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India. Katılım Eylül 2025
183 Takip Edilen31 Takipçiler
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HumHunNaa1
HumHunNaa1@HumHunNaa1·
HA HA HA ...... ........! WHERE ARE SUBMARINES? HOW MANY IN PLAN? HOW MANY NEAR DESIRED LOCATIONS? OTHERS ARE 7 DAYS AWAY FROM DESIRED LOCATIONS? शुभम्।
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HumHunNaa1
HumHunNaa1@HumHunNaa1·
चौथा पिता भी ढूंढ बनाया उसका चाल चरित्र अपनाया पर उस घर में तो कानून है और चौथे डैडी की तो लगी पड़ी है तो क्या समझें कि- तीन पीढीयों बाद भी नतीजा- यह चौथा भी असली डैडी नहीं बस पीछे खडा हो कुछ मनोरंजन? शुभम्।
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Raju Parulekar
Raju Parulekar@rajuparulekar·
The Mum Indian electorate ! Epstein Files, Surrender to Trump, Surrender to China, Mum on Tariffs, Mum on American interference, Mum on Gaza, Mum on Subramaniam Swamy ji’s allegations, Mum on Madhu Kishtwar ji’s allegations, Mum on Israeli trap, Mum on brazen, blatant Corruption in the name of Infrastructure, Mum on rapists’ parole, Mum on misogyny, Mum on crime against Women, Mum on open mockery of its Prime Minister, Mum on destruction of Hasdeo and India’s forests, mangroves, Mum on Crony amassing Indian resources, Mum on “hellhole” Mum on Chinese aggression, invasion, Why is the Indian Electorate Mum on these issues❓If it isn’t Mum, why these results❓Who is voting for BJP despite the above❓ @ECISVEEP ❓❓
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Awesh Tiwari
Awesh Tiwari@awesh29·
ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग पर बीजेपी के साथ मिलकर धांधली करने का आरोप लगाते हुए मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देने से इंकार कर दिया है। ऐसे में क्या हो सकता है? यह देखें ​राज्यपाल का हस्तक्षेप: राज्यपाल मुख्यमंत्री को इस्तीफा देने के लिए कह सकते हैं या सदन में बहुमत साबित करने के लिए विशेष सत्र बुला सकते हैं। ​अविश्वास प्रस्ताव: नई विधानसभा के गठन के बाद, यदि मुख्यमंत्री सदन में बहुमत खो देते हैं, तो अविश्वास प्रस्ताव लाकर उन्हें हटाया जा सकता है। ​संवैधानिक संकट की स्थिति: यदि मुख्यमंत्री पद छोड़ने से पूरी तरह इनकार करते हैं, तो राज्यपाल राष्ट्रपति को रिपोर्ट भेजकर बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश कर सकते हैं। ​न्यायिक समीक्षा: इस गतिरोध के समाधान के लिए मामला अदालत में जा सकता है, जहां संविधान के अनुसार अंतिम निर्णय लिया जाता है।
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HumHunNaa1
HumHunNaa1@HumHunNaa1·
One idiot's finger And Heavy on pocket of other idiot's?
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Rahul Gandhi
Rahul Gandhi@RahulGandhi·
कह दिया था - चुनाव के बाद महंगाई की गर्मी आएगी। आज कमर्शियल गैस सिलेंडर ₹993 महंगा। एक ही दिन में सबसे बड़ी बढ़ोतरी। यह चुनावी बिल है। फरवरी से अब तक: ₹1,380 की बढ़ोतरी - सिर्फ़ 3 महीनों में 81% का इज़ाफ़ा। चायवाला, ढाबा, होटल, बेकरी, हलवाई - हर किसी की रसोई पर बोझ बढ़ा। और इसका असर आपकी थाली पर भी पड़ेगा। पहला वार गैस पर, अगला वार पेट्रोल-डीज़ल पर।
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Umashankar Singh उमाशंकर सिंह
जब चुनाव के पहले आशंका जतायी जा रही थी कि चुनाव के बाद क़ीमतें बढ़ाई जाएंगी तो IT Cell के कुकुरमुत्ते (मशरूम) कहते थे भ्रम मत फैलाओ… अब दलील दे रहे हैं कि ईरान युद्ध की वजह से हो रहा है। ईरान युद्ध तो दो महीने से चल रहा है। सरकार रूकी ही थी कि मतदान ख़त्म हो!
