Darshan Brar

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@DarshanBrar9

किसी के जैसा होने की लड़ाई नहीं, अपने जैसा बने रहने की जिद है ।

sri ganganagar Katılım Şubat 2017
584 Takip Edilen39 Takipçiler
Mridul Kachawa IPS
Mridul Kachawa IPS@ips_mridul·
श्री करणी कृपा 🙏🏼🌼 18/03/26
Mridul Kachawa IPS tweet media
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Darshan Brar
Darshan Brar@DarshanBrar9·
@rahulprakashIPS बहुत शानदार कार्यकाल रहा सर! शुभकामनाएं 🙏
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Tribhuvan_Official
Tribhuvan_Official@TheTribhuvan·
राजस्थान की हर बेटी के सिर पर राजस्थान सरकार का हाथ है; लेकिन यह हाथ उन्हें हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के नए परिसर तक पहुँचाने और वहाँ से वापस लाने के लिए एक सरकारी बस लगाने के आदेश पर हस्ताक्षर नहीं कर रहा। अगर बगरू के पास बने नए भव्य विश्वविद्यालय भवन तक एक-दो बसें आने-जाने के लिए लगा दी जाएँ तो बेटियों का भला हो जाए! बेटियों का भला करें तो बेटों को भला क्यों वंचित किया जाए! @Rajendra4BJP @BJP4Rajasthan @KumariDiya @RajCMO
BJP Rajasthan@BJP4Rajasthan

राजस्थान की हर बेटी के सर पर राजस्थान सरकार का हाथ। #भजनलाल_मतलब_भरोसा

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Tribhuvan_Official
Tribhuvan_Official@TheTribhuvan·
राजस्थान सरकार आए दिन भर्ती का कार्यक्रम जारी करती है। लेकिन बेरोज़गारों के साथ सरकारों के मज़ाक़ का हाल देखो। साल 2018 में परीक्षा देने के बाद चयनित हुए शिक्षकों के साथ पहले पिछली सरकार ने मज़ाक़ किया और अब वर्तमान सरकार इन्हें फुटबॉल बनाए हुए है। उच्च न्यायालय के आदेशों को भी सरकारी तंत्र कुछ नहीं समझता। इसे अंधेरगर्दी कहा जाए या गर्दे में अंधेरा! #BerojgarShikshak
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Tribhuvan
Tribhuvan@tribhuvun·
मोहनदास, हाड़-माँस का वह अकल्पनीय पुतला त्रिभुवन महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंसटीन ने महात्मा गांधी के बारे में एक बार कहा था : आने वाली पीढ़ियां शायद ही कभी विश्वास करें कि इस धरती पर हाड़-माँस का कोई ऐसा पुतला भी रहा था। अल्बर्ट आइंसटीन ही नहीं, विश्व के अनेक प्रसिद्ध वैज्ञानिकों, विचारकों और दार्शनिकों ने गांधीजी के बारे में ऐसा कहा है, जो उनके व्यक्तित्व को नभस्पर्शी, युगांतरकारी और असाधारण बनाता है। रोम्यां रोलां हों या ईएम फोर्स्टर, अर्नाल्ड टॉयन्बी हों या ऐल्डस हक़्ज़ले, लुई फ़िशर हों या रूज़वेल्ट-चर्चिल-मैक ऑर्थर, सभी ने गांधीजी के भीतर एक ख़ास तरह की महानता का दिग्दर्शन किया और उनकी युगांतरकारी भूमिका को माना। यह भारत के लिए ही नहीं, एशिया महाद्वीप और संपूर्ण मानव समाज के लिए एक गर्वीली बात है कि पश्चिम की सभी आवाज़ों को हम एक स्वर में पिरोएं तो वे कहती हैं, महात्मा बुद्ध और प्रभु ईसा के बाद अगर इस धरती पर कोई महान व्यक्तित्व हुआ है तो वह महात्मा गांधी हैं। मानव समाज की विकास यात्रा में हर युग में कोई न कोई ऐसा आया है, जो अपने कालखंड में अपने समकालीनों से बहुत अलग रहा है। गाँधी भी ऐसे ही थे। वे जब दक्षिण अफ्रीका से भारत आए तो उन्होंने पूरे देश की यात्रा की। यहाँ के गांवों-देहातों को समझा। उन्होंने देश के सुदूर इलाकों में नागरिकों के माथे पर चिपके अभावों को महसूस किया। जीवन में बिखरे अँधेरे देखे। सूनेपन से सिहरती ज़िंदगियों से वे देश के कोने-कोने में जाकर रूबरू हुए। कमज़ोरों और मज़लूमों के चेहरों पर छितरी संताप की सलवटें देखकर वे कराह उठे। उन्होंने पीड़ा और दु:खों से लबरेज़ युग को अट्‌टहास करते पाया। इस देश के श्रेष्ठतम लोगों से वे स्वयं की पहल पर मिले। ऐसे लोगों से जो उस समय भारत भूमि पर एक अलग विचारयात्रा के लिए न केवल निकले हुए थे, अपितु अपने विचारों के अनुरूप कोई न कोई ऐसा काम भी कर चुके थे, जो अपने समय का सर्वमान्य प्रतिमान था। इनमें महान स्वतंत्रता सेनानी सीएफ ऐंड्रयूज, गुरुकुल कांगड़ी के संस्थापक और शिक्षा के अग्रदूत महात्मा मुंशीराम यानी स्वामी श्रद्धानंद और शांति निकेतन के अप्रतिम शिल्पकार रवींद्रनाथ ठाकुर प्रमुख थे। स्वामी श्रद्धानंद ने चार मार्च 1902 को हरिद्वार में शिक्षा का बहुत बड़ा केंद्र खड़ा कर दिया था, जो गुरुकुल कांगड़ी के नाम से जाना जाता है। यह शांति निकेतन से कई वर्ष पहले खुल गया था। गांधीजी को जब सीएफ एंड्रयूज यहाँ लेकर गए तो गांधीजी बहुत प्रभावित हुए। गांधी जी ने एक जगह लिखा है कि उन्हें शुरू में उस समय स्वामी श्रद्धानंद, देशबंधु चितरंजनदास, सीएफ ऐंड्रयूज और लाला लाजपतराय ने बहुत प्रभावित किया। गांधीजी को गुरुकुल कांगड़ी में महात्मा मुंशीराम ने ही सबसे पहले महात्मा कहकर संबोधित किया था। गांधीजी ने अपनी आत्मकथा सत्य के प्रयोग में एक जगह लिखा है कि मैं अपना आश्रम कहाँ बनाऊँ, जब यह प्रश्न उठा तो उन्हें महात्मा मुंशीराम यानी स्वामी श्रद्धानंद ने हरिद्वार का सुझाव दिया। सीएफ ऐंड्रयूज ने भी सलाह दी कि हरिद्वार आपके लिए बहुत उपयुक्त रहेगा। गांधीजी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि मेरी मातृभाषा गुजराती होने के कारण मुझे अहमदाबाद बहुत उपयुक्त लगा। आजादी के लिए उन दिनों के आंदोलन के बारे में गांधीजी अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, 30 मार्च को दिल्ली में एक सप्ताह तक न केवल ऐतिहासिक हड़ताल रही, बल्कि यह हिन्दू मुस्लिम एकता का भी एक बड़ा उदाहरण थी। वजह ये कि इसमें स्वामी श्रद्धानंद और हक़ीम अजमल खाँ साहेब दोनों ने इस हड़ताल को कामयाब बनाया था। गांधीजी इसे भी बहुत अदभुत बताते हैं कि इस हड़ताल के बाद जामा मस्जिद से भाषण देने के लिए स्वामी जी को बुलवाया गया। हालांकि यह सही है कि शुद्धि आंदोलन के बाद गांधीजी के मन में बहुत सवाल उठे और मतभेद भी हुए; लेकिन दोनों की प्रगाढ़ मित्रता में कभी कमी नहीं आई। गांधीजी के महात्मा बनने की यह कहानी तो दिलचस्प है ही, हमें यह भी जानना है कि जब उन्होंने एक ख़ास तरह की नींद में खोए देश और समाज की गहन अवचेतना में अपने सत्याग्रहों से हलचल मचाई तो ब्रिटिश सरकार का वह जंगल भी कैसे चीख पड़ा, जो संगीनों की नोंकों से चमक रहा था। गांधीजी की इस सक्रियता से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के आकाश में एक सुनहरी आभा सी छा गई। उन्होंने कराहती धरती को यह सिखा दिया कि संघर्ष की राह पर नैतिक आभा का भी कोई मूल्य है। और उन्होंने जन-जन के हृदय को ऐसे मथ दिया कि वे स्वत: एक पिता की सी भूमिका में आ गए। लेकिन वही प्रश्न कि आख़िर पहली बार उन्हें किसने राष्ट्रपिता के नाम से संबोधित किया। अब तक के प्रमाणों और उपलब्ध साक्ष्यों के अनुसार छह जुलाई 1944 को रेडियो रंगून से जब आज़ाद हिन्द फ़ौज़ के सेनाध्यक्ष के नाते सुभाषचंद्र बोस ने राष्ट्र के नाम संदेश दिया तो उन्होंने गांधी जी का ज़िक्र किया और उन्हें पहली बार राष्ट्रपिता कहकर संबोधित किया। उस समय सुभाष बोस ने ही रंगून से आज़ाद हिंद रेडियो शुरू किया था। महात्मा गांधी ने देश को एक नई राह दिखाई थी। उन्होंने धर्म के नैतिक मूल्यों को राजनीति में समाहित कर दिया था। उन्होंने शांति और अहिंसा के लिए पूरा जीवन होम दिया। वे भारतीय जीवन दर्शन से उन मूल्यों को लेकर आए, जिनसे देश का हर व्यक्ति अपने अापको जुड़ा हुआ महसूस करता था। चाहे राम हों या उनका रामराज्य, सत्य हो या सदाचार, नीति हो या राजनीति, उन्होंने इस राष्ट्र को एक नई व्याख्या दी और सामाजिक राजनीतिक आचरण के लिए राम और रामायण के मूल्यों की एक विचार पद्धति गढ़ी। गांधीजी ने हृदय परिवर्तन के माध्यम से बुराइयों को मिटाने का संकल्प लिया। उन्होंने अहिंसा और सत्याग्रह को परिवर्तन की राह बताया। गांधीजी ने एक नैतिक लोक का निर्माण किया। उनके नैतिक लोक का दर्शन बड़ा अदभुत है। यह गांधीजी ही थे, जिन्होंने बताया कि त्याग के मूल्यों को अपनाकर हम अपनी दुनिया, देश, राज्य, समाज या नागरिक को बेहतर बना सकते हैं। उन्होंने बलिदान की भावना को जीवन का हिस्सा बनाने का संदेश दिया। यह आत्मत्याग से आगे की भावना है, लेकिन आज हम देख रहे हैं कि त्याग के बजाय येन केन प्रकारेण छीन लेने की भावना हमारे जीवन में तारी है। गांधीजी ने शील और विनम्रता को जीवन मूल्य बताया और कहा कि भारत नामक परिवार को हम तभी समृद्ध बना सकते हैं, जब हमारे जीवन में शील और सदाचार को जगह मिलेगी। हम जब विनम्रता के मूल्यों को अपनाएंगे। हम क्रूरता, हृदयहीनता और संवेदनहीनता को पास भी नहीं फटकने देंगे। हम सत्याचरण को जीवन का आभूषण बनाएंगे, न कि सोने, चाँदी या हीरे मोतियों पर धन लुटाएंगे। गांधी जी ने सादगी और सहनशीलता के मूल्यों को राजनीतिक जीवन में उतारने के लिए चरखा कातकर अपना सूत तैयार करने और उसी के वस्त्र पहनने तक को ज़रूरी बनाया। उन्होंने नशों को जीवन से हटाने के लिए अभियान चलाया और शराब के सेवन या शराब से आने वाले पैसे को छूने तक से इन्कार दिया। आज हम देखते हैं कि गांधीजी के जीवन के मूल्यों की बात करने वाले लोग तक शराब का सेवन करते हैं और नशों के आदी हैं। अगर गांधीजी होते तो आज किसी में हिम्मत नहीं होती कि वह ऐसा कर सकें। गांधीजी ने सत्याग्रह का सिद्धांत दिया। यह सामान्य शब्द भर नहीं है। यह विवादों को दूर करने का शांतिपूर्ण तरीका है। महात्मा गांधी ने भारत को स्वतंत्रता मिलने से बहुत पहले ही इसकी राजनीति और शासन के भीतर पैदा होने वाली आहटों और कसमसाहटों को जान लिया था। इसलिए उन्होंने विकास के बजाय सर्वाेदय की बात की। उन्होंने देश की जनता के हिस्सों को खंड-प्रखंड में नहीं बांटा, बल्कि उनके विकास की अवधारणा में समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े नागरिक का उत्थान सर्वाेपरि था। गांधीजी के जीवन दर्शन में लोकतंत्र शब्द बहुत कम सुनाई पड़ता है। जो शब्द उनके यहाँ बार-बार ध्वनित होते हैं वे हैं अहिंसा, सत्य, सदाचार, सत्याग्रह, सादगी, सर्वाेदय। अर्थात् उनके सपनों का लोकतंत्र इन नैतिक विशेषताओं के बिना धूल है। गांधीजी के लिए विकेंद्रीयकरण सर्वाेपरि है। विकेंद्रीकरण के बिना उनके लिए लोकतंत्र की आवाज़ें अरण्यरोदन के अलावा कुछ नहीं हैं। वाक़ई में वही हमारे राष्ट्रपिता हो सकते थे, क्योंकि गांधीजी ही एक ऐसे थे, जो स्वतंत्रता का जश्न या उत्सव मनाने के बजाय कलकत्ता या नोआखाली में अंधियारी रातों से लेकर रक्तरंजित सुबहों तक की कराहों को सुनने के लिए पहुंचे थे। उनके हृदय में प्रसन्न और प्रफुल्लित से पहले पीड़ित था। गांधीजी के सामने पांच हजार साल पुरानी सभ्यता और संस्कृति पसरी हुई थी। लेकिन यही संस्कृति और सभ्यता अन्य लोगों के सामने भी थी। लेकिन सत्य, अहिंसा, सदाचार, सर्वोदय