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ryanmittra
@ryanmittra
Rainoholic/Pluviophile/Dreamer
New Delhi/Kolkata/Guwahati Katılım Ağustos 2009
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@ians_india "[But] she found in Panditji the companionship and equality of spirit and intellect that she craved. Each helped overcome loneliness in the other."
English

@ians_india "Quite apart from the fact that neither my mother nor Panditji had time to indulge in a physical affair, they were rarely alone. They were always surrounded by staff, police and other people."
English

@ians_india He told her, 'I need someone who can speak heart-to-heart. You alone can do it.' Throughout that long night, she stayed with him, helping him to find the strength he would need to lead the country through its darkest hour."
English

@ians_india He [Nehru] was in a state of total collapse... My mother was the only person who could give him the comfort he needed.
English

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आजकल मैं महसूस कर रहा हूँ कि मैं आहिस्ता-आहिस्ता सबसे दूर होता जा रहा हूँ। ये दूरी किसी नाराज़गी से नहीं जन्मी, न ही किसी अहंकार से। ये बस भीतर की एक थकान है गहरी, शांत, और लगभग अदृश्य। जैसे कोई नदी अपने ही तल में उतरती चली जाए, बिना शोर किए।
कभी मैं लोगों के बीच रहकर भी अपने होने को महसूस करता था। बातचीतों में अर्थ खोजता था, संबंधों में सुकून। लेकिन अब वही आवाज़ें मुझे थका देती हैं। शब्द बोझ लगते हैं। अपेक्षाएँ काँधे पर रखे अदृश्य पत्थरों की तरह भारी हो जाती हैं। कोई पूछ ले “कैसे हो?” तो मन में उत्तर होता है, पर होंठों तक नहीं आता। क्योंकि सच बहुत लंबा है, और लोग अक्सर छोटा जवाब चाहते हैं।
मैं चाहता हूँ कि कोई मुझे याद न करे। ये इच्छा अजीब है, लगभग क्रूर-सी लगती है, पर इसमें स्वार्थ नहीं है। इसमें बस एक थका हुआ मन है जो अब किसी की स्मृतियों का उत्तरदायित्व नहीं उठाना चाहता। प्रेम बहुत सुंदर होता है, पर प्रेम के साथ जो उम्मीदें आती हैं, जो निरंतर उपस्थित रहने की अनकही माँग आती है, वह अब मेरे भीतर के सन्नाटे से मेल नहीं खाती। मैं किसी के दिल में अधूरा वादा बनकर नहीं रहना चाहता।
एकांत का कमरा मुझे पुकारता है। चार दीवारें, एक खिड़की, हल्की रौशनी, और भीतर की आवाज़ें। वहाँ कोई अभिनय नहीं है। कोई भूमिका नहीं निभानी पड़ती, न मित्र, न पुत्र, न प्रेमी, न मार्गदर्शक, बस मैं अपने सबसे असुरक्षित, सबसे सच्चे रूप में। उस कमरे में बंद रहना भागना नहीं है; वह अपने भीतर उतरने की एक धीमी प्रक्रिया है। जैसे कोई व्यक्ति भीड़ से हटकर आईने के सामने खड़ा हो और पहली बार बिना झिझक खुद को देखे।
मुझे लगता है मैं थक गया हूँ लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरते-उतरते। हर किसी के लिए मजबूत बने रहना, हर परिस्थिति में संयमित दिखना, हर पीड़ा को भीतर ही भीतर सी लेना ये सब धीरे-धीरे आत्मा को चुप कर देता है और जब आत्मा चुप हो जाती है, तब व्यक्ति भी धीरे-धीरे दूर होने लगता है।
कभी-कभी सोचता हूँ, क्या ये अवसाद है? या ये आत्म-संरक्षण की कोई सहज प्रवृत्ति? शायद दोनों के बीच की कोई महीन रेखा है, जिस पर मैं चल रहा हूँ। मैं दुखी नहीं हूँ हर समय, पर प्रसन्न भी नहीं। जैसे भीतर का मौसम स्थिर हो गया हो न धूप, न वर्षा, बस धुंध।
लोग कहते हैं इतना मत सोचो, पर सोच तो स्वतः आता है। रात के सन्नाटे में जब सब सो जाते हैं, मेरे भीतर के प्रश्न जागते हैं। मैं अपने निर्णयों को परखता हूँ, अपने संबंधों को, अपने व्यवहार को। कहीं मैंने किसी को अनजाने में ठेस तो नहीं पहुँचाई? कहीं मैं स्वयं से ही बहुत अधिक अपेक्षा तो नहीं कर बैठा? इन प्रश्नों का कोई स्पष्ट उत्तर नहीं मिलता, बस एक लंबी चुप्पी मिलती है।
मैं चाहता हूँ कि कोई मुझे प्रेम न करे क्योंकि प्रेम का अर्थ है जवाबदेही और अभी मैं किसी की धड़कनों का भार उठाने की स्थिति में नहीं हूँ। अगर कोई मुझे याद करेगा, तो शायद मुझे लौटना पड़ेगा, समझाना पड़ेगा, उपस्थित रहना पड़ेगा, और मैं अभी अनुपस्थित रहना चाहता हूँ दुनिया से नहीं, बस उन अपेक्षाओं से जो मुझे खुद से दूर कर देती हैं।
एकांत में बैठकर मैं अपने भीतर के उस हिस्से को सुनना चाहता हूँ जिसे मैंने वर्षों से टाल रखा है। वह हिस्सा जो रोता नहीं, पर मौन रहता है। जो शिकायत नहीं करता, पर थक जाता है। शायद उसी को समय देने के लिए मैं ये दूरी चुन रहा हूँ।
सच कहूं तो ये दूरी स्थायी होगी या नहीं, नहीं जानता। हो सकता है कुछ समय बाद मैं फिर लोगों के बीच हल्का होकर लौट आऊं या हो सकता है ये एक आवश्यक विराम हो जैसे लंबी यात्रा में यात्री किसी पेड़ की छाया में बैठ जाए। अभी मैं बस बैठना चाहता हूँ। साँस लेना चाहता हूँ बिना किसी की निगाहों के। सोचना चाहता हूँ बिना किसी स्पष्टीकरण के।
अगर कभी कोई मेरी इस चुप्पी को समझ सके, तो वह यही समझे कि ये घृणा नहीं है, न उदासीनता। ये बस एक थके हुए मन की ईमानदार स्वीकारोक्ति है। मैं दूर हो रहा हूँ ताकि शायद किसी दिन फिर पूरे मन से पास आ सकूँ।
और अगर ऐसा न भी हो, तो कम से कम ये समय मैं अपने साथ सच्चाई से बिता लूँ बिना दिखावे के, बिना शोर के, बिना किसी को दोष दिए।
मैं किसी से भाग नहीं रहा, मैं बस अपने भीतर लौट रहा हूँ। 🫂😊
राघवेन्द्र चतुर्वेदी ✍️
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