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News from underserved regions of Bihar & WB, often ignored by mainstream media | @IPSMF_ | GNI Startups Lab 2021 | Member WAN-IFRA, DigiPub | YouTube 660K+

Seemanchal Entrou em Haziran 2013
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विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ! लेकिन क्या आपने कभी सोचा — पत्रकारिता को स्वतंत्र बनाए रखने में आपका योगदान क्या है? आज ही बिहार के सबसे भरोसेमंद न्यूज़ प्लेटफॉर्म ‘मैं मीडिया’ का मेंबरशिप लें और इस मिशन का हिस्सा बनें: हमदर्द — ₹29/माह हमराह — ₹199/माह हमराज़ — ₹7999/माह आपका साथ, हमारी आज़ादी की ताक़त! Join Membership: youtube.com/channel/UCasry… #WorldPressFreedomDay #worldpressday
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बिहार इस हफ्ते: बर्बर हत्या, लिंचिंग और मासूम के रेप से दहला राज्य | CM नीतीश की राज्यसभा शपथ
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किशनगंज में मक्के की खेती कैसे बन रही है मानव-हाथी संघर्ष की वजह? बिहार के किशनगंज ज़िले के धनतोला में 10 मार्च 2022 की आधी रात सात हाथियों का एक झुंड घुस गया। हाथियों ने जम कर तबाही मचाई, घर के साथ साथ घर में रखा सारा सामान तोड़ दिया और फूस के घर में सो रही वृद्ध महिला रातीश्री देवी राजवंशी को कुचल दिया। रातीश्री की बहु वर्ती देवी उस दिन को याद करते हुए कहती हैं, “देर रात सात हाथी घर में घुस गये, मेरी सास को कुचल कर मार दिया और बेटी के दहेज़ के लिए घर में रखा सारा सामान तोड़ दिया।” अगले वर्ष 2 फ़रवरी, 2023 को धनतोला पंचायत के ही पिपला गाँव में रात करीब 1 बजे ऐसे ही हाथियों का एक झुंड घुस गया, जिससे गाँव में अफरातफरी मच गई। 53 वर्षीय मुर्शिदा खातून अपने घर के दरवाजे पर खड़ी थी। हाथियों ने सूंड से उठाकर उन्हें फेंका और कुचल दिया। मुर्शिदा के पैर और रीढ़ की हड्डी टूट गई। पूर्णिया में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। “हमलोग सब सोये थे। रात करीब एक बजे हाथी घुसा, घर में अफरातफरी मच गई, हमलोग घर से निकल गए, लेकिन मम्मी को हाथी दरवाज़े से उठा लिया, सूड़ से उठा कर घुमाया, पैर से कुचल दिया और दूर ले जाकर छोड़ दिया,” मुर्शिदा के बेटे मतीउर रहमान बताते हैं। इसी तरह वर्ष 2016 में ठाकुरगंज में हाथियों ने एक वनकर्मी और एक महिला की जान ले ली थी। 2017 में तेआमडांगी गांव के एक युवक की जान हाथियों ने ले ली थी। 22 मार्च 2020 को बिहार टोला कामत वस्ती में मक्का खेत देखने गए 63 वर्षीय नारायण शर्मा को हाथियों ने मार डाला था। वहीं, 17 अप्रैल 2023 में बिहारटोला गांव के समीप एक हाथी की मौत हो गयी थी। पिछले एक दशक से सीमावर्ती ज़िले किशनगंज में मक्का फसल के मौसम के साथ ही मानव-हाथी संघर्ष आम हो जाता है। इस दौरान न केवल इंसानों और हाथियों की जान को खतरा होता है, बल्कि ग्रामीणों के घरों और फसलों को भी भारी नुकसान झेलना पड़ता है। Read ground report: mainmedia.in/how-is-maize-c…
