Madhulika agarwal

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@Ma26107

India Katılım Haziran 2015
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Usha Singh 55690135
Usha Singh 55690135@Usha55690135·
@Ma26107 हरिद्वार में मिले थे खाना भी परोसा था। जब बाहर हो रहा था।भूल गये हो।
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अभिरङ्गैः समाकारो राजयोग उदाहृतः। किंचित् पक्वकषायानां हठयोगेन संयुतः।।१४३।। ("अपरोक्षानुभूति") अद्वैत वेदान्त की साधना में जहाँ ज्ञान का परम लक्ष्य आत्मसाक्षात्कार है, वहीं उस ज्ञान की सिद्धि के लिए अन्तःकरण-शुद्धि, चित्त-एकाग्रता और वासनाक्षय अनिवार्य साधन माने गए हैं।
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सृष्टि के कण-कण में वही एक ब्रह्म, वही परम सत्ता व्यापक रूप से प्रतिष्ठित है। आकाश, धरा, अग्नि, जल और वायु - ये पंचमहाभूत हों, अथवा वृक्ष-वनस्पतियाँ, पशु-पक्षी और मनुष्य - सभी उसी ब्रह्म की विविध अभिव्यक्तियाँ हैं। इस दृष्टि से समस्त सृष्टि के साथ एकात्मता, सह-अस्तित्व और
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दृश्यं ह्यदृष्टितां नीत्वा ब्रह्माकारेण चिन्तयेत्। विद्वान् नित्यसुखे तिष्ठेद् धिया चिद्रसपूर्णया।।१४२।। ("अपरोक्षानुभूति") अद्वैत वेदान्त के साधना-पथ में यह श्लोक दृष्टि-परिवर्तन (Shift of Vision) की उस चरम प्रक्रिया का निर्देश करता है, जिसके द्वारा साधक दृश्य-जगत् के बन्धन
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क्षमा परमात्मा का दिव्य गुण है। अतः जीवन में दयालु, सहृदय और उदार बनें; दूसरों की भूलों को बार-बार स्मरण करने के स्थान पर उन्हें क्षमा करने का अभ्यास करें। जो कुछ प्रभु ने हमें दिया है, उसका आदर करें, उसका सदुपयोग करें और प्रत्येक क्षण उनके अनन्त आशीर्वादों के प्रति कृतज्ञ बने
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आदर्श्यं भावरूपं च सर्वमेतच्चिदात्मकम्। सावधानतया नित्यं स्वात्मनं भावयेद्बुधः।।१४१।। ("अपरोक्षानुभूति") अद्वैत वेदान्त के परम रहस्य का अत्यन्त सूक्ष्म एवं सर्वग्राही निरूपण इस श्लोक में किया गया है। यहाँ भगवद्पाद भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य साधक को यह बोध कराते हैं कि जो कुछ दृश्य (आदर्श्य) है और जो अदृश्य, भावात्मक या विचाररूप (भावरूप) है - वह सम्पूर्ण जगत् वस्तुतः चैतन्यस्वरूप ही है। इस सत्य का निरन्तर, सजग एवं सावधान भाव से चिन्तन करना ही ज्ञानी पुरुष का नित्य कर्तव्य है। प्रथम पद “आदर्श्यं भावरूपं च” द्वारा समस्त अनुभूत जगत् को दो वर्गों में विभाजित किया गया है - (१) आदर्श्य - जो इन्द्रियों द्वारा प्रत्यक्ष देखा या अनुभव किया जाता है; जैसे - स्थूल जगत्, शरीर, प्रकृति आदि; (२) भावरूप - जो सूक्ष्म है, जैसे विचार, भावनाएँ, संकल्प-विकल्प, स्मृतियाँ, कल्पनाएँ आदि। इस प्रकार स्थूल और सूक्ष्म दोनों स्तरों पर जो कुछ भी अनुभव के क्षेत्र में आता है, वह इस शिक्षण का विषय है। द्वितीय पद “सर्वमेतच्चिदात्मकम्” इस सम्पूर्ण विविधता के अन्तर्निहित एकत्व को उद्घाटित करता है। यहाँ यह प्रतिपादित किया गया है कि दृश्य और अदृश्य दोनों का वास्तविक स्वरूप चैतन्य ही है। जैसे स्वप्न में देखे गए समस्त दृश्य, पात्र और घटनाएँ स्वप्नद्रष्टा के मन से ही उत्पन्न और उसी में स्थित होते हैं, वैसे ही यह सम्पूर्ण जाग्रत् जगत् भी उस एक अद्वितीय चैतन्य से ही प्रकाशित और अधिष्ठित है।