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@Dixit_sk
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@4pmnews_network मेरी समझ में पिछले दस वर्षों में हमारी विदेश नीति असफल रही है। कारणों की समीक्षा विशेषज्ञ करें।
₹ के अवमूल्यन को भी कहीं न कहीं मैं विदेश नीति से जोड़ कर देखता हूँ , क्योंकि पूर्व में इसे पीएम की साख से जोड़ा गया था।
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अमेरिका और चीन के रिश्ते अब फिर से पटरी पर लौटते दिख रहे हैं।
दुनिया की दो सबसे बड़ी ताकतें अपने हित साधने में जुटी हैं।
लेकिन सवाल है कि इस बदलती दुनिया में भारत आखिर कहां खड़ा है?
बीते 12 साल में विदेश नीति की सफलता के बड़े बड़े दावे हुए।
दुनिया को बताया गया कि भारत अब वैश्विक शक्ति बन चुका है।
लेकिन जब असली परीक्षा का वक्त आता है, तब क्या सच में कोई हमारे साथ खड़ा दिखाई देता है?
सीमा पर तनाव हो, आर्थिक दबाव हो या अंतरराष्ट्रीय संकट
चीन अपने हित देखता है
अमेरिका अपने फायदे की राजनीति करता है
फिर भारत को हर मुश्किल में अकेले क्यों लड़ना पड़ता है?
क्या हमारी विदेश नीति सिर्फ मंचों और तस्वीरों तक सीमित रह गई है?
या फिर जमीन पर भी भारत की ताकत उतनी ही मजबूत हुई है जितना दावा किया गया?

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CJI की सफाई:
CJI जस्टिस सूर्यकांत ने कॉकरोच वाली उनकी टिप्पणी को लेकर हो रही आलोचना पर स्टेटमेंट जारी किया है। CJI ने कहा है कि कॉकरोच और पैरासाइट्स वाली टिप्पणी देश के युवाओं के लिए नहीं थी, बल्कि उन लोगों के लिए थी जो फर्जी और नकली डिग्रियों के सहारे कानून और मीडिया जैसे पेशों में प्रवेश कर रहे हैं।
" मेरी मौखिक टिप्पणियों को मीडिया के एक वर्ग द्वारा जिस तरह गलत तरीके से उद्धृत किया गया, उसे पढ़कर मुझे पीड़ा हुई है।..... मैं भारत के युवाओं के प्रति अत्यंत सम्मान रखता हूं।"
लेकिन अब इस सफाई का क्या फ़ायदा! कॉकरोच वाली बात तो पूरे देश में फैल गई। #CJI #JusticeSuryakant

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संस्थाओं की बदलती भाषा और लोकतंत्र की बेचैनी
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की हालिया टिप्पणी ने देशभर में नई बहस छेड़ दी है। बेरोजगार युवाओं, एक्टिविस्टों और मीडिया के कुछ वर्गों को “parasites” और “cockroaches” जैसी उपमाओं से जोड़कर की गई टिप्पणी को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि आखिर देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था युवाओं और असहमति की आवाज़ों को किस नजर से देख रही है।
मेरा मानना है कि बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, लोकतांत्रिक संस्थाओं की कमजोरी, बैंक घोटाले, टैक्स चोरी और व्यवस्था में बढ़ती अव्यवस्था के लिए युवा पीढ़ी नहीं, बल्कि दशकों से सत्ता और संस्थानों पर काबिज व्यवस्थाएं ज्यादा जिम्मेदार रही हैं। ऐसे में संघर्ष कर रहे युवाओं को कठोर और अपमानजनक शब्दों से नवाजना लोकतांत्रिक संवेदनशीलता के खिलाफ माना जा रहा है।
इस विवाद में मीडिया को लेकर की गई टिप्पणी ने बहस को और गहरा कर दिया है। भारत की गिरती प्रेस स्वतंत्रता रैंकिंग और पत्रकारों पर बढ़ते कानूनी दबाव को देखते हुए हमारा मानना है कि मीडिया को “समस्या” नहीं बल्कि लोकतंत्र के जरूरी स्तंभ के रूप में देखा जाना चाहिए।
आलोचकों का तर्क है कि जब संस्थाएं आलोचना से असहज होने लगती हैं और असहमति को “व्यवस्था पर हमला” मानने लगे, तब लोकतांत्रिक संतुलन कमजोर होने लगता है। यही वजह है कि अब सिर्फ बयान नहीं, बल्कि न्यायपालिका की भाषा, उसकी संवेदनशीलता और जनता के साथ उसके रिश्ते पर भी गंभीर सवाल उठने लगे हैं।
#Breaking

