दिल्ली एनसीआर का एक सामान्य दिन।
पूरे जीवन की कमाई जोड़कर कोई प्रवासी एक घर-ठिकाना लेता और उसे ऐसे परिवेश में रहना होता है।
मामला 1st Avenue नोएडा का।
आशा करते हैं पुलिस इस “उभरते गुंडे” को सजा देगी जो खुलेआम सोसाइटी में मारने की धमकी दे रहा है।
जोहार साथियों,
आज समाचार देखने के बाद, आप सभी के मन में कई सवाल उमड़ रहे होंगे। आखिर ऐसा क्या हुआ, जिसने कोल्हान के एक छोटे से गांव में रहने वाले एक गरीब किसान के बेटे को इस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया।
अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत में औद्योगिक घरानों के खिलाफ मजदूरों की आवाज उठाने से लेकर झारखंड आंदोलन तक, मैंने हमेशा जन-सरोकार की राजनीति की है। राज्य के आदिवासियों, मूलवासियों, गरीबों, मजदूरों, छात्रों एवं पिछड़े तबके के लोगों को उनका अधिकार दिलवाने का प्रयास करता रहा हूं। किसी भी पद पर रहा अथवा नहीं, लेकिन हर पल जनता के लिए उपलब्ध रहा, उन लोगों के मुद्दे उठाता रहा, जिन्होंने झारखंड राज्य के साथ, अपने बेहतर भविष्य के सपने देखे थे।
इसी बीच, 31 जनवरी को, एक अभूतपूर्व घटनाक्रम के बाद, इंडिया गठबंधन ने मुझे झारखंड के 12वें मुख्यमंत्री के तौर पर राज्य की सेवा करने के लिए चुना। अपने कार्यकाल के पहले दिन से लेकर आखिरी दिन (3 जुलाई) तक, मैंने पूरी निष्ठा एवं समर्पण के साथ राज्य के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया। इस दौरान हमने जनहित में कई फैसले लिए और हमेशा की तरह, हर किसी के लिए सदैव उपलब्ध रहा। बड़े-बुजुर्गों, महिलाओं, युवाओं, छात्रों एवं समाज के हर तबके तथा राज्य के हर व्यक्ति को ध्यान में रखते हुए हमने जो निर्णय लिए, उसका मूल्यांकन राज्य की जनता करेगी।
जब सत्ता मिली, तब बाबा तिलका मांझी, भगवान बिरसा मुंडा और सिदो-कान्हू जैसे वीरों को नमन कर राज्य की सेवा करने का संकल्प लिया था। झारखंड का बच्चा- बच्चा जनता है कि अपने कार्यकाल के दौरान, मैंने कभी भी, किसी के साथ ना गलत किया, ना होने दिया।
इसी बीच, हूल दिवस के अगले दिन, मुझे पता चला कि अगले दो दिनों के मेरे सभी कार्यक्रमों को पार्टी नेतृत्व द्वारा स्थगित करवा दिया गया है। इसमें एक सार्वजनिक कार्यक्रम दुमका में था, जबकि दूसरा कार्यक्रम पीजीटी शिक्षकों को नियुक्ति पत्र वितरण करने का था। पूछने पर पता चला कि गठबंधन द्वारा 3 जुलाई को विधायक दल की एक बैठक बुलाई गई है, तब तक आप सीएम के तौर पर किसी कार्यक्रम में नहीं जा सकते।
क्या लोकतंत्र में इस से अपमानजनक कुछ हो सकता है कि एक मुख्यमंत्री के कार्यक्रमों को कोई अन्य व्यक्ति रद्द करवा दे? अपमान का यह कड़वा घूंट पीने के बावजूद मैंने कहा कि नियुक्ति पत्र वितरण सुबह है, जबकि दोपहर में विधायक दल की बैठक होगी, तो वहां से होते हुए मैं उसमें शामिल हो जाऊंगा। लेकिन, उधर से साफ इंकार कर दिया गया।
पिछले चार दशकों के अपने बेदाग राजनैतिक सफर में, मैं पहली बार, भीतर से टूट गया। समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूं। दो दिन तक, चुपचाप बैठ कर आत्म-मंथन करता रहा, पूरे घटनाक्रम में अपनी गलती तलाशता रहा। सत्ता का लोभ रत्ती भर भी नहीं था, लेकिन आत्म-सम्मान पर लगी इस चोट को मैं किसे दिखाता? अपनों द्वारा दिए गए दर्द को कहां जाहिर करता?
