Pancham
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"अपरोक्षानुभूति" अलातं भ्रमणेनैव वर्तुलं भाति सूर्यवत्। तद्वदात्मनि देहत्वं पश्यत्यज्ञानयोगतः।।७९।। (भगवद्पादाचार्य आदि शंकराचार्य द्वारा रचित "अपरोक्षानुभूति") भगवत्पादाचार्य भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित अपरोक्षानुभूति का यह श्लोक अद्वैत वेदान्त के अत्यन्त सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक एवं दार्शनिक तत्त्व को सरल दृष्टान्त द्वारा प्रकाशित करता है। यहाँ “अलात” अर्थात् अग्नि से प्रज्वलित लकड़ी या मशाल का उदाहरण दिया गया है। जब उस जलती हुई लकड़ी को तीव्र गति से घुमाया जाता है, तो वह एक अखण्ड अग्नि-वृत्त के रूप में प्रतीत होती है; यद्यपि वास्तव में वहाँ कोई वृत्त नहीं है। वह केवल तीव्र गति से उत्पन्न भ्रान्ति है। उसी प्रकार, शुद्ध, निराकार, निर्विकार, साक्षीस्वरूप आत्मा में देहत्व का आरोप केवल अज्ञानजन्य भ्रान्ति है। “अलात-चक्र” का यह दृष्टान्त भगवान् गौड़पादाचार्य कृत माण्डूक्यकारिका में भी प्रसिद्ध है- “अलातशान्ति-प्रकरण” में जगत् की मायिकता को इसी उदाहरण से प्रतिपादित किया गया है। आदि शंकराचार्य उसी परम्परा के समर्थ संवाहक हैं। जब अग्निदण्ड को घुमाया जाता है, तो न कोई वास्तविक वृत्त उत्पन्न होता है, न अग्नि का आकार परिवर्तित होता है, न कोई नई सत्ता प्रकट होती है। केवल नेत्रों की सीमा और गति की निरन्तरता के कारण भ्रान्ति उत्पन्न होती है। इसी प्रकार आत्मा कभी देह नहीं बनती, न उसमें कर्तृत्व-भोक्तृत्व का कोई वास्तविक परिवर्तन होता है, न वह सीमित जीव में परिणत होती है। किन्तु अज्ञानयोगतः अविद्या के संसर्ग से आत्मा में देहत्व का आभास होता है। उपनिषद् बारम्बार उद्घोष करती हैं कि “असंगो ह्ययं पुरुषः” यह पुरुष (आत्मा) सर्वथा असंग है। “न जायते म्रियते वा कदाचित्” वह न जन्म लेता है, न मरता है।”अयमात्मा ब्रह्म” यही आत्मा ब्रह्म है। यदि आत्मा देहस्वरूप होती, तो वह जन्म, जरा, व्याधि और मृत्यु से बँध जाती। किन्तु उपनिषद् उसे सर्वथा निर्लेप और शाश्वत सिद्ध करती हैं। अतः देह का आत्मा में आरोप केवल अलात-चक्रवत् भ्रान्ति है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् कहते हैं कि “नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः”असत् का अस्तित्व नहीं, और सत् का अभाव नहीं। देह अनित्य है, परिवर्तनशील है। असत्-स्वरूप है। आत्मा नित्य, अविकार, सर्वव्यापक है; अतः सत् है। फिर भी अज्ञानवश मनुष्य कहता है कि मैं मोटा हूँ”, “मैं वृद्ध हूँ”, “मैं दु:खी हूँ।” यह “मैं” का देह में आरोप ही अज्ञानयोग है। गीता में स्पष्ट कहा गया है कि “क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि” इस शरीर-क्षेत्र में जो जानने वाला है, वही मैं हूँ। आत्मा क्षेत्रज्ञ है; देह क्षेत्र है। दोनों का अभेद-बुद्धि भ्रान्ति है। ब्रह्मसूत्र में कहा गया है कि “नात्मा शरीरस्य” आत्मा शरीर का धर्मी नहीं। शंकरभाष्य में स्पष्ट किया गया है कि आत्मा शरीर से सर्वथा भिन्न है; किन्तु अविद्या से देहाभिमान उत्पन्न होता है। यह देहाभिमान ही संसार-बन्धन का मूल है। जैसे अलात के भ्रम से वृत्त का आभास होता है, वैसे ही चैतन्य के निरन्तर प्रकाश में बुद्धि-वृत्तियों की गति से “अहं देहः’ का मिथ्या ज्ञान उत्पन्न होता है। भगवत्पाद भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य अपने ब्रह्मसूत्र-भाष्य के प्रारम्भ में ही कहते हैं कि “स्मृतिरूपः परत्र पूर्वदृष्टावभासः” अध्यास वह है, जिसमें एक वस्तु में दूसरी वस्तु का आभास होता है। आत्मा और देह का यह परस्पर अध्यास ही संसार है। आत्मा की चैतन्यता देह में आरोपित होती है, तब देह ‘जीवित’ प्रतीत होती है। देह के धर्म (जन्म, मृत्यु, रोग, शोक) आत्मा में आरोपित होते हैं, तब जीव दु:खी प्रतीत होता है। किन्तु वास्तव में आत्मा सदा अलात से भिन्न अग्नि की भाँति स्वप्रकाश है। अलात-चक्र दृष्टान्त यह भी सूचित करता है कि भ्रान्ति का उदय और लय, दोनों कालबद्ध हैं। सत्य पर उसका कोई वास्तविक प्रभाव नहीं पड़ता। जैसे अलात-चक्र का आभास समाप्त होते ही केवल अग्नि-दण्ड शेष रहता है, वैसे ही ब्रह्मज्ञानोदय पर देहाभिमान लीन हो जाता है, जीवत्व का मिथ्यात्व प्रकट होता है, केवल शुद्ध, अखण्ड, अद्वय ब्रह्म शेष रहता है। माण्डूक्यकारिका कहती है कि “अजातं जायते किंचित्” वास्तव में कुछ भी उत्पन्न नहीं होता। अतः देहत्व की प्रतीति भी नित्यानित्य-विवेक के अभाव से उत्पन्न एक काल्पनिक वृत्त है। जब साधक श्रवण, मनन और निदिध्यासन के द्वारा इस सत्य को आत्मसात् करता है, तब वह जानता है कि मैं देह नहीं, देह का साक्षी हूँ। ”मैं मन नहीं, मन का द्रष्टा हूँ।” “मैं चैतन्यस्वरूप ब्रह्म हूँ।” तब “अलात-वृत्त” की समस्त भ्रान्ति शान्त हो जाती है। शुद्ध आत्मा सूर्यवत् स्वयं प्रकाशमान है; उसे किसी बाह्य प्रमाण की आवश्यकता नहीं। #अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त #AdvaitVedanta






जय दादी की जय जय श्री दादी जी की भाई जी राणी सत्यै नमो नमः





