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गाँधी परिवार...
मेनका गाँधी और वरुण गाँधी को सब जानते है, भाजपा ने कांग्रेस के खिलाफ दोनों माँ बेटे का इस्तेमाल किया जरूरत खत्म हो गई तो एक किनारे कर दिया।
आज मेनका गाँधी और वरूण गाँधी कहां खड़े है... सबको पता है, आज अखबार, TV पर कोई नाम तक लेने वाला नही है. क्योंकि अब BJP को मेनका गाँधी और वरुण गाँधी की जरूरत भी नही है.।

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एक ही दिल है 24 घंटे में कितनी बार धड़काओगे अडानी जी? अमेरिकी न्याय विभाग के बाद अमेरिकन सिक्योरिटी एंड एक्सचेंज कमीशन ने गौतम अडानी और उनके भतीजे सागर अडानी पर 16 मिलियन डॉलर का जुर्माना लगाया है।
रिश्वतखोरी और सत्य छिपाने के आरोप में लगाए गए इस जुर्माने को देने पर दोनों ने सहमति जता दी है। अब वहां से भी केस खत्म हो जाएगा। DOJ और SEC दोनों ही जगह अडानी का केस ट्रंप के वकील रॉबर्ट गिफ्रा की टीम देख रही थी जुर्माने की राशि 153 करोड़ के आस पास है।

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पूरा ज़रूर पढ़ें:
"समाज में पहले से ही ऐसे #parasites मौजूद हैं जो व्यवस्था पर हमला करते हैं... #Cockroaches की तरह युवा हैं जिनको न तो रोजगार मिलता है और न ही पेशे में कोई जगह. उनमें से कुछ मीडिया में चले जाते हैं, कुछ सोशल मीडिया में, कुछ RTI activist बन जाते हैं, कुछ अन्य activist बन जाते हैं और फिर वो सब पर हमला करना शुरू कर देते हैं." सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत का बयान.
मिलार्ड, युवाओं से इतनी नाराज़गी क्यों? युवाओं के मुकाबले ज्यादा उम्रवालों ने देश का ज्यादा बंटाधार किया है.
बेतहाशा बढ़ते भ्रष्टाचार, लोकतान्त्रिक मूल्यों के पतन, चुनाव आयोग को पंगु बनाने में युवा कहाँ?
बड़े पैमाने टैक्स चोरी, बड़े-बड़े बैंक घोटालों, सरकारी पैसे के गबन, रिश्वत लेने, कंपनी के पैसों की हेराफेरी में युवा कहाँ?
न्याय व्यवस्था की गिरती साख और पुलिस के बढ़ते अत्याचार का जिम्मेदार युवा कहाँ?
हज़ूर ने #Media को भी cockroach बना दिया. 2026 विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत 180 देशों में से 157वें स्थान पर है. 2025 के मुकाबले छह पायदान नीचे, हालात को रिपोर्ट में 'बहुत गंभीर' बताया गया है. मीडिया का दमन करते और मज़बूर करते लोगों पर मिलार्ड के कानून का चाबुक क्यों नहीं चलता? World Press Freedom Index तैयार करनेवाले संगठन Reporters Without Borders ने कहा है कि "भारत में स्वतंत्र मीडिया का न्यायिक harassment बढ़ रहा है, जिसका मुख्य कारण आपराधिक कानूनों - मानहानि और राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों - का बढ़ता उपयोग है, जो सीधे पत्रकारों को निशाना बनाते हैं." हज़ूर मीडिया को संरक्षण दें. कई पीढ़ियों तक हज़ूर की जय जयकार होगी.
अभी बस एक बात और, मिलार्ड का ओहदा इतना ऊंचा पर बोल इतने मंदे, उम्मीद है इस पर आप जल्द कुछ सफाई देंगे.

