परमात्मा की शरणागति और अनुग्रह अध्यात्म पथ में साधनों का मूल उद्देश्य है। जब योगी हृदय स्थित ईश्वर के प्रति पूर्ण श्रद्धा-समर्पण भाव को धारण करते हैं सभी प्रकार के भ्रम-भय-द्वंद-संशयों तथा कर्म फल के बंधनों से मुक्त होकर कृतार्थ होते हैं।
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अथ शुद्धं भवेद् वस्तु यद् वै वाचामगोचरम्।
द्रष्टव्यं मृद्घटादृष्टान्तेन पुनः पुनः आरभ्यते ।।१३६।।
("अपरोक्षानुभूति)
अद्वैतवेदान्त का परम प्रयोजन उस शुद्ध वस्तु परम ब्रह्म का प्रतिपादन है, जो इन्द्रियों और वाणी के समस्त व्यापार से परे, अनिर्वचनीय, अवाङ्मनसगोचर और स्वप्रकाश चैतन्यस्वरूप है। प्रस्तुत श्लोक में भगवत्पादाचार्य यह उद्घाटित करते हैं कि वह शुद्ध तत्त्व वाणी की पहुँच से परे होते हुए भी, उपदेश-परम्परा में दृष्टान्तों के माध्यम से बारम्बार निरूपित किया जाता है, जिससे साधक की बुद्धि उस अप्रमेय सत्य की ओर प्रवृत्त हो सके।
“अथ शुद्धं भवेद् वस्तु” - यहाँ ‘शुद्ध वस्तु’ से अभिप्राय उस ब्रह्म से है, जो नित्य, निर्विकार, निरुपाधिक, अखण्ड और सर्वथा स्वतन्त्र है। वह न स्थूल है, न सूक्ष्म; न कर्ता, न भोक्ता; न कारण, न कार्य अपितु केवल साक्षीस्वरूप, शुद्ध चैतन्य है। वही तत्त्व सभी उपाधियों के अतिक्रमण के पश्चात् आत्मरूप से प्रकाशित होता है।
“यद् वै वाचामगोचरम्” - वह ब्रह्म वाणी का विषय नहीं है। शब्द-वृत्ति जहाँ तक जाती है, वहाँ तक केवल नाम-रूप का क्षेत्र है। शब्द सीमित हैं, और ब्रह्म असीम है; शब्द द्वैत का आश्रय लेते हैं, और ब्रह्म अद्वैत है। अतः ब्रह्म का प्रत्यक्ष निरूपण शब्दों से सम्भव नहीं। उपनिषद् भी कहती है - “यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह” जहाँ से वाणी और मन लौट आते हैं, उस ब्रह्म को वे प्राप्त नहीं कर सकते।
किन्तु, यह भी सत्य है कि शब्द ही साधन हैं श्रुति के माध्यम से ही ज्ञान का उदय होता है। अतः आचार्य कहते हैं - “द्रष्टव्यं मृद्घटादृष्टान्तेन पुनः पुनः” उस शुद्ध ब्रह्मतत्त्व का बोध कराने के लिए बार-बार मृद्घट (मिट्टी-घट) आदि दृष्टान्तों का आश्रय लिया जाता है। यह शिक्षण-विधि अत्यन्त गूढ़ है। जब साधक को सीधे ब्रह्म की ओर इंगित करना कठिन होता है, तब उसे परिचित उदाहरणों के माध्यम से उस सत्य की झलक दी जाती है।
मृद्घट दृष्टान्त में यह प्रतिपादित होता है कि घट नाम-रूप है, और मृत्तिका ही उसका तत्त्व है। घट का नाश हो जाए, तो भी मृत्तिका का नाश नहीं होता। इसी प्रकार जगत् नाम-रूपात्मक है, और ब्रह्म ही उसका तत्त्व है। जगत् के परिवर्तन, उत्पत्ति और विनाश से ब्रह्म अप्रभावित रहता है। इसी प्रकार स्वर्ण-आभूषण, जल-तरंग, लोह-उपकरण आदि अनेक दृष्टान्तों के द्वारा यह समझाया जाता है कि कार्य की सत्ता कारण से पृथक् नहीं है, और कारण का स्वरूप कार्य से कभी विकृत नहीं होता।
भगवद्पादाचार्य आदि शङ्कराचार्य की शिक्षण-पद्धति में यह पुनरावृत्ति अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि अविद्या की दृढ़ता को केवल एक बार के उपदेश से भंग नहीं किया जा सकता। मन बार-बार नाम-रूप में ही सत्यत्व का अनुभव करता है; अतः उसे बार-बार यह स्मरण कराना पड़ता है कि जो दृश्य है, वह केवल उपाधि है; तत्त्वतः सब ब्रह्म ही है।
इस प्रकार दृष्टान्तों का प्रयोजन ब्रह्म को निर्देशित करना है, न कि परिभाषित करना। वे संकेत हैं, न कि अन्तिम सत्य। जब साधक की बुद्धि परिपक्व होती है, तब वह इन दृष्टान्तों का भी अतिक्रमण कर स्वानुभव में स्थित होता है, जहाँ न शब्द हैं, न विचार केवल शुद्ध, अद्वैत चैतन्य का अविभाज्य प्रकाश है।
