Sanjeev Paliwal/संजीव पालीवाल@sanjeevpaliwal
फूल खिले बगिया उपवन में,
स्वार्थ न उनके निज़ जीवन में,
पता नहीं क्या विधि की रचना,
क्या माली के मन में।
माली जब भी बाग में जाये,
तोड़ पुष्प के गुछ बनाये,
कुछ तो चढ़े देव के सिर पे,
कुछ पहुँचें थे पैर में गिर के,
गूँथ गए जो कुछ माला में,
आशिक़ हाथ बंधे हाला में,
कुछ ने बाँधा दो जीवन को,
सात जन्म बंधन में,
पता नहीं क्या विधि की रचना,
क्या माली के मन में।
कुछ ने तख़्त का मान बढ़ाया,
राजा ने जब गले लगाया, कुछ की महिमा बड़ी है न्यारी,
पहुँच गए गजरा औ नारी,
कुछ ने लाज बचाई तन की,
फैशन प्यास बुझाई उनकी,
कुछ तो बिछ गए प्रेम डगर में,
छोड़ आन जीवन में,
पता नहीं क्या विधि की रचना,
क्या माली के मन में।
कुछ ने युद्ध विराम कराया,
श्वेत पुष्प जब हाथ में आया,
लाल लिए जब झुके हैं आशिक़,
घुटने बल पर प्रणय मुनासिब,
पहन के नेता गले हज़ारा,
देते हैं संघर्ष का नारा,
आस गई उम्मीद गई,
फिर भी थे अर्थी संग में
पता नहीं क्या विधि की रचना,
क्या माली के मन में।
कुछ फूलों की किस्मत ना थी,
किसी भी मुहूर्त जरूरत ना थी,
कुछ तो झुके ज़मीन में इतने,
आतुर हो मिट्टी में मिलने,
कुछ जो बचे थे वह मधुबन में,
सोच रहे थे अपने मन में,
रात की रानी तो ना खिलती,
पर महके जीवन में,
पता नहीं क्या विधि की रचना,
क्या माली के मन में।
नीतीश्वर कुमार
@nitishwarKumar