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Abhika gupta
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@Jaya__Kishori__ दर्द 'तोड़ने' के लिए नहीं, 'खोलने' के लिए है-
हम समझते हैं कि दर्द हमें कमज़ोर कर देता है या खत्म कर देता है। लेकिन यहाँ एक नया नज़रिया दिया गया है दर्द हमें खोलता है
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दर्द से बचने की कोशिश में हम ज़िंदगी से बच रहे होते हैं। दर्द ज़िंदगी का हिस्सा है, जैसे रात दिन का हिस्सा है। अगर रात नहीं होगी तो सितारों
की ख़ूबसूरती कौन देखेगा
अगर दर्द न हो, तो
जीवन का आनंद कैसे मिलेगा
दर्द हमें तोड़ता नहीं,
दर्द हमें खोलता है
दर्द वो दरार है, जहाँ से
जीवन की रोशनी अंदर आती है
अब इसको थोड़ा विस्तार से समझते हैं:
1. दर्द से भागना, जीवन से भागना है
अक्सर हम दुःख, असफलता या चोट से इतना डरते हैं कि हम नए अनुभव लेना ही बंद कर देते हैं। हम सुरक्षित घेरे (Comfort Zone) में दुबक जाते हैं। लेकिन अनुभव कहता है कि जब आप दर्द से बचने के लिए खुद को बंद कर लेते हैं, तो आप अनजाने में जीना भी छोड़ देते हैं। क्योंकि जहाँ भावनाएँ हैं, वहाँ दर्द की संभावना भी हमेशा रहेगी।
2. द्वंद्व का सिद्धांत (रात और सितारे)
यह प्रकृति का नियम है कि किसी भी चीज़ का मूल्य उसके विपरीत की उपस्थिति से ही होता है
प्रकाश का महत्व केवल अंधकार के कारण है
आनंद का अहसास तभी होता है जब हमने कभी पीड़ा सही हो
जैसे बिना काली रात के हम सितारों की चमक नहीं देख सकते, वैसे ही बिना संघर्ष के हम अपनी आंतरिक शक्ति और जीवन की उपलब्धियों की चमक महसूस नहीं कर सकते
3. दर्द 'तोड़ने' के लिए नहीं, 'खोलने' के लिए है-
हम समझते हैं कि दर्द हमें कमज़ोर कर देता है या खत्म कर देता है। लेकिन यहाँ एक नया नज़रिया दिया गया है—दर्द हमें खोलता है
यह हमारी सहानुभूति (Empathy) को जगाता है।
यह हमारे अहंकार की कठोर परत को तोड़ता है।
यह हमें अपनी सीमाओं से रूबरू कराता है और हमें पहले से अधिक परिपक्व बनाता है
4. दरार और रोशनी (लियोनार्ड कोहेन का संदर्भ)
यह विचार प्रसिद्ध कवि लियोनार्ड कोहेन की पंक्तियों की याद दिलाता है: "There is a crack in everything, that's how the light gets in." जब हमारा हृदय किसी चोट से "फटता" या "टूटता" है, तो वह एक खाली जगह पैदा करता है उसी खाली जगह (दरार) से ज्ञान, करुणा और नई चेतना की रोशनी हमारे भीतर प्रवेश करती है। यदि हम पूरी तरह पत्थर की तरह ठोस रहेंगे, तो न कुछ बाहर जाएगा, न कुछ अंदर आ पाएगा
संक्षेप में, यह विचार हमें सिखाता है कि दर्द कोई दुश्मन नहीं बल्कि एक शिक्षक है। यह हमें मानवीय बनाता है। जीवन की पूर्णता केवल सुख में नहीं, बल्कि सुख और दुःख के संतुलन में है। दर्द को स्वीकार करना ही वास्तव में जीवन को पूरी तरह से स्वीकार करना है

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श्री हनुमानजी का चित्र
वास्तु शास्त्र के अनुसार घर में कहां और कैसे लगाएं
यदि घर में देवी- देवताओं के चित्र लगे हों तो घर में कई तरह की परेशानियां दूर हो जाती हैं और घर में सुख-शांति बनी रहती है
वास्तुशास्त्र के अनुसार, घर में हनुमान जी की तस्वीर लगाने से कई लाभ मिलते हैं
अगर घर में वास्तु के नियमानुसार सही दिशा में सही तरह से हनुमानजी की तस्वीर लगाई जाए तो कई लाभ हो सकते हैं
हनुमानजी बाल ब्रह्मचारी हैं इसलिए उनकी तस्वीर बेडरूम में नहीं लगानी चाहिए
बेडरूम में लगाई गई हनुमानजी की तस्वीर शुभ फल नहीं देती
भगवान हनुमानजी की तस्वीर घर या दुकान में दक्षिण दिशा की ओर लगाना सबसे अच्छा माना जाता है। क्योंकि हनुमानजी ने अपनी शक्तियों का प्रयोग दक्षिण दिशा की ओर दिखाया था
घर मे पंचमुखी, पर्वत उठाते हुए या राम भजन करते हुए हनुमानजी की तस्वीर लगाना सबसे अच्छा होता है। इससे घर के सभी दोष खत्म हो जाते हैं
उत्तर दिशा में हनुमानजी की तस्वीर लगाने पर दक्षिण दिशा से आने वाली प्रत्येक नकारात्मक शक्ति को हनुमानजी रोक देते हैं। इससे घर में सुख और समृद्धि बनी रहती है
जिस रुप में हनुमानजी अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहे हों, ऐसी तस्वीर घर में लगाने से किसी तरह की बुरी शक्ति घर में प्रवेश नहीं कर पाती
हनुमानजी की तस्वीर पर सिंदूर जरुर लगाना चाहिए। ऐसा न कर पाने पर सिंदूर का केवल तिलक भी किया जा सकता है। इससे सभी मनोकामनाएं जरुर पूरी होती हैं

