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मरने वाले तो ख़ैर हैं बेबस, जीने वाले कमाल करते हैं....

khargone Katılım Aralık 2010
873 Takip Edilen609 Takipçiler
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बदहवास
बदहवास@badhwaas·
"रिश्ते, नाते, शौक, मुहब्बत... सब कुछ दांव पर लगा दिया, बस कुछ नोटों की खातिर खुद को मशीन बना लिया। थक चुका हूँ, पर रुकने की इजाज़त नहीं मुझे, क्योंकि घर की चौखट पर 'मर्द' का वजूद टिका दिया।" 🖤🫤
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निस्पृह...
ज्यादा की इच्छा नहीं है जीवन में अब, बस कुछ या कोई सच्चा साथी जो दिखावे से दूर हो जिसे प्रेम की समझ हो, जो अनुभव कराए कि वो मैं अलग नहीं एक हैं कि जिसके साथ एक लंबा सुकून मिले जो कभी खत्म न हो, बस अनंत सा सुकून...!!!
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राघवेन्द्र चतुर्वेदी
कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे आदमी धीरे-धीरे इंसान से ज़रूरत बनता चला जाता है। लोग उसे याद नहीं करते, उसकी उपयोगिता को याद करते हैं। जब उन्हें टूटना होता है, वो उसके पास चले आते हैं। जब उन्हें किसी का साथ चाहिए होता है, वो उसे पुकार लेते हैं। जब उन्हें समझे जाने की इच्छा होती है, वो उसकी चौखट पर बैठ जाते हैं। लेकिन जिस दिन वही आदमी भीतर से थोड़ा बिखरा हुआ होता है, उस दिन उसके हिस्से में सिर्फ सन्नाटा आता है। ऐसा सन्नाटा जो कानों में नहीं, आत्मा में बजता है। कभी देर रात बैठकर सोचता हूँ कि आखिर एक इंसान कितनी बार खुद को अनदेखा कर सकता है? कितनी बार अपनी तकलीफ को मुस्कुराहट के नीचे दबा सकता है? कितनी बार अपनी ही आवाज़ को भीतर कैद कर सकता है? और सबसे बड़ी बात...कितनी बार दूसरों के लिए मजबूत बनते-बनते खुद के भीतर कमजोर पड़ सकता है? क्योंकि सच मायने में हर वो व्यक्ति जो सबका सहारा बनता है, वो अंदर से कहीं न कहीं लगातार टूट भी रहा होता है। बस उसका टूटना दिखाई नहीं देता। सब कहते हैं “तुम बहुत अच्छे हो”… “तुम जैसा कोई नहीं”… “तुम हर किसी को समझ लेते हो”… लेकिन कोई ये नहीं पूछता कि जो सबको समझ लेता है, उसे कौन समझता है? जो हर किसी के आँसू पहचान लेता है, उसकी आँखों में जमा खामोशी कौन पढ़ता है? शायद इसलिए कुछ लोग धीरे-धीरे बोलना कम कर देते हैं। क्योंकि उन्हें एहसास हो जाता है कि दुनिया सुनती कम है, इस्तेमाल ज्यादा करती है। सबसे ज्यादा दर्द तब होता है जब तुम्हारी मौजूदगी को लोग अधिकार समझ लेते हैं। तुम्हारा हर त्याग उन्हें सामान्य लगने लगता है। तुम हर बार उपलब्ध रहो, हर बार संभालो, हर बार समझो, ये सब उनसे अपेक्षा बन जाता है। लेकिन तुम्हारी अपनी कोई अपेक्षा हो, तो अचानक तुम “ज़्यादा सोचने वाले”, “भावुक”, “कमज़ोर” कहलाने लगते हो, और फिर एक दिन तुम अपनी जरूरतों को खुद ही गैरज़रूरी मानने लगते हो। मैंने अक्सर देखा है कि जो लोग सबसे ज्यादा दूसरों के लिए खड़े रहते हैं, वो अपनी लड़ाइयाँ अकेले लड़ते हैं। उन्हें आदत हो जाती है चुप रहने की। वो किसी से शिकायत नहीं करते, क्योंकि उन्हें लगता है कि शायद उनकी तकलीफें किसी के समय के लायक नहीं हैं। वो हर किसी के लिए वक्त निकाल लेते हैं, लेकिन जब खुद के लिए दो शब्द चाहते हैं तो लोग कहते हैं “अरे तुम तो संभाल लोगे।” ये “तुम संभाल लोगे” दुनिया