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समर शेष है,अभी मनुज भक्षी हुंकार रहे हैं, गांधी का पी रुधिर ,जवाहर पर फुंकार रहे हैं समर शेष है,अहंकार इनका हरना बाकी है, वृक को दंतहीन, अहि को निर्विष करना

Katılım Temmuz 2018
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Vijay@ActForVijay·
आज राहुल गांधी बोधगया थे। बोधिवृक्ष देखने गए। उन्होंने वहां प्रश्न किया " क्या यह बोधिवृक्ष ओरिजिनल है? वही है जिसके नीचे बैठकर सिद्धार्थ बुद्ध बन गए थे?" ऐसा ही सवाल कई बार हम सुनते हैं। क्या यह कांग्रेस असली कांग्रेस है? कॉन्ग्रेस तो अंग्रेजों ने बनाई है। असली वाली कांग्रेस तो आजादी के बाद खतम हो गई। ये असली कांग्रेस थोड़ी न है। न जाने कितनी बार सुनते हैं ये। बिल्कुल ... कांग्रेस बनाने का उद्देश्य पढ़े लिखे लोगों को इकठ्ठा करके ब्रिटिश साम्राज्य से बातचीत करके आम जनता के हित हेतु काम करना था। पूर्ण स्वराज्य बाद में आया। बोधिवृक्ष... आज से 2500 साल से भी पहले किसी पक्षी या जानवर ने उसका बीज लाकर रख दिया होगा। क्या महत्ता रही होगी उसकी... फिर भी कई पक्षियों का आसरा रहा होगा। कई जंतुओं की शरणस्थली। कई राहगीर उसके नीचे विश्राम कर लेते होंगे। कई बार वहां से गुजरते कुछ लोग उसे देखकर श्रद्धा से नमन कर लेते रहे होंगे। लेकिन एक पूर्णिमा की रात कुछ ऐसा हुआ कि वह वृक्ष साधारण नहीं रहा। उसके पाँवों तले एक देह आकर बैठी, जो 6 साल तक हर प्रकार की साधना करके अंत में थक चुकी थी। उसी के तले उसे ये ज्ञान हुआ कि मध्यम मार्ग सर्वश्रेष्ठ है। और उस रात को सब कुछ बदल गया इस धरती पर। सबसे पहले साक्षी बना वह साधारण सा वृक्ष। उसके वहां होने ने उसे अमर बना दिया। उसे कई बार तोड़ने की , काटने की कोशिश हुई। लेकिन वह मिटा नहीं। उसकी शाखाये सब जगह भेजी गईं, लेकिन मूल बचाया गया। क्योंकि उसकी जड़ में चेतना के शिखर का जन्म हुआ था। कांग्रेस एक साधारण वृक्ष था, फिर भी उपयोगी। जिस दिन गान्धी आकर उसके नीचे बैठे, वह बोधिवृक्ष बन गया। गांधी ने मध्यममार्ग का ज्ञान वहीं से दिया। कई बार इस वृक्ष की शाखाएं टूटीं, यहां वहां। लेकिन नाम मे कांग्रेस जुड़ा रहा। किन्तु गांधी जिसकी जड़ों में बैठकर विश्व को बदल दिए, जिस कांग्रेस को उन्होंने नेहरू और पटेल को सुपुर्द किया,जिसे लालबहादुर शास्त्री ने सींचा, इंदिरा,राजीव, नरसिंहाराव, मनमोहन सिंह के साथ साथ करोड़ों कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को ऑक्सीजन देने वाला वृक्ष यही है जिसके आश्रय में सोनिया गांधी उस पद को अस्वीकार कर देती हैं जिसके लिए लोग तपस्या में कोई कमी नही आने देते। वही काँग्रेस है जो राहुल गांधी से कहलवाती है कि हम आरएसएस मुक्त भारत की बात नहीं करते, क्योंकि इस देश की विचारधारा है सभी विचार धाराओं को साथ लेकर चलना। यही मध्यममार्ग है, न लेफ्ट न राइट। यही असली काँग्रेस है। कोई शक??? उसी वृक्ष के नीचे वह स्थान जहां सिद्धार्थ ने ज्ञान पाया और संसार को अपनी करुणा से तारा, अशोक ने उस जगह को पूर्ण सुरक्षित करवा दिया था। डायमंड थ्रोन कहा जाता है उसे। उस डायमंड थ्रोन पर कभी कोई बैठेगा , वो कोई जो बुद्ध सा होगा, उसका छोटा सा ही अंश हो... कांग्रेस ने जो डायमंड थ्रोन बनाया, इस देश को चलाने के लिए, वह अभी भी कांग्रेस के साए तले है। प्रधानमंत्री बनने के पहले नकली लाल किला बनाकर एक ढोंगी ने रैली की थी। लेकिन उस डायमंड थ्रोन पर नहीं बैठ पाया है आजतक, जहां बैठकर गांधी ने तपस्या की थी। असली डायमंड थ्रोन...वहां वही बैठ सकता है, जो गांधी सा होता है। थोड़ा सी हो... (बरगद बूढ़ा होता है तो बेहया के पेड़ को नहीं पूजा जाता।) #VijayShukla
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Vijay@ActForVijay·
अखण्ड भारत ने रुकवाया विश्व युद्ध। अखण्ड भारत के ईश्वरपुर (इस्लामाबाद) में दुनिया भर के राष्ट्रध्यक्ष पहुंचे। अखण्ड भारत के सम्राट बंगाल की जनता के भोजन में मछली की कमी दूर करने में व्यस्त होने के कारण अपने मंत्री "राजपक्षी सज्जन" (शाहबाज शरीफ) को भेज दिए हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति और अखंड भारत के सम्राट के परम प्रशंसक श्री द्विलिंग ट्रंप ने अखंड भारत के सम्राट को इस के लिए धन्यवाद कहा है।
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Vijay
Vijay@ActForVijay·
वो जिनके हाथ में ज़ोर-ओ-ज़बर की ताकत है, उन्हें लगता है हर सर को झुकने की आदत है। मगर जब कोई कश्ती तूफ़ानों से टकराती है, तो समंदर की लहरें भी रास्ता बनाती हैं। 2024 में मैंने लिखा था, मेरे कजिन जो बंगाल से हैं, उन्होंने बताया था कैसे मछली की वजह से भाजपा हारेगी।मोदी मछली छीन जाने का भय दिखा रहा है। दुनिया की बड़ी ताकतें अक्सर यह भूल जाती हैं कि भूख और स्वाभिमान का कोई विकल्प नहीं होता। जब बात यहां आती है तो छोटा से छोटा इंसान भी तख्त पलट देता है। ●● किताबों में इसे COD वॉर कहा गया, पर यह एक छोटे देश की.दहाड़ थी जिसने सीमाओं को फिर से परिभाषित कर दिया। जब हम युद्ध शब्द सुनते हैं, तो हमारे दिमाग में बारूद, मिसाइलें और ज़मीन के टुकड़े आते हैं। लेकिन दुनिया पर हुकूमत करने वाली दुनिया की सबसे ताकतवर नौसेनाओं में से एक रॉयल नेवी, मछलियों के लिए हार गई,यह कहानी आज के दौर में बहुत प्रासंगिक है, जहाँ सत्ता और संसाधनों की अंधी दौड़ में छोटे हितों को कुचला जा रहा है। ●● 1950 के दशक में ब्रिटेन के पास फिश एंड चिप्स के लिए मछली COD कम पड़ रही थी। उन्होंने अपनी बड़ी-बड़ी नावें आइसलैंड की ओर मोड़ दीं। आइसलैंड ने कहा यह हमारी मछली है, हमारे अस्तित्व का आधार है। ब्रिटेन का अहंकार बोला यह अंतरराष्ट्रीय पानी है, कोई सीमा नहीं। आइसलैंड छोटा था, पर उसकी रीढ़ की हड्डी मज़बूत थी। उन्होंने अपनी समुद्री सीमा 4 मील की, फिर 12, फिर 50। यानि इसके अंदर आकर तुम शिकार नहीं कर सकते। ब्रिटेन ने इसे नज़रअंदाज़ किया और अपनी नौसेना भेज दी।एक तरफ दुनिया पर राज करने वाला साम्राज्य और दूसरी तरफ एक नन्हा सा द्वीप जिसके पास सेना के नाम पर केवल कुछ कोस्ट गार्ड के जहाज़ थे। ●● आधुनिक कूटनीति आज भी वही है। ताकतवर को लगता है कि नियम उसके लिए नहीं हैं। आइसलैंड के कोस्ट गार्ड ने क्या किया? उन्होंने बड़ी नेट कटर्स बनाए और ब्रिटिश मछुआरों के जाल काटने शुरू कर दिए। लाखों पाउंड की मछलियाँ वापस समुद्र में। ब्रिटेन बौखला गया, जहाज़ एक दूसरे से टकराने लगे, गोलियाँ चलीं, लेकिन आइसलैंड डिगा नहीं। आइसलैंड जानता था कि वह ताकत में नहीं जीत सकता, इसलिए उसने रणनीतिक दांव लगाया। कोल्ड वॉर का दौर था और आइसलैंड की लोकेशन सोवियत पनडुब्बियों पर नज़र रखने के लिए अमेरिका के लिए बहुत कीमती थी। आइसलैंड ने सीधे अमेरिका से कहा या तो ब्रिटेन को रोको, या हम NATO छोड़ रहे हैं और अपना सैन्य अड्डा बंद कर रहे हैं, जिसमे बैठकर तुम रूस पर नज़र रख रहे हो। अमेरिका घबरा गया और ब्रिटेन को झुकना पड़ा। 