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#अमित_शाह_माफी_मांगे
माननीय गृह मंत्री @AmitShah जी,
संसद में नक्सलवाद पर चर्चा हो रही थी, लेकिन क्या कभी आपने इस समस्या की जड़ तक जाने की गंभीर कोशिश की है? क्या आपने यह समझने का प्रयास किया कि आखिर क्यों देश के कुछ हिस्सों में लोग हथियार उठाने पर मजबूर हो जाते हैं?
नक्सलवाद कोई शौक नहीं है, यह उस पीड़ा का परिणाम है जो वर्षों से आदिवासी क्षेत्रों में अन्याय, शोषण, जल-जंगल-जमीन की लूट और बुनियादी अधिकारों की अनदेखी से पैदा हुई है। जिन लोगों के पास न संसाधन हैं, न सत्ता, न सुनवाई—वो आखिर अपनी बात रखने के लिए क्या करें?
क्या उनके पास कोई “खजाना” है जिसे बचाने के लिए वे जान जोखिम में डाल रहे हैं? हां—उनका खजाना है उनका अस्तित्व, उनकी जमीन, उनकी संस्कृति और उनका सम्मान। जब यही सब छीना जाता है, तो संघर्ष जन्म लेता है।
और सबसे गंभीर सवाल जब संसद में एक जनप्रतिनिधि, MP राजकुमार रोत इस मुद्दे को उठाते हैं, तो उन्हें डराने या इशारा करने की जरूरत क्यों पड़ती है? क्या लोकतंत्र में सवाल पूछना गुनाह है? क्या आदिवासियों की आवाज उठाना अपराध है?
अगर सरकार सच में नक्सलवाद खत्म करना चाहती है, तो बंदूक से नहींन्याय से जवाब देना होगा। विकास के नाम पर विनाश बंद करना होगा, और आदिवासियों को उनका हक देना होगा।
देश जानना चाहता है।
क्या सरकार समस्या की जड़ समझेगी या सिर्फ आवाज उठाने वालों को दबाएगी?
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