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हर साल ग्रीन बजट लाने वाला बिहार आंकड़ों में कितना ‘ग्रीन’ है? इस साल बिहार सरकार ने फिर से अपना ग्रीन बजट पेश किया है। गौरतलब है कि बिहार ने 2020–21 से ग्रीन बजट की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य जलवायु, पानी, प्रदूषण और जंगलों से जुड़े खर्च को अलग से पहचानना था। लेकिन राज्य की पर्यावरणीय स्थिति इससे ज्यादा जटिल है। भारत वन स्थिति रिपोर्ट (ISFR) 2023 के अनुसार बिहार उन राज्यों में है जहां वन क्षेत्र राष्ट्रीय औसत से कम है। भारत में कुल वन क्षेत्र लगभग 21.76 प्रतिशत है, जबकि बिहार इससे काफी नीचे है। यही अंतर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। अगर बिहार ने ग्रीन बजट और बड़े स्तर पर पौधारोपण कार्यक्रम शुरू किए हैं, तो असल में राज्य कितना ग्रीन है? भारत में जंगलों का सबसे भरोसेमंद आकलन भारत वन स्थिति रिपोर्ट से होता है। यह रिपोर्ट सैटेलाइट के आधार पर जंगलों को मापती है। इसमें जंगलों को तीन हिस्सों में बांटा जाता है – अत्यंत सघन वन, सामान्य सघन वन और खुले वन। बिहार में खुले वन (लगभग 4.1 प्रतिशत) सबसे अधिक हैं, इसके बाद मध्यम घने वन (करीब 3.5 प्रतिशत) आते हैं, जबकि अत्यंत सघन वन केवल लगभग 0.4 प्रतिशत ही हैं। यानी राज्य में ज्यादातर वन ऐसे हैं जहां पेड़ों की सघनता कम है, जबकि घने और बेहतर गुणवत्ता वाले जंगल बहुत सीमित हैं। Read ground report by @CptiwariSom: mainmedia.in/how-green-is-b…
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बिहार इस हफ्ते | Episode 11: बिहार में इस हफ्ते हुई घटनाएं नीतीश कुमार की विरासत को लेकर क्या कहती हैं? बिहार में इस हफ्ते हुई घटनाओं ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। करीब दो दशकों तक सत्ता में रहे नीतीश कुमार की विरासत आखिर क्या है? नालंदा में दिनदहाड़े महिला के साथ शर्मनाक घटना, मंदिर में भगदड़ से 9 लोगों की मौत, पटना में व्यापारी पर गोलीबारी और मोतिहारी में ज़हरीली शराब से मौतें — क्या ये वही “सुशासन” है जिसकी बात की जाती रही है? @tnzl_ | @mofussil_scribe
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बिहार इस हफ्ते | Episode 10: शाम में महंगी बिजली, नीतीश पर सस्पेंस, MLA-MP पर कार्रवाई, कैलेंडर वाले मंत्री
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नाव, नदी और नसीब: कोसी के गांवों में मातृत्व की अधूरी कहानियाँ कोसी तटबंधों के बीच बसे बेलागोठ गांव की रहने वाली सहायक नर्स मिडवाइफ (एएनएम) राधा देवी हाल के वर्षों में स्वास्थ्य लाभ में देरी की वजह से जच्चा और बच्चा दोनों की मौत की 12 घटनाओं की गवाह रही हैं। वह कहती हैं, “नाव की कमी के कारण मैंने कई गंभीर मामलों में गर्भवती महिलाओं के बच्चों को खोते देखा है। आपातकाल में प्राइवेट नाव मिल भी जाए तो सुपौल सदर अस्पताल पहुँचने में तीन घंटे लग जाते हैं।” बाढ़ के दौरान जलस्तर बढ़ने पर या तो नाव मिलने में अतिरिक्त देर होती है। कई बार डीजल से चलने वाली नाव मिल भी जाती है, तो उसका किराया 2000 से 5000 रुपये तक होता है, जो हमारे ग्रामीण दलित समाज के लिए बहुत महंगा है। जलस्तर बढ़ने पर यात्रा करना जोखिम भरा होता है। “इतना जोखिम उठाकर भी समय पर अस्पताल पहुंचने के बाद भर्ती की कोई गारंटी नहीं होती,” उन्होंने कहा। राधा देवी पिछले 25 साल से बतौर एएनएम काम कर रही हैं। एएनएम का मुख्य काम ग्रामीण स्वास्थ्य, मातृत्व और शिशु स्वास्थ्य में मदद करना है। बेलागोठ के नवदम्पत्ति ओमप्रकाश और रिंकू देवी ने दो मौकों पर, जब कोसी में पानी का स्तर ऊपर था, तब नाव के अस्पताल पहुंचने में विलम्ब की वजह से अपने दो अजन्मे बच्चों को खो दिया। Read ground report by @Zumbish8: mainmedia.in/boat-river-and…
