जब मेरठ में मुसलमानो के घरों पर बुल्डोजर चल रहा था तब इसी सेंट्रल मार्केट में मिठाईयां बांटी जा रही थी, खुशियां मनाई जा रही थी, बुल्डोजर बाबा की जय कही जा रही थी,
अब खुद इनकी दुकानों और घरों पर चल रहा है, तो ये सरकार को तानाशाही सरकार बता रहे है,
दूसरों की मजबूरी पर हंसने वालों को हमेशा अपनी बारी का इंतजार करना चाहिए...
हमारे कुछ साथी पूछ रहे हैं कि एक IPS जोड़ी जिनकी सैलरी लाख रुपए के आसपास हैं, वो तीन तीन ग्रैंड रिस्पेशन कैसे कर सकता हैं ?
उनको बताना चाहता हूं कि मेरे गांव में एक आदमी सिपाही की पोस्ट पर भर्ती हुआ था ,
और आज उसके पास एक इंग्लिश मीडियम स्कूल , करोड़ों की जमीन और कई SUV भी हैं!
घर ऐसा हैं जैसे किसी विधायक सांसद की कोठी , और अब रिटायर होने के बाद चुनाव में भी हाथ आजमाना चाहता हैं!
जब एक सिपाही इतना कुछ कर सकता हैं, फिर ये तो दोनों IPS हैं, इनके जलवा का हम लोग अंदाजा भी नहीं लगा सकते हैं !
>स्टीमर डूबने के बाद पता चलता है कि सवारी ने लाइफ़ जैकेट नहीं पहने थे,
>बस जलने के बाद पता चलता है कि उसमें इमर्जेंसी एग्जिट डोर तो था ही नहीं,
>ट्रॉली पलटने के बाद पता चलता है कि ट्रॉली में सवारी बैठाना मना है,
>ट्रक पलटने के बाद पता चलता है कि वो ओवरलोडेड था।
>1000 करोड़ की संपत्ति बना लेके बाद पता चलता है कि ऑफिसर भ्रष्ट था
> मरीजों के मरने के बाद पता चलता है कि हॉस्पिटल के पास लाइसेंस नहीं था
>लोगों के मरने के बाद पता चलता है कि खाना एक्सपायर्ड था
>दस्त लगने के बाद पता चलता है कि दूध में यूरिया मिला था।
"दरअसल इन सबके बारे में सिस्टम को पता होता है, बस भ्रष्टाचार की वजह से चलता रहता है।
जब पकड़े जाते हैं तब सबकुछ सामने आता है।
मेरठ के यह व्यापारी सोचते थे बुलडोजर मुसलमानों के लिए हैं। यह सब भाजपा के वोटर हैं। शिक्षा स्वास्थ्य के लिए कभी भी वोट नहीं दिया।
लगाओ नारा: मोदी है तो मुमकिन है।
बाद एक ही बात लगेगी आग तो आयेंगे कई घर जद में……
@madanmohansoni it seems that Law and order situation has totally failed in UP @CMOfficeUP@dgpup . No person is following the rules. It is a system failure outcome
यह वीडियो देखकर आपकी रूंह काँप जाएगी, यूपी के आगरा में मोटर साइकिल से जा रहे कपिल को आधी रात में तेज स्पीड से आ रही कार ने उड़ा दिया और महज़ कुछ ही सेकंड में कपिल की मौत हो गई। मामला सिकंदरा का है.