और सादगी केवल गांधी जी के जीवन दर्शन में थी। उन्होंने जिस रामराज्य की कोंपल भारतीय स्वतंत्रता के हृदय में रोपी थी, उन्हें उस दिन कल्पना नहीं थी कि एक दिन इस चंदन वन या नंदन वन के सबसे सुंदर वृक्षों पर विषधर फुफकारेंगे। आजकल हम समय-समय पर लोकतंत्र और स्वतंत्रता की विजय दुंदुभियां सुनते हैं। लेकिन अगर गांधीजी के जीवन दर्शन को देखें तो उनके सपनों का स्वराज कुछ और था। आज स्वराज और सर्वाेदय के मूल्यों तक कोई सूनी सांवली सड़क नहीं जाती। आज इस राष्ट्रपिता के सपनों के गांव को जाने और जानने वाले दिशाज्ञान से हम वंचित और प्रवंचित हैं। यही राजनीतिक प्रवंचनाएं हमें अपने ही पिता के जीवन दर्शन से पीठ फेर लेने को प्रसन्न करती प्रतीत होती हैं। गांधीजी के सपनों का लोकतंत्र किसी सत्तावादी तंत्र का निर्माण नहीं करता, अपितु वह ऐसे लोकतंत्र का निर्माण करता है, जो स्वराज की भावना को अपनी आत्मा में बसाता है। गांधी जी के सपनों का लोकतंत्र क्या है? वह गांव-ढाणी तक स्वराज पहुंचाकर झूम उठने का स्वाद है। गांधीजी के सपनों का लोकतंत्र सिरों को गिनने का लोकतंत्र नहीं है। वह एक तारामंडल है, जिसमें हर तारे का अपना महत्त्व है। उनका लोकतंत्र हर नागरिक हृदय को निर्भीक करता है और इस स्तर तक निर्भीक करता है कि किसी ने किसी के हृदय को पीड़ा पहुंचाई तो इस राष्ट्र का पिता उसके घर की देहरी पर खड़ा होता है। इस राष्ट्र के पिता के रथ पर कोई पुत्र सवार नहीं है। इस राष्ट्र के पिता के रथ का कोई पहिया किसी पुत्र के पास नहीं है। रथ का कोई पहिया किसी श्रेष्ठिवर्ग के धन से नहीं चलता। इस रथ से ऐसी कोई शंख ध्वनि नहीं आती, जिसमें हिंसा की कोई प्रेरणा घुली हो। गांधी किसी रक्तरंजित क्रांति का आह्वान नहीं करते। वे हृदय परिवर्तन में विश्वास करते हैं और वे जानते हैं कि रोज़ी-रोटी के महासमर में हर कंठ की पिपासा और हर उदर की जठराग्नि शांत करने का कोई सदाचारपूर्ण रास्ता होना ही चाहिए। गांधीजी के रामराज्य की जिह्वा मांस-स्वाद लोलुप नहीं थी। वह सत्ता लोलुप भी नहीं थी। वह अर्थ प्राप्ति के स्वाद से अनजान थी। गांधीजी ने राजनीति के रूखे और क्रूर अंतर के किसी हृदयहीन कोने में कोमलतम और सुकुमारतम भावानुभूतियां भरने की कोशिश की। गांधीजी के जीवन के दर्शन में ही नहीं, उनके दिन प्रतिदिन के जीवन में सुखानुभूति देने वाले रहस्यमयी संगीत स्वर के स्पर्श उच्छवासों में उमड़ते हैं। उनके रामराज्य के नैतिक मूल्य सायास नहीं हैं। अनायास हैं और उनमें किसी प्रकार की दुराशा नहीं है। आज जिस समय समूची दुनिया पृथिवी को विदीर्ण करने की होड़ में लगी है, वह विकास के नाम पर विनाश की उन्मत्त दौड़ में जुटी है, हिंसा और अनैतिकता की असंख्य तूफानी लहरों पर सवार है, तब गांधीजी से हमें शांति और अहिंसा का मंत्र मिल सकता है। हजारों साल पहले हमारे देश में वेदों की वाणी गूंजी थी। यजुर्वेद के अध्याय 36 का 17वां मंत्र है, जो आए दिन हमें कहीं न कहीं सुनाई पड़ता है, लेकिन हमने कभी इसके भीतर निहित अर्थ को जानने को कोशिश नहीं की। यह सिर्फ़ बोल दिया जाता है। मंत्र इस प्रकार है : द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षम् शान्ति: पृथिवी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:। वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति: सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति: सा मा शान्तिरेधि ॥ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ॥ यह मंत्र कहता है कि द्यौ: यानी सूर्य आदि लोकों का प्रकाश और विज्ञान हमारे लिए सुखदायक हो। यानी हम ऐसी राह पर न जाएं, जहां इनका दु:ख पैदा हो। जो द्याै है, अंतरिक्ष है, जो पृथिवी है, जो जो ओषधियां यानी प्रकृति के अमृतदायी पादप हैं, जो वनस्पतियां हैं, जो पेड़-पौधे और विटप हैं, जो विश्व है, जो देव हैं, जो ब्रह्म है, जो ब्रहांड है, समस्त जगहों पर शांति हो। लेकिन शांति होगी कैसे? हम इस तरह के मंत्र ताे बोलते रहे। हर दिन। हर उत्सव और पर्व पर। लेकिन शांति और अहिंसा को जीवन में आत्मसात करने की विधि तो गांधीजी ने ही सिखाई। आख़िर उनकी महानता का आधार क्या है? यह प्रश्न बार-बार उठता है और अगर हम इस प्रश्न को समझ लें तो कई उलझनें दूर हो जाएंगी। राजनीति में यह आज ही नहीं हैं कि दुर्दम दुष्ट और सर्वशोषक लोगों का बोलबाला है। आज से पहले भी यह ऐसा था और गांधीजी ने इन सबसे पार पाने के लिए ही राह दिखाई। गांधीजी को भले सुभाषचंद्र बोस ने या पंडित जवाहरलाल नेहरू ने महान बताया हो या राष्ट्रपिता कहा हो, लेकिन यह सच बात है कि यह उनका अपना जीवन ही है, जो उन्हें इस स्तर पर ऊंचा उठाता है। आख़िर ऐसा क्या है कि एक बहुत कमज़ोर बालक, जिसकी लिखावट लिखे मूसा और पढ़े ख़ुदा वाली है, जिसे स्कूल में बहुत प्रतिभाशाली नहीं माना जा रहा, जो इतना ताक़तवर भी नहीं है कि दुष्ट बच्चों से अपना बचाव कर सके, जो ब्रिटेन जाकर वक़ालत पढ़ता है, लेकिन बेहतरीन अध्ययन के बावजूद वक़ालत का यही पेशा उन्हें शर्मनाक़ लगता है। और वे जब राजनीति में आते हैं तो एक लंबा अथक संघर्ष करते हैं। राजनीति को बदलते हैं। कष्ट सहते हैं। जेलों की यात्रा करते हैं। लेकिन देश की सबसे ज्वलंत उस हिन्दू मुस्लिम समस्या का भी हल नहीं कर पाते, जो देश के विभाजन और दस लाख से अधिक लोगों की हत्या और दो करोड़ से अधिक लोगों के विस्थापन की वजह बनती