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चरम मौसमी घटनाएं रोक रही बच्चों की शिक्षा की रफ्तार कक्षा छठी में पढ़ने वाली बुलबुल कुमारी के लिए बारिश का मौसम संघर्ष लेकर आता है। वह समस्तीपुर जिले के बहादुरपुर स्थित राजकीय मध्य विद्यालय में पढ़ती है। बारिश के दिनों में उसके गांव और स्कूल के आसपास अक्सर पानी जमा हो जाता है, जिससे स्कूल तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है। बुलबुल बताती है कि बारिश के समय उसे रोज़ घुटनों तक पानी से होकर स्कूल जाना पड़ता है। “रास्ते में कई जगह कीचड़ और गंदा पानी जमा रहता है। ऐसे में स्कूल पहुंचने से पहले ही जूते-मोजे उतारने पड़ते हैं क्योंकि पानी में भीग जाने से जूते खराब हो जाते हैं और चलना भी मुश्किल हो जाता है,” उसने कहा। लगातार गंदे पानी में चलने के कारण उसके पैरों की त्वचा में समस्या होने लगती है। बुलबुल बताती है कि पानी में लंबे समय तक रहने से पैरों की त्वचा गलने लगती है, जिससे चलना मुश्किल हो जाता है। उसे अपने पैरों पर मरहम लगाना पड़ता है और दवाइयों का सेवन करना पड़ता है। “कभी-कभी इतना दर्द और जलन होता है कि स्कूल जाना ही छोड़ना पड़ता है और ये एक दो रोज़ नहीं होता है, कई कई हफ़्ते स्कूल नहीं जा पाते हैं,” बुलबुल ने बताया। स्कूल नहीं जाने से उसकी पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित होती है। "छूटे हुए पाठ समझना बहुत मुश्किल हो जाता है,” उसने कहा। समस्या केवल स्कूल के रास्ते तक ही सीमित नहीं है। बारिश के दिनों में कई बार पानी उसके घर के अंदर भी घुस जाता है, जिससे आराम करना या ठीक से पढ़ाई करना मुश्किल हो जाता है। बिहार में जलवायु परिवर्तन के चलते होने वाली चरम मौसमी घटनाएँ मसलन बाढ़, सुखाड़, शीतलहर आदि का असर केवल फसलों या घरों के नुक़सान तक सीमित नहीं है, बुलबुल की कहानी बताती है कि ये बच्चों की पढ़ाई पर भी असर डाल रहा है। खगड़िया जिले के अलौली ब्लॉक के जोगिया शरीफ गांव में रहने वाली 13 वर्षीय पाबनी कुमारी बताती है कि कभी बाढ़ के कारण स्कूल हफ्तों तक बंद हो जाता है, तो कभी भीषण गर्मी के चलते कक्षा में बैठना मुश्किल हो जाता है। Read ground report by @jyotsna_saumya: mainmedia.in/extreme-weathe…
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बेगूसराय की कांवर झील से क्यों मुंह मोड़ रहे प्रवासी पक्षी बिहार के बेगूसराय में स्थित कांवर झील कभी पक्षियों की चहचहाहट से गुलज़ार रहा करती थी, लेकिन अब वहां वीरानी रहती है। स्थानीय निवासी और पक्षियों के शोधकर्ता महेश भारती इस बदलाव को लम्बे समय से देख रहे हैं। वह कहते हैं, “पहले आसमान पंखों से ढका रहता था, अब सिर्फ खामोशी है।” अली हुसैन, जो एक अनुभवी पक्षी ट्रैपर रहे हैं और दुनिया के कई देशों में पक्षियों पर अध्ययन कर चुके हैं, कहते हैं, “कांवर झील कभी रंग-बिरंगे परिंदों से भरी रहती थी, लेकिन आज इसकी हालत देखकर अंदर तक दुख होता है।” उन्होंने