पीएम मोदी के काफिले ने एम्बुलेंस को दिया रास्ता
◆ दरअसल बंगाल में पीएम मोदी रोड शो कर रहे थे, इस दौरान एक एम्बुलेंस पीछे से आ रही थी
@narendramodi | Narendra Modi Ambulance
जब मैं लिखा था, तीर्थो को अय्याशी का अड्डा बना दिया गया है तब कईयों ने मेरा हिन्दु सर्टिफिकेट कैंसल कर दिया। इन्हें समझना चाहिए, तीर्थ अर्थव्यवस्था का साधन है। आज से नहीं शुरू से। लेकिन अर्थव्यवस्था का साधन होना और पर्यटन का साधन होने में फर्क है। पूर्ववर्ती सरकारों ने तो तीर्थों पर कोई ध्यान नहीं दिया। इस सरकार ने ध्यान दिया। लेकिन ध्यान ऐसा दिया कि तीर्थो को पर्यटन बना दिया गया। हनीमून मनाने तक अयोध्या, काशी जा रहे लोग। पर्यटकों के लिए oyo तक थोक मात्रा में खुल चुके हैं। अभी आचार्य मिथिलेशनन्दनी शरण जी को सुना। वे जैसे कह रहे थे मानो वर्षो की गुस्सा है उनमें। कह रहे अयोध्या में विकास हुआ है लेकिन ऐसा विकास भी क्या जो तीर्थो की महत्ता को ही लोप कर दे। तीर्थो को पर्यटन का साधन बना दिया। लोग हनीमून गोवा, मनाली छोड़ यही मनाने आ रहे। सेल्फी स्थल बना दिया है। अयोध्या के घाट वेडिंग शूट के लिए नहीं बने हैं। वे रीलबाजों के लिए नहीं बने हैं। भला आदमी आधा घंटा ठहर नहीं सकता है, ऐसी राम की पैड़ी हो गई है। आप अयोध्या में दक्षिण के वृक्ष लगा रहे हैं। जबकि ये अयोध्या है, उत्तर भारत है। आपने उत्तर-दक्षिण को साधने के लिए तीर्थो की उसकी वास्तविकता से दूर कर रहे हैं। वाल्मीकि जी ने अयोध्या के वृक्षों का वर्णन किया वह कहाँ है? अयोध्या की जलवायु के वृक्ष कहां हैं? जो साधु-संत जाति रहित होते हैं, आप उन साधु-सन्तों की जाति कर रहे कि वह अपनी जाति का वोट आपको दिलवाए। इसकी कल्पना किसने की थी? सरकार ने अयोध्या के हाईवे पर हनुमान और वाल्मीकि बिठा दिए। न सिर पर कोई छतरी न कोई आवरण। वे ट्रकों की धूल फांक रहे हैं, गाड़ियों से शीशा खोलकर थूकते हुए ड्राइवर उनके दो फ़ीट दूर से गुज़रते हैं। सब कुछ आपके लिए तमाशा है? सब आपके लिए सिंबल है? आप खेल की तरह देवी देवताओं का इस्तेमाल करेंगे फिर मंदिरों में बैठे भगवान क्या करेंगे, अगर सड़कों पर भी उन्हीं से सजावट होनी है? और सरकार ने अम्बेडकर की हर मूर्ति को छतरी से पाटने का निर्णय लिया है। उसपर करोड़ों करोड़ खर्च किए जाएंगे। हर वर्ष करोड़ों करोड़ खर्च किए जाएंगे। क्या यह सनातनियों के साथ धोखा नहीं?
अब जो मेरा हिन्दु सर्टिफिकेट कैंसल किया वे शरण जी का भी हिन्दु सर्टिफिकेट कैंसल कर दे। क्या शरण जी को नहीं दिख रहा विकास हुआ है?
आचार्य मिथिलेशनन्दनी शरण जी के प्रति मेरे मन मे अधिक सम्मान है। उनको सुनना मतलब बस सुनते ही रहना है। किंतु एक सवाल मिथिलेशनन्दनी शरण जी से भी है, जब अयोध्या के इन्हीं विकास को लेकर शङ्कराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद वर्षो पहले से आवाज उठा रहे थे, विरोध कर रहे थे तब आप सन्त मौन धारण कर रखे थे। आप मौन थे। उनके साक्ष्य, बयान को झूठा बताया गया, गालियां दिलवाई गई। अब क्या हो गया जो आप इस विकास पर खेद प्रकट कर रहे? क्या संत समाज सेलेक्टिव होकर निर्णय लेंगे?
Courtesy Raj k Sharma fb post feel free to share and awaken all.