है। आख़िर क्या कारण है कि गांधीजी ने स्वयं भारत विभाजन के लिए अपनी विफलता को खुले तौर पर स्वीकार किया और वे महान माने गए? वे इस हद तक गए कि आज़ादी के प्रारंभिक दिनों में ही इन्सानियत के उच्च शिखर को छुआ, जिस वजह से उनके ही एक उन्मादी सहधर्मी ने उनकी हत्या कर डाली। इस सबकी वजह है उनकी व्यक्तिगत खूबियां। जिस सिद्धांत को अपनाया, जिस अहिंसा, सत्य, सादगी, सदाचार और सत्याग्रह को चुना, उसके लिए ऐसा समर्पण कहीं दिखाई नहीं देता। साधन और साध्य की ऐसी शुचिता अन्यत्र दुर्लभ है। वैसा आत्मत्याग क्या कहीं और दिखता है? सादगी और सदाचार से परिपूर्ण दैनिक जीवन में वैभव से दूरियां और दिखावे या प्रदर्शन जैसी कोई बात स्वप्न में नहीं। आज आज ही नहीं, आज़ादी के बाद से ही हम देखते हैं कि सत्ता का कितना दुरुपयोग होता है, लेकिन गांधीजी जिन्होंने आज़ादी दिलवाई एक भी दिन सत्ता के सुख के एक क्षण तक को नहीं छुआ। गांधीजी ने न किसी दोस्त को फायदा पहुंचाया और न किसी परिजन को। उन्होंने अपने पुत्रों तक के प्रति पिता का न्यूनतम कर्तव्य तक नहीं निभाया। उन्होंने देश के आज़ाद होने के बाद या इससे पहले कभी किसी प्रकार की सरकारी सुविधा का भाेग नहीं किया। उन्होंने अपनी समस्त ग़लतियों को समय-समय पर सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया और अगर कभी थोड़ी सी भी ग़लती हुई तो उसका दंड स्वयं को दिया। इस प्रकार उनके जीवन के व्यक्तिगत गुण न केवल अतुलनीय हैं, बल्कि वैसा अन्य इन्सान हमें अपने आसपास जीवन में क्या, इतिहास में भी दिखाई नहीं देता। गांधी जी इसलिए महान हैं क्योंकि उनके लिए लोकतंत्र लोभतंत्र नहीं था। उनके जीवन दर्शन की कोई राह इस तरफ नहीं जाती। वे युद्ध और विनाश की तिज़ारत के ख़िलाफ़ थे। उन्होंने अपने जीते जी कभी किसी मौत के आढ़तिये को राजनीति में अपनी दुकान नहीं खोलने दी। अगर किसी ने ऐसा करने की कोशिश की तो उन्होंने वातावरण ही ऐसा बना दिया कि वह खु़द अपनी दुकान के शटर गिराकर चला गया। वे जनमत के बल के सामने भी नहीं झुके और धार्मिक आग्रहों के सामने भी उन्होंने घुटने नहीं टेके। गांधीजी को हम कभी सत्ता के आगे झुका हुआ नहीं देखते। अलबत्ता, डर कर नहीं या किसी लाभ या लोभ की दृष्टि से नहीं, अपनी कोई ग़लती हुई तो उन्होंने छोटे से छोटे व्यक्ति से भी क्षमा मांगने में संकोच नहीं किया। गांधीजी हमेशा विपदा से घिरे आदमी के समर्थन में खड़े दिखाई दिए हैं। इसके लिए उन्होंने न कभी ऐसे व्यक्ति की राष्ट्रीयता देखी, न धर्म और न जाति। उन्होंने कभी ऐसी राजनीतिक या प्रशासनिक शैली का समर्थन नहीं किया, जिसमें अचानक कोई इन्सान बेघर हो जाए और कोई उस पर हिंसाचार करे। गांधी जी के जीवन को जब हम देखते हैं तो साफ़ झलकता है कि वे सत्ता के नायक या जननायक बनने के लिए उत्कंठित दिखाई नहीं देते। वे किसी मुकुट के लिए कोशिश नहीं करते। उनके लोकतंत्र में मनुष्यता से बड़ा कुछ नहीं है। अगर उन्हें लगता है कि सुदूर किसी जगह कोई कंठ प्यास के कारण एक बूंद के लिए तड़प रहा है तो वे नंगे पांव कोई झरना सिर पर उठाए तपती धरती पर चलते हुए दिखाई देंगे। उनके लिए आज़ादी की गोल्डन या हीरक जयंतियां महत्व नहीं रखतीं। उनके लिए आज़ादी का मतलब अपनी आज़ादी और अपनी स्वतंत्रता के साथ जीना है। वहां दिखावे, प्रदर्शन या विज्ञापन का मायाबल नहीं है। गांधी पथराई प्यास के रेगिस्तान में जलद मेघों की कतार हैं। उनके लोकतंत्र के अंत:करण में पीड़ितों और वंचितों का महकता वसंत है। उनका लोकतंत्र कमज़ोर से कमज़ोर नागरिक को भी अकेला नहीं होने देता, बल्कि उसे ऐसी जिजीविषा और अभय प्रदान करता है, जिसके बल पर वह नृशंस विजेता की बर्बर मुद्रा के सामने भी मुस्कुराकर खड़ा होने का साहस अपने भीतर भर लेता है। यही गांधीवाद है और यही वह कारण है, जो उन्हें राष्ट्रपिता बनाता है। #GandhiJayanti2024 #GandhiJayanthi #fatherofnation #GandhiJayanthi2024 #gandhiji #Bapu #FatherOfTheNation #2october
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Darshan Brar
Darshan Brar@DarshanBrar9·
पत्रकारिता का पहला अध्याय समाप्त हुआ। 18 माह पहले शुरू हुआ भरतपुर भास्कर के साथ सफर, सफल रहा। संपादक Pradeep Sharmaa जी का बहुत बहुत आभार, जिन्होंने मुझ पर विश्वास किया और मुझे क्राइम बीट पर काम करने का मौका देते हुए समय समय पर दिशा निर्देश भी दिए।
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ravish kumar
ravish kumar@ravish_journo·
बात यही थी। 4 मई को पेपर लीक हुआ। NTA को पता चल चुका था। उस समय परीक्षा रद्द होती तो चुनाव का मुद्दा बदल जाता है। सरकार को बचाने के लिए पटना तक सीमित रखने का प्रयास किया । जबकि गिरफ़्तारी राजस्थान से हुई है और बिहार से भी। कोर्ट NTA के साथ खड़ा नहीं रह सकता। अब यह सुनवाई कोर्ट का इम्तहान लेने लगी है। संजय हेगड़े ने शानदार तरीक़े से अपना पक्ष रखा है।
Dr Amit Gupta@agupta_7

Adv. Sanjay Hegde has put everything Brilliantly in these last few minutes that's the best we could have done.. Thank you Hegde sir, It was a pleasure to work with you in past cases and it was a pleasure to hear you again from our side today 🙏 #SupremeCourtOfIndia is now bound to think what's real justice in #NEET case सत्यमेव जयते See Video

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Tribhuvan
