Tripti Soni@triptisoni6194
जुर्म की जिंदगी, चार दिन की चांदनी...
छत्तीसगढ़ और बगल से लगा हुआ आंध्र नक्सल खबरों से भरा हुआ है। कल एक सबसे बड़े नक्सल नेता हिड़मा के साथ उसकी पत्नी, और 4 दूसरे नक्सली एक मुठभेड़ में आंध्र में मारे गए। आज सुबह की खबर है कि उसी जगह पर 7 और नक्सली मारे गए हैं। छत्तीसगढ़ में पुलिस और सुरक्षाबलों ने चैन की सांस ली है क्योंकि हिड़मा इस राज्य में बहुत बड़े-बड़े हमलों के पीछे लीडर था। एक इतना बड़ा हथियारबंद वैचारिक आंदोलन किस तरह एक-एक करके अपने लीडरों को मरते देख रहा है, और बाकी नेताओं को, आम काडर को हथियार डालते देख रहा है, वह देखने लायक है। इससे यह बात भी समझ पड़ती है कि भारत जितना विशाल लोकतंत्र इतना ताकतवर है कि आधा दर्जन से अधिक राज्यों में बिखरा हुआ नक्सल आंदोलन अपनी आधी सदी की जिंदगी में भी सरकार के सामने टिक नहीं पाया। वक्त जरूर लगा लेकिन वह अब खत्म होने के करीब है। आंदोलन का वैचारिक हिस्सा चाहे बचा रहे, लेकिन उसका हथियारबंद हिस्सा तो अब विसर्जन के करीब है।
दूसरी तरफ इससे बिल्कुल ही अलग, एक आम शहरी जुर्म में शामिल गुंडागर्दी और माफिया अंदाज की सूदखोरी करने वाले तोमर नाम के दो भाई (उन्हें बंधु लिखना ठीक इसलिए नहीं लगता कि बंधु तो भले लोगों के लिए इस्तेमाल होता है, कहीं पर कातिल बंधु, या बलात्कारी बंधु तो लिखा नहीं जाता) पुलिस की गिरफ्त में आते जा रहे हैं, एक गिरफ्तार हो चुका है, और दूसरे की गिरफ्तारी महज वक्त की बात है। कानून अपना काम कुछ धीरे-धीरे करता है, लेकिन कर तो देता है। इन्हीं तोमर बंधुओं के एक आका, तथाकथित करणी सेना के स्वघोषित राष्ट्रीय अध्यक्ष ने जिस तरह एक वीडियो जारी करके अपने मवालियों से तोमर को गिरफ्तार करने वाली पुलिस के घर घुसने का फतवा दिया है, उस अध्यक्ष की गिरफ्तारी भी कुछ ही दिनों की बात है।
एक तरफ एक हथियारबंद, और हिंसक राजनीतिक विचारधारा से नक्सल आंदोलन चलाने वाले लोग, और दूसरी तरफ शहरों के बड़े ताकतवर बन गए माफिया को इस मिसाल में एक साथ रखना कुछ वामपंथी बुद्धिजीवियों को खटक भी सकता है, लेकिन मैं इन दोनों की तुलना नहीं कर रही हूं, मैं सिर्फ यह कह रही हूं कि भारत में कानून से टकराव लेते हुए बहुत लंबे चल पाना हर किसी के लिए मुमकिन नहीं हो पाता। उत्तरप्रदेश और बिहार की कई खबरें यह जरूर बताती हैं कि कई बड़े मुजरिम राजनीतिक संरक्षण से दशकों तक अपना माफियाराज चलाते रहते थे, और ताजा सरकार से न पटने पर उन्हें घेरकर मारा गया, या जेल भेजा गया। जो भी वजह रही हो, यह बात तो अपनी जगह सच है कि लोकतंत्र में कोई न कोई ऐसी सरकार आती है जो पिछली सरकारों के बनाए और बढ़ाए हुए माफिया को ठिकाने लगाती है, जैसे आज छत्तीसगढ़ के तोमर नाम के ये दो भाई, जो कि लंबे राजनीतिक संरक्षण के बाद अब जब फंसे हैं, तो धंसे हैं।