1958 से 1976 तक यह युद्ध चलता रहा। आज जो अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा का मानक है वो इसी युद्ध और आइसलैंड की ज़िद हिम्मत की वज़ह से है। ●● इतिहास खुद को दोहराता है, बस किरदार बदल जाते हैं...आज यही दृश्य हम मध्य पूर्व के समंदर में देख रहे हैं। एक तरफ दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति अमेरिका है, और दूसरी तरफ अपनी ज़िद पर अड़ा ईरान। दशकों के प्रतिबंध, घेराबंदी और धमकियों के बावजूद ईरान ने हार नहीं मानी। जो अमेरिका पूरी दुनिया को अपने इशारों पर नचाता था, आज वह ईरान की रणनीतिक चालों और उसकी क्षेत्रीय पकड़ के सामने समझौता करने को मजबूर हो रहा है। ईरान ने अपनी भौगोलिक स्थिति और तेल की नब्ज को अपना आइसलैंडिक कार्ड बना लिया है। जब एक देश ठान लेता है कि वह अपनी संप्रभुता का सौदा नहीं करेगा, तो महाशक्तियों के विमानवाहक पोत भी किनारे पर खड़े होकर सिर्फ तमाशा देखते हैं। ●● भावनाओं का ज्वार तब आता है जब आप देखते हैं कि एक राष्ट्र अपने सिद्धांतों के लिए पूरी दुनिया की पाबंदियों को झेल गया। आइसलैंड ने मछलियों के लिए किया, ईरान अपने वजूद के लिए कर रहा है। यह साबित करता है कि कूटनीति का सबसे छोटा मोहरा भी वज़ीर को मात दे सकता है, बशर्ते आपके पास वह इच्छाशक्ति हो जो बमों से नहीं खरीदी जा सकती। ●● जब हम अपने आसपास व्यवस्था को देखते हैं, तो लगता है कि आम आदमी बहुत छोटा है। मीडिया और सत्ता का गठजोड़ हमें बताता है कि हम कुछ नहीं बदल सकते।आइसलैंड की जीत और ईरान की दृढ़ता हमें याद दिलाती है कि जब बात स्वाभिमान की हो, तो नियम भी बदले जा सकते हैं और इतिहास भी। सवाल यह नहीं है कि आपके पास कितनी बड़ी सेना या संसाधन हैं।सवाल यह है कि क्या आपके पास वह साहस है जो बड़े साम्राज्यों को झुकने पर मजबूर कर दे? हमने इसी देश में गांधी को ऐसा करते देखा है। जिस दिन हम अपनी ताकत और ज़िद की कीमत पहचान लेंगे, उसी दिन वैश्विक ताकतों को हमारे सामने घुटने टेकने पड़ेंगे। इतिहास सिर्फ विजेताओं का नहीं, बल्कि उन ज़िद्दी लोगों का भी है जिन्होंने हारने से मना कर दिया और दुनिया के नक्शे पर अपनी लकीर खुद खींची। #VijayShukla
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Vijay
Vijay@ActForVijay·
जब तोपें गरजती हैं, तो सबसे पहले सच और संवेदनाएं दम तोड़ देती हैं। पर क्या एक राष्ट्र के रूप में हमने अपनी उस आत्मा को भी गिरवी रख दिया है, जिसने कभी दुनिया को अहिंसा का पाठ पढ़ाया था? ◾◾ आज जब मैं पश्चिम एशिया की जलती हुई गलियों और वहां मलबे में तब्दील होते मासूमों के सपनों को देखता हूँ, तो मन में एक टीस उठती है। यह टीस सिर्फ राजनीति की नहीं, उस ऐतिहासिक विरासत की है जिसे हम धीरे-धीरे धूल में मिला रहे हैं। आज 10 अप्रैल 2026 को कांग्रेस कार्य समिति द्वारा पारित यह प्रस्ताव केवल एक सरकारी आलोचना नहीं है, बल्कि भारत के उस मूल स्वभाव की पुकार है जिसे मौजूदा सत्ता ने चुनावी शोर में दबा दिया है। ◾◾ 1947 से लेकर अब तक भारत की पहचान एक साहसी शांतिदूत की रही है। नेहरू की गुटनिरपेक्षता और गांधी के सत्य के प्रयोगों ने हमें दुनिया की नजरों में महान बनाया था। कांग्रेस का यह घोषणापत्र याद दिलाता है कि आज भी एक ऐसी सोच जीवित है जो भारत के उन शाश्वत सिद्धांतों'वसुधैव कुटुंबकम' और अनुच्छेद 51 के मूल्यों पर अडिग खड़ी है। ◾◾ देश की आज की कूटनीति अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आत्ममुग्धता के Photo ops तक सिमट गई है, जबकि कांग्रेस का यह प्रस्ताव मांग करता है कि भारत फिर से वह सिद्धांतनिष्ठ आवाज़ बने, जिसने कभी हंगरी, वियतनाम और अफगानिस्तान के संकटों में दुनिया को दिशा दिखाई थी। आम आदमी को लगता है कि गाजा या लेबनान में जो हो रहा है, उससे उसका क्या लेना-देना? पर सच कड़वा है। कांग्रेस ने सही पकड़ा है कि जब हमारी कूटनीति लड़खड़ाती है, तो उसकी तपिश भारत के मध्यमवर्गीय घर की रसोई तक पहुँचती है। एलपीजी के बढ़ते दाम और उर्वरकों की किल्लत कोई इत्तेफाक नहीं है। यह नतीजा है उस अदूरदर्शी विदेश नीति का जिसने हमें अपने पड़ोसियों से दूर कर दिया और हमारी ऊर्जा सुरक्षा को दांव पर लगा दिया। ◾◾ विचित्र स्थिति है कि जिस पाकिस्तान को दशकों की मेहनत से हमने अलग-थलग किया था, मौजूदा सरकार की शिथिलता ने उसे फिर से अंतरराष्ट्रीय बिचौलिए की भूमिका में आने का मौका दे दिया। सोचिए उस मां के बारे में, जिसका बच्चा युद्ध की विभीषिका में खो गया। क्या एक महान राष्ट्र की विदेश नीति इतनी संकुचित हो सकती है कि वह मानवीय संवेदनाओं से ऊपर केवल वोट बैंक और वैचारिक एजेंडे को रखे? ◾◾ कांग्रेस कार्य समिति का यह प्रस्ताव स्पष्ट कहता है कि नागरिकों और बुनियादी ढांचों पर हमला मानवता के खिलाफ अपराध है। यह उस भारत की आवाज़ है जो न्याय के लिए बोलना जानती है, भले ही सामने कोई भी महाशक्ति क्यों न हो। ◾◾ सच्चाई की राह कठिन हो सकती है, पर वह कभी शर्मिंदा नहीं करती। वक्त आ गया है कि हम अपनी विदेश नीति को संकीर्ण गलियारों से बाहर निकालें और फिर से उस ऐतिहासिक भूमिका में लौटें, जहाँ भारत का मतलब सिर्फ एक बाज़ार नहीं, बल्कि दुनिया का नैतिक विवेक था। क्या हम आज भी उस भारत के साथ खड़े हैं जो शांति और न्याय की बात करता है, या हम केवल तमाशबीन बनकर अपनी विरासत को बिखरते हुए देखेंगे? ◾◾ सत्ता आती-जाती रहेगी, लेकिन भारत की जो नैतिक गहराई है, उसे बचाए रखना अनिवार्य है। कांग्रेस ने इस प्रस्ताव के माध्यम से देश को याद दिलाया है कि राजनीति से ऊपर भी एक धर्म होता है, राष्ट्र धर्म और मानव धर्म। धन्यवाद कांग्रेस, एक बार फिर मुझे ये जताने के लिए कि मेरी आस्था और निष्ठा बिल्कुल सही विचारधारा की पार्टी में है, जो राजनीति से ऊपर उठकर भारत की असली आत्मा, बुद्ध, महावीर, गांधी के विचारों और आदर्शों का कस्टोडियन है। पुनः धन्यवाद कांग्रेस #VijayShukla
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Vijay@ActForVijay·