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Dayashankar Mishra
Dayashankar Mishra@DayashankarMi·
RSS दुनिया भर में अपनी छवि चमकाने में जुटा है। भारतीय जनता के पैसे से RSS का प्रचार चरम पर है। RSS क्यों कह रहा है, ‘वह ‘कू क्लक्स क्लान’ का भारतीय संस्करण नहीं है’। RSS के बारे में इस तरह के लेखों की सतत ज़रूरत है। अंग्रेज़ी से कहीं ज़्यादा हिंदी में… @NilanjanUdwin
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Pushpraj Yadav
Pushpraj Yadav@pushprajyadav97·
भाईजी का नाम मोहम्मद आमिर खान है। 20 फ़रवरी 1998 की रात, इनकी माँ ने इनको पुरानी दिल्ली में एक दुकान से दवाइयाँ लाने के लिए भेजा। वह 18 साल का था। लेकिन वह कभी दुकान तक पहुँचा ही नहीं। साधारण कपड़ों में कुछ लोगों ने उसे रास्ते में रोक लिया। वह नहीं जानता था कि वे पुलिस अधिकारी हैं। वे इनको एक सुनसान इमारत में ले गए। सात दिनों तक उसे कथित रूप से गैरकानूनी हिरासत में रखा गया। उसके साथ मारपीट की गई। उससे खाली कागज़ों पर हस्ताक्षर करवाए गए। इसके बाद दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल ने उसे अदालत में पेश किया और उस पर दिसंबर 1996 से अक्टूबर 1997 के बीच दिल्ली, गाज़ियाबाद, रोहतक और सोनीपत में हुए 19 बम धमाकों के आरोप लगा दिए। मीडिया के सामने उसे एक आतंकवादी के रूप में पेश किया गया। उसके परिवार को कोई जानकारी नहीं दी गई। वे कई दिनों तक थानों के चक्कर लगाते रहे, तब जाकर उन्हें पता चला कि उसके साथ क्या हुआ। उसने 14 साल जेल में बिताए। यातना के बीच। एकांत कारावास के बीच। उसने देखा कि एक-एक कर केस अदालत में गिरते गए क्योंकि सबूत झूठे साबित हो रहे थे। 2012 में उसे 19 में से 17 मामलों में बरी कर दिया गया। 2 मामले अभी भी लंबित हैं। वह पहले ही जेल में उतना समय बिता चुका था जितनी सज़ा उसे सभी आरोप साबित होने पर भी मिल सकती थी। जनवरी 2012 में वह जेल से बाहर आया। उसके पिता की मौत उसके जेल में रहते हुए हो चुकी थी। उसकी माँ को इतना गहरा स्ट्रोक आया था कि जब वह घर लौटा तो वह उसे पहचान भी नहीं पाईं। National Human Rights Commission of India ने दिल्ली सरकार को उसे मुआवज़ा देने का निर्देश दिया। राशि थी 5 लाख रुपये, यह हुए साल के कोई 36 हजार और महीने के कोई 3000, चलो भाई यह भी एहसान हुआ। दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल के किसी भी अधिकारी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। न किसी को निलंबित किया गया, न कोई जांच बैठाई गई। उसने अपने साथ हुई इस घटना पर एक किताब लिखी — Framed As A Terrorist: My 14 Year Struggle To Prove My Innocence आज वह उन लोगों की मदद करता है जिन्हें झूठे मामलों में फँसाया गया है, ताकि वे उसी सिस्टम से लड़ सकें जिसने उसकी ज़िंदगी बर्बाद कर दी थी। भारत सरकार ने उसे 5 लाख रुपये दिए और उसे न्याय कह दिया। ✍️ तलबिना मुसली वाले जॉन अब्दुल्लाह
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HumHunNaa1
HumHunNaa1@HumHunNaa1·