ये दोनों तो बड़े-बड़े उदाहरण हैं, लेकिन लोगों को याद रखना चाहिए कि जिस लोकतंत्र में कानून का राज थोड़ा-बहुत भी बचा रहता है, वहां पर जुर्म की उम्र हो सकता है कि बहुत लंबी न हो। हो सकता है कि लोगों के पास ऐसी मिसालें दिखाने के लिए हों कि कुछ माफिया गुंडों, या उग्रवादी आंदोलनों, या आतंकी हरकतों की उम्र आधी-आधी सदी तक चली हो, लेकिन उनका अंत तो होता ही है। इसलिए लोकतंत्र में समझदारी इसी बात में रहती है कि अगर किसी कानून से सहमति न हो, तो एक जनमत जुटाकर उस कानून को बदलने की कोशिश करनी चाहिए, न कि उस कानून को तोड़ने की।
अब यह अंग्रेजी राज का हिंदुस्तान नहीं है जहां गांधी को नमक कानून तोड़ना जरूरी लगा हो। इस देश की आजादी के आंदोलन में कई जगह लगान देने का विरोध किया गया, अंग्रेजों के कई दूसरे आदेशों का विरोध किया गया, लेकिन वह एक परदेसी हुकूमत थी जिसका विरोध करना हर भारतीय की जिम्मेदारी थी। आज भारत में, या इसके प्रदेशों में हुकूमत यहीं की निर्वाचित सरकारों की है, और देश-प्रदेश के कानून अगर किसी को पसंद नहीं आते हैं, तो विधायकों और सांसद के माध्यम से उन्हें बदलवाने की कोशिश करनी चाहिए।
चाहे आदिवासी हितों की बात करते हुए नक्सल आंदोलन हो, या कि शहरों में कोई माफिया कारोबार हो, कानून के खिलाफ लड़ाई बहुत लंबी नहीं चल सकती। अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग सत्ता के कुछ पसंदीदा मुजरिम हो सकते हैं, किसी-किसी सरकार में यह भी हो सकता है कि नक्सलियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई न हुई हो, लेकिन एक वक्त तो ऐसा आया कि नक्सली या तो हथियार डालने को तैयार हुए, या फिर थोक में मारे गए। कुछ ऐसा ही शहरी गुंडों का भी होता है, और कुछ अधिक हद तक होना चाहिए। जब गुंडों पर बरसों तक कोई कार्रवाई नहीं होती, तो वे अपने आसपास की ठलहा नौजवान पीढ़ी के लिए एक आदर्श भी बन जाते हैं। ऐसा दाऊद इब्राहिम के मामले में भी हुआ था, चंबल के डकैतों के मामले में भी हुआ था, और कश्मीर में उग्रवादियों की मिसाल भी नौजवान पीढ़ी को प्रभावित करती थी। छत्तीसगढ़ में तोमर भाईयों जैसे सोने से लदे हुए मुजरिमों से भी कई नौजवान प्रभावित हुए होंगे, जैसे कि इसी प्रदेश के दुर्ग से निकलने वाले स्थानीय-छत्तिसगढ़िया नौजवानों ने देशका सबसे बड़ा सट्टेबाजी का महादेव एप चालू किया, और आज बरसों बाद भी भारत सरकार की पहुंच से परे यह धंधा चला रहे हैं। सौरभ चंद्राकर जैसे सट्टेबाज दुर्ग-भिलाई के इलाके में हजारों बेरोजगार नौजवानों के प्रेरणा स्त्रोत बने हुए हैं, और ऐसा न हो इसके लिए सरकारों को तेजी से कार्रवाई करनी चाहिए।
फिलहाल तो मैं आज की यह बात उन नौजवानों के लिए लिख रही हूं जो कि बस्तर जैसे इलाके में नक्सलियों की बंदूकी ताकतों से प्रभावित होकर उनके साथ चले गए थे, या जो शहरों में तोमर और चंद्राकर जैसे परदेसिया, या देसिया इनको प्रेरणास्त्रोत बना चुके हैं। याद रखना चाहिए कि जुर्म की जिंदगी हमेशा नहीं चलती, किसी भी दिन खत्म हो जाती है, जैसे कि कल हिड़मा खत्म हुआ, जैसे कि एक तोमर की आजादी खत्म हुई, और जैसे कि करणी सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष की आजादी खत्म होने वाली है।
क्या सोचते हैं आप?
- तृप्ति सोनी