Arun Mathur

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@ArunMathur42619

Katılım Ağustos 2024
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Arun Mathur
Arun Mathur@ArunMathur42619·
@semeerc मतलब बीजेपी को फायदा है मिलते हैं एक बजे
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sameer chougaonkar
sameer chougaonkar@semeerc·
ममता के अपमान से आहत कांग्रेस इस बार बंगाल चुनाव बीजेपी को रोकने के लिए नहीं,ममता को हराने के लिए लड़ रही है।बंगाल में कांग्रेस का दुश्मन नंबर वन बीजेपी नहीं,ममता बनर्जी है। 2023 के उपचुनाव में कांग्रेस ने मुर्शिदाबाद जिले की मुस्लिम बाहुल सीट सागरदिघी तृणमूल कांग्रेस को हराकर जीती थी।सागरदिघी सीट पर ममता समर्थक मुस्लिम 64 फीसद होने के बाद भी कांग्रेस की जीत ने ममता के होश उड़ा दिए थे। ममता ने बिना समय गवाए कांग्रेस विधायक को अपनी पार्टी में शामिल करा लिया और कांग्रेस को फिर से विधानसभा में शून्य पर पहुचा दिया। 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी को हर हाल में हराने के लिए ममता बेनर्जी ने गुजरात से यूसुफ पठान को लाकर बहरामपुर से मैदान में उतारा और खुद प्रचार कर कांग्रेस की हार सुनिश्चित कर दी।ममता यही नहीं रूकी,दिल्ली विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल को समर्थन दिया।ममता बनर्जी से अपमानित महसूस कर रही कांग्रेस ने अपमान का घूंट पीया और बंगाल चुनाव का इंतजार किया। कांग्रेस ने 2006 में 262 सीटों पर चुनाव लड़ा था और इस बार सबसे ज्यादा 294 सीटों पर अपने दम पर लड़ रही है।मकसद साफ है,ममता का रायता फैलाना है। 2024 के लोकसभा चुनाव मे कांग्रेस ने एक लोकसभा सीट जीतने के साथ ही 11 विधानसभा सीटों पर नंबर वन थी। ये सीटें मुस्लिम बाहुल चांचल चाकुलिया,हरिचंद्रपुर,मालतीपुर,रतुआ,मोथाबाड़ी, शुजापुर,लालगोला,बहरामपुर और मुर्शिदाबाद की अन्य सीटें थी।14 विधानसभा सीटों पर कांग्रेस दूसरे नंबर पर थी।लोकसभा चुनाव में विधानसभा की नंबर वन और नंबर दो रही इन 25 सीटों पर कांग्रेस का फोकस है। मौसम बेनज़ीर नूर के तृणमूल कांग्रेस से राज्यसभा सदस्यता से इस्तीफा देकर कांग्रेस में शामिल होने से भी कांग्रेस को ताक़त मिली है। सिर्फ एक दशक पहले 2016 में बंगाल से 44 सीटें जीतने वाली कांग्रेस आज शून्य भले ही हो,लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 28 लाख से ज्यादा वोट और एक सीट मिली है। 2021 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को लगभग 18 लाख वोट मिले थे। ऐसे में जब ममता को बीजेपी से तगड़ी चुनौती मिल रही है,ऐसे मे कांग्रेस का 294 सीटों पर लड़ना कांग्रेस की जीत का भले ना हो ममता के लिए हार का कारण बन सकता है।
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Arun Mathur
Arun Mathur@ArunMathur42619·
@semeerc आपने अच्छा और सही विश्लेषण बताया है, मामला गंभीर है। मिलते है एक बजे
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sameer chougaonkar
sameer chougaonkar@semeerc·