जब वर्षों से पार्टी के केन्द्रीय कार्यकारिणी की बैठक नहीं हो रही है, और एकतरफा आदेश पारित किए जाते हैं, तो फिर किस से पास जाकर अपनी तकलीफ बताता? इस पार्टी में मेरी गिनती वरिष्ठ सदस्यों में होती है, बाकी लोग जूनियर हैं, और मुझ से सीनियर सुप्रीमो जो हैं, वे अब स्वास्थ्य की वजह से राजनीति में सक्रिय नहीं हैं, फिर मेरे पास क्या विकल्प था? अगर वे सक्रिय होते, तो शायद अलग हालात होते।
कहने को तो विधायक दल की बैठक बुलाने का अधिकार मुख्यमंत्री का होता है, लेकिन मुझे बैठक का एजेंडा तक नहीं बताया गया था। बैठक के दौरान मुझ से इस्तीफा मांगा गया। मैं आश्चर्यचकित था, लेकिन मुझे सत्ता का मोह नहीं था, इसलिए मैंने तुरंत इस्तीफा दे दिया, लेकिन आत्म-सम्मान पर लगी चोट से दिल भावुक था।
पिछले तीन दिनों से हो रहे अपमानजनक व्यवहार से भावुक होकर मैं आंसुओं को संभालने में लगा था, लेकिन उन्हें सिर्फ कुर्सी से मतलब था। मुझे ऐसा लगा, मानो उस पार्टी में मेरा कोई वजूद ही नहीं है, कोई अस्तित्व ही नहीं है, जिस पार्टी के लिए हम ने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। इस बीच कई ऐसी अपमानजनक घटनाएं हुईं, जिसका जिक्र फिलहाल नहीं करना चाहता। इतने अपमान एवं तिरस्कार के बाद मैं वैकल्पिक राह तलाशने हेतु मजबूर हो गया।
मैंने भारी मन से विधायक दल की उसी बैठक में कहा कि - "आज से मेरे जीवन का नया अध्याय शुरू होने जा रहा है।" इसमें मेरे पास तीन विकल्प थे। पहला, राजनीति से सन्यास लेना, दूसरा, अपना अलग संगठन खड़ा करना और तीसरा, इस राह में अगर कोई साथी मिले, तो उसके साथ आगे का सफर तय करना।
उस दिन से लेकर आज तक, तथा आगामी झारखंड विधानसभा चुनावों तक, इस सफर में मेरे लिए सभी विकल्प खुले हुए हैं।
आपका,
चम्पाई सोरेन
@Mohiteksoch जैसा कि आप कह रहे हैं कि रिजर्व EVM स्ट्रांग रूम के पास वाले रुम में ही रखा जा रहा था तो ये वहां के DC की गलती है रिजर्व EVM strong room के पास नही वरण वहां से दूर कहीं वेयर हाउस में रखी जाती है। ताकि को संशय न हो।कोई गलतफहमी न फैले।
ये वीडियो आज़मगढ़ के स्ट्रांग रूम की है जहाँ जनता के वोटो को सुरक्षित रक्खा जाता है
जब मै साहब के पास पहुँचता हूँ तो साहब जी कैमरा देखते ही सटपटा कर मशीन का ठक्कन बंद कर देते है और कान में फ़ोन लगा लेते है
पूछने पर कांपते हुए बताते है की मशीन की बैटरी निकाल रहा था,
हाँ ये सच है की हाथ में बैटरी थी और EVM डब्बा खाली था
आपको बताते चले की वोटिंग होने के बाद व मशीन शील्ड होने से पहले मशीन से बैटरी निकाल ली जाती है जिससे मशीन में शार्ट सर्किट या मशीन में बैटरी के वजह से कोई समस्या न आ सके
साथ में आप ये जान ले की मशीन के बारे सभी अधिकारियों को ट्रेनिंग भी दी जाती है फिर ये चूक कैसे ?