19वीं और 20वीं शताब्दी के संधिकाल पर एक नाम चमकता है ब्रजनारायण 'चकबस्त'l कश्मीरी मूल के, फैज़ाबाद की तहजीब में पले-बढ़े इस महान शायर ने जब अपनी कलम उठाई, तो समाज का वह सच लिखा जो आज एक सदी बीत जाने के बाद भी और अधिक डरावना होकर हमारे सामने खड़ा है। आज जब हम विकास और आधुनिकता का दंभ भरते हैं, तब चकबस्त की ये पंक्तियाँ एक गंभीर चेतावनी की तरह सुनाई देती हैं। गौर कीजिए, क्या हम उसी रसातल की ओर नहीं बढ़ रहे जिसकी चिंता उन्होंने की थी? ◾कभी था नाज़ ज़माने को अपने हिन्द पे भी पर अब उरूज वो इल्मो कमालो फ़न में नहीं। (कभी पूरी दुनिया भारत के ज्ञान और हुनर की मिसाल देती थी, पर आज वो बौद्धिक ऊँचाई कहीं खो गई है।) ◾रगों में ख़ून वही दिल वही जिगर है वही वही ज़बाँ है मगर वो असर सख़ुन में नहीं। (पूर्वजों जैसा ही शरीर और ज़बान तो है हमारे पास, पर हमारे शब्दों में वो सच्चाई और चरित्र का बल नहीं रहा।) ◾वही है बज़्म वही शम्-अ है वही फ़ानूस फ़िदाय बज़्म वो परवाने अंजुमन में नहीं। (महफिलें सजती हैं, रोशनी भी है, पर देश और समाज पर मर-मिटने वाले निस्वार्थ लोग अब नजर नहीं आते।) ◾वही हवा वही कोयल वही पपीहा है वही चमन है पर वो बाग़बाँ चमन में नहीं। (प्रकृति वैसी ही है, देश की सीमाएं वही हैं, पर इस चमन की रूह से हिफाजत करने वाले माली अब कहाँ हैं?) ◾ग़ुरूरों जहल ने हिन्दोस्ताँ को लूट लिया बजुज़ निफ़ाक़ के अब ख़ाक भी वतन में नहीं। (अहंकार और अज्ञानता ने इस देश की जड़ों को खोखला कर दिया है।आपसी फूट और नफरत के सिवा अब यहाँ क्या बचा है?) यह नज़्म पढ़कर मन में एक गहरी टीस उठती है। चकबस्त ने जिस निफ़ाक़ (आपसी फूट) और जहल।(अज्ञानता) की बात की थी, क्या आज वह हमारे समाज की धमनियों में विष बनकर नहीं दौड़ रहा? क्या हमारे सख़ुन में वह नैतिक असर बचा है? यह सोचने का समय है कि जिस भारत पर कभी ज़माने को नाज़ था, उसे हम किस दिशा में ले जा रहे हैं। आज भारत का विश्व की राजनीति में क्या स्थान रह गया है? शांति और करुणा की जड़ें जिस धरती पर स्थापित हुई, वहां के हुक्मरान कहते हैं कि मध्यस्थता मतलब दलाली होती है... विश्वगुरु नाम रख कर अपने अंधभक्तों को किक देते रहे, दुनिया में भारत की जो पहचान थी, वो आज मिट्टी में मिल चुकी है। कहीं पढ़ कर या किसी रील को देखकर नहीं बता रहा। आंखों देखी बता रहा हूं। यदि आज भी हम न जागे, तो विरासत में सिर्फ खाक ही बचेगी। #VijayShukla
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Vijay
Vijay@ActForVijay·
अमित शाह ने शपथ और भरोसा के नाम पर घोषणापत्र बांटा, लगा जैसे बंगाल आसाम की सारी समस्याएँ बस एक बटन दबाने की दूरी पर हैं। आनंद बाजार पत्रिका के उस रिपोर्टर ने बस इतना पूछ लिया कि "साहब, घुसपैठियों पर White Paper कब लाओगे?" और बस, गृह मंत्री जी इधर उधर की बातें करने लगे। ●● शायद उन्हें याद आ गया होगा कि गृह मंत्रालय उन्हीं के पास है और बॉर्डर पर खड़ी BSF भी उन्हीं के इशारे पर चलती है। तो अगर घुसपैठ हो रही है, तो दरवाजा खुला किसने छोड़ा? क्या 12 साल की सत्ता के बाद भी दोष सिर्फ जमीन न देने वाली ममता दीदी का है? तो समझिए... ये खेल बड़ा पुराना है। जब काम का हिसाब न हो, तो घुसपैठिए का डर दिखा दो। क्या फर्क पड़ता है कि आंकड़े कुछ और ही कहानी कह रहे हैं? असलियत तो ये है कि मनमोहन सरकार के 10 साल में 88,000 घुसपैठिए वापस भेजे गए, और सीना ठोक सरकार के 10 साल में ये आंकड़ा सिमट कर सिर्फ 2400 रह गया! ●● अब इसे क्या कहें? क्षमता में कमी या नीयत में खोट? या फिर ये कि अगर घुसपैठिए खत्म हो गए, तो चुनाव में मुद्दा क्या बनाएंगे? असम में 10 साल से डबल इंजन की सरकार है, वहाँ कितने घुसपैठिए बाहर हुए, इसका श्वेत पत्र आज तक किसी ने देखा है क्या? वहाँ तो मियां मुस्लिम और असमिया मुस्लिम का शातिर बंटवारा किया गया है। जो सूट करे वो शरणार्थ, जो न करे वो घुसपैठिया। ●● महिला सुरक्षा के लिए स्पेशल स्क्वाड की बात सुनकर यूपी के एंटी रोमियो स्क्वाड की याद आ गई। प्रचार में शेर और धरातल पर ढेर। चुनाव आते ही नए नाम, नए जुमले, और वही पुराना डर। अमित शाह कहते हैं कि सरकार दिल्ली से चले न चले, पर बांग्लादेश से नहीं चलनी चाहिए। देश चलाने की जिम्मेदारी आपकी थी, और आप 12 साल बाद भी डर बेच रहे हैं। क्या जनता इतनी मासूम है कि वो ये न पूछे कि 7 साल से गृह मंत्री आप हैं या कोई और? ◆◆ जब कामचोरी की है, तब भावनात्मक नारों की गूँज तेज कर देते हैं। बंगाल के पहले चरण के चुनाव उन्हीं जिलों में हैं जो सीमा से सटे हैं, तो घुसपैठ का शोर तो मचेगा ही। White Paper कागजों पर आता है, चुनावी रैलियों की जुमलेबाजी में नहीं। जनता हिसाब मांग रही है, और आप उसे गिन गिन कर बताने काझांसा दे रहे हैं। गिनना है तो अपनी नाकामियों को गिनिए, घुसपैठियों के नाम पर वोट तो बहुत बटोर लिए। #VijayShukla
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Vijay
Vijay@ActForVijay·
एक बहुत ही खूबसूरत लड़की इंतज़ार करती रहती है कि जिसे वो मन ही मन प्यार करती है वो आयेगा और आई लव यू बोलेगा। हर कोई कहता है वो नहीं बोलेगा। वो डरता है उन गुंडों से जो तेरे पीछे पड़े हैं। वो कहती है, नहीं वो किसी से नहीं डरता। वो आयेगा, सबके सामने और आई लव यू बोलेगा। सब कहते हैं, मान जा पगली। उसमें हिम्मत नहीं है, वो क्या बोलेगा। वो थोड़ा चुप हो जाती है। फिर कहती है, नहीं वो आयेगा और वो आई लव यू बोलेगा। वो नहीं आता। ना ही कोई सन्देश भी भेजता है कि जानम, मै आने वाला हूं। गुंडे रोज़ लड़की को परेशान कर रहे हैं। लड़के के दोस्त सबको बताते हैं कि लड़की मरती है हमारे शेर पर। लड़के के दुश्मन मज़ाक उड़ाते हैं। कहते हैं फट्टू है, ये क्या आई लव यू बोलेगा? इसको आई लव यू की स्पेलिंग भी आती है क्या? इंतज़ार होता है। अचानक ख़बर आती है, लड़के के पड़ोसी ने लड़की को प्रपोज कर दिया। वो पड़ोसी जो लड़के के दोस्तों का सबसे बड़ा दुश्मन था। अब लड़की पड़ोसी को आई लव यू टू बोल दी है। गुंडे भी शांत हो गए। लड़के के दोस्त कह रहे हैं हमारा शेर कोई दल्ला थोड़ी न है कि लड़की को आई लव यू बोल दे। अब समझ नहीं आता कि आई लव यू बोलने से कोई दलाल कैसे हो जाता है? सुना है कि लड़की को छेड़ने वाले गुंडों के सामने लड़का नाच कर आया था। ख़ैर , पड़ोसी के तो मज़े हो गए। और अब डरपोक लड़के से पूछा गया कि कैसा लग रहा है तीन शब्द आई लव यू नहीं बोल पाए। लड़के ने भी तीन शब्दों में जवाब दिया, जिसमें पहला शब्द "लव" से ही शुरू हुआ। लड़के ने जो तीन शब्द कहे, उसे बताने वाले को दादर के ईरानी रेस्त्रां में मेरी तरफ से बन मस्का चाय और बेरी पुलाव का भोज्यम...