का सबसे भारी वाक्य है। क्योंकि इसके पीछे कहीं न कहीं ये छिपा होता है कि तुम्हें संभालने की जिम्मेदारी कोई नहीं लेना चाहता। लोग तुम्हारी मजबूती की तारीफ तो करते हैं, लेकिन उस मजबूरी को नहीं देखते जिसने तुम्हें इतना मजबूत बनाया। कोई नहीं देखता वो रातें जब तुम खुद से लड़ते रहे। वो पल जब तुमने रोना चाहा लेकिन रो नहीं पाए। वो दिन जब भीतर सब बिखरा हुआ था और बाहर तुम किसी और को हिम्मत दे रहे थे। कभी-कभी खुद पर ही गुस्सा आता है कि आखिर क्यों हर किसी के लिए दिल इतना नरम है। क्यों हर बार दूसरों की तकलीफ अपनी लगने लगती है। क्यों हर रिश्ते को इतनी सच्चाई से निभाने की आदत है। क्योंकि अंत में वही लोग सबसे ज्यादा थक जाते हैं जो रिश्तों को दिल से जीते हैं। दुनियादारी उन्हें कभी ठीक से आ ही नहीं पाती। वो हिसाब नहीं रख पाते कि किसके लिए कितना किया। और शायद इसी वजह से लोग उन्हें हल्के में लेने लगते हैं। सबसे खतरनाक अकेलापन वो नहीं होता जब आसपास कोई न हो। सबसे खतरनाक अकेलापन वो होता है जब तुम्हारे आसपास लोग हों, लेकिन तुम्हारी बातों का कोई वजन न हो। तुम बोलो और लोग बस सुनने का अभिनय करें। तुम अपने मन की गांठ खोलना चाहो और सामने वाला विषय बदल दे। धीरे-धीरे फिर आदमी बोलना छोड़ देता है। क्योंकि हर अनसुनी बात भीतर जाकर एक और दीवार बना देती है। और सच कहूँ…कुछ लोग इतने ज्यादा अपनों के लिए जीते हैं कि अंत में खुद अपने नहीं रह जाते। उनका पूरा अस्तित्व दूसरों की जरूरतों में बंट जाता है। वो खुद के लिए कुछ चाहना तक भूल जाते हैं। फिर एक दिन आईने में खुद को देखकर लगता है कि इस चेहरे को तो बरसों से किसी ने सच में देखा ही नहीं। सबने बस इससे उम्मीदें देखीं, सहारा देखा, धैर्य देखा, इंसान नहीं देखा। लेकिन सबसे दर्दनाक बात ये है कि ऐसे लोग फिर भी बदलते नहीं। वो अगली बार भी किसी के आँसू पोंछ देंगे। अगली बार भी किसी को टूटने नहीं देंगे। अगली बार भी खुद से पहले किसी और को रख देंगे। क्योंकि उनका दिल कठोर होना जानता ही नहीं। वो दुखी हो सकते हैं, थक सकते हैं, चुप हो सकते हैं, मगर किसी के प्रति बेरहम नहीं हो सकते। और शायद यही उनकी सबसे बड़ी ताकत भी है और सबसे बड़ी सजा भी...! 💔 ©® राघवेन्द्र चतुर्वेदी ✍️ (एक लड़का जो हर कहानी में खुद को ढूंढता है)
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𝗠𝗮𝗿𝗶𝘆𝗮𝗺_𝗠𝗕𝗗
दर्शन के बाद दर्दनाक अंत पत्नी के सामने ही डूब गया पति पत्नी चिल्लाती रही लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। कानपुर के मुसानगर में मुक्ता देवी के दर्शन करने गए परिवार की खुशियाँ मातम में बदल गई। यमुना नदी में स्नान के दौरान युवक मोहित अचानक डूबने लगा बेबस पत्नी बचाने के लिए गुहार लगाती रही लेकिन मोहित का कोई सुराग नहीं लगा।
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Pushpraj sharma
Pushpraj sharma@ThePushprajX·
