मधु शर्मा

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मधु शर्मा

मधु शर्मा

@VedaRicha

सनातनी लेखक✍️भक्ति, प्रेरणा, पौराणिक कथाएं, और कविताएँ। कृतज्ञ👉 @VijayVst0502 @iRakeshPanday @BeingArun28 @RamakantOnline @Bitt2DA @MYogiDevnath #VHPDigital

भारत (आर्यावर्त) Joined Ocak 2022
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मधु शर्मा
श्रीमद्भगवद्गीता: काव्य सार अष्टादश अध्याय: मोक्षसंन्यासयोग (सिद्धि और शरणागति का शिखर) पूछा अर्जुन ने, "हे महाबाहु! संन्यास क्या है? त्याग और संन्यास का, गहरा यह भेद क्या है? किस विधि से कर्म बंधन, कट जाते हैं सखा! सत्य कहिए मुझे, जो ज्ञान का है अनूप सखा!" बोले केशव, "पार्थ! सुन, कामनाओं का जो त्याग, विद्वान उसे ही कहते, सच्चा संन्यास और राग। पर सब कर्मों के फल का, जो कर दे अर्पण त्याग, वही त्यागी श्रेष्ठ है, जिसमें न मोह न राग।" कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन। सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः॥ (१८.९) कर्तव्य मान जो कर्म करे, तज फल की सब आस। सात्त्विक त्याग वही सखा, काटे जो भव-पाश॥ "अपने-अपने कर्मों में, जो तत्पर होकर रमता, ईश्वर को अर्पित कर कर्म, वही सिद्धि को वरता। स्वधर्म चाहे दोषपूर्ण हो, परधर्म से श्रेष्ठ महान, सहज कर्म को न तजे, जो है ईश्वर का वरदान।" सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥ (१८.६६) सब धर्मों को छोड़ कर, आ मेरी ही शरण। पाप मुक्त मैं करूँगा, तज दे शोक और भरण॥ "भक्ति केवल भाव नहीं, वाणी का सम्मान भी है, कृष्ण तक पहुँचने का, गीता ही प्रमाण भी है। ज्ञान बिना जो भक्ति करे, वह मार्ग अधूरा जान, वाणी के उस दर्पण में ही, होते प्रभु के दर्शन दान।" कृष्ण भक्ति ही पूर्ण नहीं, वाणी पढ़ना सार। गीता पथ पर चल मधु, होगा बेड़ा पार॥ समापन सूत्र (मधु की कलम से): "भक्ति का द्वार ज्ञान से खुलता है।" कृष्ण से प्रेम करना सरल है, परंतु उन्हें समझना महान है। श्रीमद्भगवद्गीता केवल एक ग्रंथ नहीं, स्वयं भगवान की वाणी है। जब तक हम उनकी इस वाणी का अध्ययन और मनन नहीं करते, तब तक हमारी भक्ति अधूरी है। गीता के माध्यम से ही हम कृष्ण के हृदय तक पहुँच सकते हैं। ✍️ — मधु शर्मा #श्रीमद्भगवद्गीता #VedaRicha_ #मोक्षसंन्यास_योग #गीता_सार_काव्यरूप
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मधु शर्मा@VedaRicha

श्रीमद्भगवद्गीता: काव्य सार सत्रहवां अध्याय: श्रद्धात्रयविभाग योग (तीन प्रकार की श्रद्धा) पूछा अर्जुन ने, "हे माधव! संशय एक सताता है, शास्त्र-विधि बिन जो भजें, उनका क्या हो जाता है? उनकी निष्ठा कैसी केशव, सात्त्विक या राजस जानूँ? या तामस गुण के वश में, मैं उनको ही पहचानूँ?" बोले केशव, "पार्थ! सुनो, श्रद्धा त्रिविध (तीन) विधाता, देहधारियों के स्वभाव से, उपजे यह सब नाता। सात्त्विक, राजस और तामस, तीनों के गुण भारी, जैसी श्रद्धा वैसा मनुज, यह रीति है जग सारी।" त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा। सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु॥ (१७.२) जैसी श्रद्धा वैसा मनुज, जानो कुन्ती-लाल। तीन गुणों से बंधा है, यह जग का सारा हाल॥ "सात्त्विक भोजन सुख-आयु दे, रसदार और स्निग्ध महान, राजस भोजन दुख-रोग दे, तीखा-कटु अज्ञान। तामस भोजन दुर्गंधमय, बासी और उच्छिष्ट (जूठा) जान, इन तीनों के लक्षण से, पहचानो अन्न का दान।" "विधि-विधान से यज्ञ करे, फल की चाह न होय, वह सात्त्विक यज्ञ कहाता है, जिससे जग सुख सोय। दम्भ और मान के लिए जो, राजस यज्ञ रचाये, और तमस यज्ञ विधि-हीन, श्रद्धा-दान बिन जाय।" देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्। ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते॥ (१७.१४) देव, गुरु और ज्ञानी की, पूजा, शुद्धि, सरलता धर। अहिंसा, ब्रह्मचर्य ये, शारीरिक तप जान, तू डर॥ "मन की शांति, सौम्यता और, मौन-आत्म-विनिग्रह (संयम), भाव-संशुद्धि ये सात्त्विक तप, काटे सब भव-जखम। सत्कार-मान के लिए जो, राजस तप किया जाय, और तमस तप मूढ़ता से, पीड़ा सह कर लाय।" "देश-काल-पात्र समझ, जो दान दिया जाता, फल की चाह रहित वह, सात्त्विक दान कहाता। प्रत्युपकार की चाह में, राजस दान है भारी, और तमस दान अपमानित, अश्रद्धा से दीखारी।" श्रद्धा-तप-भोजन-दान में, मधु सात्त्विक गुण धार। कृष्ण नाम का जप सखी, होगा बेड़ा पार॥ जीवन सूत्र: "आप जो हैं, आपकी श्रद्धा वैसी ही है।" हमारा स्वभाव ही हमारी श्रद्धा, हमारे भोजन और हमारे कर्मों को निर्धारित करता है। गीता हमें सिखाती है कि हमें तामस और राजस प्रवृत्तियों को त्याग कर, अपने जीवन के हर पहलू (श्रद्धा, भोजन, तप, दान) में 'सत्त्व' गुण को बढ़ाना चाहिए, तभी हम सच्चे अर्थों में उन्नति कर सकते हैं। ✍️ — मधु शर्मा #श्रीमद्भगवद्गीता #VedaRicha_ #श्रद्धात्रयविभाग_योग #गीता_सार_काव्यरूप

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मधु शर्मा retweeted
रूह 💫
रूह 💫@mrs_jesal·
मन के भीतर झांक के देख वहीं सच्चा ज्ञान मिलेगा, जहां तेरी आत्मा शुद्ध होगी वहीं परमात्मा का स्थान मिलेगा...!! #जय_श्री_कृष्ण🙏 #रूह
रूह 💫 tweet media
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आनन्द श्रीवास्तव
चैत्र नवरात्रि के द्वितीय दिन माँ ब्रह्मचारिणी की आराधना का पावन अवसर 🙏 तप, त्याग और साधना की प्रतिमूर्ति माँ सभी के जीवन में शक्ति, धैर्य और सफलता का आशीर्वाद दें। जय माता दी 🚩 #ChaitraNavratri #MaaBrahmacharini #Navratri2026 #जयमातादी
आनन्द श्रीवास्तव tweet media
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Pushpraj sharma
Pushpraj sharma@RealPushprajX·
या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मी रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः। जय लक्ष्मी मैया की🚩🙏
