

Le Comedy
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@vyangPrayog
This is a satire account. We create jokes on political, social and several other situations. Please Don’t take seriously 😃. If you follow, we follow back. 🤝




विचारों में परिपक्वता साफ साफ नजर आ रही है । यही एक कुशल राजनीतिज्ञ की पहचान है । बाकी इस पोस्ट के लिए मुझे सपाई, धर्मविरोधी बोल सकते हो। लेकिन आईने में देखो, तुम्हारी खुद की विश्वसनीयता अब संदेह के दायरे में आ चुकी है ।



कल 2019 के फ़ोटो दिखा के बताया गया कि ज़मीन पे नाराज़गी है और आर्गेनिक सपोर्ट ग़ायब है 🤣 फिर एक ने फ़ेक AI वीडियो को हाईलाइट करते बताया कि देखो क्या स्पीच है.. फिर सबने जंतर मंतर पर योगी जी के ख़िलाफ़ चल रहे खेल को पॉजिटिव प्रचार करके बताया गया कि ये देखिए भीड़.. अब फिर आज ये बताया जाएगा कि कुछ लोग योगी जी को हराना चाहते हैं.. योगी जी के ख़िलाफ़ पोलिटिकल पार्टी ख़ुद बना रहे हैं और फिर ब्लेम बाकियों पे डाला जा रहा है 🤣





कोई मेरे 500 वेरिफाइड फॉलोअर्स करवा दो.. 😑 कब तक 150 पे अटका रहूंगा

जब २०१७ में ये आदमी चुनाव जीता था, और मुख्यमंत्री बना था तो मैं अत्यधिक प्रसन्न हुआ था। क्यूंकि इसके क्रेडेंशियल्स इतने अच्छे बताए गए थे। सैनिक स्कूल का पढ़ा हुआ, ऑस्ट्रेलिया से टेक्नोलॉजी में मास्टर्स इत्यादि के कारण मेरी उम्मीद बढ़ गई थी। पूर्ण बहुमत से सपा को जिताने का श्रेय भी मुलायम सिंह ने इसी को दिया। मेरा एक मित्र सैनिक स्कूल का पढ़ा हुआ था और जिस प्रकार से वह अपने स्कूल की प्रशंसा करता था, मुझे लगता था वही सब संस्कार इसके भीतर भी होंगे। फिर जब इसकी अपने चाचा और पिता से अनबन हुई तब भी मुझे यही लगा कि बालक कुछ अच्छा करना चाहता है और बाप चाचा आड़े आ रहे हैं, गुंडई दिखा रहे हैं। लेकिन फिर समय बीता। उम्मीद को धराशाई होते हमने अपनी आँखों से देखा। प्रदेश जस का तस बना रहा। ले दे कर एक आगरा एक्सप्रेसवे और लखनऊ में सारा विकास चमकता रहा। उसके अलावा जो चमका वो सैफ़ई था। बाक़ी पूरा प्रदेश नाली के ढेर में वैसे ही पड़ा रहा पहले की भांति। फिर भाजपा आई। योगी आदित्यनाथ को सत्ता मिल गई, जबकि मुझे नहीं पता चुनाव में पूर्ण बहुमत दिलाने में उनका कितना योगदान रहा होगा। तो मुझे कोई उम्मीद ही नहीं थी योगी आदित्यनाथ से। कारण स्पष्ट था कि मैंने उनका कोई काम नहीं देखा, अपितु भड़काऊ भाषण के मुकदमे जरूर सुने थे। २०१० के बरेली में हुए दंगों के समय भी योगी को शाहजहांपुर बॉर्डर पर रोक दिया गया था जब वे आना चाहते थे, और मैं भी यही सोचता था कि ये आदमी क्या करने आ रहा है, अभी क्या समस्या कम है। इन सबके बाद भी योगी का कार्य एकदम अलग रहा। पूरे प्रदेश का समग्र विकास हुआ। केवल लखनऊ या गोरखपुर नहीं चमकाए गए। हर जिले को पूरा समय बिजली मिली, सुरक्षा व्यवस्था चाक चौबंद मिली, और वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट जैसी योजनाओं का लाभ मिला। विकास के नाम पर योगी दोबारा चुनाव जीत गए। उसके बाद शुरू हुआ जाति का खेल। जो २०२४ में भली भांति आजमाया गया (आरक्षण समाप्त होने के झूठ के नाम पर)। एक वर्ग को बरगला लिया गया और पूरे प्रदेश में भाजपा का भारी नुक़सान हुआ। वही स्क्रिप्ट अब २०२७ के चुनाव के लिए लिखी गई है। बस मोहरे बदल कर जनरल कास्ट कर दिया गया है। और इसका उद्देश्य सामान्य वर्ग के वोट काटना मात्र नहीं है। इसका उद्देश्य ये है कि सामान्य वर्ग को हाथ से फिसलता देख कर भाजपा कोई कदम उठाए और उस कदम को आधार बना कर पुनः उसी वर्ग को बरगलाया जाए जिसे आरक्षण समाप्त होने का भय दिखाया था। क्यूंकि एक ही झूठ दो बार नहीं चलता, इसलिए इस बार एक नए झूठ की तलाश है। उस चुनाव में मोहन भागवत ने कुछ बयानवीर बन कर झूठ के फैलने में सहायता की थी, तो इस बार अजीत भारती जैसे क्रांतिवीर ये काम करने में विपक्ष की भरपूर सहायता कर रहे हैं।







पत्रकारिता में बहुत सारे ऐसे लोग आ गये हैं जिनका पढ़ने लिखने से कोई लेना देना नहीं है । बस सूचना के आगे सोचना नहीं ।

Most men are gay. They're literally gay. Because they don't really like us women. Our natural bodies, they think it's gross. Our interests, they think it's cringe. Spending time with us, they think it's like a responsibility. And if a guy has a girlfriend, and instead of date night with her, he genuinely wants to be with the boys, and he feels it's a punishment that he can't spend time with his boys, he doesn't really like her. So I genuinely think most men are gay but they haven't figured it out because being gay is like also too feminine for them and they don't like feminine things.