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शुद्ध का अर्थ है, स्वभाव में होना
अशुद्ध का अर्थ है, प्रभाव में होना
यह विचार अध्यात्म और मनोविज्ञान की एक बहुत ही गहरी और सुंदर समझ को दर्शाता है। यहाँ 'शुद्धता' को किसी धार्मिक कर्मकांड से नहीं, बल्कि आपकी चेतना की स्थिति (State of Consciousness) से जोड़ा गया है
आइए इसे विस्तार से समझते हैं
1. शुद्ध का अर्थ है: स्वभाव में होना (Being in your Nature)
'स्वभाव' शब्द दो शब्दों से बना है— स्व + भाव, यानी 'अपना भाव' या 'अपने होने का ढंग'
मूल स्वरूप: जब आप वैसे ही होते हैं जैसे आप वास्तव में हैं—बिना किसी दिखावे, बिना किसी डर और बिना किसी बाहरी अपेक्षा के—तब आप 'शुद्ध' हैं
उदाहरण: जैसे पानी का स्वभाव शीतल होना है
अगर पानी शीतल है, तो वह अपने स्वभाव में है
आंतरिक शांति: जब आपके विचार और कर्म आपकी अंतरात्मा से निकलते हैं, न कि दूसरों को प्रभावित करने के लिए, तब आप अपनी शुद्धतम अवस्था में होते हैं। यहाँ शुद्धता का अर्थ 'मिलावटहीन' होना है
2. अशुद्ध का अर्थ है: प्रभाव में होना (Being under Influence)
'अशुद्धता' का अर्थ यहाँ गंदगी से नहीं, बल्कि पर-भाव (दूसरों के भाव) से है।
बाहरी नियंत्रण: जब आपके सुख, दुख, क्रोध या निर्णय दूसरों के व्यवहार पर निर्भर करने लगते हैं, तो आप 'अशुद्ध' हो जाते हैं। क्योंकि अब आप 'आप' नहीं रहे, बल्कि किसी और की कठपुतली बन गए हैं।
कंडीशनिंग (Conditioning): समाज, शिक्षा, विज्ञापन और दूसरों की राय जब आपकी मौलिकता को ढंक लेती है, तो वह 'प्रभाव' है।
उदाहरण: यदि किसी ने आपकी आलोचना की और आप घंटों दुखी रहे, तो आप उस व्यक्ति के 'प्रभाव' में हैं। आपकी शांति आपकी अपनी नहीं रही, वह बाहरी परिस्थिति की गुलाम हो गई। यही अशुद्धता है
निष्कर्ष
यह विचार हमें आत्म-जागरूकता की ओर ले जाता है
जब तक आप दूसरों के कहे अनुसार खुद को आंकते हैं, आप 'प्रभाव' में हैं। जिस दिन आप अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनकर जीना शुरू करते हैं, आप अपने 'स्वभाव' में लौट आते हैं
संक्षेप में कहें तो, स्वयं का मालिक होना ही शुद्धता है, और परिस्थितियों का गुलाम होना अशुद्धता है