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Vijay
Vijay@ActForVijay·
लोकतंत्र के इस महाकुंभ में जब जनता को भगवान माना जाना चाहिए था, तब हमारे न्यूज़ रूम के देवता एक नए पैगंबर की शरण में साष्टांग दंडवत हो गए हैं। नाम है ChatGPT, Gemini Pro अब गलियों में घूम कर ईमानदारी से सर्वे करने वाले की जरूरत किसे है? जब एक सॉफ्टवेयर ही तय कर दे रहा है कि बंगाल की हवा किस तरफ बह रही है, तो जनता को गर्मी में लाइन लगाने की जहमत क्यों दी जा रही है? ●● बंगाल की राजनीति वह ज्वालामुखी है जहां इतिहास के पन्ने खून और पसीने से लिखे गए हैं। वहां आज के हाईटेक पत्रकारिता के सूरमा एसी कमरों में बैठकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से पूछ रहे हैं कि मोमिनपुर या मेदिनीपुर का मिजाज क्या है? गजब का तमाशा है... जो एआई अभी तक यह नहीं समझ पाया कि इंसान की भावनाओं और धोखे में क्या फर्क है, वह अब बंगाल के उस मतदाता का मन पढ़ेगा जो सगे भाई को भी नहीं बताता कि बटन कौन सा दबाएगा। ◆◆ मजेदार बात देखिए, एक तरफ भाजपा के 294 उम्मीदवारों के नाम तक पूरे नहीं छपे हैं, वहीं दूसरी तरफ एबीपी आनंद और बाकी सूरमा स्क्रीन पर एआई का पोल नचा रहे हैं। बारात तैयार नहीं, दूल्हा अभी पार्लर में है, लेकिन फोटोग्राफर ने पहले ही फेसबुक पर हैप्पिली मैरिड का स्टेटस और बच्चों की एआई तस्वीरें पोस्ट कर दी हैं। ●● सच्चाई की दुहाई देखिए। मीडिया कह रहा है कि हम ईमानदारी से बता रहे हैं कि ये एआई का पोल है। क्या बात है... ये पत्रकारिता नहीं, जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने का नया टेक शॉर्टकट है। कल को अगर पोल गलत हुआ , तो कह देंगे एआई की में गड़बड़ थी, हमारा क्या कसूर? ◆◆ समझिए, ये सिर्फ एक पोल नहीं है, ये आपकी बुद्धि का अपमान है। मीडिया अब ग्राउंड रिपोर्टिंग के बजाय एल्गोरिदम पर भरोसा कर रहा है। ग्राउंड पर जाकर धूल फांकना, लोगों की आंखों में झांकना और चाय की टपरी पर होने वाली असली राजनीति को समझना अब आउटडेटेड हो गया है। अब तो बस प्रॉम्प्ट डालिए और रायता फैलाइए। ●● आज का सिस्टम उस दौर में पहुंच गया है जहां डेटा ही सच है और इंसान सिर्फ एक नंबर। अगर एआई ही सरकारें चुन रहा है, तो फिर ये चुनाव का करोड़ों का खर्चा क्यों? एक सर्वर लगाइए, डेटा फीड कीजिए और सीधे शपथ ग्रहण समारोह का लिंक भेज दीजिए। समझ लीजिए कि लोकतंत्र का इंसानी चेहरा अब सिर्फ तस्वीरों में बचेगा। बाकी जो बचा है, वह या तो आईटी सेल का प्रोपेगेंडा है या सिलिकॉन वैली का कोई कचरा कोड। ◆◆ बंगाली मीडिया की इस एआई क्रांति को सलाम। बस दुआ कीजिए कि अगली बार जब आपको न्याय चाहिए हो या अस्पताल में बेड, तो वहां भी कोई रोबोटिक आवाज ये न कह दे "क्षमा करें, मेरे डेटा के अनुसार आप अभी जीवित ही नहीं हैं।" खूब खेला होबे... #VijayShukla
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नेताओं को गाली देना तो पुराना फैशन हो गया, अब तो नेता ही आपको गाली दे रहा है। प्रसिध्द अभिनेता दादा कोंडके ,जो अपनी डबल मीनिंग फिल्मों के लिए प्रख्यात थे। उनका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकोर्ड में सबसे अधिक लगातार हिट फिल्में देने के लिए था। ●कारण स्पष्ट था,लोग मनोरंजन चाहते थे। और सस्ता मनोरंजन अक्सर फूहड़ता से बड़ी आसानी से निकलता है। ●उनकी देखादेखी हिंदी फिल्मों में कादर खान ने भी यह फार्मूला अपनाया। अमिताभ, राजेश खन्ना, विनोद खन्ना,जितेंद्र जैसे कलाकार भी डबल मीनिंग डायलॉग्स बोलते नज़र आये। ●आज भोजपुरी फिल्मों के गाने या फिल्में शायद 90 प्रतिशत फूहड़ता पर टिकी है। ●हिंदी फिल्मों में नई सदी में मस्ती, ग्रैंडमस्ती और न जाने कितनी फिल्में इस फॉर्मूले को लेकर चली और खूब पैसा कमाया। ●राजनीति में भी डबल मीनिंग तो नहीं लेकिन बेसिर पैर की बातों ,जिसमे खूब मनोरंजन होता हो, ऐसे नेता खूब चले। ●टीवी के प्रवक्ताओं का भी यही हाल है। सम्बित पातरा , सुधांशु त्रिवेदी, अमीश देवगन , रुबिका लियाकत जैसे लोग तो अपनी जोकरई से भाजपा समर्थकों की आंखों के तारे हो चुके हैं। ●कोंग्रेस प्रवक्ताओं में भी समर्थकों की मांग के कारण एंग्री यंग ओल्ड मैन लेडी वाली प्रतिभा झलकने लगी है। ●अब नेता समर्थकों को खुश करने के लिए ये नौटँकी करते हैं या समर्थक ऐसी नौटँकी से खुश होते हैं ये बात वे जानते हैं। ●मोदी ने अपने भाषणों में बॉडी लैंग्वेज और इमोशनल बातों का बखूबी मिश्रण किया है। आप मोदी के 2007 के पहले के भाषण देखिये और उसके बाद के। बहुत फर्क नजर आएगा। बाकायदा ट्रेनिंग ली गई है । Apco Modi सर्च कीजिये। ●विशेषकर हथेलियों को खोल कर श्रोताओं के सामने बात करना। ये बॉडी लैंग्वेज जानने वाले अच्छी तरह से जानते हैं खुली हथेलियों से आप बड़ी भीड़ को मंत्रमुग्ध कर सकते हैं, साथ मे नौटंकी तो है ही। ●गाली भी अब खुलकर देते हैं, मुख्यमंत्री से लेकर ... माँ बाप बहन नाना दादा मौसा मौसी सबको कोसते है।समर्थकों को उनकी ये अदा भाती है। ●अजय बिष्ट या अभी हेमंता बिस्वा शर्मा , अमित शाह द्वारा दी हुई आम गाली हो या लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान महामानव द्वारा बहन की गाली मुंह से निकल गई हो, अब इसे स्वीकार लीजिये, ये हमारे रोजमर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा है। ◾आईटी सेल का काम अब सिर्फ प्रोपेगेंडा फैलाना नहीं, बल्कि आपकी तर्कशक्ति को कुंद करना है। वे तय करते हैं कि आपको आज किस बात पर गुस्सा करना है और किस बात पर हंसना है। आप स्वतंत्र नागरिक नहीं, एक एल्गोरिदम का हिस्सा मात्र हैं। ◾ दोष उन नेताओं का नहीं है जो मंच पर नाच रहे हैं। दोष हमारा है, क्योंकि हमें सत्य से ज्यादा सर्कस पसंद आने लगा है। राजनीति अब सेवा नहीं, एक प्राइम टाइम कॉमेडी शो है जिसका सब्सक्रिप्शन हमने अपने वोट से खरीदा है। ◾जश्न मनाइए कि सभ्यता के इस पतन में हम सब साझीदार हैं। दादा कोंडके तो चले गए, लेकिन उनके असली वारिस आज सफेद कुर्ते पहनकर सत्ता की गलियारों में हिट।फिल्में दे रहे हैं। हमें तो आदत हो गई है हर गाली पर वन्स मोर कहने की। गाली अब हम भी खुल कर देने लगे हैं, including me... किसी महिला को पहली बार गाली दी है मैंने आज यहां सोशल मीडिया पर। मुझे अफ़सोस भी है इस बात का कि इन लोगों ने अपना जैसा बना ही दिया। बधाई हो, हमने अपने देश को एक बहुत बड़ा अश्लील कॉमेडी क्लब बना दिया है। दादा कोंडके ज़िंदाबाद... #VijayShukla
