अशोक शुक्ल

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अशोक शुक्ल

अशोक शुक्ल

@shuklasingota

श्रु॒तं मे॑ गोपाय(ईश्वर मेरे सीखे हुए की रक्षा करे),किसान पुत्र,शिक्षा विभाग मध्यप्रदेश में शिक्षक,पहले मेरे छात्र

Madhya Pradesh, India 464886 Katılım Eylül 2015
704 Takip Edilen207 Takipçiler
अशोक शुक्ल
#Airtel और #jio दोनों ही कंपनी का नेटवर्क बहुत कमजोर रहता है,पैसे पूरे वसूलते हैं।मुझे अपना व्यक्तिगत काम तो ज्यादा नहीं मगर सरकारी काम बिना ऑनलाइन होता ही नहीं,खुद का रिचार्ज पैकेज खत्म करो,स्पीड मिलती नहीं, कॉल करना भी मुश्किल,आवाज ही नहीं आती,#PMO India,#Ashwinivaishnav,#TRAI
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सुरेश पंत sureshpant
मातृदिवस पर आदर्श माँ महर्षि कण्व को प्रणाम। विश्वामित्र-मेनका की अवैध संतान शकुंतला, जिसे मेनका ने जन्म देते ही वन में छोड़ दिया था। महर्षि कण्व ने बच्ची को ममतामयी माँ की भाँति गोद लिया, नामकरण किया, पालपोसकर बड़ा किया और उसके प्रेम विवाह को स्वीकार कर ससुराल भेज दिया। आज की शब्दावली में कण्व "सिंगल पैरेंट" की अद्भुत मिसाल हैं।
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Yagnaja Bhatt 
Yagnaja Bhatt @yagnaja·
भारत मे अब स्टूडेंट्स स्कूल में फैल होने के बाद.. फैल होने से इनकार कर सकते है ..ममता बानो की तरह 😂😂
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Yagnaja Bhatt 
Yagnaja Bhatt @yagnaja·
डकार और गैस एक ही मां के बेटे है मगर गैस ने गलत रास्ता चुना इसलिए कोई उसकी इज्जत नहीं करता 😜😂😇
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सुरेश पंत sureshpant
आयुक्तेभ्यश्चोरेभ्यः परेभ्यो राजवल्लभात्। पृथिवीपतिलोभाच्च प्रजानां पञ्चधा भयम्॥ जनता में भय के 5 स्रोत हैं– सरकारी आयुक्त, चोर-डाकू, विदेशी, राजा के मुँह लगे सहायक और लालची राजा स्वयं। common man's 5 sources of fear– Commissioners, thieves, foreign forces, cronies of the king and the greedy king himself.
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Bhaishri Rameshbhai Oza
Bhaishri Rameshbhai Oza@PPBhaishri·
कंटकों कंकड़ों से भरे रास्तों पर हम जूता पहन के सुख पूर्वक चल के जा सकते हैं, लेकिन अपने जूते में रहा हुआ छोटा सा कंकड़ भी चलते समय बड़ा दुःख देता है। बाहर की समस्याओं से तो लड़ लेता हैं, लेकिन अपने भीतर की समस्याओं से इन्सान ज़्यादा परेशान रहता है। - #सप्रेम_हरिस्मरण
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Rajesh Reddy
Rajesh Reddy@Rajeshreddyvb·
ग़ज़ल होना, न होना हो जाता है पाना, खोना हो जाता है बेचने वाला माहिर हो तो पीतल सोना हो जाता है उसकी एक झलक से दिल पर जादू-टोना हो जाता है बचपन के दिन याद आते ही चाँद खिलौना हो जाता है घर के बड़े-बूढ़ों के लिए अब घर इक कोना हो जाता है - राजेश रेड्डी
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Alok Pathak
Alok Pathak@pathakalok68·
जनवरी 2020 में एक ज्योतिष के एक जानकार मेरी कुंडली देखकर बोले आपका बहुत खराब समय चल रहा है आपकी नौकरी चली जाएगी आपकी सारी पूंजी 2020 में खत्म हो जाएगी में तब हंस दिया लेकिन उनकी बात जून से सही साबित होने लगी जून में नौकरी गई और सारी पूंजी नवंबर 2020 तक खत्म हो गई लेकिन तब से लेकर आज तक महादेव ने कई रुपों में मेरी मदद की मैं और मेरा परिवार जिंदा है हां संघर्ष जरुर है पर महादेव ने इस दौरान हर मुश्किल में रास्ता निकाल दिया अब वही ज्योतिष बोल रहे हैं अब आपको सब कुछ वापस मिल जाएगा अगले कुछ महीनों में और आपको बर्बाद करने वाली चौकड़ी धीरे धीरे बर्बाद हो जाएगी देखते है ज्योतिष महोदय की ये भविष्यवाणी इस बार भी सच साबित होती है या नहीं हर हर महादेव
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Sanjeev Newar | सञ्जीव नेवर
१. नहीं। वेद में कहीं भी पशु बलि नहीं है। ऐसा कहने वालों को वैदिक संस्कृत का ज्ञान नहीं है। २. यजुर्वेद, जहां से कर्मकांड का आरम्भ होता है, के पहले ही मंत्र में लिखा है - पशून् पाहि अर्थात् पशुओं को कष्ट मत दो। ३. यज्ञ का तो पर्याय ही अध्वर है। ध्वर यानी हिंसा। अध्वर अर्थात् जहां हिंसा न हो। ४. गौ के लिए शब्द हैं अघन्या वा अदिति। अर्थों जिसे कदापि न मारा जाए या काटा जाए। ५. वाम पंथियों को त्यागें, उस वैदिक धर्म को स्वीकारें जिसके प्रेरक राम, हनुमान, गोविंद हैं। ६. जहां दिलीप राजा ने मरना स्वीकार किया, गौहत्या नहीं। ७. जहां मंगल पांडे ने क्रांति कर जीवन दे दिया कि गौ की चर्बी को मुंह से न लगाऊंगा। ८. वंदे मातरम् भी महाभारत से निकला है। उस श्लोक से जो गौ की महिमा बता रहा है। ९. विस्तार के लिए यह शोध पढ़ें - x.com/i/status/19041…
Surendra Pratap Singh 🇦🇫🇦🇫💕🇮🇳🇮🇳@say_surendra