गोपनीयता का अंत: आपके बेडरूम से लेकर आपके बैंक अकाउंट तक, कैसे सब कुछ अब "सार्वजनिक" है। आपके बेडरूम की दीवारें अब बहरी नहीं रहीं...... "क्या आपको लगता है कि दरवाजा बंद करने के बाद आप सुरक्षित हैं? फिर से सोचिए,आज के दौर में गोपनीयता एक ऐसा शब्द है जो डिक्शनरी में तो है, पर आपकी असल जिंदगी से गायब हो चुका है।" "आप अपने पार्टनर से वेकेशन की बात करते हैं और 2 मिनट बाद आपके फोन पर होटल के ऑफर्स आने लगते हैं यह 'इत्तेफाक' नहीं है आपका फोन आपको सुन रहा है, आपको देख रहा है और आपके मूड को डिकोड कर रहा है।" "आपके बेडरूम में रखा स्मार्ट स्पीकर या आपके हाथ में बंधी फिटनेस वॉच सिर्फ गैजेट्स नहीं हैं वे 'जासूस' हैं ,वे जानते हैं कि आप कब सोते हैं, कब जागते हैं और आपकी धड़कनें कब तेज होती हैं। "बात सिर्फ विज्ञापनों तक नहीं है,आपके बैंक अकाउंट से लेकर आपकी मेडिकल हिस्ट्री तक—सब कुछ क्लाउड पर है, एक छोटा सा 'Data Breach' और आपकी पूरी जिंदगी की जमा-पूंजी और राज सार्वजनिक हो सकते हैं।" "हम एक ऐसे डिजिटल दुनियां में जी रहे हैं जहाँ हर सीसीटीवी कैमरा और हर ऐप की परमिशन हमें ट्रैक कर रही है, हम खुद अपनी मर्जी से अपनी आजादी इन कंपनियों को बेच रहे हैं, सिर्फ थोड़े से आराम के बदले।"
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राघवेन्द्र चतुर्वेदी
मानवता जब अर्थी पर लेट जाती है, तब सबसे पहले इंसान के भीतर छिपा हुआ असली चेहरा बाहर आता है। किसी की मृत्यु पर कुछ आँखें सचमुच नम होती हैं, वहीं कुछ लोग उस चिता की आग में अपनी वर्षों पुरानी कुंठाएँ सेंकने लगते हैं। उन्हें लगता है कि यही समय है अपनी बुद्धिमत्ता का प्रदर्शन करने का,अपने कटाक्षों और अपनी नफरत को शब्दों की माला पहनाकर समाज के सामने परोसने का। मृत्यु जैसे गंभीर और मौन क्षण को भी उन्होंने बहस,उपहास और निजी एजेंडा का अखाड़ा बना दिया है। आजकल लोग शव के पास खड़े होकर भी संवेदना नहीं ढूँढ़ते,अवसर ढूँढ़ते हैं। किसी की अंतिम यात्रा में शामिल होने से पहले वे उसके जीवन का पोस्टमार्टम करने बैठ जाते हैं। कौन कैसा था,किसकी क्या विचारधारा थी,किसने किसका समर्थन किया था,मानो इंसान मर नहीं रहा,बल्कि कोई अदालत लगी हो जहाँ मृत व्यक्ति कटघरे में खड़ा हो और सबसे भयावह बात कि ये सब करने वालों को अपने भीतर कोई अपराधबोध भी नहीं होता। उन्हें लगता है कि वे बहुत जागरूक,निर्भीक और विद्वान हैं। जबकि संवेदनहीनता कभी भी विद्वता का प्रमाण नहीं होती। कुछ लोग मृत्यु पर ऐसे टूट पड़ते हैं जैसे उन्हें वर्षों से इंतजार हो कि कब कोई जाए और वे अपनी जहर भरी भाषा का प्रदर्शन करें। वे भूल जाते हैं कि मृत्यु केवल उस व्यक्ति की नहीं होती, उसके साथ कई लोगों का संसार भी टूटता है। एक माँ की उम्मीद मरती है,किसी पत्नी का सहारा चला जाता है,किसी बच्चे की छत छिन जाती है,किसी दोस्त की आधी जिंदगी खत्म हो जाती है। लेकिन जिनके भीतर इंसानियत मर चुकी हो,उन्हें केवल अपनी प्रतिक्रिया चमकानी होती है। उन्हें हर शोक में व्यंग्य दिखता है,हर आँसू में राजनीति दिखती है,हर अर्थी में मनोरंजन दिखता है। लोग दूसरों की मृत्यु पर भीतर से प्रसन्न होने लगे हैं। किसी की चिता की राख ठंडी भी नहीं होती और लोग सोशल मीडिया पर शब्दों की तलवार लेकर निकल पड़ते हैं। जैसे मृत्यु नहीं हुई,कोई उत्सव हुआ हो। कोई ताली बजाकर अपनी विचारधारा की जीत घोषित करता है,कोई व्यंग्य लिखकर खुद को क्रांतिकारी साबित करता है, कोई मृत व्यक्ति के पुराने कर्म गिनाकर खुद को धर्मात्मा सिद्ध करने लगता है। मानों दुनिया का सबसे पवित्र सच मृत्यु भी अब इंसानों को विनम्र नहीं बना पा रहा। याद रखिए समय बहुत शांत दिखाई देता है लेकिन उसका हिसाब बेहद कठोर होता है। वह हर शब्द दर्ज करता है,हर उपहास,हर कटाक्ष, हर