Antarman | The Conscious Mind

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@Antarman_vss

धर्म का जिज्ञासु, अध्यात्म का विद्यार्थी , दर्शन का प्रेमी। अंधश्रद्धा और अंधविश्वास का विरोधी, देश दुनिया की हलचल पर निष्पक्ष राय, ध्येय अर्थ से परमार्थ।✨

India Katılım Ağustos 2022
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Antarman | The Conscious Mind
ऐसी भजन संध्या को क्या कहेंगे आप ?
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पिछले चार-पांच दिनों में जिस स्पीड से इन्होंने गाड़ियां छोड़ी है, विदेश यात्रा छोड़ रहे हैं, सादा जीवन पकड़ रहे हैं, एक साल में ये लोग कहीं गांधीजी ना बन बैठें ।
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ट्विटर पर ना कोई राजस्थानी भाषा के पक्ष में है ना विरोध में, इन्हें तो पता भी नहीं था कि मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला ट्विटर पर ट्रेंड करने लगा और रीच के लालच में लोग दनादन शुरू हो गये। मुद्दों की गहराई की बजाय ट्रेंड्स और एंगेजमेंट बड़ी बात है।
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@MEENAOFINDIA @RajCMO @BhajanlalBjp @DrKirodilalBJP राजस्थानी के विरोध से पहले उन राज्यों का अध्ययन कर लेते जहां की भाषा को मान्यता मिली हुई है। एक मानक भाषा होती है और उसके अंतर्गत कई बोलियां। गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब, कर्नाटक, आंध्र, यूपी, बिहार,बंगाल । जरा गूगल करो और देखो यहां कितनी बोलियां हैं,और भाषा किसे कहते हैं।
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ये कौन नालायक बच्चे हैं जो हर बार हां हां ही किये जा रहे हैं 🤫
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@TheTribhuvan अगर पिछली कांग्रेस सरकार के दौरान समझ-बूझ से काम लिया जाता तो ना ही बाड़ाबंदी जैसी शर्मनाक घटना होती, ना मौकापरस्त लोगों की ताकत बढ़ती और ना फिर उनके द्वारा खुल्लेआम अपने भाई भतीजावाद के कारनामे होते जिनके कारण चुनावों में हार हुई।
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Tribhuvan_Official
Tribhuvan_Official@TheTribhuvan·
केरल में वीडी सतीशन का चयन केवल एक नेता प्रतिपक्ष को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला भर नहीं है; यह कांग्रेस की आंतरिक राजनीति में एक बड़ा संकेत है। सतीशन नेता प्रतिपक्ष थे, यह तथ्य महत्वपूर्ण है; लेकिन उससे भी बड़ा तथ्य यह है कि केरल की जनता में उनकी स्वीकार्यता थी। कांग्रेस हाईकमान के सामने केसी वेणुगोपाल जैसे अत्यंत प्रभावशाली केंद्रीय नेता और रमेश चेन्निथला जैसे अनुभवी दावेदार भी थे, फिर भी अंततः सतीशन को चुना गया। सतीशन को “people’s choice” माना गया और यूडीएफ सहयोगियों का भी उन्हें समर्थन था। यही वह बिंदु है, जहाँ राजस्थान में सचिन पायलट का पक्ष बहुत मज़बूत होकर उभरता है। कांग्रेस यदि केरल में यह मानती है कि मुख्यमंत्री चयन में केवल हाईकमान की निकटता, दिल्ली की ताकत, संगठनात्मक पद या वरिष्ठता ही अंतिम पैमाना नहीं हो सकते, जनता में