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एक समय ऐसा आता है जब खामोशी धैर्य नहीं, मजबूरी बन जाती है। ग्रेटर नोएडा वेस्ट आज उसी मोड़ पर खड़ा है।
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सालों से यहां के निवासी मेट्रो के वादों, और टालमटोल के बीच जी रहे हैं। रोज़ाना घंटों का ट्रैफिक जाम, पब्लिक ट्रांसपोर्ट का अभाव, और इससे होने वाला मानसिक व आर्थिक क्षति अब आम जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। यह केवल असुविधा नहीं, बल्कि एक बुनियादी अधिकार का सवाल है।
मेट्रो रेल की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर प्रस्तावित यह प्रदर्शन सिर्फ एक जुटान नहीं, बल्कि उन लाखों लोगों की आवाज़ है जो हर दिन इस परेशानी को झेल रहे हैं। यह आवाज़ उन कामकाजी लोगों की है जो सुबह से पहले घर छोड़ते हैं, उन माता-पिता की है जो अपने बच्चों के सुरक्षित सफर को लेकर चिंतित हैं, उन बुजुर्गों की है जो खुद को असहाय महसूस करते हैं, उन महिलाओं की है जो सुबह शाम शेयरिंग ऑटो रिक्शा में बैठकर जाम से जूझती हैं और खुद को असुरक्षित महसूस करती हैं।
यह एक भावनात्मक अपील है सत्ता को चला रहे अफसरों से तथा नीति निर्माताओं से, क्योंकि मेट्रो की मांग ग्रेटर नोएडा वेस्ट के लिए विलासिता नहीं बल्कि जरूरत है। ग्रेटर नोएडा वेस्ट के हर निवासी की इस मांग में भागीदारी जरूरी है। यह सिर्फ समर्थन नहीं, बल्कि हमारी जिम्मेदारी है।
इतिहास गवाह है परिवर्तन खुद नहीं आता, उसे शांतिपूर्ण तरीके से मांगना पड़ता है।
अगर अब नहीं, तो कब? अगर हम नहीं, तो कौन?
#Metro4GreaterNoidaWest