वह क्षण जब आपने किसी की मृत्यु पर संवेदना के बजाय अहंकार चुना। आज आपको लग रहा होगा कि आप बहुत सही हैं,बहुत जागरूक हैं,बहुत निर्भीक हैं। लेकिन समय के पास स्मृति भी होती है और न्याय भी। आज आप किसी की अर्थी पर खड़े होकर हँस रहे हैं, कल आपकी चौखट पर भी वही सन्नाटा उतर सकता है। आज आप किसी के विलाप का मजाक बना रहे हैं, कल आपकी आवाज भी उसी तरह काँप सकती है। मृत्यु कभी विचारधारा देखकर नहीं आती। उसे फर्क नहीं पड़ता कौन वामपंथी था,कौन दक्षिणपंथी,कौन अमीर था,कौन गरीब,कौन भक्त था,कौन विरोधी। मृत्यु केवल इंसान देखती है और जब वह आती है,तब सबसे बड़े अहंकारी व्यक्ति की साँस भी उसी तरह टूटती है जैसे किसी साधारण आदमी की। श्मशान की आग सबका घमंड एक जैसी राख में बदल देती है। वहाँ किसी की प्रसिद्धि नहीं बचती,किसी की बहस नहीं बचती,किसी का तर्क नहीं बचता। बचती है तो केवल इंसानियत और दुर्भाग्य से आज वही सबसे कम बची है। लोग कहते हैं सच बोलना चाहिए,लेकिन किसी की मृत्यु पर अपनी जहरीली संतुष्टि उगलना सच नहीं,चरित्र का दिवालियापन है। किसी के जाने पर ये साबित करने की कोशिश करना कि “देखो मैं पहले से सही था”, ये ज्ञान नहीं, भीतर की सड़ी हुई कुंठा है। क्योंकि सच्चा ज्ञानी मृत्यु के सामने शांत हो जाता है। उसे पता होता है कि अंत सबका एक ही है। जो व्यक्ति मृत्यु को भी अपने अहंकार का मंच बना ले,उससे अधिक गरीब कोई नहीं। और हाँ,अपनी बारी आने पर विलाप मत करना। जब दूसरों की चिताओं के सामने तुम्हें संवेदना नहीं मिली,तो अपनी चिता के सामने संवेदना की उम्मीद मत रखना। जब तुमने किसी की अंतिम यात्रा को तमाशा बनाया,तो याद रखना समय भी तुम्हारे लिए उतना ही कठोर हो सकता है। क्योंकि ये संसार बड़ा विचित्र है यहाँ लोग अक्सर वही लौटाकर देते हैं जो उन्होंने पाया होता है। इसलिए किसी की मृत्यु पर कम से कम इंसान बने रहिए। हर बात पर अपनी राय ठूंसना जरूरी नहीं होता। हर शोक को बहस में बदलना बुद्धिमानी नहीं होती। कभी-कभी मौन सबसे बड़ा संस्कार होता है। कभी-कभी सिर झुकाकर केवल इतना स्वीकार कर लेना कि “हाँ, अंत सबका यही है”यही मनुष्य होने की अंतिम पहचान होती है। वरना सच यही है कि जिस दिन इंसान दूसरों की मृत्यु पर हँसने लगे,उस दिन समझ लेना चाहिए कि उसकी आत्मा उससे बहुत पहले मर चुकी है। 💔
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@dsha13_·
अंत में केवल तस्वीरें रह जाती हैं लोग कहां एक-दूसरे से मिलते हैं ।। 🍁
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Guide Pawan
Guide Pawan@Guidepawan·
@dsha13_ दिल की बात लिखी है 🙏
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•
@dsha13_·
कभी किसी पुरुष को ध्यान से देखना- जब वह अकेला बैठा हो और कुछ नहीं कर रहा हो। वह सच में कुछ नहीं कर रहा होता ऐसा कम ही होता है। वह हिसाब लगा रहा होता है– पैसों का, वक्त का, रिश्तों का, और सबसे ज्यादा अपने आप का... कि वह कहाँ खड़ा है, कितना और क्या कुछ पीछे छूट गया है?।
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नेपथ्य
नेपथ्य@nepathy_·
कुछ रिश्तों की शरुवात बेहद मजबूत होती है जिससे हमे यकीन होता है कि हम कभी अलग नहीं होंगे,लेकिन अचानक उन रिश्तों का अंत इतना बुरा हो जाता है कि हम सोचते हैं कि हम अब शायद ही कभी फिर मुलाकात होगी...!