पश्चिम बंगाल के 294 सीटों वाली विधानसभा में सरकार बनाने के लिए 148 सीटों की जरूरत है। बंगाल में 112 सीट ऐसी है,जहां मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में रहते हैं और इन 112 सीटों में से 106 ममता बनर्जी के पास हैं। अंक गणित के लिहाज से समझें तो ममता बनर्जी को शेष 182 हिंदू-बहुल निर्वाचन क्षेत्रों में से केवल 42 और सीटें जीतने की जरूरत है। 2021 में तृणमूल कांग्रेस ने उन 182 सीटों में से 109 जीती थीं,सफलता दर 60 फीसदी थी।इस जीत के साथ तृणमूल को 215 सीटों का आरामदायक बहुमत दिलाया।वहीं भारतीय जनता पार्टी ने 72 हिंदू-बहुल सीटें जीतीं, लेकिन मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में सूपड़ा साफ हो गया था। बंगाल के 3 जिले- मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर में मुस्लिम आबादी 50 फीसदी या उससे अधिक है।दो अन्य जिले- दक्षिण 24 परगना और बीरभूम में यह 35 फीसदी से ऊपर है।इन क्षेत्रों में 89 ऐसी विधानसभा सीटें हैं, जहां मुस्लिम आबादी 30 फीसदी से अधिक है।साथ ही 112 विधानसभा सीटें ऐसी हैं,जहां मुस्लिम वोटरों की संख्या 25 फीसदी से अधिक है। 2021 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 35 फीसदी से अधिक मुस्लिम वोटर वाले 89 में से 87 सीटें जीती थीं,यह लगभग एकतरफा जीत था। 112 मुस्लिम-प्रभावित सीटों में से तृणमूल ने 106 पर कब्जा किया,जबकि भाजपा के पास केवल 5 सीटें रहीं। 30 फीसदी से अधिक मुस्लिम आबादी वाले निर्वाचन क्षेत्रों में बीजेपी की सफलता दर लगभग शून्य थी। मुसलमान पूरी तरह ममता के साथ है और हिंदू पूरी तरह बीजेपी के साथ नहीं है।मुसलमान पूरी तरह मुस्लिम होकर मतदान करते हैं,और हिंदू जातियों बटकर,धर्मनिरपेक्ष होकर मतदान करते हैं। बंगाल में इस बार बंगालियों को बंगाली अस्मिता से ऊपर उठकर हिंदू अस्मिता के लिए वोट करना होगा, बंगाल तभी बचेगा।
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Arun Mathur
Arun Mathur@ArunMathur42619·
@semeerc ईश्वर करे, आपका विश्लेषण बिल्कुल सही निकले, तमिलनाडु में भी बीजेपी दे दीजिए। मिलते हैं एक बजे
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sameer chougaonkar
sameer chougaonkar@semeerc·
पांच राज्यों के चुनाव परिणाम 4 मई को घोषित किए जाएंगे,लेकिन तब तक पत्रकार,राजनीतिक विश्लेषक और चुनावी पंडित चुनाव परिणाम को लेकर पूर्वानुमानों का खेल खेलने में व्यस्त रहेंगे। ये सारे पूर्वानुमान राजनीति और पत्रकारिता का अनिवार्य हिस्सा हैं। चुनाव को लेकर सबका अपना अपना आकलन होता है।किसी का सही और किसी का ग़लत साबित होता है।कुछ पत्रकार पूर्वानुमान लगाने या हार जीत को लेकर भविष्यवाणी करने से बचते हैं,और चुनाव परिणाम के बाद होने वाली आलोचना से खुद को बचाते हैं। कुछ पत्रकार किंतु परंतु के साथ गोल मोल चुनाव परिणाम बताते हैं, जिससे कोई भी जीते या हारे,अपनी किंतु परंतु के साथ कहीं बात को चुनाव परिणाम में फिट कर देते हैं और ख़ुद की पीठ थपथपाने में मशगूल हो जाते हैं। कुछ पत्रकार एक चैनल पर किसी पार्टी के जीतने की भविष्यवाणी करते हैं,और किसी दूसरे चैनल पर उसी पार्टी के हार की संभावना व्यक्त कर देते हैं।जैसा परिणाम आता है,उसी हिसाब से अपनी क्लिप को पोस्ट कर अपनी भविष्यवाणी को सही साबित करते हैं। एक पत्रकार के रूप में मेरा भी इन पाँच राज्यों के चुनाव को लेकर आकलन है। यह पूर्वानुमान 1 अप्रैल तक राजनीतिक दलों की ज़मीनी स्थिति को देखकर है। अभी की स्थिति में बंगाल में बीजेपी,तमिलनाडु में डीएमके, केरल में कांग्रेस,असम में बीजेपी और पुदुचेरी में एनडीए की सरकार बनते दिख रही है। लोकतंत्र में जनता का फैसला ही अंतिम होता है,उसे सिर झुकाकर स्वीकार करना चाहिए।