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लिब्रांडु, एक गाली जो ज़ोंबियो द्वारा दी जाती है, लिबरल सोच के लोगों को। विश्व इतिहास के अधिकांश समय में, राजाओं और सम्राटों का मानना था कि शासन करने का उनका अधिकार सीधे ईश्वर से प्राप्त हुआ है। लेकिन क्या होगा यदि राजाओं को शासन करने का ईश्वर प्रदत्त अधिकार न हो? ◾◾ 350 साल पहले एक पागल आदमी था, जॉन लॉक। उसने ये बताया कि किसी को भी उसकी सहमति के बिना किसी अन्य की राजनीतिक शक्ति के अधीन नहीं किया जा सकता। उसने गुपचुप तरीके से एक किताब लिख दी कि राजा को राज करने का हक ऊपर वाले ने नहीं दिया है। उस वक्त के हिसाब से यह वैसी ही बात थी जैसे आज आप महामानव के विरुद्ध कोई तथ्य शेयर कर दीजिए , सीधा देशद्रोह माना जाएगा। लॉक ने कहा कि इंसान पैदाइशी आजाद है और सरकार बस एक कॉन्ट्रैक्ट है। ●● लिबरलिज्म या उदारवाद कोई गाली नहीं थी, बल्कि एक हथियार था। यह उस जंजीर को काटने की आरी थी जिसने सदियों से इंसान को किसी सुल्तान, राजा , सम्राट , धर्म पुरोहितो का गुलाम बना रखा था। लेकिन आज? आज लिबरल शब्द को ऐसे इस्तेमाल किया जाता है जैसे कोई संक्रामक बीमारी हो। ये जोम्बी जानते भी नहीं होंगे कि इन लोगों को बोलने की आजादी भी इसी विचारधारा ने दी है, जिसे वे गाली दे रहे हैं। ◆◆ 1787 में अमेरिका ने संविधान लिखा, बराबरी की बातें कीं, लेकिन औरतों, गरीबों और अश्वेतों को इंसान की गिनती से बाहर रखा। फिर मैरी वोलस्टोनक्राफ्ट आईं, जिन्होंने कहा कि औरतों को लिए समान शिक्षा और अधिकारों की वकालत की। उनकी बेटी, मैरी शेली, प्रसिद्ध उपन्यास 'फ्रेंकस्टीन' की लेखिका बनीं। फिर फ्रेडरिक डगलस ने हंटर बजाया कि गोरे की खुशी काले की गुलामी पर नहीं टिकी हो सकती। श्वेत व्यक्ति की खुशी अश्वेत व्यक्ति के दुख से नहीं खरीदी जा सकती। मताधिकार के विस्तार और मुक्त बाजारों की ओर उदारवाद का यह प्रयास 19वीं शताब्दी में और मजबूत हुआ। ●● जैसे आज गुंडे तय करते हैं कि कौन क्या खाएगा, और जैसे कोई कहे कि मेरी मर्ज़ी, मैं अपना भोजन तय करूंगा। लिबरलिज्म वही बहादुर है, जो कहेगा कि तुम्हारी मर्ज़ी का गुलाम नहीं हूं। तुम तय नहीं करोगे मेरे कपड़े, मेरा भोजन। लिबरल विचारधारा को छाना था ही। आख़िर मनुष्य पशु तो है नहीं, पशु यानि जो पाश में बंधा रहे और कुछ न कर पाए। लेकिन 19वीं सदी में जॉन स्टुअर्ट मिल को डर लगा कि कहीं Tyranny of the Majority सब कुछ तहस नहस न कर दे। जैसे कम्युनिज्म जब गलत हाथों में पड़ा तो तानाशाही की अति देखी गई । जॉन स्टुअर्ट मिल का डर भी सच साबित हुआ है। क्या आज हमें वही तानाशाही गलियों और सोशल मीडिया पर नहीं दिखती? तानाशाह अच्छी विचारधारा पर भी काबिज़ हो जाते हैं, बस बहुमत को ज़ोंबी और डरपोक बनाना होता है। ◆◆ आज का दौर देखिए। ट्रंप हों या महामानव सबको लिबरलिज्म से एलर्जी है। क्यों? क्योंकि यह विचारधारा सवाल पूछती है। यह कहती है कि कानून के सामने सब बराबर हैं । लेकिन अब यहां कानून भी कपड़े देखकर रंग बदलता है। थाना हो या कचहरी, सिस्टम अब उस सोशल कॉन्ट्रैक्ट को भूल चुका है जो लॉक ने लिखा था। ●● यूनिवर्सिटी, साइंस और मीडिया पर हमले हो रहे हैं। तथ्यों को प्रोपेगेंडा और प्रोपेगेंडा को इतिहास बताया जा रहा है। लिबरलिज्म आज अपने ही घर में बेगाना है। लोग भूल गए हैं कि बिना इस सोच के हम आज भी किसी राजा के दरबार में कोड़े खा रहे होते या किसी तानाशाह की आरती उतार रहे होते । वैसे कुछ लोग आज भी उतार रहे हैं, पर वो उनकी अपनी चॉइस है। ◆◆ क्या फर्क पड़ता है अगर लिबरलिज्म मर जाए? फर्क यह पड़ेगा कि अगली बार जब सत्ता आपके दरवाजे पर लात मारेगी, तो आपके पास अधिकार शब्द का ढाल नहीं होगा। आप सिर्फ एक प्रजा होंगे, नागरिक नहीं। 350 साल की मेहनत को बारह साल की नफरत में झोंकना बहुत आसान है। ●● अगर आपको लगता है कि लिबरल होना अपराध है, तो मुबारक हो, आप गुलामी के उस दौर की वापसी का जश्न मना रहे हैं जहाँ राजा की मर्जी ही कानून थी। राजा ईश्वर था। लिबरलिज़्म को गाली देना आसान है, लेकिन उस लिबरलिज़्म को ज़रूर बचाना जो आपको गाली देने की आजादी देता है। अगली बार लिबरल को गाली देने से पहले आईने में अपनी जुबान देख लीजिएगा, वो अभी सलामत है तो शायद इसी उदारवाद की वजह से। तो ज़ोंबियो, हमे खुशी है कि हम लिबरल हैं, या कहो कि लिब्रांडु हैं। #VijayShukla
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Gas क्यों नहीं मिल रहा है, इसके पीछे क्या मास्टर स्ट्रोक है ये धुरंधर पार्ट 3 में बताया जाएगा। तबतक रैली देखो रैली
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Supriya Shrinate
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ये दोनों तो असम के बंटी और बबली हैं जालसाज़!