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Sunita Mishra
Sunita Mishra@me_sunitaa·
या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।। बुद्धि , शक्ति एवं ऊर्जा की देवी आपके जीवन में सुख शांति एवं समृद्धि लेकर आए। चैत्र नवरात्रि के द्वितीय दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं ! जय माता दी 🙏🚩❣️
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Pooja Singh
Pooja Singh@puji1110·
सभी सनातनियों को सुबह का प्रणाम 🙏
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Gujju_Singh
Gujju_Singh@Gs_Bishtpy·
शुभ प्रभात 🌼 नवरात्रि का दूसरा दिन — माँ ब्रह्मचारिणी 🙏 वह तपस्या, अनुशासन और आंतरिक शक्ति का प्रतीक हैं। उनका आशीर्वाद आपको एकाग्रता, धैर्य और अपने मार्ग पर अडिग रहने की शक्ति प्रदान करे। #NavratriDay2 #Brahmacharini #Shakti . जय माता दी 🙏
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मधु शर्मा retweeted
प्रदीप मौर्य हिंदू2.0🚩🎪
🙏🌹*Jai Shree Mahakal*🌹🙏 *श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का भस्म आरती शृंगार दर्शन* *20-03-2026 कण-कण में महादेव*
प्रदीप मौर्य हिंदू2.0🚩🎪 tweet media
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रमेश करनानी - मोदीजी का परिवार
🌸 शुभ प्रभात 🌸 ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः 🙏 माँ ब्रह्मचारिणी की कृपा से आपके जीवन में तप, संयम और शक्ति का संचार हो, हर बाधा दूर हो और आपका दिन सफलता, शांति व सकारात्मक ऊर्जा से भर जाए। जय माता दी 🌺🙏
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मधु शर्मा
रामायण की अनसुनी कहानियां अंक - ११ नन्हे राम और निश्छल पक्षी प्रेम गद्य विवरण: अयोध्या के महलों की मुंडेर पर बैठने वाले पक्षी भी जानते थे कि इस आंगन में साक्षात करुणा ने जन्म लिया है। एक किंवदंती के अनुसार, नन्हे राम अपनी माता की रसोई के पास बैठकर पक्षियों को बुलाते थे। वे अपनी थाली का आधा हिस्सा उन नन्हे जीवों के लिए रख देते थे। माता कौशल्या यह देखकर भावुक हो जाती थीं कि जो संपूर्ण सृष्टि का पालनहार है, वह एक छोटी सी चिड़िया के साथ बालक बनकर खेल रहा है। यही वह प्रेम था जिसने आगे चलकर वानर और भालू सेना को प्रभु का दास बना दिया। काव्य रूप खेलत नन्हे रामलला, कौशल्या के पास। आंगन में गूँजे सदा, खुशियों का उल्लास॥ उड़कर आई एक चिरैया, चोंच में दाना लेत। राम हाथ से छीन के, उड़ गई वन के खेत॥ देख देख कर मुस्काए, नन्हे राजदुलार। पक्षी भी तो पा रहे, प्रभु का अनुपम प्यार॥ मैया से बोले ललन, क्यों वह डर कर जाय?। क्या मैं इतना कठिन हूँ, जो वह पास न आय?॥ आँखें भर आईं प्रभु की, देख के नन्हा जीव। बचपन से ही जगा रहे, दया भाव की नींव॥ हँस के बोलीं कौशल्या, सुनु मेरे सुकुमार। तुझसे डरती है नहीं, वह तो है बलिहार॥ उस दिन से सब पक्षी आए, निर्भय होकर द्वार। राम हथेली से चुगें, दाना बारम्बार॥ पशु-पक्षी और देव सब, वश में हुए कृपाल। प्रेम डोर से बाँधते, सबको दीनदयाल॥ गाँव-गाँव में गूँजती, यह पावन सी रीत। राम नाम से जुड़ गई, पंछी की भी प्रीत॥ 'कागभगोड़ा' कह रहे, अवध के सब लोग। राम कृपा से मिट रहे, सबके सब वियोग॥ सबके हैं रघुनाथ जी, क्या मानव क्या जीव। 'मधु' लिखे इस प्रेम को, भक्ति ही है नीव॥ 'मधु शर्मा' की डायरी, बनी प्रेम का धाम। बाल रूप में खिल रहे, मेरे प्यारे राम॥ अगले अंक में देखेंगे, गुरु के संग वह चाल। जब विश्वामित्र ले चले, रघुकुल के दो लाल॥ ✍️ — मधु शर्मा #VedaRicha_ #RamayanaUnheardStories #रामजी_की_चिरैया #करुणा
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रामायण की अनसुनी कहानियां अंक - १०: नन्हे राम, नन्ही गिलहरी और करुणा का प्रथम स्पर्श कथा का संक्षिप्त विवरण अयोध्या के राजप्रासाद के उपवन में नन्हे राम अपने भाइयों के साथ कंदुक (गेंद) खेल रहे थे। तभी एक नन्ही गिलहरी वृक्ष की ऊँची शाखा से फिसलकर नीचे जा गिरी। भय और चोट से वह नन्हा जीव काँप रहा था। अन्य बालक खेल में मग्न थे, पर करुणावतार राम का ध्यान उस पर गया। उन्होंने खेल छोड़कर उस नन्ही गिलहरी को अपनी कोमल हथेलियों में उठा लिया। प्रभु ने बड़े प्रेम से उसकी पीठ पर अपनी तीन उंगलियाँ फेरीं। कहते हैं, प्रभु के उस दिव्य स्पर्श से ही गिलहरी की पीठ पर वे तीन काली धारियाँ सदा के लिए अंकित हो गईं। जब लक्ष्मण ने पूछा कि एक लघु जीव के लिए खेल क्यों छोड़ा, तब प्रभु ने भविष्य की ओर संकेत करते हुए कहा: "लखन, जो सबसे छोटा है, उसे ही सबसे बड़े सहारे की आवश्यकता होती है। लखन, यह नन्हा जीव भविष्य में मेरे एक बड़े संकल्प का साक्षी बनेगा।" यही वह गिलहरी थी, जिसने वर्षों बाद लंका विजय हेतु सेतु निर्माण में अपनी सामर्थ्य के अनुसार धूल के कण डालकर प्रभु का साथ दिया और प्रभु ने पुनः उसकी पीठ सहलाकर उस पुराने ऋण को अमर कर दिया। बिस्व भरन पोषन कर जोई। ताकर नाम भरत अस होई॥" भाव यह कि राम जी बचपन से ही सबको साथ लेकर चलने की कला सिखा रहे थे। काव्य रूप खेलत नन्हे रामलला, अवधपुरी के बाग। सब बालक हैं मग्न अति, उपजा हृदय विराग॥ ऊँची साख से गिर पड़ी, एक गिलहरी आय। व्याकुल होकर काँप रही, धीरज गया विलाय॥ प्रभु ने देखा नयन से, करुणा का जो धाम। दौड़ के उसको ले लिया, हाथों में सुखधाम॥ फेरीं तीन उँगलियाँ तब, कोमल पीठ मँझार। अंकित हो गईं धारियाँ, प्रभु का जो उपहार॥ अभय मिला उस जीव को, मिटा हृदय का त्रास। नन्हे राम के हाथ में, पाया सुखद निवास॥ बोले लखन बुझाइ के, सुनहु तात मतिधीर। लघु जीव हित क्यों तजा, खेल आपने वीर?॥ मुस्कराए तब रामलला, बोले गूढ़ वचन। "यही जीव है साक्ष मेरा, सुनहु अनुज मन॥ सागर तट पर जब कभी, बँधेगा पत्थर सेतु। यही गिलहरी आएगी, धर्म स्थापना हेतु"॥ बचपन से ही सिखा रहे, सेवा का जो धर्म। छोटा बड़ा न तौलिए, देखहु केवल कर्म॥ अंगुलियों का वह निशाँ, बना प्रेम का चिन्ह। भक्त और भगवान कभी, होते नहीं हैं भिन्न॥ बचपन का वह स्नेह ही, सेतु पे उभरा फेर। लघु सेवा को मान दिया, राम न लगाई देर॥ 'मधु शर्मा' की डायरी, साक्षी है यह रीत। प्रभु ने नन्हे जीव से, निभाई ऐसी प्रीत॥ जग कल्याण को लिखती यहाँ, करुणा का यह भेद। राम कृपा से मिट रहे, सबके मन के खेद॥ ✍️ — मधु शर्मा #VedaRicha_ #RamayanaUnheardStories #गिलहरी #करुणा

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मधु शर्मा retweeted
RN Jangid
RN Jangid@RajeshV39584952·
श्रीलक्ष्मी हृदय स्तोत्रम्🙏 हस्तद्वयेन कमले धाअरयन्तीं स्वलीलया॥ हारनूपुर-संयुक्तां महालक्ष्मीं विचिन्तयेत्॥ कौशेयपीतवसनां अरविन्दनेत्राम् पद्मद्वयाभय-वरोद्यत-पद्महस्ताम्। उद्यच्छतार्क-सदृशां परमाङ्क-संस्थां। ध्यायेत् विधीशनत-पादयुगां जनित्रीम् II ओं श्रीं ह्रीं ऐं🙏 सुप्रभात🙏
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Ajay Vijay
Ajay Vijay@ajay_vijay1·
@VedaRicha जय श्री कृष्ण 🙏🚩
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मधु शर्मा
श्रीमद्भगवद्गीता: काव्य सार अष्टादश अध्याय: मोक्षसंन्यासयोग (सिद्धि और शरणागति का शिखर) पूछा अर्जुन ने, "हे महाबाहु! संन्यास क्या है? त्याग और संन्यास का, गहरा यह भेद क्या है? किस विधि से कर्म बंधन, कट जाते हैं सखा! सत्य कहिए मुझे, जो ज्ञान का है अनूप सखा!" बोले केशव, "पार्थ! सुन, कामनाओं का जो त्याग, विद्वान उसे ही कहते, सच्चा संन्यास और राग। पर सब कर्मों के फल का, जो कर दे अर्पण त्याग, वही त्यागी श्रेष्ठ है, जिसमें न मोह न राग।" कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन। सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः॥ (१८.९) कर्तव्य मान जो कर्म करे, तज फल की सब आस। सात्त्विक त्याग वही सखा, काटे जो भव-पाश॥ "अपने-अपने कर्मों में, जो तत्पर होकर रमता, ईश्वर को अर्पित कर कर्म, वही सिद्धि को वरता। स्वधर्म चाहे दोषपूर्ण हो, परधर्म से श्रेष्ठ महान, सहज कर्म को न तजे, जो है ईश्वर का वरदान।" सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥ (१८.६६) सब धर्मों को छोड़ कर, आ मेरी ही शरण। पाप मुक्त मैं करूँगा, तज दे शोक और भरण॥ "भक्ति केवल भाव नहीं, वाणी का सम्मान भी है, कृष्ण तक पहुँचने का, गीता ही प्रमाण भी है। ज्ञान बिना जो भक्ति करे, वह मार्ग अधूरा जान, वाणी के उस दर्पण में ही, होते प्रभु के दर्शन दान।" कृष्ण भक्ति ही पूर्ण नहीं, वाणी पढ़ना सार। गीता पथ पर चल मधु, होगा बेड़ा पार॥ समापन सूत्र (मधु की कलम से): "भक्ति का द्वार ज्ञान से खुलता है।" कृष्ण से प्रेम करना सरल है, परंतु उन्हें समझना महान है। श्रीमद्भगवद्गीता केवल एक ग्रंथ नहीं, स्वयं भगवान की वाणी है। जब तक हम उनकी इस वाणी का अध्ययन और मनन नहीं करते, तब तक हमारी भक्ति अधूरी है। गीता के माध्यम से ही हम कृष्ण के हृदय तक पहुँच सकते हैं। ✍️ — मधु शर्मा #श्रीमद्भगवद्गीता #VedaRicha_ #मोक्षसंन्यास_योग #गीता_सार_काव्यरूप