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शिखा - सूत्र का वैदिक विज्ञान
सिर के ऊपरी भाग को ब्रह्मांड कहा गया है और सामने के भाग को कपाल प्रदेश। कपाल प्रदेश का विस्तार ब्रह्मांड के आधे भाग तक है। दोनों की सीमा पर मुख्य मस्तिष्क की स्थिति समझनी चाहिए।
ब्रह्मांड का जो केन्द्रबिन्दु है, उसे ब्रह्मरंध्र कहते हैं। ब्रह्मरंध्र में सुई की नोंक के बराबर एक छिद्र है जो अति महत्वपूर्ण है। सारी अनुभूतियां, दैवी जगत् के विचार, ब्रह्मांड में क्रियाशक्ति और अनन्त शक्तियां इसी ब्रह्मरंध्र से प्रविष्ट होती हैं। हिन्दू धर्म में इसी स्थान पर चोटी (शिखा) रखने का नियम है। ब्रह्मरंध्र से निष्कासित होने वाली ऊर्जा शिखा के माध्यम से प्रवाहित होती है ।
वास्तव में हमारी शिखा जहां एक ओर ऊर्जा को प्रवाहित
करती है, वहीं दूसरी ओर उसे ग्रहण भी करती है। वायुमंडल में बिखरी हुई असंख्य विचार तरंगें और भाव तरंगें शिखा के माध्यम से ही मनुष्य के मस्तिष्क में प्रविष्ट होती हैं। कहने की आवश्यकता नहीं, हमारा मस्तिष्क एक प्रकार से रिसीविंग और ब्रॉडकास्टिंग सेंटर का कार्य शिखारूपी एंटीना या एरियल के माध्यम से करता है। मुख्य मस्तिष्क(सेरिब्रम) के बाद लघु मस्तिष्क (सेरिबेलम) है और ब्रह्मरंध्र के ठीक नीचे अधो मस्तिष्क (मेडुला एबलोंगेटा) की स्थिति है जिसके साथ एक 'मेडुला' नामक अंडाकार पदार्थ संयुक्त है। वह मस्तिष्क के भीतर विद्यमान एक तरल पदार्थ में तैरता रहता है। मेरूमज्जा का अन्त इसी अंडाकार पदार्थ में होता है। यह पदार्थ अत्यन्त रहस्यमय है। आज के वैज्ञानिक भी इसे समझ नहीं सके हैं। बाहर से आने वाली परिदृश्यमान शक्तियां अधो मस्तिष्क से होकर इसी अंडाकार पदार्थ से टकराती हैं और योग्यतानुसार मानवीय विचारों, भावनाओं, अनुभूतियों में स्वतः परिवर्तित होकर बिखर जाती हैं।
योगसाधना की दृष्टि से मुख्य मस्तिष्क आकाश है। मनुष्य जो कुछ देखता है, कल्पना करता है, स्वप्न देखता है--यह सारा अनुभव उसको इसी आकाश में करना पड़ता है

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Heart touching and a Beautiful gesture by a Mother from foreign lands
While the sight of foreigners on the ghats of Banaras is generally a common occurrence, the purpose of this 70-year-old woman, who travelled nearly 8,000 kilometres from Spain to reach Kashi, was anything but ordinary.
In an accident in Barcelona, Spain, Maria Teresa's 36-year-old son sustained critical injuries. Despite receiving treatment at multiple hospitals, he could not be saved. Sensing his final moments approaching, he expressed his first and final wish to his mother: that his last rites be performed according to Hindu rituals and that his ashes be immersed in the River Ganges in Kashi.
Despite the limitations imposed by her advanced age and the daunting uncertainty of how to fulfil her son's dying wish, Maria's unwavering determination refused to yield. She gathered information with the help of a few NRI friends and set out to fulfil her son's final desire.
She arrived in Banaras via Mumbai. There, clad in traditional Indian attire and carrying her son's ashes, she proceeded to Manikarnika Ghat. Amidst the chanting of various Vedic mantras, the mother immersed the ashes in the Ganges.
She held absolute faith and conviction that by immersing the ashes in Kashi, her son would undoubtedly attain Moksha.
Remembering her child, she spoke with deep emotion: Bhagwan Shiva will surely grant my son salvation.
Har Har Mahadev

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गीतों से गीता
कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना
छोड़ो बेकार की बातों में कहीं बीत न जाए रैना
कुछ रीत जगत की ऐसी है, हर एक सुबह की शाम हुई
तू कौन है, तेरा नाम है क्या, सीता भी यहाँ बदनाम हुई
फिर क्यूँ संसार की बातों से, भीग गए तेरे नयन।
अर्थ (गीता के प्रकाश में)
संसार परिवर्तनशील है,
लोगों की वाणी अस्थायी है
इसलिए उनके शब्दों से प्रभावित होकर
अपने सत्य से विचलित होना अज्ञान है
गहराई (अस्तित्व और गीता का संगम)
यह जगत “कहने” पर चलता है
कभी प्रशंसा, कभी निंदा
पर दोनों ही क्षणिक तरंगें हैं
मनुष्य का संकट यह नहीं कि लोग बोलते हैं
संकट यह है कि
वह उन शब्दों को
अपनी पहचान बना लेता है
श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं
सुख-दुःख, मान-अपमान—इन सबमें समभाव रख
पर यहाँ मनुष्य क्या करता है
प्रशंसा में फूल जाता है,
और निंदा में टूट जाता है
यही अस्थिरता
उसे अपने मार्ग से भटका देती है
छोड़ो बेकार की बातों में
समय
यह केवल घड़ी की सुई नहीं
यह स्वयं जीवन है
जो समय दूसरों की बातों में खो गया
वह जीवन से कट गया
गीता कहती है
जो अपने कर्तव्य से हटता है
वह स्वयं से हट जाता है
सीता भी यहाँ बदनाम हुई
यह पंक्ति केवल इतिहास नहीं
यह चेतावनी है
जहाँ पवित्रता भी आरोपों से मुक्त नहीं
वहाँ दूसरों की राय को
सत्य मानना
सबसे बड़ा भ्रम है
इसलिए
सत्य बाहर नहीं,
अंतर में खोजो
फिर क्यूँ संसार की बातों से
भीग गए तेरे नयना
यही प्रश्न गीता का मूल है
तू रो क्यों रहा है
किसके लिए
उनके लिए
जो स्वयं अपने अज्ञान में बंधे हैं
श्रीकृष्ण कहते हैं
ज्ञानी न तो जीवित के लिए शोक करता है,
न मृत के लिए
फिर तू शब्दों के लिए क्यों रोता है?
संसार बोलेगा → यह प्रकृति है
मन डोलेगा → यह अज्ञान है
आत्मा स्थिर रहे → यही योग है
आज का गीता भाव (सूत्र)
जब तू अपने सत्य में स्थिर हो जाता है,
तब संसार की आवाज़ें केवल शोर रह जाती हैं
जहाँ हर शब्द, आत्मा का मार्ग बन जाए