@AhteshamFIN सिद्दीकी साहब उत्तर प्रदेश में घूस न लेने वाले अल्पसंख्यक हो गए और जल्दी ही विलुप्त हो जाएंगे। आज के समय में केवल वही घूस नहीं ले रहा है जिसको मिल नहीं रहा है भ्रष्टाचार कोहरे की तरह ऊपर से आता है मुख्यमंत्री जी कुछ भी कर लें। सब हो रहा है सभी जानते हैं। अब यह शिष्टाचार बन गया है
ऐसे विभाग और योजनाओं के नाम जिनका काम सिर्फ भ्रष्टाचार करना है, नोट कर लो -
1- Fssai
2- नहर एवं सिंचाई विभाग
3- स्वच्छ भारत मिशन
4- नमामि गंगे
5- मनरेगा
6- आयुष्मान भारत
7- पंचायती राज
8- खाद्य विभाग
कुछ आप लोग भी बताओ...........
राहुल सांकृत्यायन के बारे में आज के युवाओं को चौंका देने वाली दस अहम बातें :
1.उनका नाम राहुल नहीं, केदारनाथ पांडेय था। यानी जिस व्यक्ति को हम “महापंडित राहुल सांकृत्यायन” के नाम से जानते हैं, उसने अपने जीवन में सिर्फ विचार नहीं बदले, अपना व्यक्तित्व भी खुद गढ़ा। यह अपने आप में बताता है कि मनुष्य जन्म से नहीं, अपनी बौद्धिक यात्राओं से बनता है।
2.वे 13 साल की उम्र में घर से भाग गए थे। आज के युवाओं के लिए यह चौंकाने वाली बात है कि भारत के सबसे बड़े घुमक्कड़-बुद्धिजीवियों में एक ने किशोरावस्था में ही तय कर लिया था कि सामान्य, सुरक्षित, व्यवस्थित जीवन उनके लिए नहीं है।
3.वे एक ही विचारधारा में बंद नहीं रहे। वैष्णव साधु से आर्यसमाजी, फिर बौद्ध भिक्षु और अंततः नास्तिक समाजवादी और अंततः मार्क्सवादी बने।आज जब लोग एक ट्वीट या एक पहचान में खुद को बंद कर लेते हैं, राहुल सांकृत्यायन का जीवन बताता है कि सच्चा बुद्धिजीवी लगातार अपने विश्वासों की परीक्षा करता है।
4.उन्होंने ईश्वर-दर्शन की चाह में कठोर तप किया और विफल होने पर आत्महत्या तक का प्रयास किया। यह प्रसंग केवल सनसनीखेज नहीं, बल्कि गहरा मानवीय है। इससे पता चलता है कि उनका नास्तिकता की ओर जाना फैशन नहीं था; वह एक बहुत कठिन आत्मानुभव और तर्क की यात्रा का परिणाम था।
5.उन्होंने भारत के बड़े हिस्से और हिमालयी इलाकों की यात्राएँ पैदल कीं। आज की “ट्रैवल” संस्कृति से यह बिल्कुल अलग है। उनके लिए यात्रा पर्यटन नहीं, ज्ञान-साधना थी। वे घूमने नहीं, सीखने निकलते थे। इसी कारण उन्हें हिन्दी यात्रा-साहित्य का जनक कहा जाता है।
6.उन्होंने तिब्बत से हजारों दुर्लभ बौद्ध पांडुलिपियाँ खोजकर भारत लाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। पटना म्यूज़ियम के आधिकारिक विवरण के अनुसार, उनसे जुड़ी लगभग 10,000 पांडुलिपियों का दान दर्ज है। सोचिए, एक लेखक केवल किताबें लिख ही नहीं रहा था, वह भारत की खोई हुई बौद्धिक स्मृति वापस ला रहा था।
7.वे बहुभाषी विलक्षण प्रतिभा थे, लेकिन लिखना उन्होंने मुख्यतः हिन्दी में चुना। उनके बारे में लगभग 30 भाषाओं का ज्ञान होने का उल्लेख मिलता है। और फिर भी उन्होंने ज्ञान की प्रतिष्ठा अंगरेज़ी में नहीं, हिन्दी में बनाई। यह आज के युवाओं के लिए बड़ा सबक है कि भाषाहीनता नहीं, आत्मविश्वास का माध्यम भी हो सकती है।
