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दुर्वासा ने श्रीकृष्ण को आगम की शिक्षा दी थी , ऐसी प्रसिद्धि है । यह कितना पौराणिक है , ठीक ठीक न जान सकने पर भी इसके मूल में ऐतिहासिक सत्य है , ऐसा लगता है । ऐसी भी प्रसिद्धि है , बाद के युग में कामरूप -मठ से मीननाथ ने इसका प्रचार किया था । आपाततः मीननाथ और मत्स्येंद्रनाथ को एक ही व्यक्ति माना जा सकता है । मत्स्येंद्रनाथ नाथ सम्प्रदाय के आदि गुरु हैं । मत्स्येंद्रनाथ तथा गोरख के प्रवर्तित मत में अवान्तर भेद -अभेद जो भी हो , मत्स्येंद्रनाथ का आकर्षण ही शक्ति की उपासना की ओर था , गोरक्ष का शिव की उपासना की ओर । इसके सिवाय शक्ति -प्रस्थान की और भी बहुत सी
धाराएँ थीं । महार्घ सम्प्रदाय ( महानय सम्प्रदाय ? ) ने अपनी उपासना- पद्धति में शक्ति के रहस्य के सम्बंध में अनेक अभिनव तथ्य प्रकाशित किये हैं । विरूपाक्ष ने अपनी प्रसिद्ध पञ्चाशिका में अद्वैत शैव मत की ही बात कही है । परन्तु वहाँ भी शिवशक्ति अभिन्न है । शाक्त मत की इन दृष्टियों के सम्बंध में
यहाँ चर्चा करना सम्भव नहीं । जैनों ने भी अपने तांत्रिक प्रस्थान में शाक्तमत के प्रति अनुगतता का परिचय दिया है ।
इस विषय की सबसे ज्यादा चर्चा उत्तरयुग में महायान बौद्ध -सम्प्रदाय में मिलती है । इनके कालचक्रयान आदि शाक्तदृष्टि के अनुकूल ग्रन्थ ही हैं । तिब्बत में बहुत बहुत पहले से यह शाक्त अद्वैत तन्त्रमत प्रचलित था और ऐतिहासिकों को मालूम है कि इस श्रेणी के शाक्त आगमसिद्ध मार्ग से वैष्णव सहजिया सम्प्रदाय का कितना सम्बंध था ।
मातृका रहस्य ।।12।।
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