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@AnilYadavmedia1 क्या सीजेआई को इस तरह की टिप्पणी करना शोभा देता है!!
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भारत की लोअर कोर्ट्स से लेकर सुप्रीम कोर्ट में लाखों केस पेंडिंग हैँ,
जज लोग लाखों की तनख्वाह लेते हैँ, सरकारी आवास में रहते हैँ,
नौकर, चाकर, सरकारी गाड़ी और ड्राइवर,
फिर भी केस बढ़ते जा रहे हैँ,
कोर्ट्स में इंसाफ की जगह मिलती है तो
सिर्फ तारीख पर तारीख,
और जज साहब कॉकरोच देश के युवाओं को कह रहे हैँ,
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@AadeshRawal के सी वेणुगोपाल की फोटो के साथ पोस्ट करते तो और अच्छा होता। 🙏
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@TheKPMalik मुझे ऐसा लगता है कि ट्रंप की तरफ से सिग्नल दिया गया है और संघ के जरिए भूमिका बनायी जा रही है।
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क्या पाकिस्तान पर नया नैरेटिव गढ़ा जा रहा है?
संघ के महासचिव दत्तात्रेय होसबोले का पाकिस्तान के साथ संवाद और “लोगों के बीच संपर्क” बनाने वाला बयान राजनीतिक गलियारों में सामान्य टिप्पणी नहीं माना जा रहा। क्योंकि संघ की विचारधारा लंबे समय से पाकिस्तान को लेकर बेहद कठोर और आक्रामक रुख के लिए जानी जाती रही है।
ऐसे में अचानक संवाद, संपर्क और रिश्तों की भाषा सामने आना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि सरकार किसी बड़े कूटनीतिक या राजनीतिक बदलाव की भूमिका तैयार कर रही है। भारतीय राजनीति में अक्सर देखा गया है कि सरकार किसी संवेदनशील फैसले से पहले वैचारिक संगठनों और समर्थक समूहों के जरिए माहौल बनाती है, ताकि बाद में लिए गए निर्णय को “राष्ट्रहित” का स्वाभाविक विस्तार बताया जा सके।
दिलचस्प बात यह है कि वर्षों तक पाकिस्तान के नाम पर राष्ट्रवाद की राजनीति करने वाले वही समूह अब बातचीत और संपर्क की जरूरत पर जोर देते दिखाई दे रहे हैं। सवाल यह नहीं है कि संवाद होना चाहिए या नहीं, सवाल यह है कि क्या देश को पहले भावनात्मक उन्माद में धकेलने और फिर अचानक नरम रुख अपनाने की राजनीति अब एक स्थापित रणनीति बन चुकी है?
सत्ता के गलियारों में इस बयान को एक “सॉफ्ट सिग्नल” की तरह देखा जा रहा है, जो यह इशारा देता है कि आने वाले समय में सरकार पाकिस्तान को लेकर अपने रुख में कुछ व्यावहारिक बदलाव कर सकती है। लेकिन यह भी सच है कि जनता के भीतर वर्षों से बनाई गई आक्रामक छवि को बदलना इतना आसान नहीं होगा, क्योंकि राजनीतिक लाभ के लिए बोए गए डर और गुस्से की फसल जल्दी खत्म नहीं होती।
#Breaking

