Gyandutt Pandey

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@GYANDUTT

Blogger | Ex-Railway HOD | Now exploring Village Life Near Ganga River. ⚡️Energy doesn’t Retire at 70. Blog : https://t.co/ZOl0484oYw X, FB - @gyandutt

Bhadohi, India Inscrit le Şubat 2008
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Gyandutt Pandey
Gyandutt Pandey@GYANDUTT·
"अभी तो इस बाज की असली उड़ान बाकी है। अभी तो इस परिन्दे का इम्तिहान बाकी है। अभी अभी मैने लांघा है समन्दर को। अभी तो पूरा आसमान बाकी है।"
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Gyandutt Pandey
Gyandutt Pandey@GYANDUTT·
नर्मदा दंड परिक्रमा प्रेशर कुकर की रसोई नहीं है। धीमी आंच पर बनती खिचड़ी की तरह है। स्वाद धीरे धीरे घुलता है अन्न में — कुछ उस तरह। पर आजकल तो सूरज तप रहे हैं, रसोई की उपमा सोलर कुकर से करनी चाहिए। साढ़े पांच बजे शुरू की परिक्रमा नौ बजे तक थामने का समय हो जाता है। पहली पारी की खिचड़ी। नर्मदा परिक्रमा मार्ग बन रहा है। गर्दा उड़ रहा है। श्रमिक कहते हैं — यहीं पेड़ की छांह में आराम करो बाबा। प्रेम सागर कहते हैं — अब चार बजे शाम को शुरू करूंगा। एक किलोमीटर बचा है घाटी पार करने में। कल मुख्य सड़क पर चलना होगा। वैसे भईया यह कच्ची पगडंडी बेहतर है दंड यात्रा के लिए। पक्की सड़क पर तो डामर ज्यादा ताप देता है। उमेश यादव फिर आये, आज पत्नी लक्ष्मी और छोटी बेटी को भी साथ ले आये। बेटी के हाथ में पानी की बोतल है — शायद उसी को सौंपने की ज़िम्मेदारी दी गई है। बड़ी बेटी प्रियंका घर पर रही, पर पपीते भेजे। 40 डिग्री के जंगल में यह परिवार — नर्मदा माई की सेवा में अपनी तरफ से। मौज है। दंड भरने से बदन में छाले भले पड़ रहे हैं उमेश, लक्ष्मी और प्रियंका जैसे का आदर और सेवा जरूर तृप्त करती होगी। जंगल के चित्रों पर ध्यान दिया जाये। महुआ भी टपक रहा है। पलाश भी फूला है। बस सागौन खंखड़ हो गया है। हां, कल का आतिथ्य देने वाले साल्ले डंडा के ज्ञानी लाल वर्कड़े जी का भी चित्र है। #NarmadaDandParikrama
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Gyandutt Pandey
Gyandutt Pandey@GYANDUTT·
@rahtiwary आपके लॉजिक पर मैं विचार करूंगा। आपने जैसा बताया वैसे मामले मिले जरूर हैं पर वे अपवाद है या पैटर्न — यह सोचना है।
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Ra
Ra@rahtiwary·
@GYANDUTT और जो बुढ़ाते, टकलाते और मोटाते लड़के बिना शादी पड़े हैं, वो ज्यादा दहेज की मांग के कारण नहीं, बल्कि उसके पीछे - "पहले पैसे कमाओ, गरीब बाप के घर को रिपेयर कराओ, फ्रिज, कार खरीदो, ताकि अच्छी सुन्दर लालची लोमड़ी बीवी मिले", ये कठिन संघर्ष है।
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Gyandutt Pandey
Gyandutt Pandey@GYANDUTT·