यह चैतन्य न केवल साक्षी है, अपितु वही सबका आधार, अस्तित्व और प्रकाशक भी है - “येन सर्वमिदं प्रकाशते”। किन्तु इस सत्य का बौद्धिक ज्ञान मात्र पर्याप्त नहीं है। श्लोक का तृतीय भाग “सावधानतया नित्यं” यह इंगित करता है कि इस तत्त्वबोध को साधक को अत्यन्त सजगता, सावधानी और निरन्तरता के साथ अपने जीवन में धारण करना चाहिए। ”सावधानता’ यहाँ केवल बाह्य सतर्कता नहीं, बल्कि आन्तरिक जागरूकता (Awareness) का बोध कराती है - जहाँ साधक प्रत्येक क्षण अपने अनुभवों को इस दृष्टि से देखता है कि उनका आधार केवल चैतन्य है, न कि कोई स्वतंत्र सत्ता। अन्तिम पद “स्वात्मनं भावयेद्बुधः” इस साधना की परिपूर्णता को प्रकट करता है। ‘बुधः’ अर्थात् विवेकी, ज्ञानी साधक अपने स्वात्मस्वरूप का निरन्तर चिन्तन करता है। यह ‘भावना’ कोई कल्पना नहीं, बल्कि स्वरूप में प्रतिष्ठा है। साधक बार-बार यह अनुभव करता है - “मैं न शरीर हूँ, न मन हूँ, न विचार हूँ; मैं तो वह शुद्ध, अखण्ड, साक्षी चैतन्य हूँ, जो इन सबका आधार है।” यहाँ अद्वैत वेदान्त का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त प्रकट होता है अध्यारोप-अपवाद। प्रारम्भ में जगत् को सत्य मानकर उसके आधार का अन्वेषण किया जाता है (अध्यारोप), और अंततः यह समझा जाता है कि जगत् का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, वह केवल चैतन्य का आभास है (अपवाद)। इस प्रक्रिया के पूर्ण होने पर केवल आत्मस्वरूप का अखण्ड प्रकाश ही शेष रहता है। इस श्लोक में निदिध्यासन की पराकाष्ठा का निर्देश है - जहाँ साधक निरन्तर, अखण्ड भाव से अपने आत्मस्वरूप में स्थित रहता है। यह स्थिति ‘स्मृति’ या ‘चिन्तन’ से आगे बढ़कर ‘स्वाभाविकता’ में परिवर्तित हो जाती है - जहाँ चैतन्य का अनुभव कोई प्रयास नहीं, बल्कि स्वभाव बन जाता है। अन्ततः, यह श्लोक हमें यह शिक्षा देता है कि सम्पूर्ण जगत् - चाहे वह दृश्य हो या अदृश्य केवल चैतन्य का ही विस्तार है। इस सत्य का निरन्तर, सजग और एकनिष्ठ चिन्तन ही साधक को उस परम अवस्था में प्रतिष्ठित करता है, जहाँ वह स्वयं को समस्त भेदों से परे, शुद्ध, नित्य, अद्वैत आत्मस्वरूप के रूप में अनुभव करता है। यही "अपरोक्षानुभूति" की परिपूर्णता है कि जहाँ जानने वाला, जाने जाने वाला और जानने की प्रक्रिया तीनों का विलय होकर केवल एकमेव, स्वप्रकाश चैतन्य ही शेष रह जाता है। #अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त #AdvaitVedanta #स्वाध्याय #AvdheshanandG_Quotes
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“भवैतं गतिवेगेन वस्तु यन्निश्चयात्मना। पुमांस्तद्धि भवेच्छिघ्रं ज्ञेयं भ्रमरकीवत्।।१४०।।” अद्वैत वेदान्त की साधना में चित्त की एकाग्रता, निश्चय और तदाकारता का जो अप्रतिम महत्त्व है, उसका अत्यन्त सुन्दर और सजीव निरूपण इस श्लोक में किया गया है। यहाँ भगवान् आदि शंकराचार्य यह प्रतिपादित करते हैं कि मनुष्य जिस तत्त्व का दृढ़ निश्चयपूर्वक, अखण्ड भाव से और तीव्र वेग के साथ चिन्तन करता है, वह शीघ्र ही उसी का स्वरूप धारण कर लेता है - जैसे भ्रमरकीट न्याय में वर्णित है। इस श्लोक का प्रथम पद “भवैतं गतिवेगेन वस्तु यन्निश्चयात्मना” - यह संकेत करता है कि साधक का मन जब किसी एक तत्त्व में अचल निश्चय (निश्चयात्मना) और अभ्यास की तीव्रता (गतिवेग) के साथ प्रवाहित होता है, तब वह मन उस तत्त्व के साथ अभेदता का अनुभव करने लगता है। यहाँ ‘गतिवेग’ केवल बाह्य तीव्रता नहीं, अपितु अन्तःकरण की