Tribhuvan@tribhuvun·
आख़िर राजस्थान विश्वविद्यालय के छात्रों पर हर बरस क्यों बरसती हैं लाठियां? उनकी कौनसी माँग ग़लत और ग़ैरकानूनी है? जैसे हमारे देश में हर काम शुरू करते हुए एक ब्राह्मण को बिठाया जाता है और वह मंत्र पढ़ता है : ॐ अपवित्र: पवित्रो ...य: ...पुण्डरीकाक्षं ....ठीक वैसे ही हर साल जुलाई के इन दिनों में छात्र एक ज़रूरी और सामान्य मांग शुरू करते हैं और प्रशासनिक मशीनरी पुलिस को बुलाती है और वह लाठियां बरसाना शुरू कर देती है। पहली लाठी पीठ पर ...इदन्नमम्। दूसरी लाठी टांगों पर इदन्नत्वम्...। लाठियां ही लाठियां। हमारे देश के प्रात:स्मरणीय राजनेताओं का जैसा दुहरा-तिहरा-चौहरा चरित्र है, उसका सानी दुनिया में कहीं नहीं। वे ऐसी जुगत सीख गए हैं कि लाठी मारने वाला भी उसी परिवार का और लाठी खाने वाला भी उसी परिवार का। लेकिन न मारने वाले को समझ आ रहा और न मार खाने वाले को। ⧭ हमारे सम्मानित और विचारवान नेता सत्ता में एक समान संस्कृति को अपनाते हैं और सत्ता से बाहर होते ही ठीक उसके विपरीत। ऐसा लगता है कि संवाद लिखे हुए हैं और सिर्फ़ उन्हें बोलने वाले मुख अलग हो जाते हैं। विधानसभा में भी यही होता रहता है। ⧭ केंद्रीय चुनाव आयोग किसी बेबसी में भी विधानसभा या लोकसभा का चुनाव दो दिन इधर से उधर करने की कोशिश करे तो लोकतंत्र ख़तरे में पड़ जाता है; लेकिन जैसे ही सत्ता इन विशालहृदय नेताओं के हाथ आती है तो ये विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के चुनावों पर सबसे पहले रोक लगाते हैं। हो सकता है, इसकी कोई आंतरिक वजह बहुत उचित हो, लेकिन मुझ अज्ञानी को आजतक वह वजह समझ नहीं आ सकी। इसके लिए राजनेतागण हम जैसे अधम लोगों को माफ़ ही कर सकता है। ⧭ राजस्थान में इस समय छात्रसंघ चुनावों की मांग हो रही है। कल प्रदर्शन कर रहे विद्यार्थियों पर पुलिस ने बहुत ही बेमुरव्वत अंदाज़ में लाठियां बरसाई हैं। पिछली बार कॉंग्रेस की सरकार ने विधानसभा चुनाव से पहले छात्र संघों के चुनाव हार जाने की आशंका भर में चुनाव टाल दिए थे। हालांकि मेरी जानकारी के अनुसार उसके युवा नेता कॉलेज परिसरों में अधिकांश चुनाव जीत रहे थे। जैसा कि उन्होंने विधानसभा और लोकसभा में साबित भी किया। काँग्रेस सरकार ने वह ग़लती नहीं की होती और छात्र संघों के चुनाव हुए होते तो उसके पक्ष की बयार सामने आ जाती और वह एक ऐसा चुनाव नहीं हारती, जो उसके लिए जीतना बहुत ज़रूरी था और जिसमें ढेरों राजनीतिक चूकों के बावजूद वह मामूली अंतर से हारी। ⧭ अब भारतीय जनता पार्टी की सरकार नहीं चाह रही है कि ये चुनाव करवाए जाएं। सच अब भी वही है। कॉलेज परिसरों में चुनाव होंगे तो भाजपा समर्थक युवाओं के जीतने की संभावना है और इससे उसे अगले पांच उप चुनावों में मदद मिल सकती है। लेकिन सत्तारूढ़ दल ने वही ग़लती शुरू कर दी, जो काँग्रेस ने की थी। ⧭ आख़िर राजस्थान में 76 विश्वविद्यालय हैं, 3,982 कॉलेज हैं और उनमें 13 लाख 25 हजार 607 विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। इनमें 6,03,554 लड़के और 7,22,058 लड़कियां हैं। यह आंकड़ा अभी का उच्च शिक्षा विभाग का है। ⧭ छात्र संघ चुनावों की मांग करने वाले हमारे ही बच्चे हैं और हमीं उन पर लाठियां भांजना शुरू कर दें तो यह प्रथम ग्रासे मक्षिका पाते नहीं, प्रथम ग्रासे गिद्धं पाते जैसा कुछ हो जाता है। ⧭ सवाल ये है कि राजस्थान में छात्रसंघों के चुनाव क्यों नहीं होने चाहिए? यह ज्ञान उन लोगों को कहाँ से मिलता है, जो ख़ुद चुनाव से जीतकर आए होते हैं। हमारे कॉलेज और विश्वविद्यालय सिर्फ़ शिक्षा के केंद्र ही नहीं, लोकतंत्र की पाठशालाएं भी हैं। यहीं से भारतीय लोकतंत्र को आम हिंदुस्तानी युवक नेताओं के रूप में मिलते हैं। इन्हीं छात्र संघ चुनावों से ही राजस्थान कई प्रमुख नेता मिले हैं। छात्र संघों के चुनाव नहीं होते तो राजस्थान श्योपतसिंह, योगेंद्रनाथ हांडा, हेतराम बेनीवाल, सुरेंद्रसिंह राठौड़, राजेंद्रसिंह राठौड़, अमराराम, अश्क अली टाक, राजपालसिंह, दर्शन कोडा, कालीचरण सराफ, हनुमान बेनीवाल, महेश जोशी, सतीश पूनिया, गजेंद्रसिंह शेखावत जैसे नेताओं से वंचित हो जाता। देवीसिंह भाटी और शांति धारीवाल भी छात्र राजनीति से आगे आए राजनेता हैं। अशोक गहलोत और सीपी जोशी भी छात्र राजनीति की सौगाते हैं। ओम बिड़ला भाजयुमो से ही निकले हैं। रघु शर्मा, प्रतापसिंह खाचरियावास, राजपाल शर्मा, राजकुमार शर्मा, महेंद्रजीत मालवीय, जीतमल खांट आदि छात्र संघों के चुनावों की बदौलत ही चमके। कैलाश मेघवाल और मन्ना बापू यानी यशवंतसिंह भी आदिवासी इलाकों के छात्र नेता रहे। जगतसिंह दायमा और जगमालसिंह ने कॉलेज परिसरों से ही चेतना पाई। राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे जयनारायण व्यास तो स्कूल में ही नेता बन गए थे। हरीश चौधरी जैसा नेता भी जोधपुर विश्वविद्यालय की छात्र संघ की राजनीति की ही देन है। ⧭ इनमें कुछ नेता तो ऐसे रहे हैं, जो सत्ता में नहीं रहने के बावजूद वंचितों और उत्पीड़ितों के लिए अकल्पनीय काम करते रहे हैं। हनुमान बेनीवाल जैसा नेता राजस्थान को कहाँ से मिला, जिसने काँग्रेस और भाजपा जैसी ताक़तवर पार्टियों को नतशिर कर रखा है। अभी रवींद्रसिंह भाटी, निर्मल चौधरी और सोमू आनंद जैसे अध्यक्ष भी बने। पहले दो के पास जाति और क्षेत्र का बल भी था; लेकिन सोमू ने एक अलग नैतिक आभा और जेंडर