
क्या राजस्थान में क्रूड रिफाइनरी को रोकने के लिए दशकों से संस्थागत षड्यंत्र जारी है?
बाड़मेर की रेतीली धरती के नीचे दबा तेल भारत के कुल घरेलू कच्चे तेल उत्पादन का एक चौथाई हिस्सा है। यह संख्या अपने आप में असाधारण है देश के एक ज़िले की ज़मीन से निकलता है पूरे देश का एक चौथाई तेल। लेकिन इससे भी असाधारण यह है कि इस तेल के उत्पादन के सत्रह साल (2009 से 2026) बाद भी राजस्थान के पास अपनी एक भी रिफाइनरी नहीं है।
कहानी शुरू होती है मई 1995 से, जब RJ-ON-90/1 ब्लॉक शेल इंडिया कंपनी को आवंटित हुआ इसके बाद भारत सरकार, शेल इंडिया और ONGC के बीच प्रोडक्शन शेयरिंग कांट्रैक्ट(PSC) साइन हुआ। 1998 से 2003 के बीच शेल इंडिया की हिस्सेदारी केयर्न एनर्जी को हस्तांतरित हुई। 1999 में पहली खोज हुई और जुलाई 1999 से नवंबर 2008 के बीच कुल 25 हाइड्रोकार्बन खोजें हुई जिसमे 21 तेल और 4 गैस खोज शामिल थी। इतनी समृद्ध खोजें, इतनी बड़ी संभावना। लेकिन इसी दौरान देरी की एक समानांतर कहानी भी चल रही थी, प्रोडक्शन शेयरिंग कांट्रैक्ट(PSC) में एक्सप्लोरेशन अवधि सात वर्ष की थी जो 14 मई 2002 को समाप्त होनी थी। भारत सरकार ने जून 2002 में 36 महीने का एक्सटेंशन दिया। फिर जून 2005 में 18 महीने का और एक्सटेंशन दिया गया । फिर दिसंबर 2006 में और छह महीने का अनुरोध आया लेकिन अबकी बार डायरेक्टर हाइड्रोकार्बन ने इसकी अनुशंसा नहीं की, क्योंकि जिस काम के लिए पिछला एक्सटेंशन माँगा गया था वह पहले ही पूरा हो चुका था। लेकिन पेट्रोलियम मिनिस्ट्री (MoPNG) ने मई 2007 में यह एक्सटेंशन भी दे दिया। 15 नवंबर 2006 से 8 मई 2007 के बीच के छह महीने किसी फ़ॉरमल एक्सटेंशन के बिना ऑपरेटर बिना वैलिड कांट्रैक्ट के काम करता रहा और सरकार देखती रही। इसके अलावा मूल 11,108 वर्ग किमी अनुबंध क्षेत्र में से 1,935 वर्ग किमी का क्षेत्र जो न खोज क्षेत्र था और न ही विकास क्षेत्र सिर्फ़ इसलिए 7 नवंबर 2007 तक अनियमित रूप से रोका गया क्योंकि ऑपरेटर ने समय पर नक्शे जमा नहीं किए। सरकारी देरी को पार्ट ऑफ़ प्रोसेस बता कर निहितार्थ व्यावसायिक लाभों पर चुप्पी साध ली और हर उल्लंघन के बाद यही दोहराया गया
यह इस पूरी कहानी का सबसे चौंकाने वाला अध्याय सरकारी रिफायनरी द्वारा क्रूड नहीं उठाना है। भारत सरकार (GoI) ने (फरवरी 2008 में) कच्चे तेल की निकासी के लिए कई सरकारी रिफाइनरियों को नामित करने का फैसला किया। PSU रिफाइनरियों, यानी IOCL, HPCL, BPCL और MRPL ने भी (अक्टूबर 2008 में) भारत सरकार को बताया था कि वे इस ब्लॉक से अनुमानित 7.5 से 8.75 MMTPA उत्पादन के मुकाबले 3.5 से 4.2 MMTPA तक तेल ले सकती हैं। MRPL के हिस्से 0.60 एमएमटी HPCL के हिस्से 0.80 एमएमटी और IOCL के हिस्से 3.20 MMTPA क्रूड उठाने की लक्ष्य तय हुआ। HPCL ने अपने हिस्से के 0.80 एमएमटी के एवज़ में शून्य क्रूड उठाया। तीन वर्षों में कुल 4.60 MMT के आवंटन के विरुद्ध केवल मात्र 1.67 MMT यानी 36 प्रतिशत क्रूड उठाया गया और इस 36 प्रतिशत में भी HPCL का योगदान शून्य था।
सार्वजनिक PSU रिफाइनरियों के उठाव न करने का परिणाम यह हुआ कि भारत सरकार ने अक्टूबर 2009 में केयर्न को “मार्केटिंग फ्रीडम” दे दी। वह छूट जो राजस्थान क्रूड की हाई विस्कॉसिटी के कारण PSUs को मिलनी थी, वह रिलायंस और एस्सार को मिलने लगी। 2009-10 से 2011-12 के बीच कुल क्रूड उत्पादन का 51.11 से 87.57 प्रतिशत तक निजी रिफाइनरियों को गया। पाँच वर्षों में अनुमानित 250 मिलियन बैरल में से 80 प्रतिशत से अधिक क्रूड निजी कंपनियों को गया।
उत्पादन के चार साल बाद 2013 में HPCL को 7 मिलियन टन क्षमता की रिफाइनरी की ज़िम्मेदारी पर “विचार” शुरू हुआ। 2018 में राजस्थान सरकार और HPCL के बीच MOU हुआ। फिर भूमि अधिग्रहण के विवाद, वित्तीय मॉडल पर खींचतान, राज्य-केंद्र हिस्सेदारी की बहस, कोविड का हवाला, लागत वृद्धि का तर्क, डिज़ाइन बदलाव का कारण हर साल एक नई देरी, हर देरी के साथ एक नई वजह गढ़ती चली गई।
पूरी कहानी में जो सबसे स्पष्ट है, वह है निजी कंपनियों को लाभ का प्रवाह।इस नुकसान की भरपाई का कोई क़ानूनी रास्ता नहीं खोजा गया जो गया सो गया और जो तय करना था वह जानबूझकर अधूरा रखा गया। इस पूरे समीकरण में राजस्थान को क्या मिला? रॉयल्टी और प्रॉफिट पेट्रोलियम का वह हिस्सा जो अंतरिम मूल्य पर आधारित था जिसे भारत सरकार ने कभी अनुमोदित नहीं किया। कोई रिफाइनरी नहीं, कोई उद्योग नहीं, कोई बड़े पैमाने पर रोज़गार नहीं, कोई वैल्यू एडिशन नहीं। एक प्रतिष्ठित ऊर्जा विशेषज्ञ के अनुसार वह यह मानने से इनकार नहीं करते कि PSU का निजी क्षेत्र के साथ मिलकर क्रूड न उठाने की साज़िश में शामिल होना संभव है
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