लोकप्रियता भी निर्णायक तत्व है तो वही कसौटी राजस्थान में भी लागू होनी चाहिए। राजनीति में सबसे बड़ी पूंजी अब बंद कमरों की सहमति नहीं, जनता की स्वीकृति है। जो नेता जनता के बीच ऊर्जा पैदा करता है, जो युवाओं को जोड़ता है, जो कार्यकर्ताओं में उम्मीद जगाता है और जिसकी अपील सत्ता-विरोधी माहौल में भी पार्टी को नया चेहरा दे सकती है। उसे केवल “दावेदार” नहीं, “राजनीतिक संसाधन” मानना चाहिए। सचिन पायलट का मामला इसी अर्थ में अलग और मज़बूत है। वे केवल एक पूर्व उपमुख्यमंत्री या पूर्व प्रदेशाध्यक्ष नहीं हैं। वे राजस्थान कांग्रेस के भीतर उस पीढ़ीगत बदलाव का प्रतीक हैं, जिसकी मांग लंबे समय से ज़मीन पर सुनाई देती रही है। पायलट के पास संगठन चलाने का अनुभव है, चुनावी संघर्ष का अनुभव है और जनता के बीच एक स्वतंत्र पहचान भी है। वे जातीय समीकरणों तक सीमित नहीं हैं; उनकी छवि युवा, संयत, आधुनिक और आक्रामक विपक्षी नेता की रही है। राजस्थान जैसे राज्य में, जहाँ चुनाव अक्सर चेहरे, ऊर्जा और सत्ता-विरोधी भावनाओं के मिश्रण से बनते-बिगड़ते हैं, पायलट की लोकप्रियता कांग्रेस के लिए एक बड़ी पूंजी है। केरल का संदेश यही है कि कांग्रेस अब यह समझ रही है कि जनता की पसंद को दरकिनार कर केवल आंतरिक शक्ति-संतुलन से सरकारें नहीं चलाई जा सकतीं। सतीशन का चयन यह बताता है कि यदि कोई नेता जनता में स्वीकार्य है, सहयोगी दलों को भरोसा देता है और पार्टी को भविष्य का चेहरा दे सकता है, तो हाईकमान को अपनी पहली पसंद पर भी पुनर्विचार करना पड़ सकता है। यह लोकतांत्रिक राजनीति का स्वस्थ संकेत है। बशर्ते राजस्थान में काँग्रेस अपने आपको सत्ता में आने लायक बना लेती है। अभी उसकी स्थिति वैसी मज़बूत नहीं है, जैसी आम तौर पर रहती आई है। पार्टी कई खेमों में बंटी हुई है और यह गुटीव टूटन बहुत नीचे तक चली गई है। राजस्थान में भी कांग्रेस के सामने यही प्रश्न है। क्या पार्टी उस नेता को आगे करेगी जिसकी लोकप्रियता सड़कों, युवाओं, ग्रामीण इलाकों और कार्यकर्ताओं के बीच स्पष्ट दिखती है, या फिर वही पुराना संतुलन साधने वाली राजनीति जारी रखेगी? पायलट का पक्ष इसलिए मज़बूत है कि वे केवल पद नहीं मांगते दिखते, एक व्यापक राजनीतिक संभावना का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनके समर्थक उन्हें सत्ता की आकांक्षा से अधिक कांग्रेस के पुनरुत्थान के चेहरे के रूप में देखते हैं। कांग्रेस के लिए राजस्थान में सबसे बड़ी चुनौती केवल भाजपा से मुकाबला नहीं है; चुनौती यह भी है कि वह अपने कार्यकर्ताओं को यह विश्वास दिलाए कि मेहनत, लोकप्रियता और जनाधार का सम्मान होता है। यदि केरल में जनता की पसंद हाईकमान की पसंद पर भारी पड़ सकती है तो राजस्थान में भी जनता और कार्यकर्ताओं की भावना को अनसुना करना कठिन होगा। सचिन पायलट का दावा इसी नैतिक और राजनीतिक आधार पर मजबूत है। राजनीति में अंततः वही चेहरा टिकता है जो जनता की आँखों में भरोसा बन सके। केरल ने कांग्रेस को रास्ता दिखाया है। अब सवाल यह है कि क्या राजस्थान में भी कांग्रेस उसी कसौटी को अपनाने का साहस दिखाएगी। @SachinPilot
Mahipal Jakhar@MD_x001