मै साहब पर ब्लेम नहीं कर रहा हूँ ह्यूमेन मिस्टेक है, हो जाता है
वैसे अगर आप एक जागरूक वोटर है तो आपको पता होना चाहिए EVM में वोट पड़ने के बाद साथ में शील्ड होने के बाद काउंटिंग के दिन या समय पर ही खोली जा सकती है उससे पहले मशीन खुलती है तो ये गैर क़ानूनी है
लेकिन मेरे सवाल ये जरूर है की यही मशीन अगर शुक्ला जी पास होती तो, चौहान सर के हाथ होती तो, मिश्रा जी के हाथ होती तो, निगम जी के हाथ होती तो
ऐसा नहीं है की सभी pda वाले ही थे इस भीड़ में ये भी होंगे इस अंधेरे में कहीं भी बैठ कर मन की बात मशीन तक पहुंचाई जा सकती thi फिर मोमबत्ती जला कर EVM शील्ड हो जाती।
मुझे मजा तो तब आई जब आजमगढ़ के स्ट्रांग रूम तक दो DCM गाडी EVM से भरी हुई अंदर आते देखा वो गाड़ियां SDM साहब खुद अंदर ला रहे थे फिर भी स्थानीय नौजवान पुलिस वाले उस गाडी को अंदर नहीं जाने दे रहे थे कुछ देर गुटरगू होने के बाद गाडी स्ट्रांग रूम तक पहुंच गई मैंने SDM सर से पूछा तो बताया की ये रिज़र्व EVM है
{ रिज़र्व EVM वो होती है जब किसी बूथ पर कोई मशीन खराब हो जाए तो तुरंत उसमे वोटिंग कराई जाती है }
लेकिन यहाँ भी हमारे दिमाक में संसय पैदा हो रहा था की कही ऐसा न हो की काउंटिंग के दिन काउंटिंग उसमे न हो कर इसमें हो रही हो क्यूंकि रिज़र्व EVM में क्या है किसी को नहीं पता और किसी ने चेक भी नहीं किया क्यूंकि वोटिंग करी हुई EVM रिज़र्व EVM एक ही जगह रक्खी है बस रूम चेंज है।
उन लोगो से मेरा अनुरोध है जो EVM की निगरानी में है की जब काउंटिंग हो रही हो तो रिज़र्व EVM किस रूम में रक्खी है नजर बना कर रक्खे
खैर हमारी लेखनी का उद्देस्य आपको exclusive जानकारी देने का था किसी को भ्रमित करना या समाज में नफरत फ़ैलाने को नहीं।
शिक्षा विभाग की मनमानी का नतीजा सामने आ रहा है । शिक्षक विद्यालय पकड़ने के चक्कर में मरने के लिए तैयार है ।।
शिक्षक जानबूझकर प्रताड़ित किया जा रहा है ।।
6 बजकर 1 मिनट पर विद्यालय पर नोट कैम फोटो ले कर विभाग को भेजना है , और जाँच कर्मी का तो पूछो ही मत, उन्हें तो टारगेट मिला है कि कैसे ज़्यादा से ज़्यादा शिक्षक की हज़ारी काटे ।।
सुबह 6:00 बजे से 1:30pm तक विद्यालय का समय रखा गया है जो तो पूरी तरह से ग़लत है @BiharEducation_ इसपे दुबारा विचार कर समय में सुधार करे ।
@News18Bihar विद्यालय जाने का समय कोई बहुत ज्यादा पहले नही है।पहले भी हमेशा 6.30am ही हुआ करता था। दिक्कत जाने के समय से है जो कि 1.30pm है। उसमें भी वैसे बच्चे जिनको गर्मी की छुट्टी में भी विद्यालय आना पड़ा वो आये भी, उन्ही बच्चों को डेढ़ बजे तक रहना पड़े बांकी 12 बजे ही जाय, उनको दिक्कत है।
ACS केके पाठक के इस नए आदेश से हर कोई परेशान।
पटना: टाइमिंग चेंज होने के बाद आज शिक्षक पहले दिन स्कूल गए थे, शिक्षक पहले दिन कैसे समय पर पहुंचे और उन्हें किन किन परेशानियों का सामना करना पड़ा। देखिए...
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@BeKhushboo बस अपनी दिनचर्या में थोड़ा सा बदलाव कीजिये। अंतिम समय मे घर से निकलने की न सोचिये। इतना वक्त लेकर निकलिये की हड़बड़ी न करनी परे न ही गाड़ी ज्यादा तेज भगानी पड़े।
रोज यही करना है तो भागमभाग क्यो!
समय से पहले निकलिये और सुरक्षित घर वापस आईये।
25 सालों से ऐसे ही कर रहा हूँ।