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Balveer Choudhary
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Balveer Choudhary
@BalveerCL
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इश्क़, इबादत और 'तनहा' (भाग - 4) -तनहा ✍️
(कहानी सीरीज)
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गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर जब ट्रेन रुकी, तो राहुल के भीतर जैसे कुछ टूट कर बिखर चुका था। 16 घंटों का वह सफर किसी अंतहीन अंधेरे सुरंग जैसा था। स्टेशन से मेडिकल कॉलेज तक का रास्ता उसने जैसे होश-ओ-हवास खोकर तय किया।
रास्ते में एक पल के लिए उसने फोन ऑन किया था--जिया के दर्जनों मैसेज और कॉल्स की बाढ़ आई हुई थी।
उसने 'तुम्हारी जिया इंतज़ार कर रही है' वाला मैसेज पढ़ा, पर उंगलियों में इतनी जान नहीं थी कि टाइप कर सके। इस वक्त जिया की मोहब्बत से कहीं ज्यादा माँ की ममता का कर्ज उसे बुला रहा था। उसने फोन वापस जेब में डाल लिया।
मेडिकल कॉलेज के इमरजेंसी वार्ड की हवा में दवाइयों की कड़वाहट और सिसकियों का शोर था। दूर से ही उसे मुकुंद चाचा और उनका बेटा गलियारे में खड़े दिखे। जैसे ही राहुल की नजर बेड नंबर 14 पर पड़ी, उसकी रूह कांप गई। माँ, जो कभी पूरे घर की धुरी थी--आज मशीनों के बीच बेबस लेटी थीं।
राहुल को देखते ही माँ की पथराई हुई आँखों के कोरों से आँसुओं की एक धार निकल पड़ी। राहुल दौड़कर उनके पास पहुँचा और उनके ठंडे पड़ते हाथों को अपने दोनों हाथों में थाम लिया।
उसकी आँखों से आँसुओं का समंदर बह निकला, पर जुबां से शब्द नहीं निकल रहे थे।
पीछे से मुकुंद चाचा की भारी आवाज़ आई, "बबुआ, डॉक्टर कहत बाड़ें कि हार्ट अटैक आइल बा। सांस लेवे में बहुत तकलीफ बा। कुछु साफ-साफ बतावत नहीं बाड़ें डॉक्टर..."
पर राहुल को अब कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। उसके लिए ब्रह्मांड सिमटकर उस बेड तक आ गया था।
माँ ने कांपते हुए हाथों से राहुल का चेहरा छुआ और बहुत धीमी, मरती हुई आवाज़ में कहा, "बबुआ... रो मत बेटा। अब सुन... मुझे कुछ बताना है तुझे।"
राहुल ने सिसकते हुए अपना सिर माँ के सीने के पास झुका दिया। माँ ने रुक-रुक कर कहना शुरू किया, "तेरे पापा के एक दोस्त हैं... धवल जी। वो दिल्ली में ही रहते हैं। मैं कभी नहीं चाहती थी कि तू उन्हें जाने या उनसे मिले... पर अब, जब तू अकेला रह जाएगा... तो उनसे मिलना। उनका नंबर तेरे पापा की पुरानी डायरी में मिल जाएगा।
गाँव की ये जमीन बेच देना बेटा... शहर में बस जाना। खूब पढ़ना... अपने जीवन को संवारना। और... और किसी अच्छी लड़की से शादी करके घर बसा लेना..."
"नहीं माँ! आप चुप रहिए, आप कहीं नहीं जा रही हैं। आप ठीक हो रही हैं..." राहुल का गला रूँध गया।
माँ की सांसें अब लंबी और बोझिल होने लगी थीं। उन्होंने एक आखिरी बार राहुल की आँखों में देखा--उन आँखों में आशीर्वाद था, डर था और एक गहरा सुकून भी कि उनका बेटा उनके पास पहुँच गया। अचानक मॉनिटर पर चलती हुई लकीरें सीधी होने लगीं। माँ की पकड़ राहुल के हाथ पर ढीली पड़ गई।
उसी वक्त, राहुल की जेब में रखा फोन वाइब्रेट होने लगा। स्क्रीन पर नाम चमक रहा था, 'जिया Calling'।
वार्ड के सन्नाटे को चीरती हुई राहुल की एक चीख गूँज उठी-- "माँ!"
जिया पागलों की तरह कॉल कर रही थी। फोन बजता रहा, पर उठाने वाला अब उस दुनिया में था जहाँ आवाज़ें नहीं पहुँचतीं। राहुल ने माँ के ठंडे माथे पर अपना सिर रख दिया। जिया का कॉल कट कर दोबारा आने लगा, पर राहुल के पास अब देने के लिए कोई जवाब नहीं था। उसे लगा जैसे उसकी पहचान, उसका 'घर' और उसकी दुनिया, सब उस सफेद चादर के नीचे दफन हो गए हैं।
अस्पताल के उस शोर में राहुल बिल्कुल 'तनहा' खड़ा था--हाथ में माँ का अधूरा आंचल और जेब में जिया की अधूरी मोहब्बत का बजता हुआ फोन।
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कहानी जारी है...

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