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असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा और उनकी पत्नी पर बहुत सारे आरोप लगते रहे हैं, जैसे- जमीन हड़पना, मंदिर का चंदा चोरी करना, सरकारी सब्सिडी हड़पना आदि। लेकिन आज हम जो दस्तावेज आपके सामने रख रह हैं, वो भारत के बाहर से जुड़े हुए हैं। असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की पत्नी रिंकी भुइयां सरमा के पास तीन पासपोर्ट हैं। ⦿ UAE का पासपोर्ट • जारी हुआ: 14 मार्च 2022 • खत्म होगा: 13 मार्च 2027 ⦿ एंटीगुआ-बारबुडा का पासपोर्ट • जारी हुआ: 26 अगस्त 2021 • खत्म होगा: 25 अगस्त 2031 ⦿ अरब रिपब्लिक ऑफ इजिप्ट का पासपोर्ट • जारी हुआ: 13 फरवरी 2022 • खत्म होगा: 12 फरवरी 2029 : AICC मीडिया और पब्लिसिटी विभाग के चेयरमैन @Pawankhera जी 📍 दिल्ली

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Vijay
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धुरंधर पार्ट 3 कहानी शुरू होती है, पापिस्तान नामके देश की ख़ुफ़िया एजेंसी I Ass I के ऑफिस में, जहां भ्रमरिका के डी आई ए के डायरेक्टर बैठे हैं। बैकग्राउंड में गाना बज रहा है "सांभर दो दो दो" टॉपिक है महारथ नाम का देश, जो कभी तरक्की की पटरी पर दौड़ रहा था, उसे कैसे ज़ोंबी द्वीप में तब्दील किया गया, इसकी पटकथा पापिस्तान में लिखी गई थी। पापिस्तान को डर था कि अगर महारथ ऐसे ही मध्यमवर्गीय बनता रहा, तो उनके फटेहाल टमाटर और ₹400 लीटर वाले पेट्रोल की बेइज्जती कौन करेगा? 1948, 1965, 1971 में महारथ के हाथों पीट चुके पापिस्तान ने अपने आका भ्रमरिका से बात चीत शुरू की। भ्रमिरिका को भी महारथ भाव नहीं देता था। दुनिया का दरोगा बनने का दावा करने वाले भ्रमरिका को कई बार मुंह पर महारथ ने थप्पड़ लगा दिया था, 1971 में तो ज़ोरदार वाला। बदला लेने का मौका आ गया था। ●● प्लान के तहत राजधानी में एक महा सर्कस शुरू हुआ "गन्ना आंदोलन"। इस ड्रामे का लीड एक्टर था खुजलीझाड़, सह कलाकार गन्ना खारे। जिनकी बस एक ही जिद थी कि देश के एक-एक गन्ने को गिनने के लिए गन्ना आयुक्त बिठाया जाए। उधर साइड रोल में लल्ला भ्रम देव योग की ऐसी ऐसी मुद्राएं दिखा रहे थे कि जनता को अपनी खाली जेब में भी कपालभाति का आनंद आने लगा। ●● तभी एंट्री हुई एजेंट मरेंद्र नोडि की, जो अपनी बकबक से ऐसा समां बांधता था कि भेड़ों को उसमें साक्षात चरवाहा दिखने लगा। भ्रमेरिका ने अपनी एजेंसी डीआईए से।मीडिया को ऐसी हड्डी डाली कि रातों रात पूरा मीडिया टॉमी मीडिया बनकर पापिस्तान के बजाय अपनों पर ही भौंकने लगा। जनता को लगा कि उनकी खुजली बस गन्ना।और नोडि से ही मिटेगी। माहौल ऐसा बना कि सरकार को भी लगने लगा कि उनकी तपस्या में ही खोट है। ◆◆ फिर आया फिल्म का असली ट्विस्ट। मरेंद्र चुनाव जीता और पापिस्तान की अचानक यात्रा पर गया। वहाँ एजेंट मरेंद्र ने प्रथम चरण की सफलता पूर्वक समाप्त होने की जानकारी दी। केक और बिरयानी खाई, आगे की रणनीति अपने आकाओ जानी और "ऑपरेशन जोम्बी द्वीप" शुरू किया। इसके बाद जो जुमलेबाजी शुरू हुई, वो इतिहास के किसी भी कॉमेडी शो को मात दे दे। 100 दिन में काला धन। पैसा तो नहीं आया, पर जनता लाइनों में लगकर 'ब्लैक एंड व्हाइट' जरूर हो गई। 15 लाख का शगुन। लोग आज भी बैंक मैनेजर को ऐसे देखते हैं जैसे वो उनके खोए हुए चाचा का बेटा हो। 35 रुपए लीटर पेट्रोल। अब तो 100 पार होने पर जनता उसे अमृत्काल का जूस समझकर पी रही है। 2022 तक सबके पास घर। घर तो नहीं मिले, पर 'स्मार्ट सिटी' के नाम पर खूब मलाई बांटी गई। नदी की सफाई। नदी उतनी ही मैली रही, बस मित्र उद्योगपतियों की तिजोरी भरती गई। ●● एजेंट मरेंद्र ने ज़ोंबी वायरस का ऐसा डोज दिया कि जनता को अपनी बेरोजगारी से ज्यादा पड़ोस के अब्दुल के टाइट होने की झूठी खुशी होने लगी। 45 सैनिकों की शहादत करवाई गई। राजनीति की रोटियां सेंकी गईं। महामारी फैली और जनता श्मशान के बाहर भी मास्टरस्ट्रोक के नारे लगाती रही। अचानक नोटबंदी करके मध्यमवर्ग की जेब काटी गई और लॉकडाउन में करोड़ों को सड़कों पर पैदल वॉक कराया गया। ◆◆ देश के खजाना खाली हुआ और सरकारी संस्थान खास मित्रों को ऐसे बांटे गए जैसे भंडारे में पूड़ियां बंटती हैं। उधर भ्रमरिका का राष्ट्रपति एजेंट मरेंद्र को अपनी उंगलियों पर नचाता रहा, लेकिन टॉमी मीडिया ने इसे विश्वगुरु का कत्थक का प्रचार बताया। महारथ अब आधिकारिक तौर पर ज़ोंबी द्वीप है, जहाँ जनता को न अस्पताल चाहिए, न स्कूल, उसे बस सोते-जागते टीवी पर नफरत की चटनी , अब्दुल का कीमा चाहिए। ●● पापिस्तान और डीआईए का एजेंट मरेंद्र अपने मिशन में 100% सफल रहा। उसने एक महान राष्ट्र को ऐसे सर्कस में बदल दिया है जहाँ शेर अब सिर्फ रिंग मास्टर की उंगली पर नाचता है। जुमलेबाजी का पार्ट 4 अभी आना बाकी है... तब तक ताली बजाते रहिए! क्रमशः...