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Arun Mathur
Arun Mathur@ArunMathur42619·
@semeerc इस पर चर्चा एक बजे करेंगे
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sameer chougaonkar
sameer chougaonkar@semeerc·
देश के गृह मंत्री अमित शाह ने 24 अगस्त 2024 को देश से नक्सलवाद के सफ़ाए की डेडलाइन 31 मार्च 2026 तय की थी।इस डेडलाइन के एक दिन पहले ही कल 30 मार्च को लोकसभा में अमित शाह ने देश के नक्सलवाद से मुक्त होने की घोषणा की। ज़्यादा वक्त नहीं सिर्फ़ दशक भर पहले देश भर में नक्सलियों की इतनी व्यापक और खूंखार मौजूदगी हुआ करती थी कि तब प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने वामपंथी उग्रवाद को "राष्ट्र की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा" बताया था।जिसे लाल गलियारा कहा जाता था, उसने ठेठ नेपाल में पशुपतिनाथ से लेकर आंध्र प्रदेश में तिरुपति तक भारत को ऐन बीच से दोफाड़ कर दिया था। 2014 में जब मोदी ने कमान संभाली,126 जिलों में नक्सलियों वर्चस्व था और ये जिले 10 राज्यों में फैले थे।2019 में गृह मंत्री के रूप में शाह के जिम्मेदारी संभालने के बाद यह चुनौती विभिन्न स्तरों पर पेचीदा थी।दूरदराज के उन जंगली इलाकों में विकास की रोशनी फैलाना आसान न था जहां गुरिल्ला युद्ध में माहिर गैरसरकारी सैन्य-वर्दीधारियों की हुकूमत का सिक्का चलता था। शाह की रणनीति स्पष्ट थी।गोली और गुलाब नीति।गोली का जवाब गोली से और आत्मसमर्पण करने और संविधान पर भरोसा रखने पर गुलाब देकर स्वागत किया जाएगा।जिन्होंने माना बच गए और समाज की मुख्यधारा में शामिल होने का मौक़ा पा गए,ना करने वाले मारे गए। नक्सलवाद के सफ़ाए के लिए मोदी और शाह की रणनीति जितनी अर्थगर्भी थी उतनी ही अथक और निर्मम भी और उद्देश्य हथियारों और हिंसा को विकास और विश्वास से बदलना था।मोदी और शाह ने अपनी निर्मम और अनूठी रणनीति से गतिरोध आखिरकार तोड़ ही दिया,जो 2019 में शाह के कमान संभालने के बाद ठोस और संगठित तरीके से अपनाई गई। आज दस साल में नक्सलियों से मुक्त इलाकों में विकास की बेहद जरूरी इबारतें लिखी गई हैं।11,503 किमी से ज्यादा सड़कें,2,343 मोबाइल टावर, स्कूल,अस्पताल और खुशहाली के दूसरे हरकारे। मोदी और शाह का इरादा ऐसा प्रतिमान गढ़ने का रहा है, जिससे लोगों के पास नक्सलवाद की तरफ लौटने की कोई वजह न हो। मोदी-शाह के गोली और गुलाब नीति का असर है कि भारतीय राज्यसत्ता के खिलाफ सबसे लंबे नक्सली विद्रोह का माकूल समापन शाह की तय की गई डेडलाइन 31 मार्च से एक दिन पहले कर दिया गया। मोदी और शाह बधाई के पात्र हैं।
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Arun Mathur
Arun Mathur@ArunMathur42619·
@semeerc वैसे आपका विश्लेषण गलत नहीं होता है। मिलते हैं एक बजे
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sameer chougaonkar
sameer chougaonkar@semeerc·
