




P L Punia
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@plpunia
MP LS 2009, MP RS 2014, Ex-Chairman - National Commission for Scheduled Castes 2010, 2013. Member CEC !








असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा द्वारा कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे जी के विरुद्ध इस्तेमाल की गई अभद्र और घटिया भाषा पूरी तरह निंदनीय, शर्मनाक और अस्वीकार्य है। खरगे जी देश के एक वरिष्ठ और लोकप्रिय दलित और जननेता हैं - उनका अनुभव, कद और प्रतिष्ठा अतुलनीय है। उनका अपमान किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि इस देश के SC-ST समाज के करोड़ों लोगों का भी अपमान है। लेकिन यह कोई नई बात नहीं है - यह BJP-RSS की पुरानी और सुनियोजित मानसिकता है। बाबासाहेब अंबेडकर का अपमान हो, दलित नेताओं को नीचा दिखाना हो, या SC-ST समाज के प्रतिनिधियों पर व्यक्तिगत हमले हों - भाजपा और RSS का इतिहास गवाह है कि जब-जब कोई दलित नेता सच बोलता है, तब-तब ये उसे अपमानित करने पर उतर आते हैं। यही इनकी विचारधारा है, यही इनका असली चरित्र और चेहरा है। और, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी से सीधा सवाल है - क्या आप हिमंता सरमा की इस भाषा का समर्थन करते हैं? आपकी चुप्पी मजबूरी नहीं, सहमति है। प्रधानमंत्री अगर देश के करोड़ों दलितों के सम्मान पर हमला होते देख मुँह न खोलें - वो न सिर्फ अपनी ज़िम्मेदारी से भाग रहे हैं, बल्कि उस अपमान के हिस्सेदार भी हैं।

हिमंता सरमा देश के सबसे भ्रष्ट और सबसे सांप्रदायिक मुख्यमंत्री हैं। हिमंता सरमा ने असम की जनता को धोखा दिया है और गुमराह किया है - इसका सबूत जनता के सामने है। असम की जनता उनके भ्रष्टाचार को कभी माफ नहीं करेगी - सज़ा तय है।

8 साल पहले, SC/ST Act को कमजोर करने के खिलाफ लाखों दलित-आदिवासी युवाओं ने आंदोलन किया, जिसमें कई गिरफ्तार हुए। संसद ने कानून तो मजबूत किया, लेकिन आज भी निर्दोष युवा मुकदमों का बोझ उठा रहे हैं। मजबूत SC/ST Act उनका हक है और शांतिपूर्ण आंदोलन उनका अधिकार। आज प्रधानमंत्री से आग्रह किया है कि संवेदनशील और न्यायपूर्ण दृष्टि से ये सभी मामले वापस लिए जाएं।


असिस्टेंट कमांडेंट अजय मलिक जी ने नक्सली मुठभेड़ के दौरान IED ब्लास्ट में अपना एक पैर खो दिया - देश की रक्षा में सब कुछ दांव पर लगा दिया। और इस बलिदान के बदले मिला क्या? 15 साल से अधिक की निष्ठापूर्ण सेवा के बावजूद - प्रमोशन नहीं, अपनी ही फोर्स को लीड करने का अधिकार नहीं। क्योंकि सभी शीर्ष पद IPS अफसरों के लिए आरक्षित हैं। यह सिर्फ एक अफसर की पीड़ा नहीं - यह लाखों CAPF जवानों के साथ हो रहा संस्थागत अन्याय है। ये जवान सीमाओं पर तैनात रहते हैं, आतंक और नक्सलवाद से लोहा लेते हैं, लोकतंत्र के उत्सव चुनावों को सुरक्षित बनाते हैं। लेकिन जब इनके अधिकार और सम्मान की बात आती है, तो व्यवस्था मुँह फेर लेती है। खुद CAPF के जवान इस भेदभाव के विरुद्ध हैं। सुप्रीम कोर्ट तक ने इस व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। फिर भी, वर्तमान सरकार इसी अन्याय को कानूनी रूप से स्थायी बनाने पर आमादा है। यह विधेयक केवल एक करियर रोकने का प्रयास नहीं - यह उन लोगों का मनोबल तोड़ने की कोशिश है जो देश की पहली रक्षा पंक्ति हैं। और जब उनका मनोबल टूटता है, तो राष्ट्रीय सुरक्षा की नींव हिलती है। हम CAPF के जवानों का सम्मान सिर्फ शब्दों में नहीं, नीतियों में करते हैं। कांग्रेस का साफ वादा है - हमारी सरकार आते ही यह भेदभावपूर्ण कानून समाप्त होगा। क्योंकि जो देश के लिए लड़ता है, उसे नेतृत्व का अधिकार मिलना ही चाहिए।

देहरादून में मॉर्निंग वॉक पर निकले एक सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर वी के जोशी जी की दिनदहाड़े निर्मम हत्या साफ बताती है कि उत्तराखंड की कानून-व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। सरहद पर देश की रक्षा में जीवन समर्पित करने वाले ही आज अपने शहर में ही असुरक्षित हैं - आम नागरिक और कई समुदाय डर कर जीने को मजबूर हैं। BJP राज में सिर्फ़ अपराधी बेखौफ और महफूज़ है। कभी शांति और सुरक्षा की पहचान रहा है हमारा उत्तराखंड, आज BJP के ग़ैर-जिम्मेदार नेतृत्व में हिंसा, हत्या और भय के साये में सिमट कर रह गया है।


ऊना की चीख आज भी इंसाफ के दरवाज़े पर दस्तक दे रही है। बीते 10 सालों से पीड़ित न्याय के लिए दर-दर भटक रहे हैं। अपमान, हिंसा और हत्या - BJP शासित गुजरात में दलितों, आदिवासियों की यही हकीकत बना दी गई है। मोदी जी के इसी असंवैधानिक और अन्यायपूर्ण मॉडल को पूरे देश पर थोपा जा रहा है।

देश की विदेश नीति आज compromised है, क्योंकि PM मोदी खुद compromised हैं। मोदी सिर्फ़ वही करते हैं जो अमेरिका और इज़राइल उनसे करवाना चाहते हैं। मोदी कभी भी भारत के हित के फैसले ले ही नहीं सकते - और ये साफ दिख रहा है।

रुपये का डॉलर के मुकाबले कमजोर होकर 100 की तरफ बढ़ना और इंडस्ट्रियल फ्यूल की कीमतों में तेज़ बढ़ोतरी - ये सिर्फ आंकड़े नहीं, आने वाली महंगाई के साफ संकेत हैं। सरकार चाहे इसे “नॉर्मल” बताए, लेकिन हकीकत ये है: • उत्पादन और ट्रांसपोर्ट महंगे होंगे • MSMEs को सबसे ज्यादा चोट लगेगी • रोज़मर्रा की चीज़ों के दाम बढ़ेंगे • FII का पैसा और तेजी से बाहर जाएगा, जिससे शेयर बाज़ार पर दबाव बढ़ेगा यानी, हर परिवार की जेब पर इसका सीधा और गहरा असर पड़ना तय है। और यह सिर्फ वक्त की बात है - चुनाव के बाद पेट्रोल, डीज़ल, LPG की कीमतें भी बढ़ा दी जाएंगी। मोदी सरकार के पास न दिशा है, न रणनीति - सिर्फ बयानबाज़ी है। सवाल यह नहीं कि सरकार क्या कह रही है - सवाल यह है कि आपकी थाली में क्या बचा है।




