

Dev Sharma
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@DevShar777
Bachelor of Technology From RTU Kota 🎓 Electrical Engineering..!! Civil Services Aspirant 📚📖🎯 ideal And Ideology Sir @AbhishekScharan जी (RAS Topper)❤️☺️



मानवता कितनी मर गई है लोगों की, मेहनत पर पानी फिर गया और यह विचारों का मजाक बना रहे हैं,,,, अपनी काबिलियत के दम पर आगे बढ़े थे और वापस इस त्रासदी का शिकार हुए तो इस प्रकार के कार्टून एक अखबार के द्वारा 🙌🙏 अपने देश में सिर्फ TRP से मतलब होता है संवेदनाएं मर गई।





जन्मतिथि 🎈 🎂 मुबारक हो मेरे जीवनसाथी! आप मेरी सुबह की पहली किरण, शाम की आखिरी शांति और रात की सबसे सुंदर कहानी हो। साथ चलते-चलते हमने जो सफर तय किया है, वो सिर्फ़ दूरी नहीं, बल्कि दिलों की गहराई मापता है। आपके साथ हर पल सुकून है। आज आपकी जन्मतिथि पर दुआ है कि आपकी हर ख्वाहिश पूरी हो, हर सपना हकीकत बने, आप हमेशा मुस्कुराते रहें और हमारा ये सफर और भी खूबसूरत होता जाए। आप न सिर्फ़ मेरे हमसफ़र हो, बल्कि मेरी दुनिया हो। जितना प्यार आपको दे सकती हूँ, उससे कहीं ज़्यादा प्यार आप मुझमें भर देते हो। Happy Birthday My Love 💕 @rahul1993dhaka

20 सितंबर 2026 को दोबारा आयोजित होगी SI भर्ती परीक्षा 2021... समाज में अपने आप को जिंदा रखने और अपनी काबिलियत साबित करने करने के लिए 4 साल पढ़ाई से दूर रहकर वापस पढ़ाई करके रेगुलर तैयारी करने वालों से मुकाबला करके सिलेक्शन लेना होगा 2021 के ईमानदार चयनितों को 🙏 मेरा भारत महान

शिव सिंह राठौड़ को SOG ने पूछताछ के लिए बुलाया है। मामला पूछताछ तक सीमित ना रह कर थोड़ा आगे भी बढ़ सकता है।




देखिए मैडम मैं आपको जानता नहीं आपका ट्विटर पर भी अकाउंट पहली बार सामने आया है लेकिन आपने हनुमान बेनीवाल जी के काफिले का वीडियो लगाकर लिखा है तो आप भी जवाब पढ़ लीजिए - स्थानीय नेता शब्द इस्तेमाल करने से पहले आपको ये समझ लेना चाहिए कि @hanumanbeniwal कोई मोहल्ले के पार्षद नहीं, बल्कि एक क्षेत्रीय पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, जिनके समर्थन में राजस्थान ही नहीं बल्कि देशभर का युवा स्वतः जुड़ता है। ये भीड़ किराए की नहीं, विचारों से जुड़ी हुई है। जहाँ तक काफिले की बात है, लोकतंत्र में जनता अपने नेता के साथ चलती है, उसे भौकाल कहना लाखों समर्थकों के आत्मसम्मान का अपमान है। जो नेता किसानों, युवाओं और गरीबों की लड़ाई सड़क से संसद तक लड़ता है, उसके पीछे लोग अपनी इच्छा से चलते हैं, किसी आदेश से नहीं। और संसाधनों की चिंता आपको सिर्फ विपक्ष के काफिलों में ही दिखती है क्या ? सत्ता पक्ष के हेलीकॉप्टर, करोड़ों के रोड शो और सरकारी तामझाम पर कभी इतनी पीड़ा नहीं दिखी। पत्रकारिता सवाल पूछने का अधिकार देती है, लेकिन पूर्वाग्रह फैलाने का नहीं।



