। ट्विटर पे बड़ा पोस्ट नहीं कर सकता क्योंकि बड़ा सब्सक्रिप्शन चाहिए। और उतनी मेरी औकात नहीं है।
खैर! इस ख़त का 3 पार्ट तो लिखूंगा ही। तब तक के लिए आशीर्वाद दे देना। रूममेट ने गाना बजा रखा है कि " तुम दिल की धड़कन में रहते हो, रहते हो।"
ख़त लिखने वाला लड़का।
चाय इश्क़ और राजनीति।

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