पाँच राज्यों के चुनाव में असम को लेकर बीजेपी आश्वस्त है।केरल में खाता खोलना, वोट प्रतिशत बढ़ाना और कांग्रेस को सत्ता में आने से रोकना बीजेपी का मुख्य लक्ष्य है भले ही केरल में कम्युनिस्ट तीसरी बार सरकार बना लें।केरल में बीजेपी सरकार बनाने के लिए नहीं,कांग्रेस को सत्ता में आने से रोकने के लिए अपनी ताकत लगा रही है। तमिलनाडु में बीजेपी हिंदुत्व की राजनीति को परख रही है।द्रविड़ राजनीति के सामने हिंदुत्व कितना टिकता है,यह चुनाव परिणाम बता देगा।तमिलनाडु में बीजेपी अभिनेता विजय और अपने मुख्य सहयोगी एआईएडीएमके के प्रदर्शन पर निर्भर हैं।तमिलनाडु में बीजेपी हिंदुत्व के बीज बो रही है और ख़ुद को भविष्य की राजनीति के लिए तैयार कर रही है। बीजेपी इन पाँच राज्यों के चुनाव में अपने सारे साधन संसाधन और ताक़त बंगाल में झोंक रही है। बीजेपी और ममता बनर्जी दोनों जानते हैं कि यह सिर्फ एक राज्य का चुनाव नहीं है।मोदी और ममता दोनों दिग्गज नेताओं की प्रतिष्ठा दांव पर है।ममता को जीत से कम कुछ काम नहीं आएगा और बीजेपी को ममता की हार से कम कुछ मंजूर नहीं होगा। मोदी और शाह को चार नेता हमेशा आंख में खटकते रहे हैं।महाराष्ट्र में उद्धव,बिहार में नीतीश,दिल्ली में केजरीवाल और बंगाल में ममता।उद्धव ठाकरे और नीतीश ने बीजेपी के साथ भी सरकार बनाई और बीजेपी के धुर विरोधियों के साथ भी।ममता ने मोदी के उभार के बाद और केजरीवाल ने अपने राजनीतिक जन्म के बाद बीजेपी के साथ कभी हाथ नहीं मिलाया। उद्धव और केजरीवाल धराशायी हो चुके हैं और नीतीश ने घुटने टेक दिए और चुपचाप दिल्ली आ गए हैं।बस ममता मैदान में दमदार बनी हुई हैं। मोदी के अश्वमेध का घोड़ा बंगाल में घुसने की तैयारी कर चुका है और ममता घोड़े को खदेड़ने की कोशिश में है। बंगाल में ममता का मजबूत खुटा टिका रहता है या बीजेपी उखाड़ देती है, यह 4 मई को साफ़ होगा लेकिन फिलहाल ममता की चूलें हिल गई है।
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Arun Mathur
Arun Mathur@ArunMathur42619·
@semeerc जय राम जी की मिलते हैं एक बजे
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sameer chougaonkar
sameer chougaonkar@semeerc·
कृष्णावतार की तरह रामावतार भी युगांत बिंदु की घटना है। कृष्ण अवतरित हुए थे,द्धापर के अस्ताचल पर। राम का अवतरण भी त्रेता और द्धापर की संधिवेला में होता है।श्री देवसहाय त्रिवेद ने अपने 'इंडियन क्रोनोलॉजी' में रामावतार का काल निर्धारित किया है। 5332 बी सी। श्रीराम कौन है? श्रीराम ईश्वर हैं पर उससे भी पहले सफल, गुणवान और दिव्य पुरूष हैं। शासक के तौर पर बेहद कामयाब।इतने कामयाब और सफल कि रामराज्य की चर्चा अब तक होती है।एक आदर्श समाज और एक आदर्श राज व्यवस्था की जब बात होती है तो रामराज्य की चर्चा होती है। राम का चरित्र भारतीय जनमानस को इतना करीब से क्यो छूता हैं? देवता तो बहुत है पर इस देवता में ऐसा क्या हैं कि वह जातीय चेतना की गहराईयों में उतर गया है? वह अलौकिक और मर्यादा से परिपूर्ण है। राम गोरे नहीं है।उनका रंग श्याम और नीला है।राम का व्यक्तित्व संघर्षशील,तपशील और श्रम से परिपूर्ण है इसलिए रंग सावला है।राम की देह महलों की सुरक्षित और सुगंधित वातावरण में नहीं पनपी।वह जंगलों में भटकते हुए और विचरण करते हुए बनी। रामनवमी पर अपने मनुष्य होने का मूल्यांकन कीजिए। हम देवी देवताओं के दिन धुमधाम से मनाते है,मंदिर जाते हैं।धार्मिकता के सारे कर्मकांड़ करते हैं।रोज ईश्वर का नाम लेते हैं।लेकिन अपने अराध्य ईश्वर के धैर्य, संकल्पबद्धता, चरित्र और परिश्रम के साथ सत्य के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देने वाले गुण हम अपने जीवन में उतारने की कितनी कोशिश करते है? तुलसीदास की रामकथा में सात कांड हैं और हर सोपान का अलग राम है। इसी रामकथा के सातवे उत्तर कांड में राम कहते है 'बड़े भाग मानुस तनु पावा” जिसका अर्थ है मनुष्य का जन्म लिया है तो इस सौभाग्य को यूं ही नष्ट नहीं होने देना चाहिए। रामनवमी की शुभकामनाएँ 🙏