अतः इस श्लोक का गूढ़ निष्कर्ष यह है कि ब्रह्म वाणी और मन से परे होते हुए भी, उपदेश-परम्परा में दृष्टान्तों द्वारा ही ज्ञेय बनता है। बार-बार के विवेक, मनन और निदिध्यासन से साधक उस शुद्ध वस्तु में स्थित होता है, जो स्वयं उसका ही स्वरूप है।
यही अद्वैत का परम निष्कर्ष है; वाणी जहाँ मौन हो जाती है, वहीं ब्रह्म का अनुभव प्रारम्भ होता है; और जहाँ अनुभव पूर्ण होता है, वहाँ केवल शुद्ध, अखण्ड, अद्वितीय चैतन्य ही शेष रहता है।
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आत्म अनुभूति केवल अनुग्रह से संभव है। साधन उद्योग मन,बुद्धि,चित्त,अहंकार की शरणागति के निमित्त हैं। जैसे ही अंत:करण में ईश्वर के सर्वसमर्थ स्वरूप का भाव दृढ़ हुआ पूर्ण शरणागति प्रकट हो जाती है तथा जीव अनुग्रह को धारण कर आत्म बोध को उपलब्ध होता है
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सभी जीव अपने कर्म प्रारब्ध के आधीन हैं। पूर्ण शरणागति से जब मन बुद्धि संशयों से रहित होता है हृदय स्थित परमात्मा का अनुग्रह अनुभूत होने लगता है। प्राप्त अनुग्रह को धारण कर योगी जन ईश्वर की आज्ञा में प्रवृत्त होकर सभी प्रकार के सूक्ष्म अहंकार से मुक्त हो जाते हैं।
@AvdheshanandG
कार्ये कारणताता कारणे न हि कार्यता।
कारणत्वं स्वतो गच्छेत् कार्यभावे विचारतः।।१३५।।
("अपरोक्षानुभूति")
अद्वैतवेदान्त के सूक्ष्मतम तत्त्वों में कार्य-कारण-सम्बन्ध का विवेचन अत्यन्त महत्वपूर्ण है, क्योंकि यही विवेक जीव को नाम-रूपात्मक जगत् की आभासिक सत्ता से परमार्थतत्त्व ब्रह्म की ओर उन्मुख करता है। प्रस्तुत श्लोक में भगवत्पादाचार्य यह प्रतिपादित करते हैं कि कारण और कार्य का सम्बन्ध वस्तुतः नित्य, स्वतन्त्र और परमार्थतः सत्य नहीं, अपितु केवल अविद्योपाधि से उपपन्न एक व्यवहारिक कल्पना मात्र है।
“कार्ये कारणताता” अर्थात् कार्य में ही कारणता का अध्यास होता है। जब हम किसी वस्तु जैसे घट को देखते हैं, तब उसके भीतर कारण - मृत्तिका का बोध करते हैं। यहाँ कारणता घट में आरोपित होती है, न कि कारण में कार्य का कोई वास्तविक प्रवेश होता है। “कारणे न हि कार्यता” कारण में कार्य की सत्ता नहीं होती; मृत्तिका स्वयं घटरूप नहीं हो जाती, अपितु घट केवल नाम-रूपात्मक उपाधि है, जो मृत्तिका पर आरोपित है।
आदि शङ्कराचार्य की अद्वैतदृष्टि में यह प्रतिपादन अत्यन्त सूक्ष्म है; कारण कार्य से अभिन्न होते हुए भी कार्य की सत्ता से रहित है, और कार्य कारण से पृथक् प्रतीत होते हुए भी तत्त्वतः कारण के अतिरिक्त कुछ नहीं। यह अध्यारोप-अपवाद की पद्धति का अनुपम उदाहरण है, जहाँ पहले कार्य-कारण का स्वीकार कर शिष्य की बुद्धि को स्थिर किया जाता है, और तत्पश्चात् विचार द्वारा उस सम्बन्ध का अपवाद कर दिया जाता है।
“कारणत्वं स्वतो गच्छेत् कार्यभावे विचारतः” - जब सूक्ष्म विवेक द्वारा कार्य की स्वतंत्र सत्ता का अभाव ज्ञात होता है, तब कारण का ‘कारणत्व’ भी स्वतः ही लय को प्राप्त हो जाता है। कारण केवल कार्य की अपेक्षा से कारण है; यदि कार्य ही मिथ्या सिद्ध हो गया, तो कारण का कारणत्व भी निरर्थक हो जाता है। इस प्रकार कारण भी अपने कारणत्व-धर्म से रहित होकर शुद्ध ब्रह्मस्वरूप में प्रतिष्ठित होता है।
यहाँ अद्वैत का परम रहस्य उद्घाटित होता है न कार्यं न कारणं, केवलं ब्रह्मैव सत्यं। कार्य-कारण-प्रपञ्च केवल अविद्याजन्य दृष्टि में है; ज्ञानोदय होने पर यह सम्पूर्ण द्वैत-व्यवहार लीन हो जाता है, जैसे जागरण में स्वप्न का सम्पूर्ण व्यापार विलीन हो जाता है।
उपनिषदों का यही प्रतिपाद्य है -
“सदेव सोम्य इदं अग्र आसीत्” (छान्दोग्योपनिषद्) यह सम्पूर्ण जगत् प्रारम्भ में केवल सत् (ब्रह्म) ही था। अतः जो कुछ कार्यरूप में दृश्य है, वह केवल नाम-रूप का विस्तार है; तत्त्वतः वह कारण ब्रह्म से भिन्न नहीं।