>>> घड़ी, साइकिल, बाजा बनाम राइडर मेरे बचपन में दहेज का मानक था — घड़ी, साइकिल और बाजा – रेडियो। तेल से चुआती जुल्फी टेये नई शादी वाला दुलहा गांव में साइकिल ले कर घड़ी पहने और रेडियो पर बिनाका गीत माला सुनता निकलता था। जलवा होता था। अब समय बहुत बदल गया है। बगल में शादी तय हुई है। छेकईया में — तिलक की रस्म में — सब तय-तमाम हुआ है। पर लड़का मुंह फुलाये है। मोटर साइकिल में जो ब्रांड देने को कहा है लड़की के पिता ने, वह उसे पसंद नहीं — उसे तो कोई नई ब्रांड की राइडर चाहिये। लड़की इंटर पास है। लड़के से एक दर्जा ज्यादा पढ़ी है; पर उससे क्या। मोटर साइकिल पर पीछे बिठा ले चलेगा तो राइडर वाला जलवा थोड़े होगा — चाहे वह कितनी भी पढ़ी हो। लड़कियां अब ज्यादा पढ़ रही हैं, ज्यादा योग्य हैं। पर बाज़ार अभी भी वही है — दहेज लड़की वाला ही देता है। यही पहेली मेरी समझ में नहीं आती। साइकिल से निकलता हूँ तो गाँव की गलियों में मोटर साइकिलें ही मोटर साइकिलें दिखती हैं — खड़ी भी, दौड़ती भी। बाज़ार में चलने की जगह नहीं। लोन पर ले कर दहेज में मोटर साइकिल देना आसान हो गया है। ऋणम कृत्वा घृतम पिबेत। कई-कई गांवों में लड़कों की शादी नहीं हो रही। कोई पूछने वाला ही नहीं आता। पहले तो घर के सामने बंधे दो बैल और एक गइया शादी के लिये नेसेसरी और सफीशियेंट कंडीशन होती थी। अब वह नहीं रहा। अब नौकरी — भले ही बम्बई में होटल में बेयरा की हो — ज़रूरी है। लिहाजा, बेरोजगारी के जमाने में कई बिना शादी के रह जा रहे हैं। इंतजार में अधेड़ हो जा रहे हैं। और दहेज फिर भी लड़की वाला ही दे रहा है। बहुत सम्भव है आज से दस साल बाद जेन-अल्फा का नौजवान बेरोजगार हो; सरकार की यूनिवर्सल बेसिक इनकम पर जिंदा हो; पर चलता दहेज में माँगे चार चक्का पर ही हो। दरअसल मामला मोटर साइकिल का है ही नहीं। मामला इज्ज़त और हैसियत का है। लड़की का बाप दहेज देकर इज्ज़त खरीदता है — लड़का दहेज लेकर हैसियत जताता है। राइडर वाली मोटर साइकिल उस पूरे समीकरण में = का चिन्ह लगाती है। घड़ी-साइकिल-बाजा का ज़माना गया। चिन्ह वही रहा। < गांवदेहात डायरी > #VillageDiary विस्तार से गांवदेहात डायरी ब्लॉग पर मिलेगी — आपको जंचे तो प्रोफाइल में "मानसिक हलचल" ब्लॉग लिंक झाँक लें। → gyandutt[.]com
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Gyandutt Pandey
Gyandutt Pandey@GYANDUTT·
@BadnamShayar1 सीधा लिंक को algorithm दबाता है — रीच कम करता है।
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बदनाम शायर
बदनाम शायर@BadnamShayar1·
@GYANDUTT ब्लॉग का सीधा सीधा लिंक दिया कीजिये, पढ्ना आसान रहेगा । एडिट वगैरा करने की हिम्मत नहीं होती !
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NG
NG@nehagarg9·
@GYANDUTT Ek do log apke comment section mein kafi frustrated type hain lagta hai apki batayi category k hi hain 😁 baki dahej lena toh 1960s se apradh hai par sach yeh hai ki uske bina koi shaadi nhi ho rahi. Ab urban society mein usko expectations ka nam diya jata hai.