@awesh29 @Pawankhera समूह का वफादार कार्यकर्त्ता के प्रति नजरिया- अरे देखो, क्या हुआ, मदद करो। झुण्ड का दत्तक कार्यकर्त्ता के प्रति नजरिया- अपना अपना देख लो। शुभम्।
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Awesh Tiwari
Awesh Tiwari@awesh29·
आज अदालत के निर्णय के बाद हिमांता बिस्वा शर्मा की गुस्से और नफरत से भरी पोस्ट पढ़ा तो सोचता रहा कि यह कैसा इंसान है? अभी - अभी अग्रिम जमानत के बाद पवन खेड़ा जी @Pawankhera की पोस्ट पढ़ा। एक शब्द भी अतिरंजनापूर्ण और रोष भरे नहीं हैं। यही अंतर है। आप भी पढ़ें "मैं सर्वोच्च न्यायालय को विधि के शासन को कायम रखने के लिए धन्यवाद देता हूँ, और डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी और AICC विधि विभाग को उनके समयोचित और दृढ़ हस्तक्षेप के लिए धन्यवाद देता हूँ। डॉ. सिंघवी वास्तव में हमारे ब्रह्मास्त्र हैं। दूसरी बार, उन्होंने असम के मुख्यमंत्री की निरंतर कार्रवाई के बावजूद मेरी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए पैरवी की है। मैं सीपीपी अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी; कांग्रेस अध्यक्ष श्री मल्लिकार्जुन खर्गे; विपक्ष के नेता श्री राहुल गांधी,कांग्रेस महासचिव श्रीमती प्रियंका गांधी वाड्रा, महासचिव (संगठन) श्री के.सी. वेणुगोपाल; और महासचिव (मीडिया एवं संचार) श्री जयराम रमेश के प्रेरणादायक और निरंतर समर्थन के लिए व्यक्तिगत रूप से ऋणी हूँ। मैं उन लाखों कांग्रेस समर्थकों से भी प्रभावित हूँ जिन्होंने इन चुनौतीपूर्ण समय में मेरे लिए आवाज उठाई और प्रार्थना की। संविधान स्पष्ट है: व्यक्तिगत स्वतंत्रता को राजनीतिक प्रतिशोध की वेदी पर बलिदान नहीं किया जा सकता। असम के माननीय मुख्यमंत्री को यह समझना चाहिए कि यह कोई व्यक्तिगत लड़ाई नहीं है। वह सवालों के जवाब देने के बजाय पुलिस की आड़ में नहीं छिप सकते। अंत में, मैं अपने मित्रों और सहयोगियों, विधि विभाग के राष्ट्रीय सचिव मुहम्मद खान और उमर होदा, दो वकीलों के अथक परिश्रम और सहयोग को स्वीकार करना चाहता हूँ, जिन्होंने विभिन्न मंचों के माध्यम से इस मामले को आगे बढ़ाया।" सत्यमेव जयते
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Cartoonist Rakesh Ranjan
Cartoonist Rakesh Ranjan@cartoonistrrs·
हम चुप हैं, पता नहीं क्यों? अच्छी सड़क, पानी, बिजली, अस्पताल और स्कूल ये हर नागरिक के बुनियादी अधिकार हैं। लेकिन हालात ऐसे हो गए हैं कि सड़क भी “VIP” बनने लगी है, इस हाइवे का बहिष्कार किया जाना चाहिए लेकिन, हम चुप हैं, पता नहीं क्यों? मिडिल क्लास, जो अपनी मेहनत की कमाई से बाइक, कार खरीदना सपना होता है , आज सबसे ज्यादा दबाव में है। पुराने वाहन पेट्रोल-डीजल पर चलते हैं, लेकिन अचानक एथनॉल ब्लेंडिंग जैसे फैसले सामने आते हैं। 