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@IndiaAboriginal

Indigenous-आदिवासी(Bhil-AboriginalTribe) Tribal History, A fight to Protect Indigenous Rights,Languages & Culture

Manhattan, NY & Gujarat,India Katılım Ocak 2017
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Aboriginal of India@IndiaAboriginal·
Indigenous (Adivasi) People have a different identity & that they are not part of the #Hindu Religion From1871to1951 there used to be separate code for the #Adivasis but it was Removed in the first census of Independence #India in1951& Great injustice was done with #Adivasis
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Aboriginal of India
Aboriginal of India@IndiaAboriginal·
@DeepalTrevedie गुजरात के अशिक्षित लोगो को आप मूर्ख बना शकते है यहबोला गया खड़गे ने अब गुजरात में शिक्षित और अशिक्षित कितने है यह गुजरात bjp वालो को बताना चाहिए @DeepalTrevedie
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Jharkhand Mukti Morcha
Jharkhand Mukti Morcha@JmmJharkhand·
वीभत्स.... हर बार, बार-बार भाजपा पूरी मानवता को शर्मसार करने से बाज नहीं आती है। कोई इतना निर्दयी, क्रूर और रक्तपिपासु कैसे हो सकता है? @BJP4Jharkhand जवाब दे?
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Aboriginal of India@IndiaAboriginal·
@aditiraval જે પ્રમાણે વિકાસ માટે વૃક્ષો કપાઈ રહયા છે એ જોતાં 50ડિગ્રી સુધી ગરમી જાય તો નવાઈ નહિ @aditiraval
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Aditi Raval 🇮🇳
Aditi Raval 🇮🇳@aditiraval·
અચાનક ગરમી વધી નથી ગઈ ? ફેબ્રુઆરી મહિનામાં આ હાલ છે, માર્ચ પછી તો હાલ બેહાલ થશે..
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Vijaita Singh
Vijaita Singh@vijaita·
Kuki-Zo groups protest outside Manipur Bhavan in Delhi where Nemcha Kipgen, MLA from Kangpokpi, also a Kuki-Zo took virtual oath as deputy CM of Manipur. The civil society groups have opposed their leaders/MLAs joining the Manipur government. Pic via Kuki Students Organisation
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ANI
ANI@ANI·
Former Jharkhand Chief Minister Shibu Soren (Posthumous) to be conferred with Padma Bhushan in the field of Public Affairs.
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Ajay Bhagat
Ajay Bhagat@AjayGBhagat·
सोचिए आम आदमी पार्टी के प्रदेश प्रमुख का कहना है कि @ArvindKejriwal के कारण चैतर वसावा को वोट मिला और नेता बना और आदिवासियों की आवाज विधानसभा तक पहुंची एक वक्त ये चैतर का भी टिकट काटेंगे तो विधानसभा में अबतक आदिवासी MLA मंत्री थे ही नहीं इन्हें केवल आदिवासियों के वोट ही चाहिए
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Jitendra (Jitu) Patwari
Jitendra (Jitu) Patwari@jitupatwari·
जहाँ भाजपा सरकार को हमारे बच्चों को AI का सदुपयोग सिखाना चाहिए, वहीं वह खुद AI से भ्रष्टाचार कर रही है। खंडवा में भाजपा सरकार के अधिकारियों ने जल संरक्षण के नाम पर दो फीट के गड्ढों को AI से कुआँ बना दिया और पूरे क्षेत्र में तरह तरह के विकास कार्यों की AI से बनाई गई तस्वीरें पोर्टल पर अपलोड कर दीं। इन्हीं तस्वीरों के आधार पर माननीय राष्ट्रपति से पुरस्कार भी ले लिया गया। जब ज़मीनी हकीकत सामने आई, तो वहाँ खेत और खाली मैदान निकले। साफ है कि यह जल संरक्षण नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजी से बनाई गई तस्वीरों का खेल था। भाजपा राज में भ्रष्टाचार भी स्मार्ट हो गया।