भारत के प्रसिद्ध पक्षी वैज्ञानिक सलीम अली के साथ काम किया है और वर्तमान में बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी से जुड़े हैं। बताया जा रहा है कि लालसर, बड़ा कोचर, दुमदार बतख, चम्मच बतख, कॉमन टील, गर्गनी टील, कॉटन टील, मलार्ड और डुबकी बतख पहले कांवर झील का अहम हिस्सा हुआ करते थे, लेकिन ये सभी जलपक्षी अब कांवर झील से लगभग गायब हो चुके हैं। अली हुसैन बताते हैं कि एक समय था जब ये सभी पक्षी बड़ी संख्या में कांवर झील के परिक्षेत्र में दिखाई देते थे। सर्दियों के मौसम में झील का इलाका इन प्रवासी पक्षियों से भरा रहता था, लेकिन अब इनकी मौजूदगी बेहद कम हो गई है और कई प्रजातियां पूरी तरह दिखनी बंद हो चुकी हैं। Read ground report by @PremDDNews: mainmedia.in/why-are-migrat…
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तेजस्वी यादव की फिर हार, शरजील इमाम को राहत, गयाजी में बंधुआ मज़दूरी | बिहार इस हफ्ते Episode 9
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गयाजी के किसानों पर मौसम की मार, मोटर बनी मजबूरी जलवायु परिवर्तन से हो रहे मौसम में बदलाव की मार से हर किसान जूझ रहा है, लेकिन सबसे ज़्यादा चोट उन्हें खानी पड़ रही है जिनके पास सिंचाई का साधन नहीं है। गयाजी जिले के टिकारी प्रखण्ड स्थित छटवां गांव के 60 वर्षीय किसान अवधेश मांझी अपने 12 वर्ष के नाती के साथ गेहूं का पटवन कर रहे हैं। वह घर से ही खाना लेकर आये हैं। खेत में खाना खाते हुए वह कहते हैं, “अब खेती पूरी तरह मोटर पर निर्भर हो गई है, जिसके पास मोटर है वह अच्छे से खेती कर रहा लेकिन हम जैसे गरीब किसानों का भगवान ही सहारा है।” अवधेश के पास एक बीघे से भी कम जमीन है। वह बताते हैं, “मोटर लगवाने में करीब डेढ़ लाख रुपये तक खर्च आता है। हम कहां से इतना पैसा लाएंगे? अगर 5-10 बीघा जमीन होती तो कहीं से कर्ज लेकर भी लगवा लेते। लेकिन स्थिति ऐसी है, हम ना कर्ज लेने में सक्षम हैं और ना ही हमें कोई उधार देने को तैयार होगा क्योंकि ज़मीन ही नहीं है उतनी। ऐसे में हमें पैसा देकर दूसरे के मोटर से पटवन करना पड़ता है। कभी कभी समय पर कोई पटवन करने को तैयार भी नहीं होता।” पहले गांवों में सिंचाई के लिए आहर, पोखर और पइन जैसे पारंपरिक साधन थे। बरसात का पानी इन जलाशयों में जमा होता और धीरे-धीरे खेतों तक पहुंचता था। लेकिन अब यह व्यवस्था कमजोर पड़ गई है। अवधेश बताते है, “पहले चाड़ चलाकर भी खेत में पानी पहुंचा दिया जाता था और समय पर बारिश भी हो जाती थी, लेकिन पिछले कुछ सालों में हालात बदल गए है।” चाड़ टीन का एक डब्बा जैसा होता है, जिसके दोनों किनारों पर रस्सी बंधी होती है। इसका उपयोग गांवों में किसी जलाशय से पानी खेत तक लाने के लिए किया जाता था। सिंचाई के लिए मोटर पर निर्भरता ने किसानों की लागत बढ़ा दी है। अवधेश के गांव के एक अन्य किसान प्रदीप शर्मा कहते हैं, “अगर एक बीघा धान का पटवन करना होता था तो पहले 250 – 300 रुपए का तेल लगता था। पहले डीजल सस्ता था। अब तो फिक्स्ड पैसा जाता है, बिजली ऑफिस को एक धान के सीजन में 7000 – 8000 रुपया देना होता। अगर एक बार फिक्स कर लिये तो, बारिश हो या न हो पैसा तो देना ही पड़ता है।” एक अन्य किसान महेश कुमार ने कहा कि जिसके पास मोटर है वो ठेका पर दूसरों का पटवन करता है, एक सीजन में 1 बीघा का 2000 लेता है, कभी कभार उससे ज्यादा या कम भी लगता है। ऐसे में बारिश हो गयाजी तब भी पैसा चला ही जाता है। नहीं हुआ बारिश तो धान पकने तक पटवन करता है। Read ground report by @sauravraghuveer: mainmedia.in/weather-hits-f…