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चलो आज स्वस्थ बने… निरोगी भव:
स्वस्थ तन – शांत मन का आधार
शुद्ध और सात्विक सेवा
जैसा अन्न वैसा मन
कहा जाता है जैसा अन्न वैसा मन यह केवल कहावत नहीं बल्कि सच है। पुरातन संस्कृति में भोजन और आहार-व्यवहार पर काफी ध्यान दिया जाता था। इससे उस दौर के लोग स्वस्थ, सुखी, संस्कारित और संयमित होते थे। उनमें एकता, सद्भावना, अपनापन, पारिवारिक सामंजस्य था। इस सबका मूल कारण था कि लोगों के खानपान में सात्विकता, शुद्धता और पवित्रता थी। इस बात को विज्ञान और वैज्ञानिकों ने भी स्वीकार कर लिया है कि सात्विक आहार वाले व्यक्ति ज्यादा सकारात्मक, ऊर्जावान, ज्ञानी, आध्यात्मिक, शक्तिप्तशाली और मानसिक रूप से स्वस्थ रहते हैं। यही नहीं उनका रोग प्रतिरोधक कर भी काफी मजबूत होता है
मन की अवस्था व भावना का भी गहरा प्रभाव
भोजन बनाते हैं और ग्रहण करते हैं तो उस समय भी कुछ नियमों का पालन करना चाहिए, ताकि भोजन संपूर्ण रीति तन और मन का पोषण कर सके। जैसी हमारी स्थिति होती है वैसी ही हमारी कृति बनती है। यदि कोई व्यक्ति क्रोध में भोजन बनाता है तो क्रोध में बनाया गया भोजन कभी स्वादिष्ट और सात्विक नहीं हो सकता है। क्योंकि क्रोधी व्यक्ति की भावना भी उसमें प्रवेश कर जाती है और खाने वाले पर उसका सूक्ष्म प्रभाव पड़ता है। वैसे ही अलग अलग विकारों वश व्यक्ति के विकार भी उस भोजन में सूक्ष्मता से मिश्रित हो ही जाते हैं और फिर वह विकार भोजन ग्रहण करने वाले व्यक्ति को भी असर करते हैं
हंमेशा अच्छी भावना के साथ बनाएं भोजन
हम जब भी भोजन बनाएं या उसे ग्रहण करें तो उस समय शुद्ध और सात्विक भासना होनी चाहिए। जिससे हमारे मन पर उसका सकारात्मक प्रभाव पड़े। क्योंकि जब हम किसी मंदिर या देवी देवताओं के लिए चढ़ावा चढ़ाने के लिए प्रसाद बनाते हैं तो उस समय साफ-सफाई और सात्विकता का बहुत ध्यान रखते हैं। इसलिए वह बनायी हुई सामग्री प्रसाद बन जाती है, जिसे लोग भाव और भावना से खाते हैं। मांस, मदिरा, मछली और अन्य मांसाहारी भोजन मनुष्य के लिए नहीं है। इससे मन में आसुरी विचारों का उदय होता है, इसलिए आज व्यक्ति तेजी से हिंसात्मक होता जा रहा है, परिवारों में कलह और तनाव बढ़ रहा है
ध्यान के साथ बनाएं और खाएं भोजन
जब भी हम भोजन बनाएं और खाएं तो सबसे पहले परमात्मा को अर्पण करें। शुद्ध और सात्विक भोजन ही ग्रहण करें। आसुरी स्वभाव वाले व्यक्तियों के हाथों से बने हुए भोजन से परहेज करना चाहिए। इससे काफी हद तक मनुष्य की मनोदशा बदल जाएगी। व्यक्ति सकारात्मक हो जाएगा। इस तरह के परहेज से सामाजिक समस्याओं से काफी हद तक निजात मिल सकती है

