Sandeep_Sharma retweetledi

कभी - कभी,
सोच में पड़ जाता है।
हर कोई व्यस्त जान पड़ता है,
हर कोई अपनी अपनी
जिंदगी की व्यस्तता अलापता हैं।
लोग दुनिया में व्यस्त है?
दुनिया लोगो को व्यस्त करे हैं?
हर छोटी बात पर
निकलती खिलखिलाहट
क्या सच्ची हैं?
चेहरे पर वो चुलबुलाहट सच्ची है?
जो लोगों से बतियाने के लिए
उत्सुक हैं?
हंसते हुए चेहरे
सच में खुश हैं?
हंसते चेहरे अपनी
जिंदगी से संतुष्ट है?
या फ़िर,
मैं ही अपने जीवन
से असंतुष्ट हूं?
क्या लोगों की दौड़ आंतरिक है?
इनका कामना के प्रति
आकर्षण,
उत्तेजना,
खिंचाव,
बाहरी नहीं हैं?
शायद अपनी
मुस्कुराहट में
अपने मरणासन्न जीवन
को लिए हुए हैं।
जहां उत्तेजना है,
आकर्षण हैं,
कामना है,
वहां दुख होगा ही
बुद्ध कह गए है।
लेकिन ये लोग
अपना अधूरा चेहरा ही
दिखाते है,
उस चेहरे को नहीं
दिखाते है,
जो दुख में सूखा हुआ है,
जिसमें पिटने के निशान पड़े है,
जो सूजकर लाल हो जाता है।
शायद मेरा चेहरा भी
सूजा हुआ है।
हां, मेरा चेहरा भी
सूजा हुआ है।
लेकिन मैं दूसरों
का चेहरा क्यों देख रहा हूं ?
क्या मेरा अपना चेहरा काफ़ी
नहीं है ?
@Advait_Prashant @Prashant_Advait
#AcharyaPrashant #Poems
Posted by Pawan Kumar Sahu on Acharya Prashant's Gita Mission App.
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