85% एथनॉल की बात होती है, समझ नहीं आ रहा एथनॉल पेट्रोल में मिलाया जाएगा या पेट्रोल एथनॉल में , हम चुप हैं, पता नहीं क्यों। SIR जैसी प्रक्रियाओं में ज़िंदा लोगों के नाम सूची से हटाए जा रहे हैं , हम चुप हैं, पता नहीं क्यों? मणिपुर जैसे गंभीर मुद्दे वर्षों से सुलग रहे हैं, लेकिन राष्ट्रीय बहस में कहीं खो गया है, हम चुप हैं, पता नहीं क्यों? अचानक कोई भी बिल लाए जाते हैं, फैसले थोपे जाते हैं , हम चुप हैं, पता नहीं क्यों? हमारे चुने हुए प्रतिनिधि अचानक फैसले लेते हैं, इस्तीफे देते हैं, पद बदलते हैं, हम चुप हैं, पता नहीं क्यों? अचानक से गैस के दाम 993 रुपये तक बढ़ते हैं, हम चुप हैं, पता नहीं क्यों? चाहे दिल्ली हो या झारखंड, सरकार बनाने के खेल में सरकारी संस्थाओं का दुरुपयोग किया जा रहा है, हम चुप हैं, पता नहीं क्यों? “बेटी बचाओ” जैसे नारा देने वाली पार्टी के बीच ही अंकिता भंडारी जैसे मामले सामने आते हैं , हम चुप हैं, पता नहीं क्यों? ऐसी न जाने कितनी नाकामियां हैं, जो हमें रोज़ दिखती हैं, लेकिन हम चुप हैं, पता नहीं क्यों हम चुप क्यों हैं? क्या यह डर है? मजबूरी है? या फिर हमने सवाल करना ही छोड़ दिया है? — कार्टूनिस्ट राकेश @ravish_journo @neeraj_jhaa @abhisar_sharma @rohini_sgh @ajitanjum x.com/mohitlaws/stat…
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Surendra Rajput ‏
Surendra Rajput ‏@ssrajputINC·
पत्थर उठाने के लिये भी तो झुकना पड़ेगा!
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Saurabh
Saurabh@sauravyadav1133·
ये दो तस्वीरें आज की हैं पहली तस्वीर में जो शख्स हैं वो 160 वर्ग किलोमीटर में फैले वर्षावन को कटने से बचाने के लिए अंडमान निकोबार में हैं। दूसरी तस्वीर में जो शख्स हैं वो पिछले 12 साल से यही कर रहे हैं कहीं वोट पड़ते और ये पहुँच जाते हैं किसी मंदिर और लोग इसी में खुश हैं…
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Dr. Ragini Nayak
Dr. Ragini Nayak@NayakRagini·
राजनाथ सिंह पाकिस्तान को Clean Chit देने वाले भारत के पहले रक्षा मंत्री हैं ! “आतंक का कोई देश नहीं होता” ऐसा कायराना बयान देने का मतलब क्या है ? क्या पाकिस्तान Terror State नहीं है,रक्षामंत्री जी? क्या पाकिस्तान हमारे देश आतंकी हमले नहीं करवाता, रक्षामंत्री जी? पुलवामा और पहलगाम के आतंकी हमले किसने करवाए थे, रक्षामंत्री जी? अपने देश के साथ विश्वासघात करते हुए आपको शर्म नहीं आयी, रक्षामंत्री जी ???
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आचार्य कन्फ़्यूशियस
भई ये सब तो हम नहीं मानते. 🤷🙄 हम तो कुछ अटल सत्य जानते हैं बस - नेहरू जी के बाप दादा मुसलमान थे, सोनिया जी बार डांसर थीं, सरदार पटेल दिल से संघी थे, नोटबंदी के कारण पाकिस्तानी आतंकवादियों को 40 हजार करोड़ के नकली नोट जलाना पड़ा था, और हिन्दू खतरे में है! BC से!! 🤦😂😂😂
आचार्य कन्फ़्यूशियस tweet media
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Krishna Kant
Krishna Kant@kkjourno·