@SanjeevSanskrit वैदिक धर्म में तो पशु बलि भी है, वो प्रसाद भी है?

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Yagnaja Bhatt 
Yagnaja Bhatt @yagnaja·
कोई आपकी गलती बता रहा हो, कोई आपको गलत साबित कर रहा हो, ध्यान रखिए दोनों अलग अलग चीजें है, एक सुधार चाहता है और दूसरा सिर्फ जीतना...😎
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सुरेश पंत sureshpant
व्रत और उपवास भक्ति, साधना या किसी धार्मिक अनुष्ठान और नियम पालन के लिए दृढ़ संकल्प पूर्वक किया गया कोई विधान व्रत कहा जाता है। उपवास (उप+√वस्) अपने आत्म, आराध्य के निकट होने के लिए किया जाने वाला विशेष आचरण जिसमें भोजन सहित अनेक सुविधाओं को त्यागकर एकोन्मुखी होना उद्देश्य होता था। आजकल उपवास में लोग फल, मेवा, मिठाई आदि खाते हैं; चाय, कॉफी, दूध पीते हैं। बस, खाना नहीं खाते। रोज़ा भी एक प्रकार का उपवास ही है जिसमें सूर्योदय से सूर्यास्त के बीच कुछ भी खाना-पीना वर्जित है। [देखें 'शब्दों के साथ-साथ', (१), पृष्ठ २४०]
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Vivek Sharma 🇮🇳
Vivek Sharma 🇮🇳@SaffRonicMan·
देव्यपराधक्षमापन स्तोत्रम् ।। 🌺 न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः। न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम्॥१॥ अर्थ – हे माते मैं तुम्हारा मन्त्र, यंत्र, स्तुति, आवाहन, ध्यान, स्तुतिकथा, मुद्रा तथा विलाप कुछ भी नहीं जानता, परन्तु सब प्रकार के क्लेशों को दूर करने वाला आपका अनुसरण करना ही जानता हूँ। विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया विधेयाशक्यत्वा त्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत्। तदेतत् क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति॥२॥ अर्थ – सबका उद्धार करने वाली हे करुणामयी माते ! तुम्हारी पूजा की विधि न जानने के कारण, धन के आभाव में, आलस्य से और उन विधियों को अच्छी तरह न कर सकने के कारण, तुम्हारे चरणों की सेवा करने में जो भूल हुई हो उसे क्षमा करो, क्योंकि पूत तो कपूत हो जाता है पर माता कभी कुमाता नहीं होती। पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः। मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति॥३॥ अर्थ – हे माँ; भूमण्डल में तुम्हारे सरल पुत्र अनेकों है पर उनमें एक मैं विरला ही बड़ा चंचल हूँ, तो भी हे शिवे ! मुझे त्याग देना तुम्हारे लिये उचित नहीं, क्योंकि पूत तो कपूत हो जाता है पर माता कभी कुमाता नहीं होती। जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया। तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति॥४॥ अर्थ – हे जगदम्ब; हे माते ! मैंने तुम्हारे चरणों की सेवा नहीं की अथवा तुम्हारे लिए प्रचुर धन भी समर्पण नहीं किया तो भी मेरे ऊपर यदि तुम ऐसा अनुपम स्नेह रखती हो तो यह सच ही है की क्योंकि पूत तो कपूत हो जाता है पर माता कभी कुमाता नहीं होती। परित्यक्ता देवा विविधविधसेवाकुलतया मया पञ्चाशीते रधिकमपनीते तु वयसि। इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम्॥