इक्वैलिटी के साथ एक छोटा लेकिन बहुत महत्त्वपूर्ण चुनाव जीता आज रवींद्रसिंह भाटी और निर्मल चौधरी राजस्थान की युवा राजनीति के बड़े सितारे हैं। सोम अब एक रिपोर्टर है और उनकी समझ गहरी है। कभी छात्र राजनीति से ही राजस्थान की पत्रकारिता को ओम सैनी जैसा जज्बे वाला पत्रकार मिला था। ⧭ श्योपतसिंह, योगेंद्रनाथ हांडा, हेतराम बेनीवाल, मोहन पूनमिया, अमराराम जैसे नेताओं के संघर्ष को सलाम कि जिन्होंने भ्रष्टाचारियों की मुश्कें कसने में कसर नहीं छोड़ी और कितने ही किसान आंदोलन लड़े। सुरेंद्रसिंह राठौड़ जैसा साहसिक व्यक्तित्व जिसकी कहानी हॉलीवुड की किसी फ़िल्म के हीरो जैसी रही, क्या वह कॉलेज और विश्वविद्यालय परिसर के बिना संभव था? एक औसत सा गुंडा कहलाने वाला शराबी लड़का ऐसे ट्रांस्फोर्मेशन से भी गुजर सकता है, यह कॉलेज और विश्वविद्यालय परिसरों के पेड़-पौधे तो बता सकते हैं; लेकिन हमारे वे जड़ शिक्षक नहीं, जिनमें अधिकांशत: शिक्षा के अलावा बाकी सब में सब तरह की महारत रखते हैं। आज राजेंद्रसिंह राठौड़ के बिना भाजपा संसदीय और विधायी प्रबंधनों में एकदम लचर ओर लाचार प्रतीत होती है तो इसीलिए कि उस नेता के पास ज़ीरो से हीरो बनने की एक ऐसी कहानी है, जो किसी प्रेरक पुस्तक में नहीं मिल सकती। ⧭ आज अगर आदिवासी इलाकों का दिपदिपाता सितारा लोकसभा में पहुंचकर चर्चित हो चुका है तो इसलिए कि कभी राजकुमार रोत डूंगरपुर के कॉलेज परिसर में एक उम्मीद लेकर आया था। ⧭ अगर हम सरकारी चयन के मानदंडों के हिसाब से देखें तो वह हमारी युवा प्रतिभाओं काे शिखर पर नहीं, गहरे गड्‌ढ़ों में धकेलने वाला एक बुरा लेकिन आकर्षक खेल है। ये मानदंड जिनमें एक अच्छा गार्ड या बॉडी गार्ड या बॉक्सर देखते हैं, उनमें राजनीतिक शासन की प्रतिभा भी संभव है, यह उनके विचार के दायरे से परे की बात है। ⧭ आज जिस अल्पसंख्यक वर्ग को दरकिनार करने के लिए कुछ लोग इन्सानियत और राष्ट्रीयता के समस्त संवैधानिक सरोकारों को पलीता लगा रहे हैं, तब यह सहसा याद आता है कि कोई अश्क अली टाक था जो नोहर के एक सामान्य परिवार से निकला और राजस्थान की राजनीति में सुदूर तक गया। ⧭ भारत पाकिस्तान बॉर्डर के इलाक़ों में ठेले पर सब्ज़ी बेचने या कभी-कभार एक गधे पर कपड़े बेचने का काम करने वाले परिवार के एक ठिग्गू से लड़के का हर कोई उपहास उड़ाता; लेकिन वही लड़का कालांंतर में कॉलेज में पढ़ने लगा और वह गंगानगर से जयपुर के लिए चलता तो ट्रेन के टीटी थर-थर काँपते और राजस्थान विश्वविद्यालय का कुलपति उस दिन सिहर-सिहर रह जाता तो उसकी वजह छात्र राजनीति थी। यह शिक्षा के परिसर ही हैं, जो एक अदने से लड़के को दर्शन कोडा बनाते हैं और बाद में वह श्रमिकों के शोषण के ख़िलाफ़ इतना बड़ी चट्टान बन जाता है कि भाजपा और काँग्रेस दोनों दलों से जुड़े दो नेता उसकी हत्या करवा देते हैं। क्या कोई दर्शन कोडा ऐसे ही बिना किसी विचार के बन जाता है? और क्या यह विचार बिना किसी जीवंत शिक्षा परिसर के आ सकता है? ⧭ राजस्थान विश्वविद्यालय ने एक छात्र संघ अध्यक्ष दिया था। नाम था राजपालसिंह शेखावत। मुझे नहीं लगता कि राजस्थान के किसी राजनेता के पास इतिहास, संस्कृति, मूल्यबोध और आर्थिक मामलों की ऐसी अंतर्दृष्टि किसी अन्य नेता के पास है। अब अभागे राजनीतिक दलों में किसी की क्या छवि है, इसका तो इलाज किसी के पास नहीं। कालीचरण सराफ, सतीश पूनिया, गजेंद्रसिंह शेखावत सरीखे नेता छात्र संघों की बदौलत ही हैं। ⧭ छात्र संघों के चुनाव नहीं होंगे तो राजनीति के लिए नेता कहाँ से आएंगे? वे या तो सत्तावादी-परिवारवादी नेताओं की संतानें होंगी या वे प्रॉपर्टी डीलर्स होंगे या वे आर्थिक अपराधी होंगे या सामाजिक अपराधी होंगे या फिर पैसे, सांप्रदायिकता और जातिवाद के बल पर आए हुए लोग होंगे या फिर वे शराब ठेके चलाकर आने वाले कारोबारी होंगे, जो सरकारों में शीर्ष पदों पर बैठे लोगों की गर्दनों को ऐंठ देने के नुस्ख़ों की महारत में पारंगत होंग। ⧭ राजनीति के लिए कॉलेज परिसर ही सबसे अच्छी नर्सरी हैं; लेकिन जन आंदोलन भी एक बड़ी उर्वरा भूमि हैं। लेकिन अब सरकारें चाहे किसी भी दल की हों, उन्होंने जनआंदोलनों को ख़त्म करने का बीड़ा सा उठा लिया है। इसलिए ले देकर छात्र संघ चुनाव बचते हैं। ⧭ सच कहा जाए तो छात्र संघों के चुनावों को न करवाना भारतीय राजनीति के गर्भाशय को निकाल फेंकना है। ⧭ आज यह भी समझने की ज़रूरत है कि छात्र संघों के चुनाव क्यों होने चाहिए? इसके लिए हम इन बिंदुओं पर विचार कर सकते हैं : 1. लोकतंत्र की आधारशिला हैं ये चुनाव छात्र संघों के चुनाव ज़मीनी स्तर पर वह प्रशिक्षण है, जो हमें भविष्य के लिए अच्छे नेता दे सकता है। इस प्रक्रिया को जारी रखते हुए इसमें सुधार की ज़रूरत है। छात्र संघों के चुनाव के लिए भी एक आयोग होना चाहिए, जो उन्हें धनबल-जातिबल और धार्मिक ध्रुवीकरण की बुराइयों और लोकतांत्रिक मूल्यों के बारे में समझाए। लेकिन यह बहाना बनाकर चुनाव रोके नहीं जाएं। 2. लोकसमाज में से नए नेतृत्व का उभार - ये चुनाव छात्रों को लीडरशिप स्किल डवलप करने, गवर्नेंस की जिम्मेदारियों को समझने और भविष्य की राजनीतिक भूमिकाओं के लिए तैयार होने के अवसर प्रदान करते हैं। छात्र यह सीखते हैं कि उन्हें लोगों से किस तरह संपर्क करना है और लोगों की वास्तविक समस्याएं क्या हैं। छात्र संघों के चुनाव से उन जड़ लोगों को बाहर करना आसान है, जो राजनीति में दुकान जमा लेते हैं। 