अतः निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि कार्य-कारण का यह समस्त सम्बन्ध केवल अविद्योपाधि-कल्पित है। जब विवेक से कार्य का अभाव ज्ञात होता है, तब कारण का कारणत्व भी निवृत्त हो जाता है, और शुद्ध, निर्विशेष, अद्वितीय ब्रह्म ही शेष रहता है; जो न कर्ता है, न कारण, न कार्य अपितु केवल साक्षीस्वरूप, निरुपाधिक, नित्य चैतन्य है।
यही अद्वैत वेदान्त का परम निर्णय है - “ब्रह्म सत्यं, जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः।”
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आत्म बोध का पथ अनंत जन्मों की प्रतीक्षा और संशयों से मुक्त होकर ,हृदय स्थित परमात्मा की पूर्ण शरणागति के स्वीकार्य का पथ है। भगवत अनुग्रह प्राप्त अथवा जीवन मुक्त महत् जनों के संग से ही परमात्मा की अनुभूति का दिव्य मार्ग प्रकाशित होता है।
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आत्मानुभूति हृदय स्थित परमात्मा की पूर्ण शरणागति की अवस्था में प्रवेश और अनुग्रह से ही संभव है। आत्म बोध को उपलब्ध हो चुके महापुरुष श्री भगवान की आज्ञा से जीव को कल्याण के निमित्त निरंतर शुभ कर्मों में प्रवृत्त कर उनके आत्म कल्याण का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
@AvdheshanandG
निमेषार्द्धं न तिष्ठन्ति वृत्तिं ब्रह्ममयीं विना।
यथा तिष्ठन्ति ब्रह्माद्याः सनकाद्याः शुकादयः।।१३४।।
("अपरोक्षानुभूति")
अद्वैत-वेदान्त के परमाचार्य भगवत्पाद भाष्यकार भगवान् श्रीआदि शंकराचार्य इस श्लोक में ब्रह्मनिष्ठा की चरम अवस्था का दिव्य चित्र प्रस्तुत करते हैं। यहाँ वे उन सिद्ध महापुरुषों की स्थिति का वर्णन करते हैं, जिनके लिए ब्रह्म-वृत्ति कोई साधन मात्र नहीं रह जाती, अपितु उनका स्वाभाविक, अखण्ड और नित्य अनुभव बन जाती है।
“निमेषार्द्धं न तिष्ठन्ति वृत्तिं ब्रह्ममयीं विना” अर्थात् वे महात्मा एक निमेष के आधे क्षण के लिए भी ब्रह्ममयी वृत्ति से रहित नहीं होते। यह कथन साधना की पराकाष्ठा का संकेत है। यहाँ ब्रह्म-वृत्ति क्षणिक चिन्तन या अभ्यासजन्य स्थिति नहीं, बल्कि अखण्ड आत्मनिष्ठा का रूप ले चुकी है। जैसे दीपक का प्रकाश स्वाभाविक रूप से प्रकाशित रहता है, वैसे ही इन महापुरुषों की चेतना निरन्तर ब्रह्मस्वरूप में ही स्थित रहती है।
यह स्थिति निदिध्यासन के परिपाक का फल है, जहाँ “अहं ब्रह्मास्मि” का बोध इतना दृढ़ हो जाता है कि अन्य कोई वृत्ति उसके स्थान पर उदित नहीं हो पाती। यहाँ मन का स्वरूप ही रूपान्तरित हो जाता है - वह अब विषयों की ओर प्रवृत्त होने वाला चञ्चल उपकरण नहीं, बल्कि ब्रह्मस्वरूप का ही प्रतिबिम्ब बन जाता है। यह वही अवस्था है, जिसे अद्वैत में अखण्डाकार-वृत्ति की पूर्णता कहा जाता है।
“यथा तिष्ठन्ति ब्रह्माद्याः” - भगवत्पाद आदि शंकराचार्य इस स्थिति की तुलना ब्रह्मा आदि देवताओं से करते हैं, जो सृष्टि के उच्चतम स्तर पर स्थित होकर भी ब्रह्मतत्त्व में ही प्रतिष्ठित हैं। यहाँ यह संकेत है कि ब्रह्मनिष्ठा केवल मानव साधकों तक सीमित नहीं, बल्कि दिव्य चेतना के उच्चतम स्तरों तक व्याप्त है।
“सनकाद्याः शुकादयः” - विशेषतः सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार- ये सनकादि ऋषि और श्रीशुकदेव जैसे महात्मा इस ब्रह्मनिष्ठा के मूर्त उदाहरण हैं। ये वे महापुरुष हैं, जिन्होंने बाल्यावस्था से ही संसार-वासनाओं का परित्याग कर, निरन्तर आत्मस्वरूप में स्थित होकर जीवन व्यतीत किया। उनके लिए ब्रह्म-वृत्ति कोई अभ्यास नहीं, बल्कि सहज अवस्था थी।