अगर बावनी ​इमली का इतिहास वामपंथियों ने छुपा लिया, कांग्रेस ने दबा दिया, तो रिसर्च करते हुए अशोक श्रीवास्तव के सामने कैसे आ गया? इनसे पूछो कि क्या इलाहाबाद चौक में 'नीम का पेड़' मालूम है जिस पर दर्जनों लोग टांग दिए गए? ये कहेंगे कि वामपंथियों ने छुपा लिया। क्या इलाहाबाद के सुलेम सराय स्थित 'फांसी इमली' के बारे में सुना है? ये कह देंगे कि वामपंथियों ने छुपा लिया। क्या सुल्तानपुर, फैजाबाद और गोंडा जैसी जगहों पर ऐसी दिल दहलाने वाली कहानियां नहीं हैं? क्या अवध के हर जिले कस्बे में ऐसी कहानियां लोगों की जबान पर नहीं हैं? इनको कुछ पता ही नहीं है ​क्योंकि वामपंथियों ने छुपा लिया। ऐसे निपट नमूनों के मुताबिक, पूरे आंदोलन में कांग्रेस ने तो कुछ किया ही नहीं लेकिन ये सौ साल में कभी एक संघी का नाम नहीं बता पाए जो जेल गया हो या फांसी चढ़ा हो? इससे कोई पूछे कि मास्टर सूर्यसेन, दिनेश गुप्ता और कुशल कोंवर कौन थे? इनको पता ही नहीं होगा। इनको तो यह भी नहीं पता होगा कि लाला लाजपत राय जैसे बड़े कांग्रेसी नेता को लाठियों से पीटकर मार डाला गया था। संघियों को वह भी इतिहास नहीं मालूम है जो आपने दूसरी कक्षा में पढ़ लिया। इन्होंने तो राणाप्रताप, राणा सांगा, शिवाजी और लक्ष्मीबाई का नाम भी त​ब सुना जब 2014 में कंगना ने आजादी की घोषणा की। इनके गदहेपन की ढाल वामपंथी हैं। उन्होंने सब छुपा लिया और ये सौ साल से घुइया छील रहे हैं, सब छुप जाने दिया। वामपंथियों ने सब छुपा लिया, इसीलिए किसी संघी को नहीं ​मालूम है कि क्रांतिकारी दलों और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में फर्क था। हिंसा और अहिंसा की ऐतिहासिक बहस, उसकी भूमिका और क्रांतिकारी दलों के प्रति दमनकारी कानून के बारे में भी इन्हें नहीं मालूम होगा। सब वामपंथियों ने छुपा लिया। इन्हें नहीं मालूम है कि कांग्रेस शांतिपूर्ण धरना, प्रदर्शन और सत्याग्रह करती थी, जिसके नेता महात्मा गांधी थे। इसी ​के लिए वे महात्मा बने जिन्होंने सत्य, ​अहिंसा और सत्याग्रह को दुनिया भर में मशहूर किया। किसी शांतिपूर्ण आंदोलनकारी को फांसी देना संभव नहीं था। फांसी उसी को दे सकते थे, जिसको वे कानूनन अपराधी साबित करें। लेकिन वामपंथियों ने सब छुपा लिया। संघ ने सौ साल में क्या तीर मारा है, इसे समझने के लिए सावरकर का ए​क बयान काफी है कि ”संघ के स्वयंसेवक के समाधि लेख में लिखा होगा- वह जन्मा, संघ में गया और बिना कुछ किए धरे मर गया?” लेकिन यह गलत इतिहास है। संघ ने शाखा में लाठी भांजी और अंग्रेज डरकर भाग गए। यह सच्चा इतिहास भी वामपंथियों ने छुपा लिया। सबसे अहम सवाल, जिस लेखक की ये तारीफ कर रहे हैं, उसने बावनी इमली का इतिहास लिखने के लिए इतिहास को उपन्यास की शक्ल क्यों दी? क्योंकि उपन्यास में गप्प मारने की छूट मिलती है। इतिहासलेखन वह छूट नहीं देता। 1857 की क्रांति पर किसी संघी ने सौ साल में एक प्रामाणिक किताब क्यों नहीं लिखी? एक किताब ढंग से लिखी नहीं जाती तो उसके लिए वामपंथियों को मत कोसो, अपने आप पर शर्म करो।
Ashok Shrivastav@AshokShrivasta6

एक पत्रकार के लिए इससे ज्यादा संतोष की बात क्या हो सकती है कि वो जो मुद्दा उठाए वो देश तक पहुंच जाए। दिसंबर 2024 में मैने #DoTook में बावनी इमली का इतिहास याद दिलाया था, जो कांग्रेस और वामपंथियों ने छुपाया। दरअसल उस दिन खड़गे जी ने कहा था कि आजादी तो हमने (कांग्रेस) ने ही दिलाई। पर सहसा रिसर्च करते हुए मेरे सामने बावनी इमली का इतिहास आ गया। जब कांग्रेस का जन्म भी नहीं हुआ था तब अंग्रेजी हुकूमत से लड़ते हुए 52 