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Tejaswee
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@Dineshdhkd True happiness comes from inner peace, not outside approval.
English

🕉जय श्री कृष्णा🕉
❤️प्रेम में बहुत शक्ति होती है वह संभव को भी संभव कर देती है कुछ ऐसा ही प्रेम शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी का था जिसने अपने प्रेमी को तीन बार करने के बाद भी जीवित कर दिया यह उसकी प्रेम की शक्ति थी
❤️ शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी – प्रेम, श्राप और भाग्य की अद्भुत गाथा ❤️
प्राचीन युग की बात है।
जब देवताओं और असुरों के बीच युद्ध केवल अस्त्रों से नहीं, बल्कि बुद्धि और विद्या से भी लड़े जाते थे।
कभी देवता विजयी होते, कभी असुर।
पर एक समय ऐसा आया, जब युद्ध का पलड़ा लगातार असुरों की ओर झुकने लगा।
इस परिवर्तन का कारण था एक रहस्यमयी विद्या — मृतसंजीवनी।
असुरों के गुरु महर्षि शुक्राचार्य ने भगवान शिव की कठोर तपस्या से यह दिव्य ज्ञान प्राप्त किया था।
युद्धभूमि में गिरने वाला हर असुर, गुरु शुक्राचार्य के मंत्रों से फिर उठ खड़ा होता।
देवताओं के लिए यह संकट असहनीय था।
देवगुरु बृहस्पति स्वयं इस विद्या से अनभिज्ञ थे।
काफी सोच-विचार के बाद उन्होंने एक साहसी निर्णय लिया।
उन्होंने अपने पुत्र कच को बुलाया और कहा —
“तुम शुक्राचार्य के आश्रम जाओ, उनके शिष्य बनो और किसी भी तरह मृतसंजीवनी का रहस्य जानो।”
बृहस्पति यह भी जानते थे कि यह मार्ग सरल नहीं होगा।
उन्होंने संकेत दिया कि अगर शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी का विश्वास और स्नेह मिल जाए, तो मार्ग आसान हो सकता है।
कच शुक्राचार्य के आश्रम पहुँचा और विनम्रता से उनका शिष्य बन गया।
तेजस्वी व्यक्तित्व, सौम्य व्यवहार और ज्ञान-पिपासा से भरा कच, धीरे-धीरे सबका प्रिय बन गया।
शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी, जो रूप और बुद्धि दोनों में अनुपम थी,
कच को देखकर अनजाने ही आकर्षित हो उठी।
वह कुछ कहती नहीं थी,
पर उसकी आँखें सब कह जाती थीं।
उधर असुरों को भनक लग चुकी थी कि कच कोई साधारण शिष्य नहीं है।
वे समझ गए —
अगर यह युवक जीवित रहा, तो उनकी सबसे बड़ी शक्ति छिन सकती है।
पहली बार असुरों ने कच को छल से मार डाला।
देवयानी ने जब यह सुना, तो उसका हृदय टूट गया।
आँसुओं में डूबी वह पिता के चरणों में गिर पड़ी।
पुत्री के प्रेम के आगे शुक्राचार्य झुक गए और कच को जीवित कर दिया।
दूसरी बार भी वही हुआ।
असुरों ने फिर हत्या की,
और देवयानी की विनती पर कच फिर लौट आया।
अब असुरों ने अंतिम और भयानक षड्यंत्र रचा।
तीसरी बार कच का वध कर
उसके शरीर को जला दिया गया
और उसकी राख को एक पेय में मिलाकर
स्वयं गुरु शुक्राचार्य को पिला दिया गया।
असुर निश्चिंत थे —
अब कच कभी लौट नहीं सकेगा।
पर देवयानी को सब समझ आ गया।
उसने फिर पिता से प्रार्थना की।
तपस्या से जब शुक्राचार्य ने कच को पुकारा,
तो उत्तर उनके अपने भीतर से आया।
सत्य स्पष्ट था —
यदि कच जीवित होगा, तो गुरु का अंत निश्चित है।
शुक्राचार्य ने कच को वहीं से मृतसंजीवनी का पूर्ण ज्ञान दे दिया।
कच ने गुरु के शरीर से बाहर आकर
उसी विद्या से उन्हें पुनः जीवित कर दिया।
शिष्य धर्म पूर्ण हुआ।
गुरु प्रसन्न हुए।
देवयानी ने कच से विवाह का आग्रह किया।
पर कच ने विनम्रता से सत्य कहा —
“जिस शरीर से मैं जन्मा, वह मेरे पिता समान है।
आप मेरी बहन हुईं। यह विवाह संभव नहीं।”
टूटे हुए हृदय से देवयानी ने कच को श्राप दिया —
“तुम इस विद्या का उपयोग कभी नहीं कर पाओगे।”
कच ने भी प्रत्युत्तर में कहा —
“तुम्हारा वैवाहिक जीवन सदा कष्टमय रहेगा।”
और कच देवलोक लौट गया।
कुछ समय बाद देवयानी अपनी सखी शर्मिष्ठा के साथ वन में स्नान करने गई।
एक छोटी-सी भूल,
और बात अहंकार तक पहुँच गई।
शर्मिष्ठा ने क्रोध में आकर
देवयानी को कुएँ में धकेल दिया।
भाग्य से वहाँ से गुजर रहे थे —
राजा ययाति।
उन्होंने देवयानी को बचाया।
वहीं से प्रेम का एक नया अध्याय शुरू हुआ।
देवयानी और ययाति का विवाह हुआ।
शर्मिष्ठा दासी बनकर साथ आई।
पर समय ने फिर करवट ली।
ययाति और शर्मिष्ठा के बीच गंधर्व विवाह हुआ।
देवयानी का हृदय फिर टूटा।
शुक्राचार्य का क्रोध भड़का।
ययाति को वृद्ध होने का श्राप मिला।
ययाति ने पुत्रों से यौवन माँगा।
सबने मना किया —
सिवाय पुरु के।
पुरु ने सब कुछ दे दिया।
सौ वर्षों के भोग के बाद
ययाति को ज्ञान हुआ —
इच्छाओं की कोई सीमा नहीं।
संतोष ही सच्चा सुख है।
ययाति ने पुरु को उत्तराधिकारी बनाया।
स्वयं वानप्रस्थ ग्रहण किया।
और यहीं से जन्म हुआ
पाँच महान वंशों का।
इसलिए प्रेम कीजिए सच्चा प्रेम कीजिए राधे कृष्णा से कीजिए❤️
❤️ तो फिर प्रेम से बोलिए राधे राधे❤️

हिन्दी

@tejv111 ॐ त्र्यम्बकं य्यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्द्धनम्।
उर्व्वारूकमिव बन्धनान्न्मृत्योर्म्मुक्षीय मामृतात्॥
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