दार्शनिक दृष्टि से यह श्लोक जीवन्मुक्ति की परिपूर्ण अवस्था का निरूपण करता है। यहाँ साधक और साध्य का भेद लुप्त हो जाता है; ब्रह्म-वृत्ति और ब्रह्मस्वरूप में कोई भिन्नता नहीं रहती। यह वही स्थिति है, जहाँ वृत्ति भी अन्ततः लीन होकर केवल स्वरूपावस्थान रह जाती है।
उपनिषद् भी इसी अवस्था का वर्णन करती हैं- “ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति” ब्रह्म को जानने वाला स्वयं ब्रह्म ही हो जाता है। अतः उसकी चेतना में कोई अन्तराल नहीं, कोई विच्छेद नहीं; वह निरन्तर उसी सत्य में स्थित रहता है।
इस श्लोक का गूढ़ सन्देश यह है कि साधना का लक्ष्य केवल क्षणिक समाधि या अनुभव नहीं, बल्कि ऐसी स्थायी ब्रह्मनिष्ठा है, जहाँ साधक का सम्पूर्ण जीवन उसी सत्य में प्रतिष्ठित हो जाए। जब यह अवस्था प्राप्त होती है, तब साधक का प्रत्येक क्षण, प्रत्येक श्वास, प्रत्येक अनुभव सब ब्रह्मस्वरूप की ही अभिव्यक्ति बन जाते हैं।
अतः भगवत्पाद भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य यहाँ साधक को यह प्रेरणा देते हैं कि वह ब्रह्म-वृत्ति का इतना गहन अभ्यास करे कि वह क्षणिक प्रयास से उठकर, सहज और अखण्ड स्थिति बन जाए। यही अद्वैत वेदान्त की चरम साधना है- जहाँ ब्रह्म केवल जाना नहीं जाता, बल्कि निरन्तर जिया जाता है।
निष्कर्षतः जो महापुरुष एक क्षण के लिए भी ब्रह्म-वृत्ति से विचलित नहीं होते, वही वास्तविक सिद्ध, मुक्त और ब्रह्मनिष्ठ हैं। उनका जीवन ही वेदान्त का सजीव प्रमाण है - अखण्ड, अनवरत और दिव्य ब्रह्मानुभूति का।
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अधिक मास “पुरुषोत्तम मास”
17 मई से 15 जून, 2026 तक
श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य, श्रोत्रिय-ब्रह्मनिष्ठ, जूनापीठाधीश्वर, आचार्यमहामण्डलेश्वर, अनन्तश्रीविभूषित पूज्यपाद श्री स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज “पूज्य आचार्यश्री जी” के पावन सान्निध्य में अधिक मास “पुरुषोत्तम मास” के दिव्य एवं पुण्यमय अवसर पर श्री हरिहर आश्रम, कनखल, हरिद्वार में नित्य वैदिक अनुष्ठान, पूजा-अभिषेक, स्वाध्याय, श्रीविष्णु सहस्रनाम पारायण, श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण कथा, माँ गंगा पूजन, संकीर्तन, ध्यान-साधना एवं सत्संग का मंगलमय “आध्यात्मिक महोत्सव” श्रद्धा और भक्तिभावपूर्वक आयोजित किया जा रहा है।यह पावन मास भगवान श्रीहरि नारायण की उपासना, आत्मचिन्तन, साधना, सेवा और सत्संग के माध्यम से जीवन को अधिक पवित्र, संयमित और ईश्वराभिमुख बनाने का श्रेष्ठ अवसर है।
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-- "स्वामी अवधेशानन्द पॉलीक्लिनिक की प्रथम वर्षगाँठ" --
हरिद्वार के पुण्यभूमि कनखल स्थित श्री हरिहर आश्रम में मानव सेवा, करुणा, लोकमंगल एवं आध्यात्मिक जीवन मूल्यों को समर्पित एक और प्रेरणादायी अध्याय पूर्ण हुआ है। श्रीपंचदशनाम जूनाअखाड़ा की परम पावन आचार्यपीठ (गुरुगद्दी) में विराजमान श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामण्डलेश्वर अनन्तश्रीविभूषित पूज्यपाद स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज “पूज्य आचार्यश्री जी” के दिव्य संकल्प, करुणामय दृष्टि एवं प्रेरणास्पद मार्गदर्शन में “ऐंसीएन्ट हेरिटेज फाउंडेशन” के अंतर्गत संचालित “स्वामी अवधेशानन्द पॉलीक्लिनिक” ने मानवता की निस्वार्थ सेवा का अपना प्रथम गौरवपूर्ण वर्ष पूर्ण कर लिया है।
यह केवल एक चिकित्सालय की वर्षगाँठ नहीं, अपितु सेवा,संवेदना, समर्पण और आध्यात्मिक करुणा के उस दिव्य आदर्श का उत्सव है, जिसमें सनातन संस्कृति का शाश्वत वाक्य; “नर सेवा ही नारायण सेवा” प्रत्यक्ष रूप से साकार होता दिखाई देता है। भारतीय सन्त परम्परा सदैव से केवल आत्मोद्धार तक सीमित नहीं रही, बल्कि समाज के दुःखी, पीड़ित, असहाय और रोगग्रस्त जनों की सेवा को भी ईश्वराराधना का ही स्वरूप मानती आई है। “स्वामी अवधेशानन्द पॉलीक्लिनिक” इसी दिव्य दृष्टि का जीवन्त एवं प्रेरणादायी प्रतिरूप बनकर उभरा है।