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बिहार में केंद्र सरकार की मिशन अमृत सरोवर योजना कितनी सफल है? भोजपुर जिलांतर्गत चरपोखरी प्रखंड क्षेत्र के देकुड़ा स्थित तालाब केंद्र सरकार की मिशन अमृत सरोवर योजना का हिस्सा है, और इसके जीर्णोद्धार के लिए 24 लाख रुपये आवंटित हुए थे, लेकिन देखकर ऐसा नहीं लगता है कि इस तालाब पर कोई सरकारी पैसा खर्च हुआ है। देकुड़ा का यह तालाब प्रसिद्ध धार्मिक स्थल कुल्जी महारानी के निकट 12 बीघे में फैला हुआ है। “तालाब की स्थिति जस की तस बनी हुई है और धीरे धीरे यह सिकुड़ता भी जा रहा है,” देकुड़ा गांव के रहने वाले ललन तिवारी कहते हैं। उन्होंने आगे कहा, “आज से 50 वर्ष पूर्व यह तालाब 12 बीघा में फैला हुआ था। फ़िलहाल, इसका क्षेत्रफल 8-10 बीघा में सिमटा हुआ है। देखरेख के अभाव में यह सिमटती चली गई और इसमें जलीय पेड़-पौधे लग गए। अब इस तालाब में मवेशी तक नहीं नहाते।” इसी गांव के रहने वाले राजकिशोर तिवारी बताते हैं, “इस तालाब में बारिश का पानी एकत्रित करने की संभावना भी खत्म हो चुकी है। अगर अमृत सरोवर के तहत इसका सौंदर्यीकरण हो जाता तो न केवल बारिश के पानी को संरक्षित किया जा सकता, बल्कि लुप्त होती अपनी विरासत को संजोए रखने में भी मदद मिलती। जल संरक्षण होने से क्षेत्र में घटते जलस्तर की समस्या को रोकने में भी काफी हद तक मदद मिलती।” देकुड़ा का यह तालाब एकमात्र तालाब नहीं है, जो केंद्रीय योजना के लिए चयनित तो हो चुका है, मगर कोई काम अब तक नहीं हुआ है। Read ground report: mainmedia.in/how-successful…
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प्रदूषण की गिरफ्त में बचपन, बिहार में बढ़ती सांस की बीमारियां साढ़े-तीन महीने के आर्यांश को जन्म से ही न्यूमोनिया की शिकायत है। उसकी माता आशा देवी ने बताया कि शुरुआत से ही आर्यांश को सांस लेने में दिक्कत आती है और उसके दिल में भी छेद है। आशा देवी ने बताया कि ये उनका तीसरा बच्चा है और उनके दूसरे बच्चे की भी मौत फेफ़ड़े में खून जमा होने से हुई थी। पटना के बख्तियारपुर की आशा देवी गोइठा और लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाती हैं। पटना की रहने वाली एक साल की आकांक्षा भी न्यूमोनिया के कारण दो से तीन बार अस्पताल के चक्कर काट चुकी है। उनकी माता काजल देवी ने बताया कि उन्हें भी पांच साल पहले टीबी (ट्यूबरकुलोसिस) की बीमारी हुई थी। ये बच्चे पटना के एनएमसीएच में भर्ती थे। एनएमसीएच के डॉक्टरों ने बताया कि आजकल बच्चों में सांस की बीमारियाँ बढ़ती जा रही हैं। अस्थमा, ब्रोंकलाइटिस, न्यूमोनिया, बरम्बार न्यूमोनिया, एलआरटीआई (लोअर रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन) जैसी मामले अस्पतालों में बढ़ रहे हैं। अस्पताल के डॉक्टर अभिषेक अडिग ने बताया कि प्रदूषण एक बहुत बड़ा कारण है बीमारियों के बदलते ट्रेंड का। उन्होंने लोगों की जीवनशैली और सामाजिक-आर्थिक परिस्थिति के साथ-साथ बदलते वातावरण को भी