usha kiran girdhar

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@GirdharUsha

Katılım Ocak 2016
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Mamta Vaid (HOS)
Mamta Vaid (HOS)@HosMamtavaid·
Thank you Malabar team for your honor and contribution to our students for achieving better future opportunities.Great initiative @brd_skvNSS @PbpandeyB
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usha kiran girdhar@GirdharUsha·
आज संविधान दिवस के अवसर पर 26 नवंबर 2024 को विद्यालय प्रमुख आदरणीय के पी कर्दम जी के प्रयासों द्वारा G B S S 22 B (NRR) विद्यालय में बड़ी ही धूम धाम से संविधान दिवस मनाया गया। विद्यालय प्रमुख GGSSS NRR विकास जी, BRDSKV प्रसाद नगर ममता वेद जी शामिल हुए
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Anju Sachdeva
Anju Sachdeva@AnjuSachdeva14·
Congratulations ✨️ ⭐️ ✳️ 🎊 👏 💐 & Excited 😊 🤗...... All the Good Luck for future endeavors
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SKVNo2Mandawali@skv_no2_1002023

@Dir_Education Our New School Building #inaugurated by CM Ms Atishi & former Dy CM Mr Manish Sisodia @SKV/SBVNo2 Mandawali on 29-10-2024 🏫 School is equipped with Advanced Classrooms Labs Library Yoga Room & modern Resources #nurture young minds

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Manish Sisodia
Manish Sisodia@msisodia·
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Manish Sisodia
Manish Sisodia@msisodia·
आज पटपड़गंज विधानसभा स्थित ईस्ट विनोद नगर स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में जोनल स्कूल स्पोर्ट प्रतियोगिता के उद्घाटन समारोह में शामिल हुआ. देख कर सुखद लगा कि आज सरकारी स्कूलों के बच्चे भी प्राइवेट स्कूलों के बच्चों की तरह शानदार प्रदर्शन कर रहें हैं, शानदार कोच और शानदार सुविधाएँ प्राप्त कर रहें हैं….और वे सुनहरे भविष्य की ओर बढ़ रहें हैं।
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usha kiran girdhar
usha kiran girdhar@GirdharUsha·
@shail2018 बिलकुल सही चेताया है शैलेंद्र जी अध्यापक और विद्यार्थी का नाता अपनत्व का है, अध्यापक को खदेड़ने से उसकी क्षमता में कमी आयेगी कोई कार्य करने के लिए एनर्जी लेवल हाई होना तो क्वालिटी बेहतरीन होगी, बच्चों को सहजता का वातावरण देने के लिए अध्यापक का वातावरण सहज होना चाहिए
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Shailendra Sharma
Shailendra Sharma@shail2018·
स्कूल के टीचर और सरकारी दफ़्तर के बाबू में क्या अंतर है? राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुसार टीचर राष्ट्र के भविष्य का निर्माता है, लेकिन शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार के कुछ बड़े बाबूओं की नज़र में टीचर और दफ़्तरी बाबू में कोई अंतर नहीं है… तभी तो इन्होंने एक नया फ़रमान जारी करते हुए उन सभी टीचर्स को, जो दस साल से ज़्यादा उसी स्कूल में हैं, को चेतावनी दी है कि वो ख़ुद किसी और स्कूल में स्थानांतरण के लिए अप्लाई करें नहीं तो प्रशासन अपनी