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Amarnath Singh 🇮🇳
Amarnath Singh 🇮🇳@captamarnath·
@GYANDUTT उस जमाने के दहेज के मानकों में वर के लिए दो-तीन वस्तुएं और थीं - सिकड़ी, अंगूठी एवम् कलम. बिना पढ़े लड़कों को भी अक्सर अच्छी कलम मिल जाती थी 😂
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Gyandutt Pandey
Gyandutt Pandey@GYANDUTT·
NH 19 हाईवे पर गुजरते हुए 16 में से 12 दोपहिया मोटर साइकिल सवार बिना हेल्मेट के गिने। तीन या चार उसमें से तीन सवारी थे, सभी बिना शिरस्त्राण। कानून पालन भी मुस्तैदी से हो रहा है और पालन कराने वाले भी सतर्क हैं! 😊 अपनी ही चाल चलता है भारत।
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Sakshi Sudheer
Sakshi Sudheer@sudheer1964·
@GYANDUTT मैं गोपी गंज से 31 March se 1 April तक किसी आयोजन में था कई बार जाना हुआ इस सड़क पर लोग miles तक फ्लाइओवर के रॉंग साइड सभी प्रकार के वाहन तेजी से भगाते मिले और कोई भय या दुर्घटना होने की आशंका का नामो निशान नहीं था उनके चेहरे पर ।
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Alpha Hindu
Alpha Hindu@Alphaa_hindu·
@GYANDUTT खांटी, देसी आदमी। मेरे ख्याल से ऐसा दंडवत परिक्रमा वो भी पूरा नर्मदा का , करने वाली आखिरी पीढ़ी।
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Gyandutt Pandey
Gyandutt Pandey@GYANDUTT·
नर्मदा दंड परिक्रमा में आज का पड़ाव प्रेमसागर बताते हैं — ताले डंडा। कहते हैं इस नाम की नदी भी है सूखी हुई। बरसाती नदी है। यहाँ के पूर्व सरपंच ज्ञानी लाल जी के यहां दोपहर भी विश्राम हुआ था और शाम को दंड भरने के बाद रात भी ज्ञानी लाल जी के यहां ही रहेंगे। गांव में कच्चे पक्के दोनों तरह के घर हैं। कच्चे घर खपरैल वाले। ज्ञानी लाल जी का तो पक्का है। गेहूं काट चुके हैं किसान। कुछ मूंग की भी फसल ले लेते हैं धान की खेती से पहले। कोदों नहीं होता यहां। बगल के ब्लॉक में लोग बता रहे थे कि इस दफा राशन में सरकार ने कुटकी बांटा है। खेती हल बैल से भी होती है और ट्रेक्टर से भी। बैल गाड़ियां भी दिखती हैं। इलाका पारंपरिक और मशीनी खेती की संधि पर है। कल बैल गाड़ी का फोटो लेने की कोशिश करेंगे प्रेम सागर। रास्ता कच्चा पक्का है। आगे एक दिन कच्चे रास्ते पर दंड भरा जाएगा। सड़क से दूर हट कर। आज वन नहीं था। कल रहेगा। ताले डंडा नदी सूख गई है तो जंगली जानवर भी पानी की तलाश में कहीं और चले गए हैं। कोई दिखा नहीं आज। #NarmadaDandParikrama
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Gyandutt Pandey
Gyandutt Pandey@GYANDUTT·
@saurabhchandra प्रतिस्पर्धा के तत्व अभी भी हैं पर करीब 20 प्रतिशत। शत प्रतिशत हों और फ्रेट पैसेंजर यातायात को सबसिडी ना दे तो बड़ा बदलाव हो। 😊
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Saurabh Chandra
Saurabh Chandra@saurabhchandra·
Indian Railways can improve by transforming into a regulator and 20 PSUs. Retain govt ownership but introduce competition. Make each zone into a PSU for one. And many sub functions like logistics, stations etc.