@TheTribhuvan बाकि को गोली मारो आप तो यह बताओ हमारे पायलेट जी का क्या होगा

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Virendra Shekhawat
Virendra Shekhawat@Follow_Virendra·
फोटो में दिखाई दे रहे तीन मशहूर अभिनेता अजय देवगन, शाहरुख खान और जैकी श्रॉफ को लोग दोष देते हैं कि वे विमल गुटखे का विज्ञापन करते हैं। अगर आप भी यही सोचते हैं तो आप ग़लत हैं, विज्ञापन में दिखाई देने वाले पाऊच पर विमल इलायची लिखा है। लोग पता नहीं कैसे इसे गुटखा समझ लेते हैं। इलायची के दानों में केसर मिला है, इसे आप त्यौहार पर घर में बनने वाली मिठाई में डालकर अपनी खुशियां डबल कर सकते हैं। दरअसल ये लोग कानून का मजाक उड़ा रहे हैं। टीवी और सोशल मीडिया पर शाहरुख खान और अजय देवगन जिस "विमल इलायची" का प्रचार करते हैं, वह असल में सरोगेट विज्ञापन (Surrogate Advertising) का एक हिस्सा है, कानूनी नियमों के तहत भारत में तंबाकू, गुटका और पैन मसाला के सीधे विज्ञापन पर प्रतिबंध है। इसलिए, कंपनियां अपने मुख्य तंबाकू ब्रैंड का नाम लोगों के दिमाग में बनाए रखने के लिए उसी नाम से 'माउथ फ्रेशनर' या 'इलायची' का विज्ञापन बनाती हैं । यही पैटर्न शराब बनाने वाली कंपनियां अपनाती हैं वे अपने विज्ञापन में प्रोडक्ट के रूप में सोडा दिखाती हैं।
Virendra Shekhawat tweet media
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Antarman | The Conscious Mind
@avadheshjpr पेपर लीक के मामले एकदम बेनामी संपत्ति वाले मामलों के जैसे है, असली मालिक का पता ही नहीं चलता, नौकर रगड़े जाते हैं। असली गुनहगार बाहर से जांच को प्रभावित करते हैं, नतीजा वही जो आज तक होता आया है।
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Avadhesh Akodia
Avadhesh Akodia@avadheshjpr·
क्या नीट-2025 भी क्लीन नहीं? जमवारामगढ़, जयपुर के विकास बिवाल ने पिछले साल भी गुरुग्राम के यश यादव से 25 लाख रुपए में खरीदा था नीट का पेपर। इसी से बिवाल परिवार के 5 भाई-बहनों का चयन हुआ, सभी को सरकारी मेडिकल कॉलेज में एडमिशन मिला। #BhaskarInvestigation #MyReport
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Swami Ramsukhdasji
Swami Ramsukhdasji@Ramsukhdasji·
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Arvind Chotia
Arvind Chotia@arvindchotia·
प्रिय सुमन बहन मैं देख रहा हूं कि आप राजस्थानी भाषा के मुद्दे पर दिनभर से गदर मचाए हुए हैं। मैं इसमें पड़ा नहीं। क्योंकि मुझे पता है कि आप लोगों को समझा पाना किसी के बूते की बात नहीं है। फिर भी मैं कुछ कहना चाहता हूं। राजस्थानी भाषा एक सच्चाई है। आप इसे स्वीकार करें या नहीं करें, इससे कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ने वाला है। राजस्थानी का समृद्ध साहित्य और विस्तृत शब्दकोश है। अच्छा खासा कहावत कोश भी है। विश्वविद्यालयों में इसकी पढ़ाई होती है। डिग्रियां मिलती हैं। सुप्रीम कोर्ट का नया आदेश कहता है कि इसे स्कूलों में भी पढ़ाया जाना चाहिए। राजस्थानके स्कूलों में इससे पहले हिंदी, संस्कृत, पंजाबी, सिंधी वगैरह भी पढ़ाई जा रही हैं। राजस्थानी भाषा भी पढ़ाई जाएगी और हमारे आने वाली पीढ़ी के बच्चे इसे पढ़ेंगे भी। अपने अन्य किसी भी भाषा का विरोध नहीं किया। पता नहीं क्यों? अब बात करते हैं मेरे ट्वीट की। मैं अधिकांश ट्वीट हिंदी में लिखता हूं। मेरे ट्वीट्स का दायरा राजस्थान के बाहर भी है। राजस्थानी मेरी भाषा है। मेरी भाषा की एक समृद्ध संस्कृति है। अति समृद्धि संगीत भी है। अगर भाषा को स्कूली शिक्षा में पढ़ाया जाता है तो यह सब आने वाली पीढ़ियों को भी ट्रांसफर होता जाएगा। अन्यथा यह भाषा धीरे-धीरे मर जाएगी। मैं कोई भाषाविद् या भाषा विज्ञानी नहीं हूं। बस अपनी भाषा से प्रेम करता हूं। राजस्थानी मेरी मातृभाषा है, मेरी मां से मैं इसी भाषा में बात करता हूं। इसलिए मैं राजस्थानी भाषा का समर्थन करता हूं।
Suman Dudi@SumanDudi6