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मेरे अप्रिय अंधभक्तों, रोम जब जल रहा था, तो नीरो बंसी बजा रहा था। आज जब सिस्टम सड़ रहा है, तो नीरो बंसी भी बजाता है, देश की भी बजाता है और 4K कैमरे के सामने एक शानदार पोज़ देता है। ●● विश्वगुरु का तमगा आपकी छाती पर चिपका दिया गया है, ताकि आपको भूख, प्रदूषण और मिलावट का अहसास न हो। यह एक ऐसा नशा है जिसे सुबह की पहली चाय के साथ सोशल मीडिया के जरिए आपकी रगों में उतार दिया जाता है। ●● सुबह उठते ही आप जिस टूथपेस्ट से दांत साफ करते हैं, उसमें नमक हो या न हो, पर मिलावट की पूरी गारंटी है। अभी दिल्ली में नकली सेंसोडाइन टूथपेस्ट की फैक्ट्री मिली है। जिसे सेंसोडाइन समझते थे, वो तो डायन निकली। जिस नाश्ते को आप प्रोटीन समझकर निगल रहे हैं, वह दरअसल स्लो पॉइजन का एक किफ़ायती पैक है। पर फिक्र मत कीजिए, टीवी चालू करते ही आपको बताया जाएगा कि महामानव किसी भी क्षण ईरान अमेरिका युद्ध रुकवा देंगे। ●● घर से बाहर कदम रखिए। 700 AQI वाली हवा आपका स्वागत करेगी। यह हवा नहीं, फेफड़ों के लिए सीधा मौत का वारंट है। पर आप इसे धुंध कहिए, क्योंकि पॉल्यूशन कहने पर आपको धर्मद्रोही माना जाएगा। ◆◆ ट्रैफिक में फंसे रहिए, सड़कों के गड्ढों में अपनी गाड़ी का सस्पेंशन तोड़िए, और फिर उसी सड़क पर टैक्स भरिए। अगर गलती से किसी गड्ढे की फोटो खींचकर सोशल मीडिया पर डाल दी, तो थाने का चक्कर लगाने के लिए तैयार रहिए। सिस्टम को आपकी सुरक्षा की चिंता नहीं है, उसे अपने फोटोशूट वाले महामानव की चिंता है। ●● पनीर के नाम पर आप उबला हुआ प्लास्टिक खा रहे हैं और दूध के नाम पर सफेद जहर। पर असली मज़ा तो तब आता है जब आप ईमानदारी से अपना इनकम टैक्स और GST भरते हैं। यह पैसा आपके बच्चों के स्कूल या अस्पताल के लिए नहीं, बल्कि महामानव के वर्ल्ड टूर और नए फोटोशूट के लाइटिंग बजट के लिए है। ◆◆ महामानव के लिए आप नागरिक नहीं हैं, आप एक अंधभक्त हैं, दर्शक है।।जिसका काम है, वाह वाह करना। आप एक जरिया हैं जिससे सत्ता की चकाचौंध को बरक़रार रखा जा सके। आपका काम सिर्फ लाइन में लगना है।कभी राशन के लिए, कभी अस्पताल के बेड के लिए, कभी गैस के लिए, कभी अपने पैसे के लिए ,तो कभी वोट देने के लिए। ●● क्या फर्क पड़ता है कि आपकी सांसें कम हो रही हैं? क्या फर्क पड़ता है कि आपकी जेब कट रही है? महामानव की फोटो तो अच्छी आ रही है ना। विज्ञापन में मुस्कुराते हुए चेहरे आपको बता ही देंगे कि आप अमृत काल के सबसे सुखी इंसान हैं। ◆◆ इस महान सर्कस में आप वो दर्शक हैं जिसने टिकट भी खुद खरीदा है, अपनी पिटाई भी खुद करवा रहा है और अंत में जोकर की परफॉर्मेंस पर तालियां भी खुद ही बजा रहा है। टैक्स देते रहिए, जहर पीते रहिए और कैमरे की तरफ देखकर मुस्कुराते रहिए क्योंकि अब्दुल को टाइट करना ज़रूरी है। मुस्कुराइए , आपको महामानव देख रहे हैं। #VijayShukla
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संसद की ऊंची मीनारों से लेकर गांव की धूल भरी पगडंडियों तक, लोकतंत्र का एक ही उसूल सिखाया जाता है जवाबदेही। लेकिन जब तिजोरी की चाबी हाथ में आती है, तो ये जवाबदेही शब्द शब्दकोश से गायब होकर फाइलों के ढेर में दफन हो जाता है। ●● महामानव के गुजरात मॉडल की चकाचौंध के पीछे एक ऐसा ' ब्लैक होल है, जहां सात हजार चार सौ करोड़ रुपये गायब हुए हैं। सीएजी (CAG) की रिपोर्ट आई है, लेकिन महामानव और उनके अंधभक्तों को क्या फर्क पड़ता है? उनके लिए तो बस अब्दुल के टाइट रहने से मतलब है। ●● शिक्षा, आदिवासी विकास और शहरी आवास ये वो विभाग हैं जिन्होंने जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा ऐसे निकाला जैसे किसी पुराने दोस्त से उधार लिया हो। नियम कहता है कि पैसा खर्च करो और यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट (UC) जमा करो। यानी रसीद दो कि पैसा कहां लगा? ◆◆ लेकिन यहां तो रसीद का नामोनिशान नहीं है। 2001 से लेकर अब तक 4200 से ज्यादा सर्टिफिकेट पेंडिंग पड़े हैं। 2001...तब के बच्चे आज बाप बन गए, लेकिन सरकार को ये याद नहीं आया कि वो 7400 करोड़ रुपये पुल बनाने में लगे या विज्ञापन की होर्डिंग्स चमकाने में? ●● सोचिए, अगर आप अपने घर के नौकर को सब्जी लाने के लिए 500 रुपये दें और वो शाम को हिसाब न दे, तो आप उसे घर से निकाल देंगे। लेकिन यहां सिस्टम ने हजारों करोड़ डकार लिए और हम विकास का झुनझुना बजा रहे हैं। क्या ये आपके बाप का पैसा है? नहीं, ये हमारे पसीने की कमाई है जो टैक्स हम भरते है। ◆◆ कॉलेज की फीस भरने के लिए एक आम छात्र को दस कागज़ दिखाने पड़ते हैं, एक छोटे दुकानदार को जीएसटी की मार झेलनी पड़ती है, लेकिन इन साहबों को हिसाब देने की जरूरत नहीं महसूस होती। शायद इनके लिए ऑडिटिंग का मतलब सिर्फ पन्ने पलटना है, सच सामने लाना नहीं। ●● आईटी सेल वाले अब तर्क देंगे कि "प्रक्रिया में देरी होती है"। 23 साल की देरी? इतनी देर में तो इतिहास बदल गया। लेकिन ये भ्रष्टाचार के विरोधी बनकर सत्ता हथियाए हुए लोग आकंठ तक भ्रष्टाचार में डूबे हैं। ◆◆ जब तक जनता सिर्फ नौटंकी देखकर तालियां बजाएगी, तब तक सिस्टम ऐसे ही डकार लेता रहेगा। 7400 करोड़ की ये गुमशुदगी कोई प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि जनता की जेब पर सरेआम डकैती है। पर छोड़िए, हमें क्या? हम तो बस रैलियों में भीड़ बढ़ाने के लिए बने हैं, हिसाब मांगने की औकात हमारी कहां। ज्यादा पूछो तो पाकिस्तान भेज देंगे। #VijayShukla
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राजनीति में इमानदारी का चूर्ण बेचकर सत्ता की मलाई तक पहुँचने का हुनर कोई इस चतुर खिलाड़ी से सीखे। कल तक जो व्यवस्था बदलने निकले थे, आज वो व्यवस्था के जमाई बन बैठे हैं। ●● एक शांत और शालीन प्रधानमंत्री पर कीचड़ उछालकर 2014 की बिसात बिछाई गई थी। 1,76,000 करोड़ का वो जादुई आंकड़ा, जो टीवी स्क्रीन पर किसी हॉरर फिल्म की तरह फ्लैश होता था, अदालत की चौखट पर पहुँचते ही टांय टांय फिस्स हो गया। विदेशी ताकतों के इशारों पर नाच कर देश को गर्त में पहुंचाने की शुरुआत करने वाले इस पापी की पोल खुल चुकी है। इसका काम था, लेवल 1 पर जोम्बी बनाकर आगे के लिए फॉरवर्ड करना, जहां लेवल 2 पर महादानव इन ज़ोंबियो को अपना फौजी बनाता। ●● मकसद तो पूरा हो गया। 