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कुंडली में चंद्र से बनने वाले राजयोग
ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा मन और भावनाओं का कारक है, जो कुंडली में सुनफा, अनफा, दुर्धरा और गजकेसरी जैसे प्रभावशाली राजयोग बनाता है। ये योग व्यक्ति को अपार धन, मानसिक शक्ति और जीवन में उच्च सफलता प्रदान करते हैं। ये योग मुख्य रूप से चंद्रमा की स्थिति और अन्य ग्रहों के साथ उनके संबंधों पर आधारित होते हैं।
चंद्रमा के शुभ योग के लाभ
(1)मानसिक मजबूती - जातक मन से मजबूत होता है और मानसिक तनाव से मुक्त रहता है।
(2)माता का आशीर्वाद - यह योग माता का स्वास्थ्य और सुख अच्छा रखता है।
(3)उच्च सफलता - जीवन में अपार धन-दौलत और मान-सम्मान प्राप्त होता है।
चंद्रमा से बनने वाले प्रमुख राजयोग
=
गजकेसरी राजयोग
=
वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार गजकेसरी राजयोग का मतलब है। हाथी के ऊपर सवार सिंह। ऐसे में जब इस राजयोग का निर्माण होता है, तो जातक बलवान, निडर, साहसी, शक्तिशाली होता हैं।
जब गुरु और चंद्रमा केंद्र (1, 4, 7, 10 भाव) में एक साथ हों या एक-दूसरे से केंद्र में हों, तो यह योग बनता है। यह योग जातक को बुद्धिमान, धनवान और प्रतिष्ठित बनाता है।
सुनफा योग
=
यदि चंद्रमा से अगले घर में (दूसरे भाव) सूर्य के अलावा कोई अन्य ग्रह हो, तो सुनफा योग बनता है। यह जातक को बुद्धिमान, धनवान और प्रसिद्ध बनाता है।
अनफा योग
=
यदि चंद्रमा से पिछले घर में (12वें भाव) कोई ग्रह हो, तो अनफा योग बनता है। इससे व्यक्ति स्वस्थ, आकर्षक और सुख-सुविधाओं से युक्त होता है।
दुर्धरा योग
=
यदि चंद्रमा के आगे और पीछे (12वें और 2रे भाव) दोनों तरफ ग्रह हों, तो यह योग बनता है। यह जातक को धन-संपत्ति और मान-सम्मान दिलाता है।
महा लक्ष्मी योग
=
ज्योतिष में महालक्ष्मी राजयोग को बहुत ही शुभ और लाभकारी योग माना जाता है।
मंगल और चंद्रमा की युति से महालक्ष्मी राजयोग का निर्माण होता हैं ।इस राजयोग से धन, सुख-समृद्धि, करियर और धन लाभ के जीवन में योग बनते है
चंद्रमा और मंगल की युति या दृष्टि संबंध से लक्ष्मी राजयोग बनता है, जो धन और ऐश्वर्य का प्रतीक है।
वैभव लक्ष्मी योग
=
चंद्रमा और शुक्र की युति से यह राजयोग बनता है। इस योग के अद्भुत लाभ अपार धन-संपत्ति ऐसे व्यक्ति के पास जीवन में कभी धन की कमी नहीं रहती।
नोट - इन योगों का पूर्ण फल पाने के लिए चंद्रमा का कुंडली में बली (मजबूत) होना आवश्यक है

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The 5 Things That Decide Your Next Birth
Puranic teachings explain that rebirth is not random... The next birth unfolds according to precise inner and karmic laws
Karma… the accumulated force of past actions
What has been done with intention creates the momentum for future embodiment
Vasanas… deep latent tendencies
The strongest desires and unresolved inclinations seek expression again
Samskaras… stored impressions in the subtle body
Repeated thoughts and actions shape the psychological blueprint carried forward
Antim smriti… the state of mind at the moment of death
The final dominant thought reflects the deepest inner conditioning
Adhikara or inner fitness… the level of spiritual maturity and readiness
Consciousness is drawn toward the environment most suited to its evolution
These together determine the body, circumstances, and field of experience in the next life
Birth is not a beginning from nothing
It is the continuation of inner momentum
What appears as fate... the dharmic tradition explains as lawful continuity across lifetimes
The next life is not chosen randomly
it is shaped now