लेकिन आपके तो सारे ट्वीट हिंदी मे है 🤔🤔

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Tribhuvan_Official
Tribhuvan_Official@TheTribhuvan·
फाँसी के तख़्ते पर खड़ा वह मौन मस्तिष्क: सुखदेव का बलिदान इतिहास कई बार अपने सबसे बड़े पुत्रों के साथ सबसे बड़ी नाइंसाफी यही करता है कि वह उन्हें उनके मित्रों की चमक में रखकर देखता है। भगत सिंह भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम के आकाश में वह दीप्तिमान नक्षत्र हैं, जिनकी रोशनी ने पूरी सदी को आलोकित किया; लेकिन उसी रोशनी के भीतर एक और अग्नि थी। कम बोलने वाली, भीतर से जलती हुई, कठोर अनुशासन और असीम करुणा से बनी हुई। नाम था सुखदेव थापर। अगर भगत सिंह क्रांति की आवाज़ थे तो सुखदेव उसका संगठन थे; भगत सिंह उसका घोष थे तो सुखदेव उसका मौन व्याकरण; अगर भगत सिंह जनता के सामने उठी हुई मुट्ठी थे तो सुखदेव वह अदृश्य हाथ थे, जो उस मुट्ठी की नसों में रक्त दौड़ाते थे। सुखदेव का जन्म 15 मई 1907 को लायलपुर के मोहल्ला आर्य समाज में आर्यसमाजी परिवार के रल्ली देवी और रामलाल थापर के घर हुआ। सरदार भगतसिंह ने भी अपनी जेल डायरी में लिखा है कि उनके दादा आर्यसमाज से प्रभावित थे। राजगुरु भी ऐसे ही परिवार से थे। लेकिन यह कोई साधारण जन्म नहीं था; यह उस पीढ़ी का जन्म था जिसे गुलाम भारत ने अपनी कोख से इसलिए निकाला था कि वह उसके माथे पर पड़ी पराधीनता की राख को झाड़ सके। सुखदेव ने जीवन को लंबाई में नहीं, तीव्रता में जिया। मात्र चौबीस वर्ष की आयु में वे फाँसी पर चढ़े, पर इस छोटे-से जीवन में उन्होंने जितनी ऐतिहासिक गरिमा, नैतिक स्पष्टता और संगठनात्मक क्षमता दिखाई, वह कई लंबे जीवनों से बड़ी है। लेकिन ये आर्यसमाज के प्रभाव से आगे बढ़े और कम्युनिस्ट हो गए। लाहौर षड्यंत्र केस का शीर्षक ही बहुत कुछ कह देता है, “क्राउन बनाम सुखदेव और अन्य।” यह कोई छोटी बात नहीं कि अंगरेजी साम्राज्य की अदालत ने इस मुकदमे में सुखदेव को प्रधान अभियुक्त माना। एफआईआर में उनका नाम पहले नंबर पर था। भगत सिंह बारहवें और राजगुरु बीसवें नंबर पर थे। इससे यह स्पष्ट होता है कि ब्रिटिश सत्ता के लिए सुखदेव केवल एक क्रांतिकारी युवक नहीं थे, वह मस्तिष्क थे जो पूरी क्रांतिकारी गतिविधि को दिशा दे रहा था। निर्णय में भी कहा गया कि सुखदेव इस षड्यंत्र का “ब्रेन” थे और भगत सिंह उसका “राइट आर्म।” यह वाक्य सुखदेव की भूमिका को समझने की सबसे बड़ी कुंजी है। सुखदेव ने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी को ईंट-ईंट जोड़कर खड़ा किया। वे केवल नारे लगाने वाले युवक नहीं थे। वे जानते थे कि क्रांति रोमांच नहीं, संगठन है; क्रांति भावुकता नहीं, अनुशासन है; क्रांति केवल गोली और बम का शोर नहीं, बल्कि उस शोर के पीछे छिपा हुआ राजनीतिक अर्थ है। वे साथियों की क्षमता पहचानते थे, उन्हें काम देते थे, उनके रहने, खाने, पहनने, छिपने और लड़ने तक की चिंता करते थे। वे अपने रूप-रंग के प्रति उदासीन थे, पर साथियों को ठीक से सजाने-सँवारने में उन्हें आनंद आता था। यह एक अजीब मनुष्य था। अपने लिए कठोर, दूसरों के लिए कोमल; अपने लिए तपस्वी, साथियों के लिए लगभग मातृवत। सुखदेव के व्यक्तित्व की सबसे मार्मिक घटना वह है जब केंद्रीय विधान सभा में बम फेंकने के लिए पहले भगत सिंह को भेजने से इनकार कर दिया गया था। पार्टी को भय था कि पंजाब पुलिस पहले से ही सांडर्स हत्या-प्रकरण में भगत सिंह के पीछे थी; उनका पकड़ा जाना मृत्यु को आमंत्रण देना था। पर सुखदेव अनुपस्थित थे। लौटकर जब उन्हें यह निर्णय मालूम हुआ तो उन्होंने उसका कठोर विरोध किया। उनका तर्क था कि एचएसआरए का लक्ष्य, उसका दर्शन, उसका संदेश, यह सब जनता तक सबसे सशक्त ढंग से भगत सिंह ही पहुँचा सकते हैं। उन्होंने भगत सिंह को कठोर शब्द कहे, उन्हें कायर तक कहा। बाहर से यह निर्ममता लगती है, पर भीतर से यह क्रांति के प्रति निष्ठा की चरम परीक्षा थी।