8.वे केवल लेखक नहीं, जेल जाने वाले राजनीतिक कार्यकर्ता भी थे। वे किसान आंदोलनों और औपनिवेशिक सत्ता-विरोधी गतिविधियों से जुड़े, कई बार जेल गए और उनका लेखन सिर्फ पुस्तकालयी बौद्धिकता नहीं था; वह संघर्ष से पैदा हुआ विचार था।
9.उन्होंने रूस में पढ़ाया, एक रूसी महिला एलेना कोज़ेरोव्सकाया से विवाह किया और उनका पुत्र इगोर हुआ। यह बात आज भी बहुतों को नहीं मालूम। एक हिन्दी लेखक, बौद्ध विद्वान, किसान-नेता और अंतरराष्ट्रीय जीवन जीने वाला व्यक्ति—यह संयोजन राहुल सांकृत्यायन को अपने समय से बहुत आगे का मनुष्य बनाता है।
10.वे केवल ‘घुमक्कड़’ नहीं, गंभीर इतिहासकार भी थे और ‘मध्य एशिया का इतिहास’ के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला। हिन्दी में गंभीर, विश्वस्तरीय इतिहास-लेखन संभव है; यह उन्होंने करके दिखाया। साहित्य अकादेमी की आधिकारिक सूची में 1958 में उनके लिए मध्य एशिया का इतिहास दर्ज है।
राहुल सांकृत्यायन से आज के युवाओं के लिए सबसे बड़ा सबक यह निकलता है: ज़िंदगी को सिर्फ करियर मत बनाइए, उसे बौद्धिक साहस, यात्रा, भाषा, तर्क और आत्म-परिवर्तन की खुली प्रयोगशाला बनाइए। वे अतुलनीय कल्पनाशील थे। उन्होंने “बाईसवीं सदी” जैसी पुस्तक बीसवीं सदी में लिखी। “तुम्हारी क्षय” उनकी कमाल पुस्तक है।
आज भारत के प्रथम चक्रवर्ती सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य की जयंती के पावन अवसर पर उन्हें शत-शत नमन।
हम भगवान राम को ईश्वर के रूप में पूजते हैं, कृष्ण को भगवान मानते हैं, हम महाराणा प्रताप की वीरता का गुणगान करते हैं और छत्रपति शिवाजी महाराज की बहादुरी पर गर्व करते हैं। इन महान पुरुषों में से कुछ के चरित्र अलौकिक थे, कुछ में कूटनीतिक गुण थे, और कुछ अदम्य साहस व दृढ़ निश्चय के प्रतीक थे।
लेकिन जब हम इन महान व्यक्तियों की राजनीतिक उपलब्धियों का विश्लेषण करते हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि वे अंततः सीमित क्षेत्रों के ही शासक थे। उन्होंने अपना अधिकांश जीवन या तो अपने छोटे-से राज्य की रक्षा में बिताया या फिर उसे स्थापित करने में। उनके व्यक्तित्व का गौरव निस्संदेह महान था, परंतु उनकी उपलब्धियों को कई बार बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया गया है। इनमें से कोई भी संपूर्ण भारत को एकजुट कर एक विशाल साम्राज्य स्थापित नहीं कर सका।
जहाँ तक राम की बात है, उनके अस्तित्व के विषय में भी अनेक मतभेद और रहस्य हैं। उनके जीवन की कई घटनाएँ संदिग्ध मानी जाती हैं। कृष्ण एक महान कूटनीतिज्ञ थे, जिन्होंने पांडवों को उनका राज्य वापस दिलाने में सहायता की, किंतु स्वयं उनका राज्य द्वारका तक ही सीमित रहा। महाराणा प्रताप ने अपना जीवन अपने राज्य की रक्षा में समर्पित कर दिया, जबकि मुगल सम्राट अकबर जैसा शक्तिशाली शासक भी पूरे भारत पर अधिकार नहीं कर सका। छत्रपति शिवाजी महाराज ने भी मुख्यतः महाराष्ट्र के पहाड़ी क्षेत्रों में एक मराठा साम्राज्य की स्थापना की। ब्रिटिश इतिहासकार स्मिथ ने तो उन्हें “पहाड़ी चूहा” तक कह दिया था।