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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
बालकाण्डम्
३२. ब्रह्मपुत्र कुश के चार पुत्रों का वर्णन, शोणभद्र-तटवर्ती प्रदेश को वसु की भूमि बताना, कुशनाभ की सौ कन्याओं का वायु के कोप से 'कुब्जा' होना
कुशाम्बस्तु महातेजाः कौशाम्बीमकरोत् पुरीम् । कुशनाभस्तु धर्मात्मा पुरं चक्रे महोदयम् ॥ ६ ॥
महातेजस्वी कुशाम्ब ने 'कौशाम्बी' पुरी बसायी (जिसे आजकल 'कोसम' कहते हैं)। धर्मात्मा कुशनाभ ने 'महोदय' नामक नगर का निर्माण कराया ॥ ६ ॥
असूर्तरजसो नाम धर्मारण्यं महामतिः । चक्रे पुरवरं राजा वसुनाम गिरिव्रजम् ॥ ७ ॥
परम बुद्धिमान् असूर्तरजस ने 'धर्मारण्य' नामक एक श्रेष्ठ नगर बसाया तथा राजा वसु ने 'गिरिव्रज' नगर की स्थापना की ॥ ७ ॥
एषा वसुमती नाम वसोस्तस्य महात्मनः । एते शैलवराः पञ्च प्रकाशन्ते समन्ततः ॥ ८॥
महात्मा वसु की यह 'गिरिव्रज' नामक राजधानी वसुमती के नाम से प्रसिद्ध हुई। इसके चारों ओर ये पाँच श्रेष्ठ पर्वत सुशोभित होते हैं ॥ ८ ॥
महाभारत सभापर्व (२१। १-१०) में इन पाँचों पर्वतों के नाम इस प्रकार वर्णित हैं-(१) विपुल, (२) वराह, (३) वृषभ (ऋषभ), (४) ऋषिगिरि (मातङ्ग) तथा (५) चैत्यक।
सुमागधी नदी रम्या मागधान् विश्रुताऽऽययौ । पञ्चानां शैलमुख्यानां मध्ये मालेव शोभते ॥ ९ ॥
यह रमणीय (सोन) नदी दक्षिण-पश्चिम की ओर से बहती हुई मगध देश में आयी है, इसलिये यहाँ 'सुमागधी' नाम से विख्यात हुई है। यह इन पाँच श्रेष्ठ पर्वतों के बीच में माला की भाँति सुशोभित हो रही है ॥ ९ ॥
सैषा हि मागधी राम वसोस्तस्य महात्मनः । पूर्वाभिचरिता राम सुक्षेत्रा सस्यमालिनी ॥ १०॥
श्रीराम ! इस प्रकार 'मागधी' नाम से प्रसिद्ध हुई यह सोन नदी पूर्वोक्त महात्मा वसु से सम्बन्ध रखती है। रघुनन्दन ! यह दक्षिण-पश्चिम से आकर पूर्वोत्तर दिशा की ओर प्रवाहित हुई है। इसके दोनों तटों पर सुन्दर क्षेत्र (उपजाऊ खेत) हैं, अतः यह सदा सस्य-मालाओं से अलंकृत (हरी-भरी खेती से सुशोभित) रहती है ॥ १०
श्रीराम – जय राम – जय जय राम

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अक्सर हम यह मान लेते हैं कि अधिक वस्तुएँ, अधिक पैसा, अधिक सुविधाएँ ही हमें अधिक खुश कर सकती हैं। लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है। खुशी का संबंध बाहरी चीज़ों की मात्रा से नहीं, बल्कि हमारे मन की संतुष्टि और दृष्टिकोण से होता है।
जब व्यक्ति कम में भी संतोष करना सीख लेता है, तो उसके मन में शिकायत, तुलना और लालच कम हो जाते हैं। वह जो कुछ उसके पास है, उसी के लिए कृतज्ञ महसूस करता है। ऐसी स्थिति में उसका मन हल्का, शांत और प्रसन्न रहता है। इसलिए उसके जीवन में खुशी की कमी नहीं होती।
लेकिन यदि व्यक्ति के पास बहुत कुछ होते हुए भी संतोष नहीं है, तो वह हमेशा किसी न किसी कमी को महसूस करता रहेगा। फिर चाहे उसके पास कितना भी धन या साधन क्यों न हों, उसका मन कभी पूर्ण नहीं होगा