और फिर वही सुखदेव, जिन्होंने अपने सबसे प्रिय मित्र को मृत्यु के मुँह में धकेला, उसी रात भीतर से टूट गए। दुर्गा भाभी के कथनानुसार जब वे लाहौर पहुँचे तो उनकी आँखें सूजी हुई थीं। वे रात भर रोए थे। यही सुखदेव का असली चरित्र है फूल से भी कोमल और पत्थर से भी कठोर। वे निजी प्रेम को राष्ट्रहित के सामने रोक सकते थे, लेकिन उस रोक की पीड़ा भीतर ऐसे सहते थे जैसे कोई अपनी ही छाती में धँसा हुआ काँटा छिपाकर मुस्करा रहा हो।उनके भीतर की कठोरता कोई प्रदर्शन नहीं थी। कहा जाता है कि उन्होंने अपने हाथ पर गुदे “ॐ” के निशान को हटाने के लिए नाइट्रिक एसिड डाल दिया था और जब निशान पूरी तरह नहीं मिटा तो घाव को मोमबत्ती की लौ पर रखा। इसे केवल शारीरिक साहस कह देना कम होगा। यह उस मनुष्य की परीक्षा थी जो अपने शरीर को भी विचार के सामने गौण मानता था। यह अपने आपको किसी एक धर्म की सीमा में बांध कर रखने के बजाय संपूर्ण मानवता से जुड़ने की पुकार थी। सुखदेव के लिए देह अंतिम सत्य नहीं थी; अंतिम सत्य था स्वतंत्र भारत, समाजवादी गणराज्य, और वह जनता जिसकी पीड़ा क्रांति को जन्म देती है। सुखदेव की क्रांतिकारिता अंधी हिंसा नहीं थी। उन्होंने अपने अंतिम पत्रों में साफ़ कहा कि क्रांतिकारी उद्देश्य विध्वंस में आनंद लेना नहीं है। उनका लक्ष्य समाजवादी गणराज्य की स्थापना था। वे जानते थे कि अंग्रेजी सत्ता क्रांतिकारियों को अविवेकी, रक्तपिपासु और विनाशकारी सिद्ध करना चाहती है। इसलिए गांधीजी को लिखे पत्र में उन्होंने स्पष्ट किया कि क्रांतिकारी अपने दायित्वों को समझते हैं, वे रचनात्मक तत्वों को ऊँचा स्थान देते हैं, पर परिस्थितियाँ उन्हें संघर्ष के कठोर पक्ष की ओर धकेलती हैं। यह भाषा किसी उन्मादी युवक की नहीं, एक राजनीतिक चिंतक की भाषा है।सांडर्स वध के बारे में उनकी व्याख्या भी इसी राजनीतिक परिपक्वता को दिखाती है। लाला लाजपत राय पर लाठियाँ बरसीं, देश में आक्रोश था। सुखदेव और साथियों ने उसे केवल प्रतिशोध का क्षण नहीं माना, जनता का ध्यान क्रांतिकारी विचारधारा की ओर खींचने का अवसर माना। वे चाहते थे कि लोग समझें; यह निजी हत्या नहीं, राजनीतिक प्रतिकार है; यह अराजकता नहीं, औपनिवेशिक अत्याचार के विरुद्ध संगठित प्रतिरोध है। उनका आग्रह था कि क्रांतिकारी विचार सबसे अधिक चमकते हैं जब वे फाँसी के तख़्ते पर खड़े मनुष्य के मुँह से निकलते हैं। यही कारण है कि सुखदेव अपनी मृत्यु-दंड की सजा से विचलित नहीं हुए। गांधीजी को लिखे पत्र में उनका कथन कि देश को उनकी सजा बदलने से उतना लाभ नहीं होगा जितना उनके फाँसी पर चढ़ने से होगा, यह वाक्य केवल वीरता नहीं, शहादत की राजनीतिक समझ है। वे जानते थे कि कुछ जीवन जीकर आंदोलन को आगे बढ़ाते हैं, और कुछ मृत्यु के बाद जनता की चेतना में बारूद की तरह फैलते हैं। सुखदेव ने अपने को दूसरे प्रकार के जीवन के लिए तैयार कर लिया था। एक ऐसा जीवन जो देह के समाप्त होने के बाद शुरू होता है।23 मार्च 1931 को जब सुखदेव, भगत सिंह और राजगुरु फाँसी पर चढ़े, तो भारत ने केवल तीन युवकों को नहीं खोया; उसने अपनी आत्मा का वह हिस्सा खोया जो अन्याय के सामने झुकना नहीं जानता था। वे मरने नहीं गए थे; वे साम्राज्य की आँखों में आँख डालकर यह बताने गए थे कि मनुष्य की देह को फाँसी दी जा सकती है, पर विचार को नहीं। वे जानते थे कि रस्सी उनके गले पर पड़ेगी, पर इतिहास की गर्दन अंग्रेजी शासन के हाथ से छूट जाएगी।आज सुखदेव को याद करना केवल श्रद्धांजलि देना नहीं है। यह इतिहास की एक भूल को सुधारना है। हमें उन्हें भगत सिंह की छाया में नहीं, भगत सिंह के बराबर खड़े उस साथी के रूप में देखना होगा जिसने क्रांति की इमारत का नक्शा बनाया, दीवारें उठाईं, साथियों को जोड़ा, निर्णयों को दिशा दी और निजी प्रेम को भी राष्ट्रीय कर्तव्य की अग्नि में रख दिया। उनकी शहादत हमें बताती है कि बलिदान केवल मरना नहीं होता; बलिदान अपने सबसे प्रिय को भी विचार की वेदी पर रख देने का साहस है।