भारत के इतिहास में अन्य भी अनेक योद्धा और शासक हुए हैं, जिनका अपना-अपना स्थान है—कुछ का स्थान उचित है और कुछ का अतिशयोक्ति का परिणाम।
परंतु जब हम इन सभी महान व्यक्तियों की राजनीतिक उपलब्धियों की तुलना चंद्रगुप्त मौर्य से करते हैं, तो यह निष्कर्ष निकलता है कि वे वास्तविक अर्थों में भारत के प्रथम सम्राट थे। उन्होंने केवल केरल और तमिलनाडु के कुछ भागों को छोड़कर लगभग पूरे भारत को अपने अधीन कर लिया था, साथ ही वर्तमान अफगानिस्तान के बड़े हिस्से पर भी उनका अधिकार था। उनके समय में उनका साम्राज्य विश्व के सबसे विशाल साम्राज्यों में से एक था और उनकी सेना भी अत्यंत विशाल थी—कुछ इतिहासकारों के अनुसार लगभग 6,00,000 सैनिक उनके अधीन थे।
इसी महान सम्राट ने एक संगठित और एकीकृत भारत की कल्पना को वास्तविक रूप दिया। साधारण परिस्थितियों में जीवन शुरू करने वाले चंद्रगुप्त मौर्य ने अपनी प्रतिभा और पराक्रम से असाधारण ऊँचाइयाँ प्राप्त कीं। कुछ लोग उन्हें शूद्र सिद्ध करने का प्रयास करते हैं, जो कि राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित है, जबकि यह स्पष्ट रूप से प्रमाणित है कि उस काल में समाज मूलतः जाति-विहीन और वर्ण-विहीन था।
वे उस समाज से आते थे जिसे “खत्तीय” कहा जाता था। “खत्तीय” पालि भाषा का शब्द है, जिसका प्रयोग उस समय खेती करने वाले समुदायों के लिए किया जाता था—जिनमें शाक्य, कोलिय, मोरिय (मौर्य) आदि अनेक गण-समूह शामिल थे। इन्हीं समुदायों में से उनके गणराज्यों के प्रमुख भी चुने जाते थे, जिन्हें “राजा” का पद दिया जाता था। यह व्यवस्था अत्यंत लोकतांत्रिक और सामूहिक नेतृत्व पर आधारित थी। शांति के समय ये लोग खेती-बाड़ी करते थे, और युद्ध के समय शस्त्र उठाकर अपने गणराज्य और मातृभूमि की रक्षा करते थे।
चंद्रगुप्त मौर्य की उपलब्धियों पर संदेह करना स्वाभाविक प्रतीत होता है, क्योंकि भारतीय इतिहास में शायद ही कोई अन्य शासक उनके समान महान कार्य कर सका हो। यह भी सत्य है कि साधारण लोग अपनी सफलताओं के लिए जाने जाते हैं, जबकि महान व्यक्तियों को अक्सर उनकी असफलताओं के आधार पर आँका जाता है।
मौर्य वंश को कभी-कभी इस आधार पर आलोचना का सामना करना पड़ता है कि सम्राट सम्राट अशोक की अहिंसा की नीति ने भारत को कमजोर बना दिया। परंतु यह भूल जाना अनुचित होगा कि इसी मौर्य साम्राज्य ने भारत को एकता के सूत्र में बाँधा और विश्व को शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का संदेश दिया।
आज, चंद्रगुप्त मौर्य की जयंती के अवसर पर हमें उनके जीवन से प्रेरणा लेने की आवश्यकता है—संगठन, एकता, परिश्रम और दृढ़ निश्चय की प्रेरणा। हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि एक साधारण पृष्ठभूमि से उठकर भी कोई व्यक्ति पूरे राष्ट्र की दिशा और दशा बदल सकता है।
आइए, इस महान सम्राट की जयंती पर हम संकल्प लें कि हम भी उनके आदर्शों पर चलकर समाज में एकता, समानता और प्रगति का मार्ग प्रशस्त करेंगे।
जय सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य!