Handre@Handre

The Japanese railway privatization of 1987 stands as one of the most devastating defeats ever dealt to statist transportation mythology. The government split the bloated Japan National Railways into seven regional companies, sold them off, and watched private ownership transform a bankruptcy-bound disaster into the world's most efficient rail system. JNR hemorrhaged money for decades before privatization. By 1987, the state railway carried debt equivalent to $200 billion in today's money while delivering mediocre service plagued by strikes and inefficiency. Politicians treated it as a jobs program rather than a transportation service. The predictable result: chronic losses, deteriorating infrastructure, and customer service that reflected government monopoly arrogance. Private ownership changed everything overnight. The new JR companies slashed operating costs by 40% within five years while dramatically improving service quality. JR East alone now generates annual profits exceeding $3 billion. These companies invest billions in cutting-edge technology, maintain punctuality rates above 99%, and operate the world's most advanced high-speed rail networks. They achieved this without a single yen of operational subsidies. The transformation reveals a core dynamic of transportation infrastructure: private companies must satisfy customers to survive, while government monopolies need only satisfy politicians. JR companies diversified into real estate, retail, and hospitality around their stations, creating integrated profit centers that cross-subsidize rail operations. Government railways never innovate this way because bureaucrats face no market pressure to generate returns. Meanwhile, Amtrak burns through $2 billion in annual subsidies while delivering third-world service across most routes, and European state railways require massive taxpayer bailouts every few years to stay solvent.

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Gyandutt Pandey
Gyandutt Pandey@GYANDUTT·
@Observer4s बुर्का बैन करने में जूड़ी का बुखार आ जाएगा।
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लंकेश
लंकेश@Observer4s·
सबको पता है जनेयु से परीक्षा में नकल की संभावना जीरो है मगर सवर्णों का गर्व है जनेयु तो उसपर प्रहार करते हैं, जानबूझकर।
Rakesh Krishnan Simha@ByRakeshSimha

Janeu is banned during exams. Burqa is allowed. Which one of these two has the capacity to allow crib notes, transmitters and impersonation?

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Gyandutt Pandey
Gyandutt Pandey@GYANDUTT·
जगह ताले नहीं साल्ले डण्डा है। नक्शे में यही दिखता है। प्रेम सागर जी सुनने में लटपटा गए। 😊
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लंकेश
लंकेश@Observer4s·
समाजवादी पार्टी के लोगों से अपील है कि, जो अखिलेश यादव जी के नजदीक रहते हैं, उनसे कांटेक्ट करें और यह अखिलेश यादव जी जो हुलिया बनाए हुए हैं अपना, वह थोड़ा सा चेंज करें। लाल टोपी, पीछे बड़े बाल, और आगे जो है उसको तो बदल नहीं सकते,,बहुत ही गंदा फील आता है यार🙄
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Gyandutt Pandey
Gyandutt Pandey@GYANDUTT·