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Kunal Shukla
Kunal Shukla@kunal492001·
छत्तीसगढ़ में योग से संभोग तक की आध्यात्मिक–प्रशासनिक यात्रा करने वाले आईपीएस अधिकारियों की शृंखला के बाद अब एक नया अध्याय खुला है। अमरीश पुरी की खलनायक वाली फ़िल्मों की याद दिलाने वाले एक लंपट, अधेड़ से भी अधेड़ आईपीएस और उनकी कथित ओपन माइंड प्रेयसी की पिकनिक मनाते हुए कई तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हैं।“कवि” के सूत्र ने इन्हें कवि के व्हॉट्सएप नंबर पर कवि की ख़ास डिमांड पर भेजा है। यह सिर्फ़ तस्वीरें नहीं, दरअसल यह प्रशासन की नैतिक नग्नता का फोटोशूट है। ऐतिहासिक रूप से स्वभाव से निर्लज्ज और चरित्र से निर्वस्त्र इस महोदय का पसंदीदा डायलॉग है— “ओपन माइंड रहोगी तो सब सेट हो जाएगा।” जो महिला कांस्टेबल और एसआई ओपन माइंड रहती हैं, उनका सचमुच सब सेट हो जाता है—पोस्टिंग से लेकर प्रमोशन तक। और जो नहीं रहतीं, उनके करियर का योग–भोग दोनों ही निरस्त हो जाता है। ख़बर है कि साहब ने अपनी आधी उम्र की ओपन माइंड प्रेयसी के लिए दो निरीह जनों को डिमोट कर, प्रेम को प्रमोशन में तब्दील किया है। अब हाल यह है कि पुलिस के उस पूरे विभाग की चाभी विधिवत वर्दी से निकलकर उसी ओपन माइंड प्रेयसी के पर्स में विराजमान है। रात-बिरात साहब के सरकारी आवास के सामने खड़ी चमचमाती चारपहिया EV गाड़ी अब किसी को चौंकाती नहीं— वह विभाग की इलेक्ट्रिक नैतिकता का प्रतीक बन चुकी है। ठेकेदारों से लेन-देन हो, टेंडर की सेटिंग हो या फ़ाइलों की एक्सप्रेस डिलीवरी— सब कुछ अब वर्दी नहीं, ओपन माइंड से चलता है। कह सकते हैं कि पुलिस विभाग अब क़ानून से नहीं, कथित प्रेमिका की सहमति से संचालित हो रहा है। कुल मिलाकर, यह प्रेम प्रसंग नहीं बल्कि प्रशासन के पतन पर आधारित एक अश्लील डॉक्यूमेंट्री है— जिसमें किरदार असली हैं, संवाद गंदे हैं और सिस्टम पूरी तरह नंगा। नोट:यह तस्वीरें असली हैं या नक़ली हैं “कवि” इसकी पुष्टि नहीं करता है,पाठक अपने स्वविवेक से काम लें।
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Aboriginal of India@IndiaAboriginal·
@mumtazpatels भरूच में अब आप @mumtazpatels चुनाव नही लड़ोगे अब सीधा दिल्ली में ही चुनाव लड़ोगे
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Mumtaz Patel
Mumtaz Patel@mumtazpatels·
आज उन्नाव पीड़िता और उनकी माताजी के साथ मुलाकात की । जब इनके और भारत की बेटियों के हक में आवाज़ उठाई तो मौजूदा भाजपा शासन में अपने हितों की रक्षा के लिये धरना करने को भी अपराध ठहराया जा रहा है — संसद के बाहर 6 महिलाओं का शांतिपूर्ण विरोध भी सत्ता को अखर गया, और उन्हें हिरासत में ले लिया गया। ना सुरक्षा, ना न्याय — और अब तो शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार भी छीना जा रहा है। हम भारत की बेटियों की सुरक्षा, सम्मान और न्याय के लिए खड़े हैं और लड़ रहे हैं — और यह लड़ाई तब तक जारी रहेगी, जब तक न्याय नहीं मिल जाता। @yogitabhayana our star warrior….Let’s join hands with her to raise our voice for all the women of this country. #JusticeForDaughters #IStandWithRapeVictim #bharatkibeti #bharuchkibeti
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Jharkhand Mukti Morcha