3. छात्र हितों की बेहतर नुमाइंदगी - निर्वाचित छात्र संघ यह सुनिश्चित करते हैं कि निर्वाचित संघों में विविध इलाक़ों की विविध आवाज़ों और ऐसे इलाक़ों के युवाओं को जगह मिलती है, जिन्हें यह कल्पना भी नहीं होती। उनकी चिंताओं और सरोकारों को समझने वालों को प्रतिनिधित्व दिया जाता है। कॉलेज और विश्वविद्यालय की समस्याओं को वे बेहतर तरीके से समझते हैं और उनके आसान हल उनके पास रहते हैं। 4. पॉलिटिकल अवेयरनेस बढ़ाने में मददगार हैं छात्र संघ चुनाव - चुनावों में भाग लेने से युवाओं में राजनीतिक जागरूकता और सहभागिता बढ़ती है। युवा देशवासी वेल इन्फोर्म्ड और एक्टिव होते हैं। लिहाजा, अब यह संशोधन करने की आवश्यकता है कि छात्र संघ में मेल-फीमेल रिजर्वेशन रहे और 50 प्रतिशत लड़कियां हों ही। जातिगत और धर्मगत प्रचार पर रोक के लिए बेहतरीन वातावरण बने, ताकि एक अच्छा राजनीतिक माहौल पैदा हो। 5. जवाबदेही और पारदर्शिता का प्रशिक्षण - छात्र संघ के पदाधिकारी होते हैं तो विश्वविद्यालय प्रशासन पर नियंत्रण रखते हैं। निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में जवाबदेही और पारदर्शिता को बढ़ावा मिलता है। आज राजस्थान विश्वविद्यालय अपना वार्षिक प्रतिवेदन जारी करता है तो यह नहीं बताता कि इस परिसर में कितने लड़के-लड़कियां पढ़ रहे हैं? वे किन पाठ्यक्रमों में कितने हैं? आम तौर पर 22 हजार से 25 हजार स्टूडेंट वोटर होते हैं, लेकिन इस संख्या का हिसाब विश्वविद्यालय छुपाए रखता है। 6. टकरावों को कम करने में मददगार -निर्वाचित छात्र संघ चुनाव ग्रीवेंसेज को हल करने के लिए एक स्ट्रक्चर्ड प्लेटफॉर्म देते हैं। इनके माध्यम से विरोध और टकराव को टाला जा सकता है। लेकिन इस तर्क पर बहुत से शिक्षक हंसेंगे। हालांकि वे खुद जब-तब प्रदर्शन करते हैं, नारे लगाते हैं, काली पट्टियां बांधते हैं और विद्यार्थियों को जाने कैसे-कैसे शब्दों में कोसते हैं। यह दुहरा आचरण ही है कि जो शिक्षक कक्षा में लोकतंत्र पर लंबे व्याख्यान और आख्यान प्रस्तुत करते हैं, उस कक्ष से बाहर आते ही लोकतंत्र की शिक्षाओं को पलटने के लिए पूरा दमख़म लगा देते हैं। 7. हाशिये पर पड़े मार्जिनैलाइज्ड समूहों को एम्पावर करने में मददगार - छात्र संघ हाशिये पर पड़े मार्जिनैलाइज्ड समूहों को एम्पावर करने का काम तो करते ही हैं, वे ऐसे समूहों को भी मौके मुहैया करवाते हैं, जिन्हें कभी प्रतिनिधित्व नहीं मिला होता। अनसुनी आवाज़ों को अवसर देने का मौका और कहां मिलेगा? छात्र संघ चुनाव यह सुनिश्चित करते हैं कि उनके मुद्दों को उजागर किया जाए और उनका समाधान किया जाए। आप सहमत हों या असहमत; लेकिन अगर रवींद्रसिंह भाटी ने जोधपुर विश्वविद्यालय का चुनाव नहीं जीता होता तो आज न तो एक सामान्य शिक्षक का बेटा विधानसभा में इतना प्रखर होकर बोल रहा होता और न ही कॉंग्रेस का सांसद लोकसभा में पहुंच पाता। यह सब रवींद्रसिंह भाटी की लोकप्रियता के कारण ही है। 8. अकादमिक और एक्स्ट्राकरिकुलर के बीच बैलेंस - अकादमिक और एक्स्ट्राकरिकुलर के बीच बैलेंस छात्र संघों के चुनाव ही रख सकते हैं। छात्र हितों का प्रतिनिधित्व वे ही कर सकते हैं। निर्वाचित छात्र नेता अकादमिक और एक्स्ट्राकरिकुलर के बीच एक संतुलित दृष्टिकोण की वकालत कर सकते हैं, जिससे समग्र छात्रों के अनुभव संसार में वृद्धि होती है। दिक्कत यह है कि युवा छात्रों की भाषा एक ऊर्जा स्रोत से निकलती है और वह शिक्षक नामक उस जीव को बहुत बुरी लगती है, जो अपने आपको लोकतांत्रिक प्रणाली का शिक्षक समझने की वास्तविकता के बजाय भारतीय पौराणिक काल के गुरु की भूमिका में आ चुका होता है और हर समय हर छात्र को पांवोंं में शरणागत पाकर ही प्रसन्न होता है। 9. डेमाक्रेटिक इंस्टीट्यूट्स को मज़बूत बनाना - लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में प्रारंभिक भागीदारी या तो पंचायती राज संस्थाओं के माध्यम से की जा सकती है या फिर स्थानीय निकाय में। लेकिन युवाओं के लिए सबसे बेहतर जगह कॉलेज और विश्वविद्यालय परिसर ही हैं। युवा छात्र जब निर्वाचन की प्रक्रिया से गुजरते हैं तो इससे देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को मज़बूती मिलती है। इन परिसरों में ही छात्र जीवन मूल्यों को सीखते हैं और प्रोफेशनल निजी जीवन में संतुलन हासिल करते हैं। अगर कहीं कमी रहती है तो उसे अच्छे नियम बनाकर दुरुस्त किया जा सकता है। 10. छात्र संघों के चुनावों से कैंपस में जीवंतता आती है - छात्र संघों के चुनावों की वजह से कैंपस जीवंत रहते हैं। चुनाव में उतरने वाले युवा भविष्य के नेताओं के रूप में नई कोंपलों की तरह खिलते हैं और भविष्य के प्रमुख भारतीय नेताओं के रूप में उभरते हैं, जो साबित करते हैं कि ये चुनाव भविष्य के राजनीतिक और सामाजिक नेताओं के लिए एक महत्वपूर्ण उर्वर भूमि हैं। ऐसी ज़रख़ेज़ ज़मीन से निकले नेता एक बेहतर मज़बूत व्यक्तित्व के धनी बनते हैं। कुल मिलाकर, छात्र संघ चुनाव सिर्फ़ परंपरा का मामला भर नहीं है; बल्कि यह युवा व्यक्तियों में लोकतांत्रिक मूल्यों और नेतृत्व कौशल को बढ़ावा देने वाली एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया ही सुनिश्चित करती है कि छात्रों की आवाज़ सुनी जाए और उस पर कार्रवाई की जाए, जिससे एक अधिक इन्क्लूज़िव और रीप्रेजेंटेटिव अकैडमिक एन्वायर्नमेंट बनाने में मदद मिले। अगर छात्र संघों के चुनाव होंगे तो कॉलेज और विवि परिसर जीवंत होंगे। फर्जी छात्रों और फर्जी शिक्षकों की पोल खुलेगी। फर्जी डिग्रियों का कारोबार रुकेगा और एक अच्छा वातारण बनेगा, जहाँ अच्छे और सुचिंतित अध्ययनशील शिक्षकों का सम्मान बहाल होगा। ⧭ और अंत में इस ज़रख़ेज़ ज़मीन को मक्तल में मत बदलो शासकीय तंत्र के सिपहसालारो। ⧭ @RavindraBhati_ @AmraRamMPSikar @Rajendra4BJP @Rajpal_BJP @NirmlChoudhary @PSKhachariyawas @NirmlChoudhary @SomuAnand_ @Barmer_Harish ( ये तथ्य और मान्यताएं अंतिम नहीं हैं। कृपया संशोधन नि:संकोच सुझाएं। इसके लिए DM करें।)