“पूज्य आचार्यश्री जी” के पावन सान्निध्य एवं लोककल्याणकारी संकल्प से आरम्भ हुई यह पॉलीक्लिनिक अल्प समय में ही जनविश्वास, करुणा और सेवा का एक सशक्त केन्द्र बन चुकी है। यहाँ स्वास्थ्य सेवा केवल उपचार का माध्यम नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना, आत्मीयता और संस्कारित जीवनदृष्टि का विस्तार है। समाज के प्रत्येक वर्ग तक सुलभ, समर्पित एवं गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएँ पहुँचाने का जो उद्देश्य इस संस्थान के मूल में निहित है, वह निरंतर सार्थक रूप में फलीभूत हो रहा है।
इसी सेवा-भावना के अंतर्गत विश्वप्रसिद्ध Medanta The Medicity “मेदान्ता अस्पताल गुरुग्राम” के सौजन्य से प्रतिमाह नियमित रूप से दो दिवसीय “निःशुल्क स्वास्थ्य परीक्षण शिविर” आयोजित किए जाते हैं, जिनमें हरिद्वार एवं कनखल क्षेत्र के सन्त-महात्मा, साधक, श्रद्धालु एवं स्थानीय नागरिक बड़ी संख्या में लाभान्वित होते रहे हैं। इन स्वास्थ्य शिविरों में विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा हृदय रोग, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, नेत्र रोग तथा सामान्य स्वास्थ्य सम्बन्धी विविध समस्याओं की गहन जाँच कर रोगियों को उचित चिकित्सकीय परामर्श प्रदान किया जाता है। साथ ही आवश्यक निःशुल्क औषधियों का वितरण भी सेवा और सद्भाव की भावना से किया जाता है।
अत्याधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं से युक्त इस पॉलीक्लिनिक में आयोजित “निःशुल्क स्वास्थ्य परीक्षण शिविर” में ई.सी.जी. (ECG), पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट (P.F.T.), एक्स-रे, ब्लड शुगर, रक्तचाप, हीमोग्लोबिन सहित अनेक महत्वपूर्ण जाँचें नियमित रूप से सम्पन्न की जाती हैं। चिकित्सा की आधुनिक व्यवस्थाओं और भारतीय आध्यात्मिक जीवन मूल्यों का यह सुन्दर समन्वय इस संस्थान को विशिष्ट पहचान प्रदान करता है। यहाँ आने वाला प्रत्येक व्यक्ति केवल उपचार ही नहीं, बल्कि आत्मीयता, विश्वास और मानवीय सहानुभूति का भी अनुभव करता है।
इसके अतिरिक्त “स्वामी अवधेशानन्द पॉलीक्लिनिक” में निःशुल्क दन्त चिकित्सा सेवाएँ भी अत्यंत समर्पण एवं आधुनिक सुविधाओं के साथ प्रदान की जा रही हैं। यहाँ सामान्य दन्त परीक्षण से लेकर "रूट केनाल उपचार" (Root Canal Treatment) तथा दाँतों के इम्प्लांट जैसी उन्नत दन्त चिकित्सा प्रक्रियाएँ भी निःशुल्क अत्यंत सेवा-भाव से सम्पन्न की जाती हैं।
इस हेतु अत्यधिक प्रशिक्षित एवं अनुभवी दन्त चिकित्सकों की एक समर्पित टीम निरन्तर सेवाएँ प्रदान कर रही है, जो रोगियों को आधुनिक चिकित्सा तकनीकों के साथ आत्मीयता एवं संवेदनशील व्यवहार का अनुभव भी कराती है। यह सेवा विशेष रूप से उन लोगों के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो रही है, जो आर्थिक अभाव अथवा संसाधनों की कमी के कारण गुणवत्तापूर्ण दन्त चिकित्सा से वंचित रह जाते हैं।
विशेष रूप से उल्लेखनीय यह है कि “स्वामी अवधेशानन्द पॉलीक्लिनिक” की सेवाएँ केवल रोग-निवारण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह समाज में स्वास्थ्य-जागरूकता, सेवा-संस्कार और मानवीय मूल्यों के जागरण का भी एक प्रभावशाली माध्यम बनती जा रही हैं। आज जब आधुनिक जीवनशैली के कारण शारीरिक एवं मानसिक समस्याएँ निरंतर बढ़ रही हैं, ऐसे समय में यह संस्थान चिकित्सा और अध्यात्म के समन्वित दृष्टिकोण के माध्यम से समाज को नई दिशा प्रदान कर रहा है !