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ठाकुर श्री मुरली मनोहर लाल जी की जय हो,
एक पंडित जी थे वो रोज घर घर जाके भगवत गीता का पाठ करते थे,,* एक दिन उसे एक चोर ने पकड़ लिया और उसे कहा तेरे पास जो कुछ भी है मुझे दे दो
तब वो पंडित जी बोला की बेटा मेरे पास कुछ भी नहीं है
तुम एक काम करना मैं यहीं पड़ोस के घर मैं जाके भगवत गीता का पाठ करता हूँ वो यजमान बहुत दानी लोग हैं जब मैं कथा सुना रहा होऊंगा
तुम उनके घर में जाके चोरी कर लेना! चोर मान गया
अगले दिन जब पंडित जी कथा सुना रहे थे तब वो चोर भी वहां आ गया तब पंडित जी बोले की यहाँ से मीलों दूर एक गाँव है वृन्दावन, वहां पे एक लड़का आता है जिसका नाम कान्हा है,वो हीरों जवाहरातों से लदा रहता है अगर कोई लूटना चाहता है तो उसको लूटो वो रोज रात को पीपल के पेड़ के नीचे आता है जिसके आस पास बहुत सी झाडिया हैं चोर ने ये सुना और ख़ुशी ख़ुशी वहां से चला गया!
वो चोर अपने घर गया और अपनी बीवी से बोला आज मैं एक कान्हा नाम के बच्चे को लुटने जा रहा हूँ
मुझे रास्ते में खाने के लिए कुछ बांध कर दे दो पत्नी ने कुछ सत्तू उसको दे दिया और कहा की बस यही है जो कुछ भी है,
चोर वहां से ये संकल्प लेके चला कि अब तो में उस कान्हा को लुट के ही आऊंगा,वो बेचारा पैदल ही पैदल टूटे चप्पल में ही वहां से चल पड़ा,
रास्ते में बस कान्हा का नाम लेते हुए, वो अगले दिन शाम को वहां पहुंचा जो जगह उसे पंडित जी ने बताई थी!
अब वहां पहुँच के उसने सोचा कि अगर में यहीं सामने खड़ा हो गया तो बच्चा मुझे देख कर भाग जायेगा तो मेरा यहाँ आना बेकार हो जायेगा,
इसलिए उसने सोचा क्यूँ न पास वाली झाड़ियों में ही छुप जाऊँ,
वो जैसे ही झाड़ियों में घुसा, झाड़ियों के कांटे उसे चुभने लगे! उस समय उसके मुंह से एक ही आवाज निकली कान्हा, कान्हा , उसका शरीर लहू लुहान हो गया पर मुंह से सिर्फ यही निकला कि कान्हा आ जाओ! कान्हा आ जाओ!
अपने भक्त की ऐसी दशा देख के कान्हा जी चल पड़े
तभी रुक्मणी जी बोली कि प्रभु कहाँ जा रहे हो वो आपको लूट लेगा!प्रभु बोले कि कोई बात नहीं अपने ऐसे भक्तों के लिए तो मैं लुट जाना तो क्या
मिट जाना भी पसंद करूँगा और ठाकुर जी बच्चे का रूप बना के आधी रात को वहां आए वो जैसे ही पेड़ के पास पहुंचे चोर एक दम से बहार आ गया और उन्हें पकड़ लिया और बोला कि ओ कान्हा तुने मुझे बहुत दुखी किया है अब ये चाकू देख रहा है न,अब चुपचाप अपने सारे गहने मुझे दे दे
कान्हा जी ने हँसते हुए उसे सब कुछ दे दिया! वो चोर हंसी ख़ुशी अगले दिन अपने गाँव में वापिस पहुंचा और सबसे पहले उसी जगह गया जहाँ पे वो पंडित जी कथा सुना रहे थे और जितने भी गहने वो चोरी करके लाया था उनका आधा उसने पंडित जी के चरणों में रख दिया!
जब पंडित ने पूछा कि ये क्या है, तब उसने कहा आपने ही मुझे उस कान्हा का पता दिया था
मैं उसको लूट के आया हूँ और ये आपका हिस्सा है पंडित ने सुना और उसे यकीन ही नहीं हुआ!
वो बोला कि मैं इतने सालों से पंडिताई कर रहा हूँ
वो मुझे आज तक नहीं मिला, तुझ जैसे पापी को कान्हा कहाँ से मिल सकता है!चोर के बार बार कहने पर पंडित बोला कि चल में भी चलता हूँ तेरे साथ वहां पर,मुझे भी दिखा कि कान्हा कैसा दिखता है, और वो दोनों चल दिए!
चोर ने पंडित जी को कहा कि आओ मेरे साथ यहाँ पे छुप जाओ और दोनों का शरीर लहू लुहान हो गया और मुंह से बस एक ही आवाज निकली
कान्हा, कान्हा, आ जाओ!
ठीक मध्य रात्रि कान्हा जी बच्चे के रूप में फिर वहीँ आये और दोनों झाड़ियों से बहार निकल आये
पंडित जी कि आँखों में आंसू थे वो फूट फूट के रोने लग गया, और जाके चोर के चरणों में गिर गया और बोला कि हम जिसे आज तक देखने के लिए तरसते रहे जो आज तक लोगो को लुटता आया है तुमने उसे ही लूट लिया तुम धन्य हो,
आज तुम्हारी वजह से मुझे कान्हा के दर्शन हुए हैं,
तुम धन्य हो
ऐसा है हमारे कान्हा का प्यार अपने सच्चे भक्तों के लिए
जो उसे सच्चे दिल से पुकारते हैं तो वो भागे भागे चले आते हैं
मेरो तो गिरधर-गोपाल, दूसरो न कोई