2G घोटाले का शोर मचाने वाले आज खुद भ्रष्टाचार के आरोपों की चादर ओढ़े बैठे हैं। सादगी का चोला पहनकर आए थे, अब महल और काफिलों की शान-ओ-शौकत में खो गए हैं। ●● यह एक ऐसा स्टार्टअप था जिसका प्रोडक्ट इमोशन था और प्रॉफिट निरंकुश सत्ता। जिस आंदोलन ने आम आदमी को सपना दिखाया, उसी ने खास आदमियों की एक नई फौज खड़ी कर दी। ●● राखी बिड़लान याद हैं? दलित समाज का वो चेहरा जिसे दिल्ली विधानसभा के स्पीकर की कुर्सी पर बिठाकर हाशिए पर धकेल दिया गया। यह राजनीति का वो कोल्ड स्टोरेज है जहाँ उभरते हुए चेहरों को करियर खत्म करने के लिए भेजा जाता है। ●● जब राज्यसभा भेजने की बारी आती है, तो आम आदमी की परिभाषा बदल जाती है। तब संघर्ष करने वाले कार्यकर्ता नहीं, बल्कि बड़े-बड़े व्यापारी और रसूखदार सवर्ण चेहरे याद आते हैं। लवली यूनिवर्सिटी के मालिक डॉ. अशोक कुमार मित्तल को उपनेता बनाना महज एक बदलाव नहीं, बल्कि पार्टी के असली DNA का खुलासा है। ●● सिस्टम को बदलने की बात करने वाले अब सिस्टम के सबसे बड़े बेनेफिशियरी बन चुके हैं। चंदा देने वाले सेठ राज्यसभा पहुँच रहे हैं और नारे लगाने वाला कार्यकर्ता आज भी थाने और कचहरी के चक्कर काट रहा है। ●● क्या गजब का लोकतंत्र है, जहाँ एक शिक्षा का व्यापारी राज्यसभा में पार्टी का चेहरा बनता है और गरीब का बच्चा बस मुफ्त बिजली पानी के नाम पर अपना भविष्य गिरवी रख देता है। ●● केजरी की क्रांति का नारा सिर्फ एक लॉन्चिंग पैड था। जब रॉकेट कक्षा में पहुँच गया, तो उन बूस्टर इंजनों (कार्यकर्ताओं और विचारधारा) को समंदर में गिरने के लिए छोड़ दिया गया। अब बस सत्ता का राज है और आम आदमी का नाम सिर्फ बैनरों पर बचा है, अपने सिंबल झाड़ू की तरह। #VijayShukla
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@SusmitP साले साहब, जनसंघ के साथ मिलकर सरकार बनाई थी तेरा अटल उसमें विदेश मंत्री था।
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@ActForVijay जिन काव साहब ने रॉ को खड़ा किया उसके एजेंट्स को मरवाने वाला मोरारजी देसाई भी पहले कांग्रेसी ही था, और हामिद अंसारी को भी कांग्रेस ने ही उपराष्ट्रपति बनाया।
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Vijay
Vijay@ActForVijay·
इतिहास के पन्नों को जब सत्ता की स्याही से लिखा जाता है, तो उसमें अक्सर वही दिखता है जो हुक्मरान दिखाना चाहते हैं। आज के हुक्मरान कांग्रेस को हिंदू विरोधी बताने में पूरी मशक्कत से लगे हैं। इसी कांग्रेस को जिन्ना मुस्लिम विरोधी बताता था। उसी जिन्ना के पुजारी कांग्रेस को हिंदू विरोधी बताते हैं। 1968, इंदिरा गांधी, जिन्हें दुनिया आयरन लेडी।कहती थी, एक ऐसी आँख की तलाश में थीं जो सात समंदर पार भी झपकना न भूले। ●● तभी एंट्री होती है रामनाथ काव की। एक ऐसा नाम जो खामोशी से तूफान खड़ा करने का हुनर जानता था। लोग कहते हैं कि रॉ (R&AW) का नाम उनके सरनेम Kao से मेल खाता है ताकि इतिहास उन्हें कभी भुला न सके। लेकिन क्या वाकई यह सिर्फ एक नाम का खेल था? या इसके पीछे कोई बहुत बड़ी प्रेरणा छिपी थी? ●● काव साहब हिंदू माइथोलॉजी के प्रकांड विद्वान थे। उनके जेहन में एक ही नाम कौंध रहा था हनुमान। दुनिया के पहले और सबसे सफल अंडरकवर एजेंट। ●● हनुमानजी का लंका जाना कोई साधारण यात्रा नहीं थी। वह एक हाई।प्रोफाइल जासूसी मिशन था। वेश बदलना, दुश्मन की ताकत का अंदाजा लगाना, और बिना डरे रावण के दरबार में अपनी बात कहना। क्या आज के जासूसों को यही ट्रेनिंग नहीं दी जाती? ●● एक विदेशी एजेंट के लिए सबसे जरूरी क्या है? लगातार यात्राओं से न थकना, जो मिले उसे खाकर पेट भर लेना और अपमान के घूंट को अमृत समझकर पी जाना। हनुमानजी ने समंदर लांघा तो भूख प्यास नहीं देखी। उन्होंने सुरसा के सामने बुद्धिमानी से काम लिया और सिंहिका का वध किया... सिचुएशनल अवेयरनेस... ●● आज के दौर में जब आईटी सेल के शूरवीर कीबोर्ड पर युद्ध लड़ते हैं, उन्हें समझना चाहिए कि असली 'रॉ' (RAW) की जड़ें सुंदरकांड के उस आत्मविश्वास में थीं, जहाँ अंतिम विकल्प के तौर पर ही बल प्रयोग किया गया था। लंका जलाई गई, लेकिन तब, जब कूटनीति के सारे रास्ते बंद हो गए थे। ●● आज की राजनीति में लोग हनुमानजी को सिर्फ वोट बैंक या फोटो फ्रेम तक सीमित कर चुके हैं। जबकि रामनाथ काव ने उनकी कार्यप्रणाली से देश की सबसे बड़ी सुरक्षा दीवार खड़ी कर दी। मान अपमान से परे रहकर राष्ट्रहित सर्वोपरि रखना। ●● हम संस्थानों के नाम तो याद रखते हैं, लेकिन उनकी आत्मा को भूल जाते हैं। काव ने हनुमानजी को आदर्श माना क्योंकि एक सर्वोच्च राजनयिक वही है जो शत्रु के घर में घुसकर उसकी लंका ढहा दे और वापस आकर बिना किसी अहंकार के अपने बॉस से कहे "बस आपके आदेश का पालन किया" ●● हम आज भी हनुमानजी को पूजते तो हैं, लेकिन उनके इंटेलिजेंस और धैर्य को अपनाने में हमें नानी याद आ जाती है। हम नारों वाली कौम बन चुके हैं, जबकि काव और इंदिरा ने खामोश रहकर इतिहास बदलने वाली मशीन बनाई थी। शायद इसीलिए आज का तंत्र सिर्फ शोर मचाता है, और काव का 'रॉ' चुपचाप अपना काम कर जाता है। क्या फर्क पड़ता है कि आप किसे मानते हैं, फर्क इससे पड़ता है कि आप उनसे सीखते क्या हैं। जय बजरंग बली #VijayShukla
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Vijay
Vijay@ActForVijay·
@RameshSidhpura1 साले साहब रमेश , तू चिंतित न हो, बेइज्जत होने में तेरे पापा की बराबरी कोई नहीं कर सकता, जो तुझे चकले पर तेरी मम्मी सहित बेच आया था 😂
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Ramesh Sidhpura
Ramesh Sidhpura@RameshSidhpura1·
@ActForVijay यार तुम्हारी बहुत बेइज्जती हुई है और तुमको बहुत ट्रोल किया गया है।
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Vijay
Vijay@ActForVijay·
@peace_78vi वही जिसने तेरे बाप की लंका में आग लग दी थी और तेरे मां को तेरे साथ चकले से छुड़ाया था।
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RADIO-inactive
RADIO-inactive@peace_78vi·
@ActForVijay ये कौन कौवा kao kao कर रहा है?
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Vijay
Vijay@ActForVijay·
@Nit_22 @SureshC85120965 @Arunkum59038880 साले साहब, तेरे समझ के बाहर की बात है। तू जा के गोबर खा और मेरी सरहज यानि तेरी बीवी को मेरा प्यार बोलना
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Nitz (blue tick)
Nitz (blue tick)@Nit_22·
@SureshC85120965 @ActForVijay @Arunkum59038880 कांग्रेस मतलब मुसलमान, मुसलमान मतलब कांग्रेस - रेवंत रेड्डी। हुक्मरान का क्या रोल है बे! कांग्रेस ने कोर्ट में हलफनामा दिया था कि भगवान राम तो काल्पनिक हैं। इसमें हुक्मरान कहां से आए बे झांटू!
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Vijay
Vijay@ActForVijay·
@rkdevar @sharmass27 तेरे समझ के बाहर की बात है, तू निकल
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Raj Devar 🇮🇳
Raj Devar 🇮🇳@rkdevar·
@ActForVijay @sharmass27 क्या काओ सर कांग्रेस के कार्यकर्ता थे? हम उनके काम की सराहना करते हैं, लेकिन इसका मैडम या उनके परिवार से क्या लेना-देना है? आप को इस ट्वीट से जान था जापान पर चीन पहुंच गए?
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