ज़िम्मेदार ठहराया। वह कहते हैं, “लोगों में प्रदूषण और उससे संबंधित बाकी पहलू एंटीबायोटिक प्रतिरोध पैदा कर रहे हैं।” एंटीबायोटिक प्रतिरोध वह स्थिति है जब बैक्टीरिया (जीवाणु) उन दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो जाते हैं जो उन्हें मारने या उनकी वृद्धि को रोकने के लिए बनाई जाती है। स्वास्थ्य बीमा दावों के आंकड़ों से पता चलता है कि हाल ही में भारत में वायु प्रदूषण के कारण बीमा दावों में भारी वृद्धि देखी गई है, विशेष रूप से सर्दियों के महीने में। आंकड़ों से मालूम चलता है कि प्रदूषण से संबंधित बीमारियों के दावों (2025-26) में 8% से अधिक की वृद्धि हुई है। इसमें सबसे ज़्यादा प्रभावित जनसंख्या बच्चों की है। भारत में 0-10 साल की उम्र के बच्चों में प्रदूषण से संबंधित स्वास्थ्य बीमा दावों में 43% की बढ़ोतरी देखने को मिली है। Read: mainmedia.in/pollution-affe…
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मानसिक स्वास्थ्य संकट से जूझते कोसी-सीमांचल के बाढ़ पीड़ित 28 वर्षीया रुपमा देवी (बदला हुआ नाम) की ससुराल कटिहार जिला के बरारी प्रखंड के एक तटबंध पर है, जहां वह अपने चार बच्चों और बूढ़ी सास के साथ रहती हैं। शादी के बाद वह 2008 की बाढ़ में विस्थापित उस परिवार का हिस्सा बनी जिसके पास रहने के लिए दो कमरों का फूस का मकान और आमदनी, रोज़गार के लिए पलायन पर टिकी हुई है। “पति दिल्ली में रहकर परिवार का खर्च चलाते हैं और मैं घर संभालती हूं,” वह बताती हैं। तटबंध पर आने से पहले उनका अपनी ज़मीन पर घर था और परिवार का गुज़र बसर खेत में मज़दूरी करके होता था। लेकिन, हर साल आने वाली बाढ़ ने सबकुछ बदल दिया। वह बताती हैं, “अभी तो नदी या बारिश के पानी का डर नहीं है, पर बाढ़ के समय तटबंध की दूसरी तरफ पानी बढ़ने से डर बना रहता है। हर वक़्त चिंता लगी रहती है।” इसी तटबंध पर थोड़ी दूर 43 वर्षीय नूरुल हक़ (बदला हुआ नाम) का घर है जो पहले अपने पैतृक ज़मीन पर खेतीबाड़ी करते थे। आज अपने छह सदस्यों वाले परिवार के पालन-पोषण के लिए ईंट-भट्ठा में कामकाज और घर के आसपास ही दिहाड़ी मज़दूरी पर निर्भर हैं। “बस अब यही क़िस्मत है। इस उम्र में दिल्ली-पंजाब जाकर नहीं कमा सकते, बेटियों की शादी का टेंशन है। परिवार को ऐसे हाल में अकेले छोड़ कर नहीं जा सकते,” वह कहते हैं। वह हाई प्रेशर (उच्च रक्तचाप) के मरीज़ हैं। हाई प्रेशर की मुख्य वजहों में एक वजह तनाव भी है। कटिहार समेत बिहार के कोसी क्षेत्र में बाढ़ के कारण विस्थापन और अन्य परेशानियां कोई नयी घटना नहीं है। लेकिन सच ये है कि बाढ़ से होनेवाली क्षति महज़ पानी भरने से लेकर पानी उतर जाने के दौरान के नुक़सान तक सीमित नहीं रहती। बाढ़ से होनेवाले नुकसान में एक बड़ा हिस्सा बाढ़ पीड़ितों के मन-मस्तिष्क पर लम्बे समय तक बाढ़ का सदमा समाये रहना भी है जिसे प्रायः नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। Read: mainmedia.in/mental-health-…