५॥ अर्थ – हे गणेश जननी मैंने अपनी पचासी वर्ष से अधिक आयु बीत जाने के कारण विविध विधियों द्वारा पूजा करने की विधि से घबड़ा कर सभी देवताओं को छोड़ दिया है, यदि इस समय तुम्हारी कृपा न हो तो मैं निराधार होकर किस की शरण में जाऊंगा? श्‍वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा निरातङ्को रङ्को विहरति चिरं कोटिकनकैः। तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ॥६॥ अर्थ – हे माता अपर्णे ! यदि तुम्हारे मंत्राक्षरों के कान में पड़ते ही चांडाल भी मधु के समान सुमधुरवाणी से युक्त बड़ा भारी वक्ता बन जाता है और महादरिद्र भी नृपति (राजा) बन कर चिरकाल तक निर्भय विचरता है तो उसके जप का अनुष्ठान करने पर जपने से जो फल होता है, उसे कौन जान सकता है? चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः। कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं भवानि त्वत्पाणि ग्रहणपरिपाटीफलमिदम्॥७॥ अर्थ – जो चिता का भस्म रमाये रहते हैं, विष पान करने वाले हैं, नंगे रहते है, जटाजूट बांधे है, गले में सर्पमाला पहनते हैं, हाथ में खप्पर लिए हैं, पशुपति और भूतों के स्वामी हैं, ऐसे शिवजी ने भी जो एकमात्र जगदीश्वर की पदवी प्राप्त की है, वह हे भवानि ! तुम्हारे साथ विवाह होने का ही फल है। न मोक्षस्याकाङ्क्षा भवविभववाञ्छापि च न मे न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः। अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः॥८॥ अर्थ – हे चंद्रमुखी माते ! मुझे मोक्ष की इच्छा नहीं है, सांसारिक वैभव की भी लालसा नहीं है, विज्ञान तथा चंद्रमुखी पत्नीसुख की भी अभिलाषा नहीं है, इसलिए मैं तुमसे यही मांगता हूँ कि मेरी सम्पूर्ण आयु मृडानी, रुद्राणी, शिव-शिव, भवानी आदि नामो के जपते-जपते ही बीते। नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः किं रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभिः। श्यामे त्वमेव यदि किञ्चन मय्यनाथे धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव॥९॥ अर्थ – हे श्यामे ! मैंने अनेको उपचारों से तुम्हारी सेवा नहीं कि (यही नहीं, इसके विपरीत) अनिष्ट चिंतन में तत्पर अपने वचनों से मैंने क्या-क्या नहीं किया? फिर भी मुझ अनाथ पर यदि तुम कुछ कृपा रखती हो तो यह तुम्हें बहुत ही उचित है, क्योंकि तुम मेरी माता हो। आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि। नैतच्छठत्वं मम भावयेथाः क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति॥१०॥
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Bhaishri Rameshbhai Oza
Bhaishri Rameshbhai Oza@PPBhaishri·
कर्म की गति गहन है, धर्म का तत्व भी रहस्यमय है। प्रभु में विश्वास और महापुरुषों के मार्ग पर चलते रहना चाहिए । - #सप्रेम_हरिस्मरण
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अशोक शुक्ल
अशोक शुक्ल@shuklasingota·
बेहतरीन
Ashok Mushroof@AMushroof