>>> संहजन की फलियां सुखाई जा रही हैं हमारे घर में संहजन नहीं है। एक लगाया था पर उसकी पत्तियां और फलियाँ कड़वी होती थीं। सो उसे हटा दिया। उसकी जगह कोई और फलदार पौधा लगा है। सुभाष जी को मालुम था कि हमारे यहां संहजन नहीं है। तो उन्होने ढेर सारी फलियाँ भेज दीं। काफी तो हमने दाल में उबाल कर चूस कर खाईं। बची हुई फलियों के दो-तीन इंच के टुकड़े काट कर कड़ी धूप में सुखाये जा रहे हैं। पूरी तरह सूख जायेंगे तो उनको मिक्सी में पीस कर पाउडर बनेगा। वह पाउडर व्यंजनों में या दही आदि में मिलाया जायेगा। मैंने पढ़ा है कि संहजन घुटनो के दर्द के लिये फायदेमंद होता है। अमेजन पर यह सुपर – फूड कहा गया है और ₹2000 प्रति किलो बिकता है। घर में यह सुखाने-पीसने से एक पाव संहजन.मोरिंगा पाउडर तो बन ही जायेगा। फ्री में सुपर – फूड उत्पादन कर लेंगे हम गांवदेहात और घरपरिसर में। प्रयोग सफल रहा तो अगले साल सुभाष दुबे जी से और फलियां मांगी जायेंगी! ### विस्तार से गांवदेहात डायरी ब्लॉग पर मिलेगी — आपको जंचे तो प्रोफाइल में "मानसिक हलचल" ब्लॉग लिंक झाँक लें। → gyandutt[.]com । < गांवदेहात डायरी > #VillageDiary
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Gyandutt Pandey@GYANDUTT·
@BadnamShayar1 सब मेरा देखा घूमा इलाका है रेल सेवा के दौरान।
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बदनाम शायर
@GYANDUTT गोरखपुर मे एक बौद्धकालीन स्थान है जहां सहजन के जंगल थे तो नाम पड़ा - सहजनवा क्षत्रियों की एक शाखा 'रावत' का जन्मस्थान राजा शारदा सिंह रावत के जमाने मे उनका घोड़ा ट्रेन (अंग्रेजी) को हरा दिया तो लगान माफ था, जहां दौड़ end हुई वही आज रावतगंज रेलवे स्टेशन है कैम्पियरगंज, गोरखपुर मे
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BB SINGH
BB SINGH@buntbingo·
@GYANDUTT महोदय, भारतीय वायु सेना से ३९ वर्ष की नौकरी पश्चात सेवानिवृत्ति ली और जन्मभूमि पर गांव आ गया, गांव के बाहर खेत में देसी आमों के बगीचे (बाबा ने लगाया था) में घर बना लिया। बहुत आनंद है।
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Gyandutt Pandey
Gyandutt Pandey@GYANDUTT·
>>> घर के बगीचे के कोने की दुनियाँ घर के सामने की दांये कोने पर कम ही जाता हूं। वहां गूलर, नीम और पीपल के तीन पेड़ हैं। त्रिदेव की तरह। वहां रामसेवक घर की किचन गार्डनिंग करते हैं। एक कोने में दुमुही – सैंडबोआ और धामिन – असाढ़िया चूहे खाने वाले सांप की भी उपस्थिति है। कभी कभी तीतर भी अपना परिवार बनाता है उधर। आज उस ओर गया। पत्नीजी साथ थीं — उन्होंने एक-एक पौधे का परिचय कराया, जैसे किसी पुराने मोहल्ले में घर की बुजुर्ग मालकिन पड़ोसियों को कराती हैं। बोड़ा-बजरबट्टू की हरी भरी बेल फैल गई है, सफेद-बैंगनी फूलों के साथ। तीस-चालीस सूरजमुखी के पौधे हैं — कंधे तक ऊँचे — और सभी मुँह पूरब की ओर किये हैं, सूरज की तरफ। बाद में, चित्र में देखा तो पीछे त्रिदेव भी खड़े थे — सूरजमुखी के साक्षी। गाजर और धनिया अब फूल-फल-बीज तक पहुँच गये हैं — अपना पूरा जीवनक्रम चुपचाप पूरा करते हुए। लेमन ग्रास तो खूब छंछड़ा है। रामसेवक की कैंची ने लगता है उसे संवार दिया है — आकर्षित करता है। दो दिन पहले आनंद और राजकुमारी आये थे — राजकुमारी उसके चित्र ले गईं। कलकत्ता में शायद उनके यहां है नहीं लेमन ग्रास। घरपरिसर का हर एक कोना अपना अपना दुख-सुख लिये मौन जी रहा है। शायद सोचता भी हो कि इस घर का खूसट बुढ़ऊ मालिक उनके आसपास क्यों नहीं आता। आज सोचा — रोज सवेरे दस मिनट वहाँ जाना चाहिये। उनसे संवाद करना चाहिये। < गांवदेहात डायरी > #VillageDiary विस्तार से गांवदेहात डायरी ब्लॉग पर मिलेगी — आपको जंचे तो प्रोफाइल में "मानसिक हलचल" ब्लॉग लिंक झाँक लें। → gyandutt[.]com
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