मर्ज़ी से उन्हें किसी भी स्कूल में पोस्ट कर देगा ! हो सकता है इस प्रकार का रैंडम ट्रांसफ़र सरकारी बाबूओं के केस में ज़रूरी हो पर टीचिंग प्रोफेशन में ये बिलकुल ग़ैर ज़रूरी है। ऐसा इसलिए क्योंकि टीचर्स का अपने स्कूल के बच्चों, उनके पैरेंट्स और समुदाय के साथ एक आर्गेनिक रिश्ता होता है। ये रिश्ता कई सालों के भरोसे के आधार पर बनता है। इसलिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का पैरा 5.3 कहता है, “शिक्षक और समुदाय के बीच संबंध बने और वह समुदाय से जुड़ा रहे जिससे विद्यार्थीयों को रोल मॉडल और शैक्षिक वातावरण मिल सके, इसे सुनिश्चित करने के लिये अत्यधिक स्थानांतरण की हानिकारक प्रैक्टिस पर रोक लगाई जाएगी।" पर अफ़सोस की बात है कि शिक्षा निदेशालय के वर्तमान आकाओं ने न सिर्फ़ राष्ट्रीय शिक्षा नीति की भावनाओं का अपमान किया है बल्कि मनीष सिसोदिया जी द्वारा टीचर्स और सरकार के बीच भरोसे और सम्मान का जो रिश्ता स्थापित किया था, उसे तोड़ने का काम भी किया है। इस रिश्ते की बदौलत ही दिल्ली सरकार के टीचर्स ने राष्ट्रीय राजधानी के लगभग 18 लाख बच्चों को विश्वस्तरीय शिक्षा देने का काम किया है। देश के अन्य सरकारी स्कूलों से अलग दिल्ली सरकार के टीचर्स, स्कूल को सरकारी स्कूल नहीं बल्कि अपना और अपने स्टूडेंट्स का स्कूल मानने लगे थे। अब ये नये आका लोग एक झटके में उस रिश्ते को फिर से अविश्वास की खाई में धकेलना चाह रहे है। ये सरकारी फ़रमान फिर से स्कूलों को सिर्फ़ और सिर्फ़ शिक्षा निदेशालय का ब्रांच ऑफिस बनाने की प्रक्रिया है। शिक्षा निदेशालय की एक ट्रांसफ़र पालिसी है जिसके तहत आवश्यकतानुसार टीचर्स ख़ुद ट्रांसफ़र के लिए ऑनलाइन आवेदन करते हैं। इसके अलावा, प्रिंसिपल की संस्तुति, स्कूलों की ज़रूरत या प्रशासनिक कारणों से भी टीचर्स का ट्रांसफ़र होता है। इन सब के अलावा अब ये नया फ़रमान लगभग 6000 टीचर्स यानी दिल्ली सरकार के स्कूलों में पोस्टेड 10% टीचर्स को विशेष रूप से प्रभावित करेगा। ये सारी क़वायद कुछ तथाकथित “मठाधीश टीचर्स”, जो कई सालों से एक ही स्कूल में जमे है और क्लास में पढ़ाने नहीं जाते, उन्हें “डिसिप्लिन” करने के नाम पर लिया जा रहा है। पर मेरी बात नोट कर लीजिए- वो तथाकथित “मठाधीश टीचर्स” अपने जुगाड़ की बदौलत कहीं नहीं हिलेंगे, बल्कि इस फ़रमान की ग़ाज़ सिर्फ़ “सिंसियर टीचर्स” पर ही गिरेगी। और तो और, इतना बड़ा डिसिशन लेने से पहले इन आकाओं ने चुनी हुई सरकार या शिक्षा मंत्री से विचार विमर्श करना भी ज़रूरी नहीं समझा। इनके अनुसार से “सर्विस मैटर” है लिहाज़ा ये मुद्दा चुनी हुए सरकार के दायरे से बाहर है। ग़ज़ब स्थिति है ये !! बच्चों को अच्छी शिक्षा देने की ज़िम्मेदारी चुनी हुए सरकार की है, पर उन्हें शिक्षा देने वाले टीचर्स किस स्कूल में पढ़ायेंगे ये चुनी हुई सरकार नहीं तय करेगी, ये तय करेंगे बाबू लोग!! अब देखना ये है टीचर्स की “ऑटोनोमी” की दुहाई देने वाले और भारत को “विश्वगुरु” बनाने का सपना देखने वाले लोग, दिल्ली सरकार के इन गुरुओं के साथ हो रही इस प्रशासनिक मनमानी पर क्या बोलते और करते हैं… @msisodia @Dir_Education @AtishiAAP
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usha kiran girdhar
usha kiran girdhar@GirdharUsha·