कानपुर विजिलेंस ने कमर्शियल टैक्स विभाग के रिटायर्ड एडिशनल कमिश्नर केशव लाल के खिलाफ भ्रष्टाचार का केस दर्ज किया है. जांच में उनकी 100 करोड़ से अधिक की बेनामी संपत्ति और करोड़ों के जेवरात का पता चला है. आय से कई गुना अधिक खर्च और संपत्तियों के मिलने के बाद अब उन पर कानूनी शिकंजा कस गया है.
@asim_arun Seizure is temporarily for showoff to public.... The final Outcome is important which will definitely go in his favour 😃😊😁 . You also know very well.
@PMOIndia@CMOfficeUP
"ये अयोध्या एक धोखा है!"
योगी राज की अयोध्या पर अयोध्या के परम विद्वान आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण के भाषण का एक और हिस्सा।
"कम से कम अयोध्या के घाट तो छोड़ दीजिए।
वे वेडिंग शूट (Wedding shoot) के लिए नहीं बने हैं।
वे रील बाजों के लिए नहीं बने हैं।
भला आदमी आधा घंटा ठहर नहीं सकता है, ऐसी राम की पैड़ी हो गई है!!
अयोध्या के हाईवे पर हनुमान और वाल्मीकि बैठे हुए हैं।
न सिर पर कोई छतरी। न कोई आवरण।
वे ट्रकों की धूल फांक रहे हैं।
गाड़ियों से शीशा खोलकर थूकते हुए ड्राइवर उनके दो फ़ीट दूर से गुज़रते हैं।
सब कुछ आपके लिए तमाशा है।
सब आपके लिए सिंबल है।
आप खेल की तरह देवी देवताओं का इस्तेमाल करेंगे।
फिर मंदिरों में बैठे भगवान क्या करेंगे, अगर सड़कों पर भी उन्हीं से सजावट होनी है?
अयोध्या में आप दक्षिण के पेड़ लगा रहे हैं। ये पॉम ट्री हैं?
अरे अयोध्या की जलवायु के वृक्ष कहां हैं?
आप पांच गुना-दस गुना पेमेंट करते हैं, फिर उन पेड़ों की रखवाली करते हैं।
इस अयोध्या में रामायणियों की कथा परंपरा ही शून्य हो चुकी है ।"
अयोध्या को शास्त्रों में “अयोध्य” कहा गया है, यानि जिसे शत्रु जीत न सके।
मगर विडंबना तो देखिए, जिस अयोध्या को दुनिया नहीं जीत पाई,
उसे राम की विरासत के कलियुगी टेंडर के विजेता ठेकेदारों ने मिलकर हरा दिया!!
UP: अलीगढ़ के लोधा थाना जॉइन करने जा रहे दरोगा ब्रषपाल सिंह की नगर निगम के ट्रैक्टर की चपेट में आने से मौत हो गई। वह मैनपुरी के रहने वाले थे और नई तैनाती के लिए लोढ़ा थाना जा रहे थे
ब्रषपाल सिंह अपनी बाइक पर चारपाई बांधकर नई तैनाती के लिए जा रहे थे, तभी सासनी गेट इलाके में नगर निगम के बेकाबू ट्रैक्टर ने उन्हें रौंद दिया। हादसे के बाद चालक मौके से फरार हो गया,
शराब के लिए कोई बायोमेट्रिक नहीं जो सेहत के लिए हानिकारक हैं ।
लेकिन किसानों को फसल बेचने के लिए बायोमेट्रिक, ट्रैक्टर नंबर प्लेट, तीन गारंटर और मालिक।
चिट्टा, स्मैक, सुल्फा ,गांजा सरे आम बिक रहा हैं ताकि लोग नशे करें सरकार के खिलाफ कोई आवाज ना उठा सके अनपढ़ रहे इनको दारू पिलाकर इनको इनकी पार्टी के जयकारे लगवाने के लिए रखा जा सके।