Jharkhand Mukti Morcha@JmmJharkhand·
झारखंड झुकेगा नहीं।
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Aboriginal of India
Aboriginal of India@IndiaAboriginal·
@mumtazpatels @idconclave बहन आप भरूच चुनाव लड़ने ही आओगे जब चुनाव आएगा बाकी वक़्त दिल्ली में रहोगे क्या ? @mumtazpatels
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Aboriginal of India@IndiaAboriginal·
केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्री आदिवासी वीर श्री @KirenRijiju जी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं #जोहार_जय_आदिवासी @RijijuOffice
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Aboriginal of India@IndiaAboriginal·
सोचनीय
Tripti Soni@triptisoni6194

जुर्म की जिंदगी, चार दिन की चांदनी... छत्तीसगढ़ और बगल से लगा हुआ आंध्र नक्सल खबरों से भरा हुआ है। कल एक सबसे बड़े नक्सल नेता हिड़मा के साथ उसकी पत्नी, और 4 दूसरे नक्सली एक मुठभेड़ में आंध्र में मारे गए। आज सुबह की खबर है कि उसी जगह पर 7 और नक्सली मारे गए हैं। छत्तीसगढ़ में पुलिस और सुरक्षाबलों ने चैन की सांस ली है क्योंकि हिड़मा इस राज्य में बहुत बड़े-बड़े हमलों के पीछे लीडर था। एक इतना बड़ा हथियारबंद वैचारिक आंदोलन किस तरह एक-एक करके अपने लीडरों को मरते देख रहा है, और बाकी नेताओं को, आम काडर को हथियार डालते देख रहा है, वह देखने लायक है। इससे यह बात भी समझ पड़ती है कि भारत जितना विशाल लोकतंत्र इतना ताकतवर है कि आधा दर्जन से अधिक राज्यों में बिखरा हुआ नक्सल आंदोलन अपनी आधी सदी की जिंदगी में भी सरकार के सामने टिक नहीं पाया। वक्त जरूर लगा लेकिन वह अब खत्म होने के करीब है। आंदोलन का वैचारिक हिस्सा चाहे बचा रहे, लेकिन उसका हथियारबंद हिस्सा तो अब विसर्जन के करीब है। दूसरी तरफ इससे बिल्कुल ही अलग, एक आम शहरी जुर्म में शामिल गुंडागर्दी और माफिया अंदाज की सूदखोरी करने वाले तोमर नाम के दो भाई (उन्हें बंधु लिखना ठीक इसलिए नहीं लगता कि बंधु तो भले लोगों के लिए इस्तेमाल होता है, कहीं पर कातिल बंधु, या बलात्कारी बंधु तो लिखा नहीं जाता) पुलिस की गिरफ्त में आते जा रहे हैं, एक गिरफ्तार हो चुका है, और दूसरे की गिरफ्तारी महज वक्त की बात है। कानून अपना काम कुछ धीरे-धीरे करता है, लेकिन कर तो देता है। इन्हीं तोमर बंधुओं के एक आका, तथाकथित करणी सेना के स्वघोषित राष्ट्रीय अध्यक्ष ने जिस तरह एक वीडियो जारी करके अपने मवालियों से तोमर को गिरफ्तार करने वाली पुलिस के घर घुसने का फतवा दिया है, उस अध्यक्ष की गिरफ्तारी भी कुछ ही दिनों की बात है। एक तरफ एक हथियारबंद, और हिंसक राजनीतिक विचारधारा से नक्सल आंदोलन चलाने वाले लोग, और दूसरी तरफ शहरों के बड़े ताकतवर बन गए माफिया को इस मिसाल में एक साथ रखना कुछ वामपंथी बुद्धिजीवियों को खटक भी सकता है, लेकिन मैं इन दोनों की तुलना नहीं कर रही हूं, मैं सिर्फ यह कह रही हूं कि भारत में कानून से टकराव लेते हुए बहुत लंबे चल पाना हर किसी के लिए मुमकिन नहीं हो पाता। उत्तरप्रदेश और बिहार की कई खबरें यह जरूर बताती हैं कि कई बड़े मुजरिम राजनीतिक संरक्षण से दशकों तक अपना माफियाराज चलाते रहते थे, और ताजा सरकार से न पटने पर उन्हें घेरकर मारा गया, या जेल भेजा गया। जो भी वजह रही हो, यह बात तो अपनी जगह सच है कि लोकतंत्र में कोई न कोई ऐसी सरकार आती है जो पिछली सरकारों के बनाए और बढ़ाए हुए माफिया को ठिकाने लगाती है, जैसे आज छत्तीसगढ़ के तोमर नाम के ये दो