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निरर्थक
निरर्थक@nirarthak_·
आज परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं हैं,पर इसका अर्थ यह नहीं कि हमेशा ऐसा ही रहेगा क्योंकि जब सब कुछ ठीक था,तब भी बहुत कुछ वैसा नहीं हुआ जैसा होना चाहिए था वक्त सिर्फ हालात नहीं बदलता,सोच और सहने की क्षमता भी बदल देता है...!
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रजनीश रंजन
जीवन में सब कुछ अच्छा चलते रहता है … कोई अप्रत्याशित घटना जिंदगी को ऐसा यूटर्न देती है की सब कुछ खत्म सा नजर आता है ! लोग जीवन में सकारात्मक होने की बात करते हैं … सब कुछ भूलकर आगे बढ़ने भी कहते हैं लेकिन एक चीज़ जो मैंने अनुभव किया है की कोई एक जिंदगी बाकियों को संवारने में ख़ुद को खो देता है । अपना अस्तित्व को भुलाकर मुस्कुराना कितना मुश्किल है ये सब नहीं समझ पायेंगे … जीवन के प्रवाह में बहते तो सब जाते हैं लेकिन उसे जीना कहना कभी उचित नहीं होता ! ख़ासकर लड़कों की सिसकियाँ भी क़ैद होती है … वो कभी बाहर नहीं आ पाती है , बस ख्वाहिशों का गला घोंटते हुए बनावटी मुस्कान तले दब जाती है ! ये जीवन संघर्ष की कहानियाँ के रूप में भी अंकित नहीं होती है … बस नियति के हवाले सब कुछ छोड़ जीवन प्रवाह में बहते जाना होता है ! ☺️ #Unsaid11May #SilentScars11 #11MayDiaries #ADayINeverForget
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Parwez Eshaan پرویز ایشان
हम नहीं मानते की समय के साथ घाव भर जाते हैं, किताब पर धूल जम जाने से कहानियां मिटा नहीं करती..!!
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निरर्थक
निरर्थक@nirarthak_·
किसी और के हिस्से का बहुत जी चुके,बहुत मर भी चुके भीतर ही भीतर अब बस तुम्हारे हिस्से का जीवन तुम्हारे साथ,जिंदा रहते हुए बिताना है...!
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सर्व प्रिय
सर्व प्रिय@priyaso07143042·
पता है जिन ख़ुशियाँ पर मेरा कोई हक़ नहीं है ना आज और ना कभी कल में, फिर भी उन खुशियों की कामना करना या उनका साथ चाहना भी एक अपराध से कम नहीं है.. क्योंकि सब परिणाम जानते हुए ग़लत काम करना गलती नहीं रह जाती 🍂🍂
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Cricketopia
Cricketopia@CricketopiaCom·
Did you know? As an ODI opener, Sachin Tendulkar had a better strike rate than Chris Gayle. •Tendulkar’s strike rate as an ODI opener: 88.04 •Gayle’s strike rate as an ODI opener: 88.02
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Gulmohar 🌸
Gulmohar 🌸@Bekaarbaate·
Inki chutiya harkat se 4 din se poora internet aur prashasan pareshan hai
Gulmohar 🌸 tweet media
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