निरन्तरता, अनवरतता और तन्मयता का बोध कराता है। यह वही स्थिति है, जिसे उपनिषद् “यद्भावं तद्भवति” जिस भाव में स्थित होता है, वही बन जाता है के रूप में उद्घोषित करते हैं। द्वितीय चरण “पुमांस्तद्धि भवेच्छिघ्रं” - यह स्पष्ट करता है कि यह रूपान्तरण कोई दूरस्थ, कल्पित या विलम्बित प्रक्रिया नहीं है; अपितु यह शीघ्र सम्भव है, यदि साधना में दृढ़ता, श्रद्धा और निरन्तरता हो। यहाँ ‘भवेत्’ शब्द केवल बाह्य अनुकरण का बोध नहीं कराता, बल्कि स्वरूप-साक्षात्कार का सूचक है; अर्थात् साधक अपने ही वास्तविक स्वरूप, ब्रह्मभाव को पहचान लेता है। श्लोक के अन्तिम भाग “ज्ञेयं भ्रमरकीवत्” में ‘भ्रमर-कीट न्याय’ का अत्यन्त सशक्त उपमान दिया गया है। जिस प्रकार एक कीट (लार्वा) भ्रमर (भौंरे) के भय और निरन्तर ध्यान के कारण, उसी का चिन्तन करते-करते अन्ततः भ्रमर के स्वरूप को धारण कर लेता है; उसी प्रकार साधक, जब निरन्तर ब्रह्म का चिन्तन करता है, तब वह ब्रह्मस्वरूप का ही अनुभव करने लगता है। यहाँ ‘भय’ का तात्पर्य शाब्दिक नहीं, बल्कि पूर्ण एकाग्रता और अनन्यता से है - जहाँ मन किसी अन्य विषय की ओर प्रवृत्त नहीं होता। अद्वैत वेदान्त की दृष्टि से यह रूपान्तरण वास्तव में किसी नये स्वरूप की प्राप्ति नहीं है। जीव कभी ब्रह्म से भिन्न था ही नहीं “अहं ब्रह्मास्मि”, “तत्त्वमसि” जैसे महावाक्य इसी सत्य का उद्घाटन करते हैं। किन्तु अविद्या के कारण जीव स्वयं को देह, मन और इन्द्रियों से अभिन्न मान बैठता है। अतः यह साधना अध्यारोपित भ्रान्ति के अपवाद की प्रक्रिया है, न कि किसी नये तत्त्व की सिद्धि। निदिध्यासन - अर्थात् बार-बार, निरन्तर, दृढ़ भाव से ब्रह्म का चिन्तन इस श्लोक का केन्द्रीय साधन है। जब साधक “मैं देह नहीं, मैं मन नहीं, मैं शुद्ध चैतन्य हूँ” इस भाव में स्थित होकर, उसी में तन्मय हो जाता है, तब धीरे-धीरे उसके समस्त देहाध्यास क्षीण हो जाते हैं। अन्ततः वह अपने शुद्ध, अखण्ड, निर्विकल्प स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है। यह श्लोक यह भी सिखाता है कि साधना केवल बौद्धिक समझ तक सीमित नहीं होनी चाहिए। यदि ज्ञान केवल शास्त्रों में रह जाए और जीवन में उसका अनुवर्तन न हो, तो वह मुक्तिदायक नहीं बनता। निश्चय, अभ्यास और तन्मयता - ये तीनों मिलकर ज्ञान को अनुभूति में रूपान्तरित करते हैं। अतः इस श्लोक का सार यह है कि साधक को अपने चित्त को ब्रह्म में इस प्रकार स्थिर करना चाहिए कि अन्य सभी वृत्तियाँ क्षीण हो जाएँ। जब मन पूर्णतः ब्रह्ममय हो जाता है, तब जीव-ब्रह्म का भेद स्वतः लुप्त हो जाता है और वही शुद्ध अद्वैत सत्य प्रकट होता है। इस प्रकार ‘भ्रमरकीट न्याय’ के माध्यम से यह श्लोक हमें यह दिव्य संदेश देता है कि निरन्तर, दृढ़ और एकनिष्ठ चिन्तन से साधक अपने ही ब्रह्मस्वरूप का साक्षात्कार कर सकता है और यही "अपरोक्षानुभूति" की परम सिद्धि है। #अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त #AdvaitVedanta #स्वाध्याय #AvdheshanandG_Quotes
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RT @AvdheshanandG: मंदिर-मुक्ति : धर्म, संस्कृति और न्याय की दिशा में आशाजनक संकेत ! माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 18 मई 2026 को Review…
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Swami Avdheshanand@AvdheshanandG·