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बिहार के जलाशयों, नदियों से क्यों गायब हो रहे घोंघे? विज्ञान के अनुसार, घोंघा, मॉलस्का (Mollusca) संघ और गैस्ट्रोपोडा (Gastropoda) वर्ग का सदस्य है। ये उत्तरी बिहार की आर्द्रभूमि और ग्रामीण जल-इकोसिस्टम का अभिन्न हिस्सा है और स्थानीय भाषा में लोग इसे डोका, घोगा, गोंगा या अईंठा भी कहते हैं। दुनिया भर में ‘हेलिक्स पोमेटिया’ जैसी प्रजातियों को ‘एस्कार्गो’ के नाम से महंगा विलासी भोजन माना जाता है, लेकिन बिहार के चौरों और बाढ़ वाले मैदानों में पाए जाने वाले ये घोंघे गरीब परिवारों के लिए प्रोटीन का सबसे सस्ता और आसानी से उपलब्ध स्रोत हैं। इनकी पहचान है कैल्शियम कार्बोनेट का कड़ा सुरक्षा कवच और नीचे का मांसल पैर, जो चिपचिपे म्यूकस की मदद से गीली मिट्टी पर आसानी से रेंगता है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) तथा इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) के शोधों में साफ कहा गया है कि मीठे पानी के घोंघे सिर्फ खाने की चीज नहीं, बल्कि प्रकृति के ‘लाइव वाटर फिल्टर’ हैं। ये जल शुद्धिकरण का काम करते हैं और खाद्य श्रृंखला की अहम कड़ी भी। पूरी तरह शाकाहारी होने के कारण ये पत्तियों और जलीय कार्बनिक पदार्थों पर निर्भर रहते हैं, जिससे जैविक चक्र बना रहता है। स्वास्थ्य की दृष्टि से भी ये अत्यंत लाभकारी हैं। संक्षेप में, घोंघा बिहार के चौरों की सेहत का सूचक है—जिसकी मौजूदगी का मतलब है स्वस्थ जल और समृद्ध जैव-विविधता। @earthjournalism Read report by @rajanmfp: mainmedia.in/why-are-snails…
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घटते घोंसले और सिकुड़ता फीडिंग ग्राउंड, बिहार का ‘गरुड़ गांव’ संकट में! साल 2006 – 2007 में भागलपुर में गरुड़ की संख्या 78 थी जो 2023-2024 में बढ़कर 600 हो गई। इस साल गरुड़ों की गणना की प्रक्रिया चल रही है। इंडियन बर्ड कंजर्वेशन नेटवर्क के बिहार के को-ऑर्डिनेटर व बर्ड एक्सपर्ट अरविंद मिश्रा ने बताया कि इस बार भागलपुर के कदवा दियारा में गरुड़ के 130 घोंसले मिले हैं। गरुड़ का अंतिम आंकड़ा कुछ दिनों में जारी किया जाएगा। घोंसलों की बात करें, तो पिछली बार के मुकाबले इस बार उनकी संख्या कम है। पिछली बार की गणना में 160 घोंसले मिले थे। हालांकि, बर्ड वाचरों का कहना है कि गरुड़ की आबादी जितनी बताई जा रही है, वास्तविक संख्या उससे कम होगी। बर्ड वाचर मो. दानिश मसरूर बताते हैं, “मैंने पिछले साल दिसंबर में गरुड़ के प्रजनन के समय कदवा दियारा का निरीक्षण किया था। मैंने देखा कि अधिकाधिक पेड़ जिन पर गरुड़ के घोंसले होते थे, उनकी टहनियों को प्रजनन काल में काट दिया गया है। मुख्य स्थानों पर लगभग 10 घोंसले ही देखने को मिले थे।” वह कहते हैं, “अभी तक गरुड़ की संख्या को आधिकारिक रूप से सत्यापित करने के लिए उनकी रिंगिंग भी नहीं की गयी है। रिंगिंग करने से पारदर्शी तरीके से वास्तविक आंकड़े सामने आ जाएंगे। मगर, मुझे लगता है कि गरुड़ की जो संख्या बताई जा रही है, वास्तविक संख्या उससे आधी होगी।” उल्लेखनीय है कि गरुड़, पर्यावरण को साफ रखने में मदद करते हैं और उनकी मौजूदगी स्वस्थ आर्द्रभूमि का संकेत है। गरुड़, मृत जैविक अपशिष्टों की सफाई, सरीसृपों, फसल कृन्तकों, बड़े कीटों इत्यादि को खाकर खाद्य श्रृंखला में अपनी भूमिका निभाते हैं। Read: mainmedia.in/with-dwindling…
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नीतीश कुमार छोड़ेंगे मुख्यमंत्री की कुर्सी, राज्यसभा जाने का किया ऐलान
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