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हृदय स्थित परमात्मा की शरणागति सभी साधनों की सिद्धि का मूल मंत्र है। अनुग्रह को धारण कर आत्मा के गुणातीत अवस्था को अनुभूत कर चुके तत्त्वज्ञानी भगवत प्राप्त जन कर्मों में प्रवृत्त होकर भी अहम् भाव से मुक्त होने के कारण संशय रहित होकर कृत कृत रहते हैं।
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कुशला ब्रह्मनामकरणे वृत्तिहीनाः।
तेऽप्यज्ञानितमा नूनं पुनरायान्ति यान्ति च ।।१३३।।
("अपरोक्षानुभूति")
अद्वैत-वेदान्त के प्रखर भाष्यकार भगवत्पाद भगवान् श्रीआदि शंकराचार्य इस श्लोक में साधना के एक अत्यन्त सूक्ष्म, किन्तु गम्भीर भ्रान्ति का उद्घाटन करते हैं। यहाँ वे उन लोगों की ओर संकेत करते हैं, जो ब्रह्मतत्त्व के विषय में वाचाल, तर्ककुशल और नाम-रूप के स्तर पर प्रवीण तो होते हैं, किन्तु जिनमें ब्रह्म-वृत्ति का वास्तविक उदय नहीं हुआ है। इस प्रकार वे ज्ञान और ज्ञानाभास के मध्य के भेद को अत्यन्त स्पष्ट कर देते हैं।
“कुशला ब्रह्मनामकरणे” अर्थात् जो लोग ब्रह्म के नामों, परिभाषाओं, तत्त्वचर्चाओं और शास्त्रीय पदावली में अत्यन्त दक्ष हैं। वे वेदान्त के गूढ़ सिद्धान्तों का सुन्दर निरूपण कर सकते हैं, भाषण दे सकते हैं, शास्त्रों का उद्धरण कर सकते हैं; किन्तु यह कुशलता केवल वाणी और बुद्धि तक सीमित है। यह शब्दज्ञान है, न कि स्वानुभव।
“वृत्तिहीनाः” ऐसे साधक ब्रह्म-वृत्ति से हीन हैं। अर्थात् उनके अन्तःकरण में वह अखण्डाकार वृत्ति उत्पन्न नहीं हुई है, जो “अहं ब्रह्मास्मि” इस सत्य को जीवित अनुभव के रूप में प्रकट करती है। उन्होंने ज्ञान को केवल बौद्धिक स्तर पर ग्रहण किया है, उसे आत्मनिष्ठ अनुभूति में रूपान्तरित नहीं किया। इसीलिए उनका ज्ञान परिवर्तनकारी नहीं बन पाता; वह उनके जीवन, व्यवहार और अन्तःकरण को रूपान्तरित नहीं करता।
दार्शनिक दृष्टि से यह स्थिति श्रवण और मनन के स्तर पर ही रुक जाने का द्योतक है। जब तक निदिध्यासन द्वारा उस ज्ञान को अन्तःकरण में दृढ़ नहीं किया जाता, तब तक वह अविद्या-नाशक नहीं बनता। जैसे केवल औषधि का नाम जान लेने से रोग दूर नहीं होता, वैसे ही केवल ब्रह्म का नाम और स्वरूप जान लेने से मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती।
“तेऽपि अज्ञानितमाः नूनम्” - भगवद्पादाचार्य यहाँ अत्यन्त स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि ऐसे लोग, यद्यपि बाह्य रूप से विद्वान् प्रतीत होते हैं, वस्तुतः अज्ञानियों में भी अत्यन्त अज्ञानी हैं। यह कथन कठोर प्रतीत हो सकता है, किन्तु इसका उद्देश्य साधक को जागरूक करना है; क्योंकि यहाँ अज्ञान केवल जानकारी का अभाव नहीं, बल्कि आत्मस्वरूप के प्रति अपरिचय है।
“पुनरायान्ति यान्ति च” अर्थात् ऐसे साधक पुनः-पुनः जन्म-मरण के चक्र में आते-जाते रहते हैं। कारण यह है कि उनके भीतर देहाभिमान, कर्तृत्व-भोक्तृत्व और वासनाएँ अभी भी विद्यमान हैं। जब तक ये संस्कार नष्ट नहीं होते, तब तक संसरचक्र से मुक्ति सम्भव नहीं है। शास्त्रज्ञान, यदि वह अनुभूति में परिणत न हो, तो इस बन्धन को नहीं काट सकता।
उपनिषद् भी इसी सत्य को प्रतिपादित करती हैं “नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यः, न मेधया, न बहुना श्रुतेन” यह आत्मा न प्रवचन से, न बुद्धि से, न अधिक श्रवण से प्राप्त होती है। वह उसी को प्राप्त होती है, जो उसे अपने सम्पूर्ण अस्तित्व से अपनाता है। अतः केवल वाणी की कुशलता या तर्क की तीक्ष्णता आत्मज्ञान का प्रमाण नहीं है।