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Arun Mathur
Arun Mathur@ArunMathur42619·
@semeerc आपने बहुत सारगर्भित संदेश लिखा है। साधुवाद
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sameer chougaonkar
sameer chougaonkar@semeerc·
तेरह वर्ष के दर्द भरे मौन के बाद हरीश राणा ने मंगलवार को दिल्ली एम्स में अंतिम सांस ली। 31 साल का हरीश 13 साल से कोमा में था।सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च को हरीश राणा को इच्छामृत्यु की इजाजत दी थी।ये देश का पहला मामला है,जिसमें किसी को इच्छामृत्यु दी गई है। हरीश राणा की मौत के साथ एक ऐसी यात्रा का अंत हुआ,जिसमे भारतीय चिकित्सा, क़ानून और मानवता को भी गहराई से छुआ है। 13 साल से सिर्फ हरीश ही ज़िंदा लाश नहीं थे, उनकी माँ भी 13 साल से ज़िंदा लाश थी।बेटा मरकर मुक्त हुआ,माँ 13 साल से तिल तिल कर मर रही थी,अब अंतिम सांस तक घुट घुट कर मरने के लिए अभिशप्त है। हरीश को होश नहीं था,वह सुख दुख से परे था।लेकिन हरीश की माँ तो पूरे होशो हवास में यह असहनीय दर्द सह रही थी।हरीश की माँ 13 साल से हर रात यह सोच कर सोती होगी कि कल सुबह उसका बैठा उठ कर माँ को आवाज़ लगाएगा।माँ की उम्मीद का कभी सवेरा नही हुआ। माँ के दर्द की कोई दवा नहीं थी।किसी के पास दवा नहीं थी। न दवा काम आई ना दुआ।हरीश मुक्त हुआ। लेकिन यह भी सच है कि जीवन के प्रति मनुष्य का मोह बहुत प्रबल होता है।कोई मरना नहीं चाहता।बुरी से बुरी परिस्थिति में भी ज़िंदा रहना चाहता है।जीने की लालसा मनुष्य को इतना दुर्बल बना देती है कि वह ज़िंदा रहने के लिए बुनियादी अधिकार भी त्याग देता है।जीने की तीव्र इच्छा में भविष्य के बेहतर होने की उम्मीद भी होती है। दुख हमे मुक्त करता है या फ़ींच कर रख देता है।हर इंसान को अपने दुख से अकेले मुठभेड़ करनी पड़ती है।कोई संवेदना व्यक्त कर सकता है,कोई कुछ मदद कर सकता है,लेकिन उस दुख से गुजरना ख़ुद को ही पड़ता है।कुछ दुख ऐसे होते हैं जिसमें भागीदारी नहीं की जा सकती है।हरीश राणा और उसकी माँ का दुख भी ऐसा ही है। सुख से जुड़ने की सीमा है।तुम्हारा सुख ही कभी कभी मेरा सुख बनता है।पर दुख की हिस्सेदारी दुनिया के किसी भी कोने तक की जा सकती है।दुख की एकता बहुत व्यापक और गहरी हो सकती है। जो किसी के दुख में काम नहीं आता उसका होना न होना बराबर है।ऐसा व्यक्ति समाज पर एक बोझ है। हरीश राणा को ईश्वर अपने चरणों में स्थान दे और उसके परिवार को को यह दुख सहने की शक्ति दे।
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Arun Mathur
Arun Mathur@ArunMathur42619·
@semeerc क्या राजस्थान में बदलाव होने वाला है
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sameer chougaonkar
sameer chougaonkar@semeerc·