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श्रीमद्भगवद्गीता: काव्य सार सत्रहवां अध्याय: श्रद्धात्रयविभाग योग (तीन प्रकार की श्रद्धा) पूछा अर्जुन ने, "हे माधव! संशय एक सताता है, शास्त्र-विधि बिन जो भजें, उनका क्या हो जाता है? उनकी निष्ठा कैसी केशव, सात्त्विक या राजस जानूँ? या तामस गुण के वश में, मैं उनको ही पहचानूँ?" बोले केशव, "पार्थ! सुनो, श्रद्धा त्रिविध (तीन) विधाता, देहधारियों के स्वभाव से, उपजे यह सब नाता। सात्त्विक, राजस और तामस, तीनों के गुण भारी, जैसी श्रद्धा वैसा मनुज, यह रीति है जग सारी।" त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा। सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु॥ (१७.२) जैसी श्रद्धा वैसा मनुज, जानो कुन्ती-लाल। तीन गुणों से बंधा है, यह जग का सारा हाल॥ "सात्त्विक भोजन सुख-आयु दे, रसदार और स्निग्ध महान, राजस भोजन दुख-रोग दे, तीखा-कटु अज्ञान। तामस भोजन दुर्गंधमय, बासी और उच्छिष्ट (जूठा) जान, इन तीनों के लक्षण से, पहचानो अन्न का दान।" "विधि-विधान से यज्ञ करे, फल की चाह न होय, वह सात्त्विक यज्ञ कहाता है, जिससे जग सुख सोय। दम्भ और मान के लिए जो, राजस यज्ञ रचाये, और तमस यज्ञ विधि-हीन, श्रद्धा-दान बिन जाय।" देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्। ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते॥ (१७.१४) देव, गुरु और ज्ञानी की, पूजा, शुद्धि, सरलता धर। अहिंसा, ब्रह्मचर्य ये, शारीरिक तप जान, तू डर॥ "मन की शांति, सौम्यता और, मौन-आत्म-विनिग्रह (संयम), भाव-संशुद्धि ये सात्त्विक तप, काटे सब भव-जखम। सत्कार-मान के लिए जो, राजस तप किया जाय, और तमस तप मूढ़ता से, पीड़ा सह कर लाय।" "देश-काल-पात्र समझ, जो दान दिया जाता, फल की चाह रहित वह, सात्त्विक दान कहाता। प्रत्युपकार की चाह में, राजस दान है भारी, और तमस दान अपमानित, अश्रद्धा से दीखारी।" श्रद्धा-तप-भोजन-दान में, मधु सात्त्विक गुण धार। कृष्ण नाम का जप सखी, होगा बेड़ा पार॥ जीवन सूत्र: "आप जो हैं, आपकी श्रद्धा वैसी ही है।" हमारा स्वभाव ही हमारी श्रद्धा, हमारे भोजन और हमारे कर्मों को निर्धारित करता है। गीता हमें सिखाती है कि हमें तामस और राजस प्रवृत्तियों को त्याग कर, अपने जीवन के हर पहलू (श्रद्धा, भोजन, तप, दान) में 'सत्त्व' गुण को बढ़ाना चाहिए, तभी हम सच्चे अर्थों में उन्नति कर सकते हैं। ✍️ — मधु शर्मा #श्रीमद्भगवद्गीता #VedaRicha_ #श्रद्धात्रयविभाग_योग #गीता_सार_काव्यरूप

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SURESH PUNIA
SURESH PUNIA@Punia7474·
‼️‼️जय मां महालक्ष्मी ‼️‼️ माता रानी की कृपा आप सभी पर बनी रहे 🙏
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