इस श्लोक का गूढ़ सन्देश यह है कि अद्वैत वेदान्त केवल बौद्धिक दर्शन नहीं, बल्कि अस्तित्वगत अनुभूति है। जब तक ब्रह्म-वृत्ति का उदय होकर वह साधक के अन्तःकरण को रूपान्तरित नहीं करती, तब तक ज्ञान अधूरा है। और जब यह वृत्ति उदित होकर स्थिर हो जाती है, तब साधक स्वतः ही ब्रह्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है।
अतः भगवद्पादाचार्य भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य यहाँ साधक को सावधान करते हैं कि वह केवल शब्दों में न उलझे, केवल तर्क और चर्चा में संतुष्ट न हो, बल्कि उस ज्ञान को जीवन में उतारे- उसे जीए, उसे अनुभव करे, और उसी में स्थित हो जाए। यही वेदान्त का वास्तविक उद्देश्य है।
निष्कर्षतः, जो केवल ब्रह्म के नामों और तत्त्वों का उच्चारण करते हैं, किन्तु ब्रह्म-वृत्ति से हीन हैं, वे अभी भी अज्ञान के अधीन हैं और संसार-चक्र में बँधे रहते हैं। केवल वही साधक मुक्त होता है, जो ज्ञान को अनुभव में रूपान्तरित कर, ब्रह्मस्वरूप में अचल स्थित हो जाता है। यही इस श्लोक का सार और अद्वैत वेदान्त का परम उपदेश है।
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-- "अधिक मास (पुरुषोत्तम मास)" --
(17 मई से 15 जून, 2026 तक)
“पुरुषोत्तम मास” भगवान श्रीहरि विष्णु की उपासना, जप, तप, दान, कथा-श्रवण, शास्त्र-पारायण और आत्मशुद्धि का अत्यंत पुण्यदायी मास माना गया है। यह मास साधना, संयम और भगवद्-स्मरण के माध्यम से जीवन में आध्यात्मिक ऊर्जा, शान्ति और मंगल का संचार करता है।
इस पावन अवसर पर श्री हरिहर आश्रम, कनखल, हरिद्वार में श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामण्डलेश्वर अनन्तश्रीविभूषित पूज्यपाद श्री स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज के पावन सान्निध्य में विविध आध्यात्मिक अनुष्ठान आयोजित किये जा रहे हैं।
"अधिक मास (पुरुषोत्तम मास)" के इस साधना काल में श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण कथा, श्री विष्णु सहस्रनाम पारायण, भगवान श्री मृत्युञ्जय महादेव का महारुद्राभिषेक एवं अन्य वैदिक-धार्मिक अनुष्ठान श्रद्धापूर्वक सम्पन्न होंगे।
निवेदक :
“हरिहर आश्रम प्रबन्ध समिति”
श्री हरिहर आश्रम, कनखल,
हरिद्वार (उत्तराखण्ड)
सम्पर्क -
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आत्मा अथवा परमात्मा गुणातीत हैं। जीव तीन गुणों के आधीन कर्म में प्रवृत्त होता है। परमात्मा के असीम कृपा से अनुग्रह की प्राप्ति होती है। उस अनुग्रह को स्वीकार कर धारण कर साधन यात्रा परमात्मा की ओर अग्रसर होती है। गुणातीत अवस्था में प्रवेश होता है।
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येषां वृत्तिः समावृद्धा, अन्या च सा पुनरारम्भः।
ते वै सद्ब्रह्मतां प्राप्ता, नेतरे शब्दवादिनः ।।१३२।।
("अपरोक्षानुभूति")
अद्वैत-वेदान्त की साधना में यह श्लोक अत्यन्त सूक्ष्म और निर्णायक सत्य का उद्घाटन करता है। यहाँ भगवद्पादाचार्य भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य उस अवस्था का निरूपण करते हैं, जहाँ ब्रह्म-वृत्ति केवल क्षणिक चिन्तन न रहकर, साधक के अन्तःकरण में परिपक्व, सुदृढ़ और अखण्ड रूप से प्रतिष्ठित हो जाती है।
