

vasu_dev_charan
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@Dev9V
लक्ष्य यदि सर्वोपरि है तो आलोचना विवेचना और प्रशंसा कोई मायने नहीं रखती है !!














इतिहास के कुछ अनछुए पहलू और पीएचडी यात्रा के संस्मरण । आज के दिन , 6 अप्रैल 1955 को चितौड़गढ़ में अलग स्तर का जुनून था । किले के पास गाड़िया लुहार समुदाय के सज्जे- धजे लोगों तथा उनकी बैल-गाड़ियों का जमावड़ा था। चितोड़गढ़ किले में उन्हें प्रवेश करवाने के लिए भारत के प्रधानमंगी जवाहरलाल नेहरू और आठ राज्यों के मुख्यमंत्री यहां आए हुए थे । इतिहास में ऐसे बहुत कम समुदाय होते है , जो कि अपनी प्रतिज्ञा के लिए अपना जीवन खपा देते हैं । चितोड़ पतन के उपरांत गाडोलिया लुहार समुदाय ने यह प्रण लिया था कि वे किले में प्रवेश नहीं करेंगे और महाराणा के साथ घुमतू जीवन अपनाकर जीवन निर्वाह करेंगे । इस लौह प्रतिज्ञा के बाद वे भीषण कठिनाइयों में जिए । रांगेय राघव ने अपने उपन्यास "धरती मेरा घर" और जहूर खां मेहर ने अपने निबंध "धर मजलां धर कोसां" में व्यापक स्तर पर उनके जीवन को लिखा हैं । गाँव - गाँव घूमकर लौह सामग्री बनाकर , जन कल्याण के विशिष्ट कार्य किए । कुछ लोग तो यूरोप तक गए , जो रोमां कहलाए हैं , यूनेस्को ने भी इस पर अध्ययन किया हैं। माणिक्य लाल वर्मा जो एक संवेदनशील वयक्ति थे , उन्हें इस समुदाय की जानकारी हुई तो उन्होंने इन्हें स्थायी निवास और क़िले में पुनः प्रवेश करवाने की ठानी । उन्होंने अथक प्रयासों से गाडोलिया लुहार समुदाय के लोगों और प्रधानमंत्री नेहरू को सहमत करवाकर, आज के दिन 1955 को न केवल स्वाभिमान के साथ किले में प्रवेश करवाया बल्कि स्थानी जीवन जीने की ओर प्रस्थान भी करवाया । वर्तमान में आज भी ये घूमंतू और अर्द्ध- घूमंतू जीवन पद्धति के साथ जीवन यापन कर रहें हैं, किंतु इनके समक्ष आज पहचान , आजीविका तया आवास सहित विभिन्न चुनौतियाँ है। रेनके और इदाते कमीशन ने इस बारे में विस्तृत रिपोर्ट दी हैं । ये समुदाय संकटो के बावजूद, अपने स्वाभीमान युक्त इतिहास और कठोर परिश्रम से आज भी खुशहाल जीवन जी रहें जो कि एक अपने आप में एक प्रेरणादायक जीवन शैली हैं। #gadoliya_luhar #rajasthan #history @kuldeepdetha4 @pantlp











पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल में पेपरलीक और भ्रष्टाचार जैसी घटनाओं से युवाओं के सपनों पर कुठाराघात हुआ। @BhajanlalBjp #आपणो_अग्रणी_राजस्थान