भाई, जो कि लंबे राजनीतिक संरक्षण के बाद अब जब फंसे हैं, तो धंसे हैं। ये दोनों तो बड़े-बड़े उदाहरण हैं, लेकिन लोगों को याद रखना चाहिए कि जिस लोकतंत्र में कानून का राज थोड़ा-बहुत भी बचा रहता है, वहां पर जुर्म की उम्र हो सकता है कि बहुत लंबी न हो। हो सकता है कि लोगों के पास ऐसी मिसालें दिखाने के लिए हों कि कुछ माफिया गुंडों, या उग्रवादी आंदोलनों, या आतंकी हरकतों की उम्र आधी-आधी सदी तक चली हो, लेकिन उनका अंत तो होता ही है। इसलिए लोकतंत्र में समझदारी इसी बात में रहती है कि अगर किसी कानून से सहमति न हो, तो एक जनमत जुटाकर उस कानून को बदलने की कोशिश करनी चाहिए, न कि उस कानून को तोड़ने की। अब यह अंग्रेजी राज का हिंदुस्तान नहीं है जहां गांधी को नमक कानून तोड़ना जरूरी लगा हो। इस देश की आजादी के आंदोलन में कई जगह लगान देने का विरोध किया गया, अंग्रेजों के कई दूसरे आदेशों का विरोध किया गया, लेकिन वह एक परदेसी हुकूमत थी जिसका विरोध करना हर भारतीय की जिम्मेदारी थी। आज भारत में, या इसके प्रदेशों में हुकूमत यहीं की निर्वाचित सरकारों की है, और देश-प्रदेश के कानून अगर किसी को पसंद नहीं आते हैं, तो विधायकों और सांसद के माध्यम से उन्हें बदलवाने की कोशिश करनी चाहिए। चाहे आदिवासी हितों की बात करते हुए नक्सल आंदोलन हो, या कि शहरों में कोई माफिया कारोबार हो, कानून के खिलाफ लड़ाई बहुत लंबी नहीं चल सकती। अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग सत्ता के कुछ पसंदीदा मुजरिम हो सकते हैं, किसी-किसी सरकार में यह भी हो सकता है कि नक्सलियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई न हुई हो, लेकिन एक वक्त तो ऐसा आया कि नक्सली या तो हथियार डालने को तैयार हुए, या फिर थोक में मारे गए। कुछ ऐसा ही शहरी गुंडों का भी होता है, और कुछ अधिक हद तक होना चाहिए। जब गुंडों पर बरसों तक कोई कार्रवाई नहीं होती, तो वे अपने आसपास की ठलहा नौजवान पीढ़ी के लिए एक आदर्श भी बन जाते हैं। ऐसा दाऊद इब्राहिम के मामले में भी हुआ था, चंबल के डकैतों के मामले में भी हुआ था, और कश्मीर में उग्रवादियों की मिसाल भी नौजवान पीढ़ी को प्रभावित करती थी। छत्तीसगढ़ में तोमर भाईयों जैसे सोने से लदे हुए मुजरिमों से भी कई नौजवान प्रभावित हुए होंगे, जैसे कि इसी प्रदेश के दुर्ग से निकलने वाले स्थानीय-छत्तिसगढ़िया नौजवानों ने देशका सबसे बड़ा सट्टेबाजी का महादेव एप चालू किया, और आज बरसों बाद भी भारत सरकार की पहुंच से परे यह धंधा चला रहे हैं। सौरभ चंद्राकर जैसे सट्टेबाज दुर्ग-भिलाई के इलाके में हजारों बेरोजगार नौजवानों के प्रेरणा स्त्रोत बने हुए हैं, और ऐसा न हो इसके लिए सरकारों को तेजी से कार्रवाई करनी चाहिए। फिलहाल तो मैं आज की यह बात उन नौजवानों के लिए लिख रही हूं जो कि बस्तर जैसे इलाके में नक्सलियों की बंदूकी ताकतों से प्रभावित होकर उनके साथ चले गए थे, या जो शहरों में तोमर और चंद्राकर जैसे परदेसिया, या देसिया इनको प्रेरणास्त्रोत बना चुके हैं। याद रखना चाहिए कि जुर्म की जिंदगी हमेशा नहीं चलती, किसी भी दिन खत्म हो जाती है, जैसे कि कल हिड़मा खत्म हुआ, जैसे कि एक तोमर की आजादी खत्म हुई, और जैसे कि करणी सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष की आजादी खत्म होने वाली है। क्या सोचते हैं आप? - तृप्ति सोनी

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RK Vij
RK Vij@ipsvijrk·
माओवादी संघटन की ताकत लगातर कम हुई! #HidmaMadvi
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