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@VinodAgnihotri7 आज की दुनिया दिखावे की है।
प्रचार नेताओं की प्राण वायु है, उसके बिना वो जिंदा नहीं रह सकते।
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एक बात तो माननी पड़ेगी कि
अरविन्द केजरीवाल ये बंदा जिस चीज के पीछे पड़ जाता है तो फिर पड़ ही जाता है,
शराब कांड की सुनवाई कर रहीं जस्टिस सवर्णकांता शर्मा ने खुद को इस मामले की सुनावाई से अलग कर लिया है,
खुद केजरीवाल बार बार उनकी कोर्ट में इंसाफ ना मिलने की बात कर रहे थे,
और सुनवाई दुसरी कोर्ट में ट्रांसफर करने की मांग कर रहे थे,
केजरीवाल अब NEET EXAM घोटाले के पीछे पड़ गए हैँ,
इसमें भी कोई ना कोई नतीजा निकल कर रहेगा,
क्योंकि केजरीवाल एक बार जो मुद्दा पकड़ लिया तो फिर छोड़ना नहीं होता है,


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देश के प्राकृतिक संसाधनों, मेहनत से खड़ा किए गए सार्वजनिक संस्थानों पर कब्जा करने की बदनीयत रखने वाला अडानी अमेरिकी अदालतों में रिश्वतखोरी से बचने के लिए नया खेल कर रहा है। गज़ब यह है कि देश के समाचार माध्यम खामोश हैं, विपक्ष खामोश है, व्हीसल ब्लोअर खामोश हैं।
अडानी की ओर से खुद के ऊपर लगे रिश्तवखोरी के आरोप से मुक्ति के एवज में अमेरिका को 10 अरब डॉलर का निवेश और 15 हजार अमेरिकन को नौकरी का भरोसा दिया गया है। याद रखिए यह वह अडानी है जिसने जेमिनी के अनुसार भारत में महज 27 से 32 हजार तक स्थाई नौकरियां दी हैं। यह हाल तब है जब भारत की आबादी अमेरिका की तुलना में लगभग 4.2 गुना ज्यादा है।
दरअसल अडानी ने बड़ा खेल करते हुए अमेरिका के लंपट राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निजी वकील रॉबर्ट के ग्रिफा के नेतृत्व में टीम बनाई। उस टीम ने अडानी के पक्ष में जस्टिस डिपार्टमेंट में जिरह की और अडानी का यह प्रस्ताव रखा। न्यूयार्क टाइम्स कह रहा है अभियोजकों में से एक ने इस प्रस्ताव को आकर्षक कहा है।
आप कल्पना करके देखें कि अमेरिकी अदालत में हम हिन्दुस्तानियों की क्या स्थिति बनी होगी? देश का पीएम कह रहा है कि सोना चांदी मत खरीदो, गाड़ी मत चलाओ। वहीं अडानी अरबों डॉलर का निवेश लेकर अमेरिका के दरवाजे पर खड़ा है। देश ठन ठन गोपाल है।

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तमिलनाडु विधानसभा में जब विपक्षी नेत्री SOWMIYA ANBUMANI सवाल उठा रही थी , विजय न तो उन्हें टोक रहे थे, न चिल्ला रहे थे और न ही उनकी अनदेखी कर रहे थे।
वे चुपचाप सुन रहे थे, हर बात को गौर से देख रहे थे और गंभीरता से नोट कर रहे थे।
आज की राजनीति में, कई नेता आलोचना को दुश्मन की तरह मानते हैं।
लेकिन विधानसभा में हर मुद्दे को महत्व देते हुए किसी को देखना वाकई अलग अनुभव है।
नेतृत्व का मतलब सिर्फ जोर से बोलना नहीं होता—कभी-कभी ध्यान से सुनना भी होता है।
और यही बात इस पल को खास बनाती है।