“येषां वृत्तिः समावृद्धा” - जिन साधकों में यह ब्रह्म-वृत्ति सम्यक् रूप से विकसित और परिपुष्ट हो गई है, अर्थात् जिनका अन्तःकरण निरन्तर “अहं ब्रह्मास्मि” इस अखण्ड बोध में स्थित रहता है, उनकी वृत्ति अब साधारण मानसिक प्रक्रिया नहीं रह जाती। वह अखण्डाकार-वृत्ति के रूप में अविद्या का पूर्ण निवारण कर, आत्मस्वरूप के प्रकाश को स्थायी बना देती है। यहाँ “समावृद्धा” का अर्थ है न केवल उत्पन्न होना, बल्कि परिपक्व होकर सहज स्वभाव बन जाना।
“अन्या च सा पुनरारम्भः” - ऐसे साधकों के लिए अन्य वृत्तियों का पुनरारम्भ नहीं होता। अर्थात् संसार-विषयक संकल्प-विकल्प, देहाभिमान, राग-द्वेष, कर्तृत्व-भोक्तृत्व की वृत्तियाँ अब पुनः उदित नहीं होतीं। यदि बाह्य रूप से वे प्रकट भी हों, तो वे केवल व्यवहारिक स्तर तक सीमित रहती हैं; वे साधक के आत्मबोध को स्पर्श नहीं कर पातीं। यह वही अवस्था है जहाँ वासनाक्षय और मनोनाश का चरम परिणाम प्रकट होता है।
दार्शनिक दृष्टि से यह स्थिति निदिध्यासन के परिपाक का फल है। श्रवण और मनन से उत्पन्न ज्ञान, जब बारम्बार चिन्तन और आत्मनिष्ठा से दृढ़ होता है, तब वह वृत्ति स्थायी होकर अन्य सभी वृत्तियों का लय कर देती है। यह स्थिति जीवन्मुक्ति का सूचक है - जहाँ साधक संसार में रहते हुए भी उससे असंग रहता है।
“ते वै सद्ब्रह्मतां प्राप्ताः” - ऐसे साधक ही वास्तव में “सद्ब्रह्मतां” प्राप्त होते हैं अर्थात् वे ब्रह्मस्वरूप में ही स्थित हो जाते हैं। यहाँ “प्राप्ति” का अर्थ किसी नये तत्त्व की प्राप्ति नहीं, बल्कि अपने नित्य स्वरूप का आविर्भाव है। वे जानते हैं कि वे कभी बन्धन में थे ही नहीं; केवल अज्ञान के कारण ऐसा प्रतीत होता था। अब वह भ्रान्ति निवृत्त हो चुकी है।
“नेतरे शब्दवादिनः” - इसके विपरीत, जो केवल शास्त्रों के शब्दों में ही उलझे रहते हैं, जो केवल तर्क-वितर्क और वाक्चातुर्य में ही तुष्ट होते हैं, वे इस सत्य को प्राप्त नहीं कर सकते। “शब्दवादिनः” वे हैं जो ज्ञान को केवल बौद्धिक स्तर तक सीमित रखते हैं, परन्तु उसे आत्मानुभूति में रूपान्तरित नहीं करते। उनके लिए वेदान्त केवल विचार है, अनुभव नहीं।
उपनिषद् भी इसी सत्य को प्रतिपादित करती हैं - “नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यः, न मेधया, न बहुना श्रुतेन” यह आत्मा न प्रवचन से, न केवल बुद्धि से, न अधिक श्रवण से प्राप्त होती है; वह उसी को प्राप्त होती है, जो उसे अपनी सम्पूर्ण सत्ता से अपनाता है। अतः शास्त्र का उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं, बल्कि साधक को उस ज्ञान में स्थित करना है।
इस श्लोक का गूढ़ सन्देश यह है कि आत्मज्ञान केवल बौद्धिक उपलब्धि नहीं, बल्कि अस्तित्वगत परिवर्तन है। जब तक ब्रह्म-वृत्ति परिपक्व होकर अन्य सभी वृत्तियों का अतिक्रमण नहीं कर लेती, तब तक ज्ञान अधूरा है। और जब यह परिपक्वता प्राप्त हो जाती है, तब साधक स्वतः ही ब्रह्मस्वरूप में स्थित हो जाता है - निरन्तर, सहज और अखण्ड रूप से।
निष्कर्षत: भगवद्पादाचार्य यहाँ यह स्पष्ट करते हैं कि सच्चा वेदान्त वही है, जो जीवन में उतरे, जो वृत्ति को रूपान्तरित करे, और जो साधक को ब्रह्मस्वरूप में प्रतिष्ठित कर दे। केवल शब्दों का ज्ञान पर्याप्त नहीं; अनुभव की परिपक्वता ही वास्तविक सिद्धि है। यही अद्वैत वेदान्त की चरम साधना और परम फल है।
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