असम में मुख्यमंत्री रहें सर्बानंद सोनोवाल की जगह हेमंत बिस्वा सरमा मुख्यमंत्री बने,मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की जगह मोहन यादव मुख्यमंत्री बने,हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर की जगह नायब सिंह सैनी मुख्यमंत्री बने। राजस्थान में वसुंधरा की जगह भजनलाल को मुख्यमंत्री बनाया गया। सर्बानंद सोनोवाल,शिवराज सिंह चौहान और मनोहर लाल खट्टर को प्रदेश की राजनीति से निकालकर और दिल्ली लाकर मोदी सरकार में मंत्री बना दिया गया।वसुंधरा राजे को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का झुनझुना थमा दिया गया। ऐसे ही गुजरात की मुख्यमंत्री रही आनंदीबेन पटेल से इस्तीफ़ा लेकर विजय रुपाणी को मुख्यमंत्री बनाया गया, फिर विजय रुपाणी से इस्तीफ़ा लेकर भूपेंद्र पटेल को गुजरात का सीएम बनाया गया।आनंदीबेन पटेल को राज्यपाल बनाकर और विजय रुपाणी को राज्यसभा सांसद बना कर दिल्ली लाया गया।(अहमदाबाद विमान हादसे में विजय रुपाणी का निधन हो गया) कर्नाटक के मुख्यमंत्री रहे येदियुरप्पा से जुलाई 2021 में इस्तीफा लेकर बसवराज बोम्मई को मुख्यमंत्री बनाया गया।अब येदियुरप्पा और बसवराज बोम्मई दोनों पूर्व मुख्यमंत्री दिल्ली में है।बोम्मई सांसद बनकर और येदियुरप्पा बीजेपी पार्लियामेंट्री बोर्ड के सदस्य बनकर।कर्नाटक के मुख्यमंत्री रहे जगदीश शेट्टर को भी सांसद बनाकर दिल्ली लाया गया है। इसी क्रम में उत्तराखंड में त्रिवेंद्र सिंह रावत की जगह मार्च 2021 में तीरथ सिंह रावत मुख्यमंत्री बने और तीरथ सिंह रावत को भी मात्र 114 दिनों में ही पद छोड़ना पड़ा और धामी मुख्यमंत्री बने।दोनों पूर्व मुख्यमंत्रियों को प्रदेश से बाहर दिल्ली लाया गया। त्रिपुरा में मई 2022 में बिप्लब कुमार देब की जगह माणिक साहा को मुख्यमंत्री नियुक्त बनाया गया और बिप्लब देब को सांसद बनाकर दिल्ली लाया गया। मुख्यमंत्रियों को दिल्ली लाने की शुरुवात गोवा के दिवंगत मुख्यमंत्री मनोहर परिकर को नवंबर 2014 में दिल्ली लाकर रक्षा मंत्री बनाकर हुई थी। लेकिन गोवा में मनोहर परिकर के बिना पार्टी कमजोर हुई तो मजबूरी में मनोहर पर्रिकर को फिर गोवा मुख्यमंत्री बनाकर भेजा गया।मनोहर पर्रिकर के निधन के बाद प्रमोद सावंत सीएम बने। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रहे रमन सिंह को दिल्ली ना लाकर छत्तीसगढ़ में स्पीकर बना दिया गया। यहाँ जितने भी मुख्यमंत्रियों को बदलने के उदाहरण दिए गए हैं यह सब परिवर्तन मोदी जी के 2014 से लेकर 2024 तक के दो कार्यकाल में हुआ है। मोदी के तीसरे कार्यकाल में भी मुख्यमंत्री को अपदस्थ करने की शुरुवात हो चुकी है।पिछले माह मणिपुर में बीरेन सिंह के जगह युमनाम खेमचंद को मुख्यमंत्री बना दिया गया। अभी ताजा ताजा मामला देखे तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को राज्यसभा सांसद बनाकर दिल्ली बुला लिया गया है। मोदी जी के तीसरे कार्यकाल में 2029 के लोकसभा चुनाव तक तीन मुख्यमंत्रियों को प्रदेश से हटाकर दिल्ली लाने की रणनीति पर मोदी और शाह काम कर रहे हैं। नीतीश कुमार के रूप में मोदी के तीसरे कार्यकाल में पहले मुख्यमंत्री को सांसद बनाकर दिल्ली सफलतापूर्वक लाया गया है।अभी दो बीजेपी के मुख्यमंत्री दिल्ली लाए जाएँगे।एक नाम बहुत चौकाने वाला होगा।
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Hindustan
Hindustan@Live_Hindustan·
भारतीय रेलवे ने अपने सोशल मीडिया हैंडल एक्स पर पोस्ट करके एक चैलेंज दिया है। अगर आपकी नजर तेज है तो पढ़ के बताएं कि इसमें क्या लिखा है। कमेंट कर दे जवाब.. #IndianRailways #Quiz
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