सुखदेव के बलिदान की सबसे बड़ी छाप यही है कि वे शोर में नहीं, संरचना में रहते हैं; नारे में नहीं, नारे के पीछे की तैयारी में रहते हैं; भगत सिंह की ऊँची प्रतिमा के पीछे नहीं, उसके पाँवों के नीचे रखी उस नींव में रहते हैं जिसके बिना प्रतिमा खड़ी ही नहीं हो सकती थी। इतिहास ने भले देर की हो, पर अब समय है कि हम कहें कि सुखदेव केवल “और अन्य” नहीं थे। वे मुकदमे के पहले नाम थे, संगठन के धड़कते मस्तिष्क थे और भारतीय स्वतंत्रता के उस स्वप्न के प्रहरी थे जिसके लिए चौबीस वर्ष का एक युवक मुस्कराते हुए फाँसी के फंदे तक चला गया।उनकी चिता पर सचमुच हर वर्ष मेले लगते हैं। पर सबसे बड़ा मेला उन मनुष्यों की चेतना में लगता है जो आज भी पूछते हैं: देश के लिए क्या दाँव पर लगाया जा सकता है? सुखदेव का उत्तर अब भी वही है, सब कुछ। देह, मित्रता, यौवन, आँसू और अंततः जीवन भी। यही उनका शेष निशान है। यही अमरता है। यही शहादत है। सुखदेव सुखदेव भर नहीं हैं, वह राजगुरु भी हैं और वह भगतसिंह भी। इसी तरह राजगुरु और भगतसिंह भी सुखदेव ही हैं। इसी वह त्रयी है, जिस पर हम गर्व कर सकते हैं, करते हैं। #Sukhdev #सुखदेव #BhagatSingh #Rajguru #भगतसिंह #शहीददिवस #आजादी
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Tribhuvan_Official
Tribhuvan_Official@TheTribhuvan·
बता भायला, मुहम्मद सद्दीक साब री इण रचना नैं कुण नीं समझै? थै मजा करो म्हाराज आज थांरी पांचूं घी में है म्है पुरस्यो सगळो देस बता अब कांई जी में है ? गळी गळगळी होय गांव री बिलखे साख भरै भोळा डाळा जीव जीण री झूठी आस करै लुच्चा लूटै माल मसकरा मीठो नास करै कुत्ता खावै खीर मिनख तो बोदी घास चरै गांव में लागण लागी आग घरां में दीखै भागमभाग टाबरां गायो रोटी राग कमावणियां रै आग्या झाग।। पण मजा करो म्हाराज आज थांरी पांचूं घी में है म्है पुरस्यो सगळो देस बता अब कांई जी में है ? पीड़ पाळतू कर लेवै पण मेखां रोज जड़ै मिनख मांस रा बिणजारा बातां रा महल घड़ै अबळा मांग मिटै दिन धोळै चूड़ी रोज झड़ै फळसो खुल्लो छोड़ दियो जद डांगर आय बड़ै गांव रै कूवै पड़गी भांग बांदरा लड़सी सांगोपांग सराफत झूठी भरसी सांग लाज री खुल्ली दीखै जांघ। पण मजा करो म्हाराज आज थांरी पांचूं घी में है म्है पुरस्यो सगळो देस बता अब कांई जी में है ? सदा सरीसा दिन बीतै बिरथा ही जूण गमावै तिल-तिल जीणो भारी पड़ग्यो सांस काळजो खावै लाजां लाज मरै सड़कां पर जणो जणो बतळावै बादळ बूंद बणै जद बरसै ओळा क्यूं बरसावै- सूरड़ा दे मिनखां नै मार चोरटा देवै खुल्ली धार समय री माया अपरमपार आपणी बस्ती ठंडी ठार  थे मजा करो म्हाराज आज थांरी पांचूं घी में है म्है पुरस्यो सगळो देस बता अब कांई जी में है ? सतजुग री बातां रा सपना अणदेख्या रै जावै सुख-सपनो ले घर स्यूं चालै दुख-दाळद ले आवै माथै चढग्या भाव बेगड़ा जिनस जीव नै खावै कवि करै कुचमाद मिनख नै मांदा गीत सुणावै घणा-सा बेरूजगार लोग पसरग्या घर-घर में बण रोग घरां नै घेरयां राखै सोग जीवण दीखै मरणै जो पण मजा करो म्हाराज आज थांरी पांचूं घी में है म्है पुरस्यो सगळो देस बता अब कांई जी में है ? अणभणिया आखर बुझैला कुण बांरी बात करै ऊंचै आसण बैठणियां नित नूंवो घात करै बिना साख रा सौदागर बिन खेल्यां मात करै बैलां बाळ उजाळो कर लै दिन में रात करै आंख रो देखण सारू काम जीभ तो एक टकै री चाम टसकता दीखै जाया जाम काढ़ सी बापू जी रो नाम पण मजा करो म्हाराज आज थांरी पांचूं घी में है म्है पुरस्यो सगळो देस बता अब कांई जी में है ?
R k Rajasthani 🇮🇳🕊@rkrajasthani64