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5 अप्रैल – 10 अप्रैल: ब्रह्मांड का एक अदृश्य द्वार खुल रहा है
हजारों साल पहले Mesopotamia की प्राचीन सभ्यता में बैठे सुमेरियन आकाश को सिर्फ देखते नहीं थे
वे उसे पढ़ते थे
उनके लिए ग्रह-नक्षत्र सिर्फ तारे नहीं थे
वे घटनाओं के संकेत थे
उन्होंने कहा था
जब आकाश बदलता है, तो धरती पर जीवन की दिशा बदलती है
सदियों बाद Alexander Chizhevsky ने इसी सत्य को विज्ञान की भाषा में समझाने की कोशिश की
उन्होंने 700+ साल के इतिहास को खंगाला
और पाया कि
सूर्य की गतिविधियाँ (Solar Cycles)
सीधे मानव की सोच, भावनाओं और सामूहिक घटनाओं को प्रभावित करती हैं
जब सूर्य में ऊर्जा उफान पर होती है
तो धरती पर
युद्ध बढ़ते हैं
क्रांतियाँ जन्म लेती हैं
और मनुष्य के भीतर बेचैनी और बदलाव की आग जलती है
इतना गहरा सच था यह
कि उन्हें जेल में डाल दिया गया
अब वर्तमान की ओर देखो
5 अप्रैल से 10 अप्रैल के बीच
एक विशेष नक्षत्रीय संयोग बन रहा है
यह सिर्फ एक खगोलीय घटना नहीं है
यह एक ऊर्जा का पोर्टल है
इस समय
सूर्य की तरंगें बदलती हैं
ग्रहों का alignment नया pattern बनाता है
और ब्रह्मांड एक नई frequency पर कंपन करता है
लेकिन सबसे बड़ा सवाल है
क्या तुम इस ऊर्जा को संभाल पाओगे
क्योंकि जब ब्रह्मांड बदलता है
तो हर व्यक्ति को एक मौका मिलता है
या तो वह उठे
या टूट जाए
सावधान:
यह समय हर किसी के लिए आसान नहीं होगा
कुछ लोग अचानक गुस्से में आ सकते हैं
कुछ के जीवन में बड़े बदलाव होंगे
कुछ रिश्ते टूटेंगे
कुछ नए रास्ते खुलेंगे
क्योंकि ऊर्जा बदल रही है
और जब ऊर्जा बदलती है
तो जीवन का संतुलन भी बदलता है
लेकिन जो जागरूक हैं… उनके लिए यह वरदान है
अगर तुम इस “Cosmic Portal” में प्रवेश कर पाते हो
तुम अपनी दिशा बदल सकते हो
अपनी सोच को upgrade कर सकते हो
अपने जीवन का नया अध्याय शुरू कर सकते हो
याद रखो
सुमेरियन ने इसे संकेतों में बताया था
Alexander Chizhevsky ने इसे डेटा में साबित करने की कोशिश की
अब यह तुम्हारे सामने अनुभव बनने जा रहा है
मेरा दावा है:
5–10 अप्रैल के बीच
धरती पर कुछ न कुछ ऐसा जरूर बदलेगा
जिसे हर संवेदनशील व्यक्ति महसूस करेगा
सवाल यह नहीं है कि “क्या होगा
सवाल यह है कि “तुम उसके लिए तैयार हो या नहीं
अगर तैयार हो… तो इस ऊर्जा को पकड़ो।
क्योंकि ब्रह्मांड हर बार मौका नहीं देता

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a person's inherent nature does not change just because their status or position does...
Kanakapu simhasanamuna
sunakamu gurpundabetti shubhalagnamuna
donaraga battamu gattina
venukati gunamela manu vinara Sumathi!
(Sumathi Satakam)
Even if you place a dog on a golden throne during an auspicious time and crown it as a king with all royal honors, it will not give up its original nature (of wandering or base behaviors).
A person's character and deep-rooted habits do not change simply by giving them a high position, power, or wealth. Their true nature will eventually reveal itself regardless of their surroundings

English

@Jaya__Kishori__ शनिदेव को भगवान शिव की शक्ति प्राप्त हो गई। जब शनिदेव ने भगवान सूर्य को क्रोध से देखा तो उनका रंग काला पड़ गया और उन्हें कुष्ठ रोग हो गया। सूर्यदेव ने भगवान शिव से क्षमा याचना मांगी और शनिदेव को सभी ग्रहों में सबसे अधिक शक्तिशाली होने का वरदान दिया भगवान शनि ने अपने काला रंग होन
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भगवान शनि को काला रंग क्यों पसंद है? इससे जुड़ी पौराणिक कथा क्या है?*
पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान सूर्य की शादी दक्ष प्रजापति की बेटी देवी संध्या से हुआ था। जिनसे उन्हें मनु, यमराज और यमुना नामक संतान प्राप्ति हुईं, लेकिन देवी संध्या भगवान सूर्य के ताप को सह नहीं पा रही थीं, इसलिए उन्होंने अपनी जगह एक प्रतिरूप छाया को रख दिया जो दिखने में देवी संध्या की प्रतिरूप छाया थीं। इस बात का पता भगवान सूर्य को पता नहीं चला, लेकिन देवी छाया भगवान शिव की कठोर तपस्या कर रही थीं जिसकी वजह से वह अपनी गर्भावस्था के समय सही से ध्यान नहीं रख पा रही थीं। इस वजह से शनिदेव जन्म के समय अंत्यत काल और कुपोषित पैदा हुआ। जिसके देखकर सूर्यदेव ने अपनी संतान मानने से इंकार कर दिया। लेकिन ये बात भगवान शनि को बहुत बुरी लगी।
देवी संध्या जब तप कर रही थी, उस समय मां के गर्भ में ही शनिदेव को भगवान शिव की शक्ति प्राप्त हो गई। जब शनिदेव ने भगवान सूर्य को क्रोध से देखा तो उनका रंग काला पड़ गया और उन्हें कुष्ठ रोग हो गया। सूर्यदेव ने भगवान शिव से क्षमा याचना मांगी और शनिदेव को सभी ग्रहों में सबसे अधिक शक्तिशाली होने का वरदान दिया। भगवान शनि ने अपने काला रंग होने और काले रंग के अपेक्षा के कारण काला रंग अतिप्रिय है, इसलिए उनकी पूजा में काले तिल, काला चना और लोहे की चीजों को खरीदा या दान में दिया जाता है

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