@shail2018 बहुत ही सहजता और सरलता से अपनी बात रखी, शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करना जो की कहा जाता है "शिक्षा दान महादान"
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Shailendra Sharma
Shailendra Sharma@shail2018·
देश तानाशाही की तरफ़ बढ़ रहा है। मोदी जी तानाशाह बन गए हैं, इत्यादि। देश में ये बहस काफ़ी दिनों से चल रही है।  कल तक मुझे इस बात से कोई लेना देना नहीं था कि मोदी जी तानाशाह हैं या नहीं। अगर वो तानाशाह हैं भी तो उससे मेरी लाईफ़ पर क्या फ़र्क़ पड़ता है? मैं तो शांति से अपना काम करता हूं। मेरे काम से दिल्ली सरकार के स्कूलों के लाखों बच्चों को फ़ायदा होता है। इस काम से किसी को कोई नुक़सान नहीं होता। लिहाज़ा कुछ छिटपुट मसलों को छोड़ दें तो किसी के पास मुझसे नाराज़गी का कोई कारण भी नहीं है। मैं शाम को अपने घर जाता हूं, TV देखता हूं, दोस्तों से देश-दुनिया के बारे में बातें करता हूं, कुछ पढ़ता हूं और फिर सो जाता हूं। अगले दिन यही दिनचर्या फिर से शुरू हो जाती है। मेरी लाइफ़ बड़ी शांति से कट रही थी। मोदीजी अपना काम कर रहे थे और मैं अपना। न मैं उनके काम में कोई दखल देता था, न उन्हें मेरे काम से कोई मतलब था। यानी हम दोनों “peacefully co-exist” कर रहे थे। पर यहीं कहानी में ट्विस्ट आ गया। दिल्ली सरकार के सतर्कता विभाग के विशेष सचिव ने ज़बर्दस्त सतर्कता दिखाते हुए 8 महीने की गहन रिसर्च के बाद ये ढूँढ निकाला कि, 8 साल पहले शिक्षा विभाग द्वारा मुझे बिना वेतन, बिना किसी सुविधा के शिक्षा निदेशक के प्रमुख सलाहकार के रूप में appoint करना ग़लत था। ऐसा सिर्फ़ इसलिए क्योंकि उस appointment की मंज़ूरी जनाब उपराज्यपाल महोदय से नहीं ली गई थी। हैरान होकर मैंने शिक्षा विभाग के उन लोगों से, जो इस विषय की जानकारी रखते हैं, पूछा कि भाई आपसे इतनी बड़ी चूक कैसे हो गई? तो उन लोगों ने मुस्कुराते हुए कहा कि, किस बात का approval लेते? हम न तो कोई नया पद create कर रहे थे, और न ही किसी created पद पर आपकी नियुक्ति कर रहे थे। सबसे बड़ी बात तो यह है कि, आपके ऊपर सरकारी ख़ज़ाने से एक रुपया भी खर्च नहीं हो रहा था। तो ऐसे में उपराज्यपाल महोदय से किस बात की इजाज़त लेते? आपका engagement तो शिक्षा निदेशक और शिक्षा मंत्री के साथ ही था, लिहाज़ा इन दोनों की रज़ामंदी से आपके लिए आदेश जारी कर दिया गया था। और तो और 2018 में सभी advisors की details तत्कालीन उपराज्यपाल महोदय को भेजी गई थी। उन्होंने आपको छोड़ कर बाक़ी सब हो हटाने का आदेश भी दिया था। आपको तब भी शायद इसलिए नहीं हटाया क्योंकि आपकी profile देखकर उन्हें लगा होगा कि बच्चों की शिक्षा पर काम करने के अलावा आपको और कुछ आता जाता नहीं है लिहाज़ा आप शांति से अपना काम करते रहें। इस घटना के 6 साल बाद, सतर्कता विभाग के इन विशेष सचिव को अचानक लगा कि वो उन अधिकारियों और उस वक्त के उपराज्यपाल से कहीं ज़्यादा काबिल और समझदार हैं जिन्होंने 2018 में मेरी नियुक्ति निरस्त नहीं की थी। लिहाज़ा उनके सामने एक अवसर है की वो उस “ऐतिहासिक गलती” को सही करें और मुझे तुरंत हटायें। अब आप सोचेंगे की इसमें मोदी जी या उनकी तानाशाही कहां से आई? इसे जानने के लिए आगे पढ़ें….
