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मैं गरीब दलित हूँ।
मेरे नाम पर सोचने वाला अमीर दलित मेरा मालिक बना बैठा है।
वह तय करता है- मैं कहाँ वोट दूँ, क्या सोचूँ, कौन-सा इतिहास मानूँ।
वह पूजा को पाखंड कहे, पर पुजारी मैं बनूँ।
वह और उसका परिवार बार-बार आरक्षण खाए-यह सही।
मैं सवाल करूँ-तो ग़द्दार।
घुसपैठ, नफ़रत, बदला-सब मानना है।
झाडू-मटका, स्तन-टैक्स जैसी डरावनी कहानियाँ सुनाकर मुझे सोचने से रोका जाता है।
यह संगठन नहीं, मानसिक गुलामी है।

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