इस नश्वर संसार में दृश्य-अदृश्य सब कुछ परिवर्तनशील है। वस्तुएँ, घटनाएँ, परिस्थितियाँ और व्यक्तियों के स्वभाव, गुण तथा प्रवृत्तियाँ भी समय के प्रवाह में बदलती रहती हैं। इसलिए विपरीत परिस्थितियों में विचलित न होकर सहज, धैर्यवान और आत्मस्थित रहें; क्योंकि जो परिवर्तन को स्वीकार कर लेता है, वही जीवन में शान्ति, संतुलन और सफलता का अधिकारी बनता है। #AvdheshanandG_Quotes #motivation
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Swami Avdheshanand@AvdheshanandG·
कार्ये हि कारणं पश्येत् पश्चाचार्यं विसर्जयेत्। कारणत्वं स्वतो नश्येदवशिष्टं भवेनमुनिः।।१३९।। ("अपरोक्षानुभूति") अद्वैत वेदान्त के सूक्ष्मतम तत्त्व का निरूपण करते हुए यह श्लोक साधक को अनुभूति की उस चरम अवस्था की ओर इंगित करता है, जहाँ समस्त द्वैत-प्रपञ्च का लय होकर केवल ब्रह्मस्वरूप का अवशेष रह जाता है। प्रारम्भ में साधक को उपदेश दिया जाता है कि वह कार्य में कारण का दर्शन करे अर्थात् इस समस्त दृश्य जगत् (कार्य) में उसके कारणरूप ब्रह्म का साक्षात्कार करे। जैसे मृत्तिका से बने घट में मृत्तिका का ही सत्यत्व है, वैसे ही इस नाम-रूपात्मक विश्व में ब्रह्म ही एकमात्र सत्य तत्त्व है यह दृढ़ बोध साधना का प्रथम चरण है। किन्तु आदि शंकराचार्य की अद्वैत-दृष्टि केवल यहाँ तक सीमित नहीं रहती। वे आगे कहते हैं - “पश्चात् कारणं विसर्जयेत्” अर्थात् जब कार्य में कारण का अभेदबोध सुदृढ़ हो जाए, तब उस कारण-कार्य की संज्ञा का भी परित्याग कर देना चाहिए। यह अत्यन्त गूढ़ संकेत है। यहाँ ‘कारण’ भी एक उपाधि है, एक कल्पना है, जो केवल ‘कार्य’ के सापेक्ष ही अर्थवान् है। जब कार्य (जगत्) का मिथ्यात्व बोध हो जाता है, तब कारण (ब्रह्म) का ‘कारणत्व’ भी स्वतः निरस्त हो जाता है। इस प्रकार, कारणत्वं स्वतो नश्येत् ब्रह्म का कारणत्व भी अपने आप लुप्त हो जाता है, क्योंकि अब उसके लिए कोई कार्य शेष नहीं रहता, जिससे उसका कारणत्व सिद्ध हो। यह अवस्था ‘अवशिष्टं भवेत् मुनिः’ - जिसमें केवल शुद्ध, निरुपाधिक, अद्वय ब्रह्मस्वरूप ही अवशिष्ट रहता है वही मुनि की परम स्थिति है। यहाँ अद्वैत वेदान्त का चरम सत्य उद्घाटित होता है कि ब्रह्म न तो वास्तव में कारण है, न कार्य; वह केवल स्वप्रकाश, स्वयंसिद्ध, निर्विशेष चैतन्य है। कारण-कार्य का सम्पूर्ण व्यापार केवल अविद्या के स्तर पर है। ज्ञान के उदय से यह समस्त कल्पना विलीन हो जाती है, और जो शेष रहता है, वह नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त ब्रह्म ही है। अतः इस श्लोक का मर्म यह है कि साधना की क्रमबद्ध यात्रा में पहले जगत् में ब्रह्म का दर्शन करो, और अंततः ब्रह्म को भी सभी सम्बन्धों, उपाधियों एवं कल्पनाओं से परे, अपने शुद्ध स्वरूप में प्रतिष्ठित करो। यही अपरोक्षानुभूति की परम सिद्धि है, जहाँ ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान का भेद लुप्त होकर केवल एकमेव अद्वितीय ब्रह्म का अनुभव शेष रह जाता है। #अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त #AdvaitVedanta #स्वाध्याय #AvdheshanandG_Quotes
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Swami Avdheshanand
Swami Avdheshanand@AvdheshanandG·
In this transient world, everything is naturally subject to change objects, events, situations, and even the nature, qualities and tendencies of people. Therefore, in adverse circumstances, remain calm, composed, and inwardly steady; for the one who accepts change with wisdom
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