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@RdyTwitte1
मेरे लिए धर्म से बड़ी इंसानियत है क्योंकि अगर इंसान ही नहीं रहेगा तो धर्म किस काम की ! जब तक दिमाग में अंधविश्वास और पाखंड मौजूद है आप पढ़े लिखे होकर भीअनपढ है
Khalilabad India เข้าร่วม Mayıs 2017
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रूसी तेल खरीद प्रतिबंधों पर अमेरिका ने बढ़ाई 30 दिनों की छूट
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ट्रंप ने ईरान हमला रद्द किया! जले पर नमक छिड़कते हुए, ईरान ने ये सुलह के लिए ये 8 मांगें और रख दीं:
– यूरेनियम संवर्धन का अधिकार।
– लेबनान और गाज़ा सहित सभी मोर्चों पर युद्धविराम।
– अमेरिका की नौसैनिक नाकेबंदी हटाना।
– विदेश में जमा ईरान की सभी फ़्रीज़ की गई संपत्तियों को जारी करना।
– युद्ध से हुए नुकसान के लिए मुआवज़ा।
– सभी आर्थिक प्रतिबंधों को समाप्त करना।
– ईरान के ख़िलाफ़ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सभी प्रस्तावों को वापस लेना।
– फ़ारसी खाड़ी क्षेत्र से अमेरिकी सेना की वापसी।

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पूंजीपतियों का “राइट-ऑफ”, किसानों की “कुर्की” आखिर यह कैसा न्याय?
देश की बैंकिंग व्यवस्था का सबसे कड़वा सच यह है कि जब बड़े उद्योगपतियों का हजारों करोड़ का कर्ज डूबता है, तो उसे तकनीकी भाषा में “राइट-ऑफ” कहकर कागज़ों से गायब कर दिया जाता है। लेकिन वही व्यवस्था तब बेहद कठोर हो जाती है जब कोई किसान मौसम, बाजार या प्राकृतिक आपदा की मार झेलकर कुछ हज़ार रुपये का कर्ज नहीं चुका पाता।
बड़े कॉरपोरेट घरानों के लिए पुनर्गठन, सेटलमेंट और कानूनी राहत के दरवाजे खुले रहते हैं, जबकि किसान के हिस्से में नोटिस, कुर्की और सामाजिक अपमान आता है। सवाल यह है कि क्या आर्थिक अपराध की गंभीरता रकम देखकर तय होगी या इंसाफ के सिद्धांतों से?
पिछले दिनों डॉ. सी. रंगराजन द्वारा बताए गए 9.2 लाख करोड़ रुपये के राइट-ऑफ का आंकड़ा केवल बैंकिंग डेटा नहीं, बल्कि उस असमान आर्थिक सोच का आईना है जिसमें “डिफॉल्टर” भी वर्ग देखकर तय होता है। एक तरफ पूंजीपति का कर्ज “व्यावसायिक जोखिम” कहलाता है, दूसरी तरफ किसान की मजबूरी को “अदायगी में विफलता” बताकर उसकी जमीन तक नीलाम कर दी जाती है।
दरअसल यह व्यवस्था तब और सवालों के घेरे में आ जाती है जब बैंकों की रिकवरी राइट-ऑफ के मुकाबले बेहद कम दिखाई देती है। आखिर क्यों आम नागरिक के टैक्स से चलने वाली बैंकिंग व्यवस्था का बोझ बार-बार गरीब, किसान और मध्यम वर्ग उठाए, जबकि बड़े आर्थिक खिलाड़ियों के लिए नियम नरम पड़ जाते हैं?
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पेट्रोल-डीजल के बाद अब खाने का तेल 20 रुपये हुआ महंगा
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