@RajasthanScion @TheTribhuvan हम पर राजस्थानी के नाम पर मारवाड़ी मत थोपो..... हमें पता हैं भविष्य में जब परिक्षा में ऐसे सवाल पूछेंगे... जांटी साफ करने को क्या कहते हैं.... 😀 तब तुम खुशी खुशी कर दोगे और पूर्वी, उत्तर, दक्षिण वाले बाहर आकर पूछेंगे ये जांटी क्या होता हैं.... 😀😂

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Amit Yadav 🇮🇳
Amit Yadav 🇮🇳@AmitYaddav·
स्कूलों में राजस्थानी भाषा पढ़ाने के लिए शिक्षक जो नियुक्त होंगे उनकी शैक्षणिक योग्यता क्या होगी?? और क्या वो शैक्षणिक योग्यता सम्पूर्ण राजस्थान के लोगों के पास होगी या सिर्फ़ क्षेत्र विशेष के लोगों के पास ही होगी?? आपको क्या लगता है कमेंट में बताए???
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@1K_Nazar अब ना सामंती व्यवस्था है ना चौधरी व्यवस्था। अंग्रेजों के शासनकाल के दौरान और कुछ जगह स्वतंत्रता के बाद में दोनों व्यवस्थाओं का खात्मा हो गया। अब बस खाली नाम रहा है।
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एक नजर
एक नजर@1K_Nazar·
अबकि बार मैने कांग्रेस से अलायंस किया क्योकि बिना अलायंस मै नागौर मे जीत नही सकता था😳😲 मुझे 1.5-2 लाख वोट ओर चाहिए थे और नागौर मे जो बार-बार हमारे सामने कैंडिडेट आ रहा था वो सामंती व्यवस्था से प्रेरित वही लोग थे जिन्होने नागौर को बर्बाद करके रख दिया उन्हे रोकना था
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Antarman | The Conscious Mind
'राजस्थानी सबदकोश' जिसके रचयिता डॉ. सीताराम लालस हैं। यह संसार के विशाल शब्दकोशों में से एक माना जाता है, जिसमें लगभग सवा दो लाख से ढाई लाख शब्द समाहित हैं। राजस्थानी भाषा और साहित्य में उनके इस योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें 2 अप्रैल 1977 को पद्मश्री से सम्मानित किया.
Antarman | The Conscious Mind@Antarman_vss

राजस्थानी भाषा रो सबदकोष rajsabadkosh.org

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Antarman | The Conscious Mind
इसे चूरण, मीठी गोली, लाॅलीपाप कहते हैं। आज 99.99 कथाकार/बाबा /ज्योतिषी आदि किसी ना किसी राजनीतिक पार्टी के घोषित/अघोषित , स्वयंसेवक/कार्यकर्ता/प्रवक्ता बन चुके हैं।
मनीष यादव रायबरेली@YadavManish1001

इस पोंगा के हिसाब से NEET का जो पेपर लीक हुआ है उसमें सरकार और सिस्टम का कोई दोष नहीं है। ये दोष समय को दे रहा है और NEET के बच्चों को ज्ञान दे रहा है कह रहा कि समय से पहले कुछ नहीं मिलता है जो कुछ भी मिलता है समय से ही मिलता है।

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Antarman | The Conscious Mind
@V927251518 लीक पीटना है बस, जाति के चक्कर में बेमेल जोड़ी बना देते हैं, अनाप शनाप खर्चा करते हैं, पर्यावरण की बारह बजाते हैं, समाज के पंच पटेलों के दबाव में जिंदगी भर ग़लत रिश्ते को ढोते हैं, आने वाली पीढ़ी को भीरूता गिफ्ट में देते हैं। ज्यादातर लोग धार्मिक कलेवर में भीरूता ही परोस रहे हैं।
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सौभद्र
सौभद्र@V927251518·
@Antarman_vss इन लोगों से पुछो डॉक्टर और नर्स का वर्ण क्या है? क्षत्रिय? क्योंकि वो बीमारियों से लड़ती है? वैश्य? क्योंकि वो पैसे लेते हैं। शूद्र? क्योंकि नर्स सेवा करता है। और तो क्या कोई ब्राह्मण डॉक्टर नहीं बनेगा?🥲 वर्ण बचा ही कहा? 🤷
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Antarman | The Conscious Mind
अभी कौनसा कार्य अपने वर्ण के अनुसार कर रहे हैं ? वर्णसंकरता केवल विवाह से ही नहीं आती है, अपने कर्तव्य कर्मों के त्याग से भी आती है। हजारों साल पहले गुण और कर्मों के आधार पर सामाजिक व्यवस्था के तहत वर्ण निर्धारित किए गए थे। तब से लेकर अब तक कितने ही परिवर्तन आ चुके हैं।
The Thakur Force@thethakurforce