सब इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा का पूरा प्रकरण केवल एक भर्ती निरस्त होने की कहानी नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक विफलता, राजनीतिक देरी, व्यवस्था में समन्वय के अभाव और युवाओं के टूटते विश्वास का बड़ा उदाहरण बन गया है। इसमें कुछ युवाओं को न्याय मिला है, तो कुछ को अपने साथ अन्याय महसूस हो रहा है। राजस्थान पुलिस सब-इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा आखिरकार निरस्त कर दी गई। इस फैसले के बाद स्वाभाविक रूप से समाज और अभ्यर्थियों के बीच दो स्पष्ट पक्ष सामने आए हैं। पहला पक्ष उन हजारों बेरोजगार युवाओं का है, जो लंबे समय से इस भर्ती में पेपर लीक और धांधली के आरोपों को उठाते रहे। उनके लिए यह निर्णय न्याय की जीत और व्यवस्था में विश्वास की पुनर्स्थापना जैसा है। उनका मानना है कि जब भर्ती प्रक्रिया की निष्पक्षता ही संदिग्ध हो जाए, तब उसे जारी रखना ईमानदार अभ्यर्थियों के साथ अन्याय होता। दूसरी ओर एक ऐसा पक्ष भी है, जिसकी संख्या भले कम हो, लेकिन उसकी पीड़ा भी कम नहीं है। ये वे अभ्यर्थी हैं जो स्वयं को पारदर्शी और ईमानदार तरीके से चयनित मानते हैं। उनका सवाल है कि यदि कुछ लोगों ने गलत तरीके अपनाए, तो पूरे चयन को क्यों रद्द किया गया? उनका तर्क है कि “गेहूं के साथ घुन क्यों पीसा जाए?” और इसी कारण उन्हें यह फैसला अपने साथ अन्याय प्रतीत होता है। यदि इस पूरे प्रकरण की तह में जाएं तो सबसे पहला दायित्व तत्कालीन अशोक गहलोत सरकार पर आता है, जिसके कार्यकाल में यह भर्ती आयोजित हुई और पेपर लीक की घटनाएं सामने आईं। जब सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट और एसओजी जैसी संस्थाएं यह स्वीकार कर चुकी हैं कि भर्ती प्रक्रिया प्रभावित हुई थी, तब यह स्पष्ट है कि उस समय की सरकार व्यवस्था को सुरक्षित और पारदर्शी रखने में विफल रही। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि उस दौर की सरकार इस पूरे घटनाक्रम की सबसे बड़ी जिम्मेदार पक्षों में से एक है। इसके बाद वर्तमान सरकार और विशेष रूप से मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की भूमिका भी सवालों के घेरे में रही। भर्ती को निरस्त करने में ढाई वर्ष से अधिक का समय लग गया। इस दौरान मुख्यमंत्री, किरोड़ीलाल मीणा, एसओजी अधिकारियों, न्यायालयों और मंत्रिमंडलीय समिति के बीच जिस स्तर का समन्वय होना चाहिए था, उसका अभाव लगातार दिखाई दिया। निर्णय लगातार टलता रहा, मामले को लंबा खींचा जाता रहा और इसी देरी ने अभ्यर्थियों की पीड़ा को कई गुना बढ़ा दिया। जब नई सरकार बनी थी, तब यह धारणा थी कि इस भर्ती पर शीघ्र निर्णय होगा और यदि अनियमितताएं सिद्ध होती हैं तो भर्ती जल्द निरस्त कर दी जाएगी। यदि उसी समय स्पष्ट और निर्णायक फैसला ले लिया जाता, तो आज जिन अभ्यर्थियों को वर्षों बाद बाहर होना पड़ा, उनकी पीड़ा शायद इतनी गहरी नहीं होती। समय बीतने के साथ कई चयनित अभ्यर्थियों ने नौकरी की उम्मीदों, सामाजिक प्रतिष्ठा और भविष्य की योजनाओं को इस भर्ती से जोड़ लिया था। ऐसे में देर से लिया गया निर्णय उनके लिए मानसिक और भावनात्मक आघात बन गया। हालांकि न्यायालय की उस टिप्पणी को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता जिसमें कहा गया कि यदि पानी के गिलास में जहर की दो बूंदें मिल जाएं, तो उन्हें अलग करना संभव नहीं होता; ऐसे में पूरा गिलास फेंकना ही एकमात्र विकल्प बचता है। इसी सिद्धांत को आधार बनाकर अदालत ने माना कि जब पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता संदिग्ध हो जाए, तब केवल कुछ लोगों को अलग कर निष्पक्षता सुनिश्चित करना व्यावहारिक नहीं रह जाता। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि ऐसी परिस्थितियां पैदा ही क्यों हुईं, जहां लाखों युवाओं का भविष्य वर्षों तक अनिश्चितता में झूलता रहा।

@DevShar777 @rao_satyendra सत्तू ब्रो सॉरी 🫤

जिसके पांव की बिवाई फटती हैं दर्द का एहसास उससे ही होता हैं। न्याय यही था, दोषियों को गिरफ्तार करते है और 2500 लोगों की जांच करते जो वेटिंग लिस्ट और मेरिट में थे। दोषियों को बहार करते और निर्दोष चयनित और वेटिंग वालों को नौकरी पर रखते हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट ने न्याय की बजाय आसान रास्ता को चुना, और सच्चाई शोर गुल में कही दफन हो गईं।


हर भर्ती में इस तरह से जहर लगभग घुला हुआ ही है 💔🙏🙏