स्वतंत्रता सेनानियों को एक ही दिन (और वो आज ही की तारीख थी, 28 अप्रैल 1858) अंग्रेजों ने इमली के पेड़ पर फांसी दे दी थी। कितने दुर्भाग्य की बात है कि स्वतंत्रता संग्राम के पूरे इतिहास में 52 कांग्रेसियों को फांसी नहीं हुई,पर जिस एक ही दिन 52 लोग फांसी पर लटका दिए गए उसका हमारे इतिहास की किताबों में कोई जिक्र तक नहीं है। दो टूक में जब मैने यह विषय उठाया तो यह क्लिप बहुत वायरल हुई और देश की नई पीढ़ी ने बावनी इमली का इतिहास जाना। और आज ही मुझे लेखक भगवंत अनमोल की लिखी पुस्तक "बावनी इमली" मिली! भगवंत अनमोल को यह पुस्तक लिखने के लिए बधाई। और आप सबसे आग्रह है कि यह पुस्तक जरूर पढ़ें और हमारे गुमनाम स्वतंत्रता सैनियों का वो इतिहास जरूर पढ़ें तो एक साजिश के तहत हमसे छुपाया गया।

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Ranvijay Singh
Ranvijay Singh@ranvijaylive·
हम लोगों में आपसी मतभेद थे, वो मिट गए हैं. कुछ लोगों ने जो भ्रम फैलाया, उससे मैं व्यथित थी. अब मेरी अध्यक्ष जी से कोई शिकवा शिकायत नहीं है. मैं परेशान थी, बस इसलिए मैंने ऐसा किया. - BJP नेता दीपाली तिवारी ने बयान बदल दिया दीपाली के बगल में जिला अध्यक्ष मोहनलाल खड़े हैं.
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Manish Singh
Manish Singh@RebornManish·
मैदान में फौज, और अर्धसैनिक बल उतर गए। बख्तरबंद गाड़ियां उतर गई। लेकिन राफेल, सुखोई, SU400, अग्नि, पृथ्वी और ब्रह्मोस और पनडुब्बियों का स्ट्रेटजिक इस्तेमाल नही करना, एक गम्भीर चूक रही। इतिहास में लिखा जायेगा, कि बस इसी चूक की वजह से भाजपा.. बंगाल का युद्ध हार गयी।
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Indian Youth Congress
"बाँटो और राज करो”, ये कोई पुरानी अंग्रेज़ों वाली कहानी नहीं है, ये आज की Modi सरकार की राजनीति है, और उसका नया प्रयोगशाला बना है लद्दाख। Modi सरकार लद्दाख में सीटों और सीमाओं का ऐसा खेल, खेल रही है, जिसमें नक्शा इस तरह काटा गया कि सत्ता हमेशा उनके ही पक्ष में रहे। और“delimitation" के नाम पर कल यही मॉडल पूरे देश पर चलेगा – जैसा राहुल गांधी कहते हैं, की बीजेपी “पूरा सिस्टम अपने कब्ज़े में लेने की कोशिश कर रही है।" लद्दाख की जनता ने माँगा था: स्टेटहुड, छठी अनुसूची, ज़मीन–नौकरी की सुरक्षा, अपनी चुनी हुई सरकार। सरकार ने दिया क्या? काग़ज़ पर सात ज़िले, और ज़मीर पर सात टुकड़े। पूरे लद्दाख में मुसलमान करीब 46%, बौद्ध लगभग 40%, और हिंदू लगभग 14% हैं। लेकिन नए नक्शे में देखिए खेल – 5 ज़िले वहाँ बनाए जहाँ बौद्ध बहुमत में हैं, सिर्फ 2 ज़िले जहाँ मुस्लिम बहुमत में हैं। पहले तो बस दो ही ज़िले थे, लेह और कारगिल, जो धर्म की लाइन पर नहीं कटे थे, अब पूरा administrative ढाँचा religious fault lines देखकर redraw किया गया है। लद्दाख ने अधिकार माँगे थे, सरकार ने उन्हें धर्म और ज़िलों में बाँट दिया। आज ये प्रयोग लद्दाख पर हो रहा है, कल यही नक्शा पूरे देश पर बनाया जाएगा, ऊपर centralized सत्ता, नीचे बंटी हुई जनता।
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