अंतर्जातीय विवाह क्षत्रियों के लिए शर्मनाक है इससे क्षत्रिय संस्कारों का समूल नाश हो रहा है इसलिए क्षत्रियों को इससे हजार कोस दूर ही रहना चाहिए। वर्णशकर्ता एक अभिशाप है,दोगले बच्चे ,देश धर्म और जाति ,समाज सभी को धोखा दे सकता है,ऐसे विचार रखनेवाले भेड़ियाँ से सावधान. क्षत्रियों में यह चलन बढ़ रहा है यह चिंता का विषय है। मैं ऐसे 10 लोगों को अपने खास परिचय में जानता हूं जो पहली पीढ़ी में अमीर हुए और थोड़ा सा आगे बढ़े तो सबसे पहले बेटियों को इतना फ्रीडम दिया कि वह गैर बिरादरी में ब्याह रचा लें।उसके बाद वह लोग राणा प्रताप का नारा लगाएंगे। प्रवचन करेंगें।अपने बच्चों में संस्कार और जातीय बोध नहीं डाल पाए।इसके उलट जो ओबीसी की मजबूत जातियां हैं वह अपनी लड़कियों के इंटरकास्ट विवाह में ज्यादा सतर्क रहती हैं और फ्रीडम के नाम पर उसकी छूट देने से परहेज करते हैं। बाकी आप अपने घर के बच्चों को समय नहीं दे पा रहें उन्हें समझा नहीं पा रहें हैं और इंस्टा पर बहन बेटियों को अधनंगा खुला प्रदर्शन करने की छूट दे रहें हैं तो आपकी सारी प्रतिष्ठा व्यर्थ हैं। अन्तरजातीय विवाह समाज को खत्म करता है धीरे धीरे समाज का पतन तय है. क्षत्रियों की समुदायिक पहचान खत्म हो रही। उसके इतिहास पर चर्चा और विचार करने वाले कम है। कायस्थ जैसी शानदार जाति इस इंटरकास्ट विवाह के चलते हासिये पर चली गई,इंटरकास्ट अभिशाप है. लड़कियाँ के साथ साथ लडके भी निम्न कुल की लड़कियों से शादी कर रहे हैं, क्या उनके वंशज को क्षत्रिय कह सकते हैं या मान सकते हैं, बिल्कुल भी नहीं। क्षत्रियों की सामुदायिक पहचान ही खत्म हो जाएगी इंटरकास्ट मैरिज से। ऐसी शादियों को रीढ़विहीन और पैसे को ही सब कुछ मानने वाले सपोर्ट कर सकते हैं। क्लास चेंज होने का मतलब तुंरत किसी गैर बिरादरी के व्यक्ति के साथ ब्याह रचाना ही नहीं होता। मौकापरस्त और तात्कालिक लाभ वाले जिनका स्वाभिमान मर गया वही सरेंडर वाली भाषा बोल कर इसे सेलिब्रेट करते हैं।बाकी यहूदी और पारसी दुनिया के सबसे ज्यादा साइंटिफिक टेंपरामेंट वाले और अमीर व्यक्ति माने जाते हैं वह भी शादी विवाह में कमोबेश परंपरावादी ही हैं और अपने समुदाय में ही विवाह करते हैं। अतः सभी क्षत्रिय युवाओं से निवेदन है कि क्षत्रिय जाति में ही विवाह करें 🙏🙏 अधिक से अधिक शेयर करें और अन्तर्जातीय विवाह रोके और उसे हतोत्साहित करें!!

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Antarman | The Conscious Mind
जो पकड़े जा रहे हैं हो सकता है वे मात्र दलाल ही हों, क्यों कि इतने ऊंचे स्तर पर पहुंचना वहां से पेपर लीक कर लेना , ताज्जुब ही है।
Ranvijay Singh@ranvijaylive

BJP नेता दिनेश बिंवाल का कहना है- 'NEET पेपर लीक में बड़े लोगों को बचाया जा रहा है.' आखिर ये बड़े लोग कौन हैं?

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Antarman | The Conscious Mind
@jeevanyatraa हां यह बड़ा मजेदार है, साथ ही खुद की भी गलतियों का आंकलन किया जा सकता है। वैसे तो अपने प्राचीन साहित्य में भी इस बारे में काफी कुछ है। एक लेखक हैं कार्लो एम. सिपोला (Carlo M. Cipolla) इनकी पुस्तक है "द बेसिक लॉज ऑफ ह्यूमन स्टुपिडिटी" इनका शोध भी बड़ा मजेदार है।
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जीवन यात्रा
@Antarman_vss अहंकार ही सबके बड़ा रीज़न है इसका, शायद उनको ऐसा लगता है अब मेरे से ज्यादा ज्ञान और किसको होगा।
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