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usha kiran girdhar
usha kiran girdhar@GirdharUsha·
@shail2018 सुलझा हुआ विचार ,चेतनापूर्ण,
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Shailendra Sharma
Shailendra Sharma@shail2018·
हां, तो मैं कह रहा था की इस मामले में मोदी जी और तानाशाही कहां से आ गईं? तो साहब, “Organisational Behaviour” की भाषा में एक टर्म होता है जिसे कहते हैं “Anticipatory Compliance”. इसका अर्थ है, अदना कर्मचारियों द्वारा वो काम करना जो उन्हें लगता है कि उनके बॉस को पसंद आएगा। यानी बॉस ने कोई आदेश नहीं दिया, या बॉस ने कभी नहीं कहा कि फ़लां काम करना है। पर कर्मचारी अपने बॉस के हावभाव और इरादे को देखकर ख़ुद ही वो सब करने लगता है, जो उसे लगता है कि उसके बॉस को पसंद आएगा। आप थोड़ा specifically देखें की मेरे केस में क्या हुआ। हुआ यूं की दिल्ली सरकार के इन विशेष सचिव महोदय को लगा की मोदी जी तो ED और CBI के माध्यम से मनीष सिसोदिया और अरविंद केजरीवाल जैसे बड़े लोगों को तानाशाही के दर्शन करा रहे हैं, तो ऐसे में क्यों न तब तक वो ख़ुद तानाशाही के “Trickle Down” प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए कुछ छोटे लोगों को भी एक ट्रेलर दिखा दें। हो सकता है सरदार (बड़ा तानाशाह) खुश हो जाये। वैसे भी सरदार जब अपने अफ़सरों के कारनामों से खुश होता है तो उन्हें अनगिनत सेवा विस्तार और मनमानी करने की पूरी आज़ादी देता है। तो साहब इन महोदय ने शैलेंद्र शर्मा नामक झुनझुने को दबी हुए फ़ाइलों में से निकाला और बजा दिया। इन्हें पूरी उम्मीद होगी कि सरदार न सिर्फ़ खुश होगा बल्कि शाबाशी भी देगा और साथ में इनाम भी। और वो इनाम इस शक्ल में हो सकता है कि इनके ख़ुद के ख़िलाफ़ जो भ्रष्टाचार के केस CBI ने कई साल पहले रजिस्टर किए थे, वो फ़ाइलों में ही दबे रहें। जो अभी कुछ दिनों पहले उत्तराखंड में कोर्ट के आदेश पर इनके ख़िलाफ़ FIR दर्ज हुई है, उसमें जाँच आगे न बढ़े। वैसे मैं और क्या कहूं, इनके बारे में पूरी जानकारी के लिये आप ख़ुद ही google कर लें। तो दोस्तों, हम जैसे छोटे लोगों को मोदी की तानाशाही से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। उनकी तानाशाही की चिंता तो केजरीवाल, ममता बनर्जी, स्टालिन जैसे बड़े और दिग्गज लोग करें। पर छोटे तानाशाहों को देखकर नहीं लगता कि आने वाले दिनों में ये मुद्दा सिर्फ़ ऊपर वालों को ही इफ़ेक्ट करेगा। हम और आप जैसे सामान्य लोग, जो सिर्फ़ शांति से अपना काम करना चाहते हैं, अपना घर चलाना चाहते हैं; वो भी इससे अछूते नहीं रहेंगे। क्योंकि हमारे रास्ते में मोदीजी की तानाशाही के “Trickle Down” इफ़ेक्ट से पोषित ये बाबू, ये पुलिसवाले, ये छुटभैये नेता आयेंगे जिन्हें ताक़त देश के संविधान और क़ानून से नहीं बल्कि मोदीजी के लाइसेंस से मिल रही होगी। ऐसे में तानाशाही का विरोध शायद इसलिए भी ज़रूरी है, क्योंकि अब वो हमसे दूर नहीं है। By the way, तानाशाही पर @dhruv_rathee का बहुत ही शानदार वीडियो है, ज़रूर देखियेगा, शाम को टीवी पर!!!!
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