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जयपुर स्थापना दिवस; जयपुर के निर्माण व विकास में मीणा समुदाय की भूमिका
जयपुर रियासत इलाके में मीणाओं का प्राचीन शासन
• यह बात है वीं सदी की जब खोहगंग (वर्तमान खोह नागोरियान) के इलाके में चांदा वंशीय मीणा राजा आलनसिंह ने वर्तमान मध्यप्रदेश के नरवर राज से भागकर आये राजवंश जयपुर के कच्छवाह राज के संस्थापक दुल्हेराय को भानजा बनाकर शरण दी थी. उसी ने मीणा राज्य को हथियाया. उसके बाद एक-एक कर सभी मीणा राज्यों पर इस राजवंश ने सत्ता स्थापित कर ली.
• जयपुर रियासत की पूर्व राजधानी आमेर थी जिसे कच्छवाह राजाओं ने स्थापित किया था. कच्छवाह राजवंश से पूर्व वहां सुसावत गौत्र का मीणा राजवंश था. कांकिल के पुत्र मेकुलराव के समय महाराज सूरसिंह नामक सुसावत मीणा राजा राज करता था. उसका शासनकाल सन् 1135-1145 बताया जाता है. कर्नल जेम्स टॉड के अनुसार कांकिल के पुत्र मेदल (मेकुल राव) ने सुसावत राव भत्तो (भानोराव) से आमेर का राज छीना. इतिहासकार कनिंघम ने भी ‘केम्ब्रिज हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया’ में इस तथ्य की पुष्टि करते हुए लिखा कि- ‘मेकुलराव कच्छावा ने सुसावत वंश के राव भानो से आमेर छीन लिया.’ रावल नरेन्द्र सिंह कृत ‘ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ़ जयपुर’ में यह उल्लेख किया है कि कांकिल देव ने आमेर पर विजय प्राप्त की.
• जयपुर की पूर्व महारानी स्वर्गीय गायत्री देवी अपनी पुस्तक ‘मेरी स्मृतियाँ’ (1994) के दूसरे संस्करण के पृष्ठ 65 पर लिखती हैं कि ‘जयपुर महाराज ने हमें बताया कि जब उनके पूर्वज पहले पहल जयपुर आये थे तो यह महल स्थानीय मीणा जाति के अधीन था जिसे इनके पूर्वजों ने जीता था.’
कच्छवाह एवं मीणों के बीच संघर्ष व समझौता
• आमेर छिन जाने के बाद कच्छवाह और मीणों की संघर्ष-शृंखला चलती है, जिसका प्रथम चरणीय समाधान कच्छावा नरेश राव पजोनी के समय हुआ. यह वह दौर था जब मुस्लिम आक्रमण इस क्षेत्र में भी चल रहे थे. राव पजोनी (छठवां कच्छावा शासक) ने यह उचित समझा कि ऐसे संकट काल में मीणा सरदारों से मित्रता करना अनिवार्य है. कच्छावा नरेश पजोनी ने मीणा सरदारों के साथ समझौता किया जिसके मुख्य बिंदु निम्न थे-
1. मीणों के प्राचीन राजचिन्ह, नक्कारा, पताका, छड़ी, पालकी, छत्र, चामर, घोटा, किरणी आदि उनको पुनः दे दिए गए.
2. फौज, खजाना व शस्त्रगार का दायित्व मीणों के हाथ दे दिया.
3. मीणा सरदारों की सम्मति के बिना किसी को राज गद्दी पर नहीं बिठाया जायेगा.
4. सेना में विशेषकर मीणों को ही प्राथमिकता दी जायेगी.
5. मीणों की स्वीकृति बिना किसी को न तो जागीर दी जावे और न किसी से छीनी जावे.
6. मीणा सरदारों से किस प्रकार का टेक्स नहीं लिया जावे.
7. मीणा जाति के किसी भी किसान से बेगार न ली जाये.
8. मीणाओं के पैर में सोना पहनने तथा उनके राजसी ठाठ-बात पूर्वत बना रहेगा.
(इस मुद्दे पर विस्तार के लिए SHM रिज़वी की पुस्तक ‘Minas, the Ruling Tribe of Rajasthan’ को देखा जा सकता है.)
जयपुर राज की सीमाओं के प्रहरी मीणा
इतिहासकार दशरथ शर्मा ने अपनी प्रमुख पुस्तक Rajasthan Through the Ages में जयपुर (आमेर) राज्य की सुरक्षा व्यवस्था में मीणा सरदारों की महत्वपूर्ण भूमिका का उल्लेख करते हुए लिखा है-‘आमेर (जयपुर) के कच्छवाह शासकों ने अपनी राज्य-सीमाओं की रक्षा का प्रमुख दायित्व मीणा जाति को सौंप रखा था. मीणा सरदारों को ‘चौकीदार-ए-मुल्क’ (देश के प्रहरी) कहा जाता था. वे पहाड़ियों, जंगलों और घाटियों में रहते थे और राज्य की उत्तरी-पूर्वी सीमाओं (वर्तमान अलवर, दौसा, सवाई माधोपुर आदि क्षेत्रों) पर किसी भी बाहरी आक्रमण या डाकुओं के हमले की स्थिति में सबसे पहले मुकाबला करते थे.’
जयपुर शहर की सुरक्षा
जयपुर की बसावट के बाद नगर सुरक्षा का दायित्व भी मीणा सरदारों के हवाले रखा गया. जयपुर शहर की सभी 27 चौकियों के प्रभारी मीणा ही थे. इतिहासकार हनुमान शर्मा के अनुसार ‘मीणा रखवाले प्रजा और धन के असली रक्षक रहे. ये पहरायत और चौकायत के रूप में रहकर जनधन की रक्षा करते थे. बड़ी चौपड़ के तख्तों पर बैठकर सोना चांदी का कारोबार करने वाले रात को अपना सोना-चांदी घर ले जाने की बजाय विश्वनीय चौकीदारों के भरोसे वहीँ छोड़कर चले जाते थे.’
राज खजाना का दायित्व
इतिहासकार प्रोफ़ेसर राघवेंद्र सिंह मनोहर ने लिखा है-‘जयपुर राज का खजाना मीणा सरदारों के नियंत्रण में रहता था. जब भी महाराजा को खजाना तक ले जाया जाता था तो उसकी आँखों पर पट्टी बाँधी जाती थी. खजाना का भेद केवल मीणा सरदार को रहता था.
अश्वमेध यज्ञ और हीदा मीणा की बहादुरी
जयपुर के महाराजा जयसिंह द्वितीय के समय ॰॰॰
~ इतिहासकार पूर्व IPS श्री हरिराम मीणा
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