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Jeetu Burdak
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सत्यपाल मलिक जी ने तो पहले ही समझाया था कि किसान कौम कभी भूलती नहीं है बदला लेती हैं, इनका patience चैक मत करो। 🔥 इस तमाचे के बाद कंगना की जीब पर लगाम रहेगी।🤫
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@meenaaindia 'भविष्यवाणी' नहीं सिर्फ झूठ था, जो इसे पहले भी नहीं फैलाना चाहिए था।
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Darshan Brar
Darshan Brar@DarshanBrar9·
@tribhuvun एक थप्पड़ से आंतकवाद बढ़ गया, जब किसानों पर मोटार्र दागे जा रहे थे तो कौनसा शांति सम्मेलन का प्रचार हो रहा था ..
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Tribhuvan@tribhuvun·
पंजाब में आतंकवाद बढ़ रहा है : कँगना रनौत
The Quint@TheQuint

Mandi MP #KanganaRanaut was allegedly slapped by a woman CISF personnel at the security check post at #Chandigarh Airport on Thursday, 6 June, 2024. Later posting on social media, Kangana said the woman officer "hit" her on her face as she "supported the farmers' protest".

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Darshan Brar
Darshan Brar@DarshanBrar9·
जो बदतमीजी किसान आंदोलन के समय के कंगना ने की थी, क्या उस पर भी दो शब्द लिखने की हिम्मत हुई थी आपकी ??
Arvind Chotia@arvindchotia

प्रिय राहुल गांधी जी, खड़गे जी, आज चंडीगढ़ एयरपोर्ट पर मंडी से हाल ही निर्वाचित हुई लोकसभा सदस्य कंगना रानाउत को एक सीआईएसएफ की सुरक्षा कर्मी ने थप्पड़ जड़ दिया। सुरक्षा कर्मी किसान आंदोलन के दौरान कंगना द्वारा किसानों को लेकर दिए गए बयान से आहत थीं। ऑपरेशन ब्लू स्टार से नाराज होकर आपकी दादी जी और देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी जी की हत्या उनके सुरक्षा कर्मियों ने कर दी थी। इस देश को इंदिरा जी की हत्या से बहुत बड़ा सदमा लगा था और वह सदमा यह देश आज तक झेल रहा है। देशभर में अनेक मंचों से आपने इस घटना का उल्लेख किया है। आज आपत्तिजनक और पीड़ादायक यह है कि आपकी पार्टी के बड़े-बड़े नेता चंडीगढ़ एयरपोर्ट की घटना को सही ठहरा रहे हैं और इसे विभिन्न प्रकार से जस्टिफाई करने की कोशिश कर रहे हैं। उनको देखा देखी उनके समर्थक भी उसी राह पर चल पड़े हैं। यह अत्यंत ही घातक प्रवृत्ति है। इस देश में राजनीतिक बयानबाजी की एक लंबी श्रृंखला है जिसके आधार पर अगर इस तरह के हमले होने लग गए तो शायद कोई भी सुरक्षित नहीं रहेगा क्योंकि अलग-अलग बयानों से किसी न किसी की भावनाएं आहत होती रहती हैं। आज आपकी जिम्मेदारी बनती है कि आप अपने उन सभी नेताओं और समर्थकों को सार्वजनिक रूप से फटकार लगाई और उन्हें इस घटना को महिमा मंडित करने से रोकने के लिए कड़ा कदम उठाएं। अन्यथा यह भेड़ चाल इस देश को कहीं का नहीं छोड़ेगी। मोहब्बत की दुकान में इतनी नफ़रत के लिए जगह हो ही नहीं सकती। @RahulGandhi @kharge

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Arvind Chotia
Arvind Chotia@arvindchotia·
प्रिय राहुल गांधी जी, खड़गे जी, आज चंडीगढ़ एयरपोर्ट पर मंडी से हाल ही निर्वाचित हुई लोकसभा सदस्य कंगना रानाउत को एक सीआईएसएफ की सुरक्षा कर्मी ने थप्पड़ जड़ दिया। सुरक्षा कर्मी किसान आंदोलन के दौरान कंगना द्वारा किसानों को लेकर दिए गए बयान से आहत थीं। ऑपरेशन ब्लू स्टार से नाराज होकर आपकी दादी जी और देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी जी की हत्या उनके सुरक्षा कर्मियों ने कर दी थी। इस देश को इंदिरा जी की हत्या से बहुत बड़ा सदमा लगा था और वह सदमा यह देश आज तक झेल रहा है। देशभर में अनेक मंचों से आपने इस घटना का उल्लेख किया है। आज आपत्तिजनक और पीड़ादायक यह है कि आपकी पार्टी के बड़े-बड़े नेता चंडीगढ़ एयरपोर्ट की घटना को सही ठहरा रहे हैं और इसे विभिन्न प्रकार से जस्टिफाई करने की कोशिश कर रहे हैं। उनको देखा देखी उनके समर्थक भी उसी राह पर चल पड़े हैं। यह अत्यंत ही घातक प्रवृत्ति है। इस देश में राजनीतिक बयानबाजी की एक लंबी श्रृंखला है जिसके आधार पर अगर इस तरह के हमले होने लग गए तो शायद कोई भी सुरक्षित नहीं रहेगा क्योंकि अलग-अलग बयानों से किसी न किसी की भावनाएं आहत होती रहती हैं। आज आपकी जिम्मेदारी बनती है कि आप अपने उन सभी नेताओं और समर्थकों को सार्वजनिक रूप से फटकार लगाई और उन्हें इस घटना को महिमा मंडित करने से रोकने के लिए कड़ा कदम उठाएं। अन्यथा यह भेड़ चाल इस देश को कहीं का नहीं छोड़ेगी। मोहब्बत की दुकान में इतनी नफ़रत के लिए जगह हो ही नहीं सकती। @RahulGandhi @kharge
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