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थालापति विजय ने तमिलनाडु का मुख्यमंत्री बनने के बाद एक और महत्त्वपूर्ण आदेश जारी किया है,
विजय ने अपने आदेश में तमिलनाडु की सड़कों पर नेताओं और उनके चमचों द्वारा लगाए जाने वाले बड़े होर्डिंग्स, बैनर और पोस्टर और वॉल राइटिंग पर रोक लगा दी है,
जोजेफ़ विजय ने कहा कि
मैं अपने राज्य तमिलनाडु को गंदा नहीं होने दूंगा,
इसीलिए कहता हूं,
सरकारों को बदलते रहो, तभी अच्छे आईडियाज आएंगे, अच्छे काम होंगे,
तालाब में जमा स्थिर पानी भी कुछ समय बाद बास मारने लगता है,
इसलिए लोकतंत्र में भी परिवर्तन जरुरी है,
बदलाव करते रहो, रोटी पलटते रहो,


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राजनीति में हमने आज तक बहुत सारे नेता देखे हैं,
लेकिन विजय जैसा शायद पहली बार देख रहा हूँ।
आज विधानसभा सत्र में जब विपक्ष के नेता सवाल और मुद्दे उठा रहे थे,
तब विजय उन बातों को ध्यान से सुनकर नोट कर रहे थे।
आजकल तो नेता विपक्ष की बात सुनना भी पसंद नहीं करते,
लेकिन यहाँ एक मुख्यमंत्री हर मुद्दे को लिख रहे थे।
सच कहूँ तो मैंने पहली बार किसी नेता को
संसद या विधानसभा में विपक्ष की बातों को इतने ध्यान से नोट करते देखा है।
क्या आपने कभी ऐसा नेता देखा है?

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@DixitMyself Agree with you but who will fix the time. The whole system needs to be changed.
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क्या यही है न्याय व्यवस्था?
कुंभ मेला ड्यूटी पर तैनात थे पांच पुलिस कांस्टेबल. उनमें इलाहाबाद के जीआरपी रामबाग पुलिस स्टेशन के भोजनालय में खाने को लेकर मामूली विवाद हुआ. एक दूसरे कांस्टेबल के साथ हाथापाई हुई. FIR हो गई. दंगा करने, जानबूझकर चोट पहुंचाने और जानबूझकर अपमान करने के साथ रेलवे अधिनियम की धारा 120 के तहत मामला दर्ज हुआ. इसमें 22-साल के कैलाश चंद्र कापड़ी समेत पांच कांस्टेबलों को आरोपी बनाया गया.
ये मामला 19 फरवरी 1989 का है. अब कापड़ी 59 साल के हो चुके हैं. मुकदमे की सुनवाई के दौरान दो सह-आरोपियों की मृत्यु हो गई, जबकि दो अन्य फरवरी 2023 में बरी हो गए. तीन दशकों से ज्यादा तक केस लटके रहने के बावजूद, एक भी गवाह पेश नहीं किया गया. 2024 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कापड़ी पर कार्यवाही रद्द करने से इनकार कर दिया. अब सुप्रीम कोर्ट ने 35 साल से चल रही आपराधिक कार्यवाही को ख़त्म किया है.
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने कहा: "मारपीट और धमकी के मुकदमे के लिए 35 साल बहुत लंबा समय है. जल्द न्याय संविधान के अनुच्छेद 21 का अनिवार्य हिस्सा है. बेंच ने कहा कि इतनी लंबी कार्यवाही आरोपी के जल्द सुनवाई और निष्पक्ष प्रक्रिया के अधिकार का उल्लंघन है."
सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा: "इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता कि आरोपी का ठप्पा किसी व्यक्ति को पूरी मानवीय गरिमा के साथ जीने के अधिकार से वंचित कर देता है. हमारा मानना है कि जल्द सुनवाई का अधिकार एक मानवाधिकार है और कोई भी सभ्य समाज किसी आरोपी को इस अधिकार से वंचित नहीं कर सकता.'
अब सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल से जानकारी मांगी है कि ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास (JMFC), चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (CJM) और सेशन कोर्ट में कुल कितने मामले लंबित हैं, ये केस कितने पुराने हैं और विचाराधीन कैदियों ने जेल में कितने साल बिताए हैं.

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