नज़्म -- अश्लीलता ये जो हर तरफ़ नज़रों में उतरती हुई बेचैनी है— ये यूँ ही नहीं है, ये हमने ही धीरे-धीरे अपने अंदर बोई है। कभी लफ़्ज़ों में आई, फ़िर हँसी में घुली, फ़िर स्क्रीन से निकल कर आदत बन गई— और हम इसे “चलन” समझते रहे। अश्लीलता— सिर्फ़ जिस्म का खुलापन नहीं होती, ये नज़र का भी होता है, इरादों का भी, और सोच का भी। जब इंसान दूसरे इंसान को सिर्फ़ एक तमाशा समझने लगे, तो समझ लो वो अपने ही क़िरदार से गिर चुका है। कारण? बहुत आसान हैं— हमने शर्म को पुराना कह दिया, हया को कमज़ोरी, और इज़्ज़त को सिर्फ़ किताबों में रख दिया। लाइक, व्यू, ट्रेंड— इन तीन शब्दों ने कितनी तहज़ीबें निगल लीं, ये कोई हिसाब नहीं रखता। और सच ये भी है— कि बाज़ार ने इंसान की कमजोरी को समझ लिया, और उसे ही मुनाफ़े का ज़रिया बना लिया। जो बिकता है वही दिखता है— और जो बार-बार दिखे, वो धीरे-धीरे सही लगने लगता है। हम हँसते रहे— हर उस चीज़ पर जो कभी हमें शर्मिंदा कर सकती थी, और धीरे-धीरे शर्म ही ख़त्म हो गई। बचपन भी अब जल्दी बड़ा होने लगा है, खेलों की जगह स्क्रीन ने ले ली है, और मासूमियत वक़्त से पहले ही कहीं खोने लगी है। निवारण? कोई कानून अकेला नहीं कर सकता, ये काम घर से शुरू होगा, नज़र से, नीयत से। जब बाप बेटे को सिर्फ़ कमाना नहीं, देखना भी सिखाएगा, जब माँ बेटी को सिर्फ़ सहना नहीं, समझना भी सिखाएगी— तब कुछ बदलेगा। जब हम किसी को “कंटेंट” नहीं, इंसान समझेंगे, जब हम ताली नहीं, सवाल उठाएँगे— जब हम अपने ही घरों में बात करना शुरू करेंगे, चुप्पी तोड़ेंगे, और सही-गलत के बीच स्पष्ट रेखा खींचेंगे— तब शायद ये लहर थमेगी। याद रखो— समाज अचानक नहीं बिगड़ता, हर दिन थोड़ा-थोड़ा टूटता है। और उतना ही धीरे ठीक भी हो सकता है— अग़र हम आज से शुरू करें। तो अगली बार जब कुछ ग़लत दिखे— उसे सिर्फ़ स्क्रॉल मत करना, अपने अंदर एक छोटा सा इंकार ज़रूर करना… क्योंकि बदलाव भीड़ से नहीं, एक इंसान से शुरू होता है— और शायद वो इंसान तुम ही हो। #अशोक_मसरूफ़

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सुरेश पंत sureshpant
//ज्ञान// की बात /ज्ञ/ में दो ध्वनियाँ ज्+ञ हैं, जिसे उत्तर भारत में प्रायः 'ग्यँ' बोला जाता है, इसलिए ज्ञान (ज्+ञान) का उच्चारण 'ग्याँन'; यद्यपि शब्द में ग् ध्वनि कहीं नहीं है। ञ को यँ का समध्वनिक मानने से ज्ञान= ग्याँन। जो ज् को ञ के साथ बोलते हैं, उनका उच्चारण 'ज्यँ' सुनाई पड़ता है, इसलिए ज्ञान> ज्याँन। रोमन लिप्यंतरण में ज्ञान (ग्याँन)> Gyan और ज्ञान (ज्याँन)> jnān (jñāna)। ओड़िया, तेलुगु, मलयालम, तमिल में भी ज्ञान को gnāna ही कहते हैं। शायद कन्नड़ में भी। परंतु जब दक्षिण के संस्कृत पंडित अंग्रेजी (रोमन) में लिखते हैं तो jnāna और gnāna दोनों का प्रयोग करते हैं। नासिक्य /ञ/ ध्वनि का लिप्यंतरण /n/ से ही हो सकता है। उससे पूर्व /ज्/ को कहीं /ग/ और कहीं /ज/ बोला जाता है, इसलिए कहीं gyān, gnān, और कहीं jnāna.
सुरेश पंत sureshpant tweet media
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सुरेश पंत sureshpant
एके सत्पुरुषाः परार्थघटकाः स्वार्थं परित्यज्य ये सामान्यास्तु परार्थमुद्यमभृतः स्वार्थाऽविरोधेन ये। तेऽमी मानुषराक्षसाः परहितं स्वार्थाय निघ्नन्ति ये ये तु घ्नन्ति निरर्थकं परहितं ते के न जानीमहे॥ ~नीतिशतकम् – 75 सत्पुरुष स्वार्थ छोड़कर परोपकार करते हैं, सामान्य जन अपना अहित किए बिना परोपकार करते हैं, मनुष्य-राक्षस स्वार्थ के लिए दूसरे का अहित करते हैं। उनको क्या कहा जाए, जो अकारण ही निरंतर दूसरों की हत्या करते हैं। आजकल युद्ध के वातावरण में ये चौथे प्रकार के हत्यारे ही सक्रिय हैं।
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The Poetic House
The Poetic House@thepoetichouse·
"शिक्षा सबसे अच्छा दोस्त है। एक शिक्षित व्यक्ति हर जगह सम्मानित होता है। शिक्षा सौंदर्य और युवाओं की धड़कन है" — चाणक्य
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