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@Mayank_2024
LLB-NLU JODHPUR, Optimistic 🫰 Proud INDIAN (भारतीय )🇮🇳







डोळ तो कोनी दीखै लाख रिपियां को सो फेर भी म्हारा भाई तू सुण, राजस्थानी वा ई भासा है, जी मै मीरा बाई भजन गाया, राजस्थानी वा घ भासा है जी मै करमा बाई भगवान नै बुला र खीचड़ो खुवायो। राजस्थानी वा ई भासा है, जी मै चूरू रा कन्हैयालाल सेठिया जी "धरती धोरां री" अर "पातळ और पीथळ" सिरजी। राजस्थानी वा ई भासा है जी मै जैपर रा सीमा मिश्रा जी एक ऊं एक जोरका लोकगीत गाया है। राजस्थानी वा ई भासा है जी मै कोटा रा दुर्गादान सिंह जी गौड़ "गौरी गौरी गजबण बणी ठणी" गीत लिख्यो। राजस्थानी वा ई भासा है जी मै झुंझुनूं रा भागीरथ सिंह जी भाग्य "एक छोरी काळती" गीत लिख्यो। राजस्थानी वा ई भासा है जी मै नागौर रा कानदान जी कल्पित "डब डब भरिया, बाई सा रा नैण" जिस्यो विदाई गीत लिख्यो। राजस्थानी वा ई भासा है जकी मै घणा ई टाबर पीएचडी अर एम ए कर रिया है। राजस्थानी वा ई भासा है जीकी सेवा वास्तै सीताराम जी लालस नै पद्म श्री सम्मान मिल्यो। राजस्थानी वा ई भासा है जकी मै केंद्रीय साहित्य अकादमी राजस्थानी साहित्यकारां नै सम्मान देवै। अर सुण, राजस्थानी वा ई भासा है जकी आणै वाळा दिनां मै आपणी इस्कूलां मै भी पढ़ाई जावैगी। सब री बोलियां न्यारी-न्यारी है पण मूल सब रो राजस्थानी है। एक भासा री जित्ती ज्यादा बोलियां होवै, वा भासा उत्ती ई समरथ मानी जै। अब ओजूं मत आ ज्याई ज्ञान देवण










केरल में कांग्रेस ने आज वीडी सतीशन को मुख्यमंत्री बनाने का फ़ैसला करके केवल एक नाम घोषित नहीं किया; उसने अपने ही इतिहास की एक पुरानी बीमारी मुख्यमंत्री चयन की अनंत अनिश्चय-ग्रंथि से बाहर निकलने की कोशिश की है। UDF ने 140 सदस्यीय विधानसभा में 102 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत पाया और कांग्रेस अकेले 63 सीटों पर जीती (INC 63, IUML 22, CPI(M) 26, CPI 8 और BJP 3)। इतने स्पष्ट जनादेश के बाद भी कांग्रेस को CM तय करने में करीब दस दिन लगे और अंततः सतीशन को केसी वेणुगोपाल तथा रमेश चेन्निथला पर वरीयता दी गई। यानी निर्णय काफी सही और सोच विचार कर लिया गया है। केरल कांग्रेस के लिए यह असामान्य नहीं, लगभग परंपरा है। 1960 में भी कांग्रेस 63 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी थी; लेकिन मुख्यमंत्री कांग्रेस का नहीं बना। तब कांग्रेस-PSP-मुस्लिम लीग की “मुक्कूटु मुन्नानी” सरकार में PSP नेता पट्टम ए थानु पिल्लै मुख्यमंत्री बने और आर शंकर उपमुख्यमंत्री। कारण वही था] जो कांग्रेस की पुरानी कमज़ोरी रही है। जातीय-सामाजिक संतुलन, सहयोगी दलों का गणित और अपने नेताओं के बीच अविश्वास। अंततः 1962 में दिल्ली के हस्तक्षेप के बाद पट्टम को पंजाब का राज्यपाल बनाया गया और आर शंकर केरल के पहले कांग्रेस मुख्यमंत्री बने। लेकिन शंकर सरकार भी स्थिरता नहीं दे सकी। पीटी चाको विवाद, कांग्रेस के भीतर विद्रोह और 15 कांग्रेस विधायकों का अपनी ही सरकार के ख़िलाफ़ वोट करने का घटनाक्रम, जिसने सरकार गिरा दी। बाद में असंतुष्टों से केरल कांग्रेस जैसी ताक़त निकली। यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण है कि 1960 के दशक में कांग्रेस की 63 सीटों की शक्ति भी उसकी अंदरूनी लड़ाई के सामने कमज़ोर पड़ गई थी; 2026 में भी वही संख्या लौटी, पर इस बार कांग्रेस ने अंततः सतीशन पर निर्णय लेकर उस अभिशप्त स्मृति को तोड़ने की कोशिश की है। मुझे लगता है, इस मामले में कांग्रेस के वयोवृद्ध नेता मल्लिकार्जुन खड़गे के अनुभव काम आए हैं। 1970 में भी कांग्रेस सत्ता में लौटी; लेकिन शीर्ष पद फिर उसके पास नहीं आया। कांग्रेस ने 30 सीटें जीतीं, CPI केवल 16 पर थी, फिर भी सी अच्युत मेनन मुख्यमंत्री बने। कई लोगों को लगता था कि के करुणाकरण मुख्यमंत्री बनेंगे, मगर वे गृह मंत्री बने। 1977 में करुणाकरण मुख्यमंत्री बने; लेकिन राजन केस की छाया में एक महीने से भी कम समय में हटना पड़ा। उसके बाद कांग्रेस ने 37 वर्षीय एके एंटनी को मुख्यमंत्री बनाया, जो तब विधायक भी नहीं थे। यह कांग्रेस की केरल शैली थी। संकट में अचानक नैतिक छवि, समझौता और दिल्ली-निर्णय का मिश्रण। 1981 और 1982 में करुणाकरण लौटे, पर 1981 की सरकार कमज़ोर बहुमत पर चली और केरल कांग्रेस (एम) के समर्थन वापसी से गिर गई। 1982 में करुणाकरण ने स्थिर सरकार दी और पांच साल पूरे किए। 1995 में फिर कांग्रेस संकट में फंसी। करुणाकरण 1991 में मुख्यमंत्री बने थे, मगर ISRO जासूसी केस, गुटीय युद्ध और राजनीतिक दबाव ने उन्हें हटाया। एंटनी लौटे और बाद में तिरूरंगाड़ी उपचुनाव से विधानसभा में आए। यानी कांग्रेस ने एक बार फिर चुनावी जनादेश की सीधी रेखा को गुटीय-संकट और नैतिक-प्रतिस्थापन की वक्र रेखा से पार किया। 2001 में UDF को 99 सीटें मिलीं। एंटनी मुख्यमंत्री बने; लेकिन 2004 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की ख़राब हालत और गुटीय तनाव के बाद उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया। तब ओमन चांडी आए। यह परिवर्तन दिलचस्प था; क्योंकि एंटनी ने ही चांडी का नाम आगे किया। बाद में 2011 में चांडी ने पूर्ण कार्यकाल पूरा किया। इस पूरी यात्रा में कांग्रेस केरल में दस बार सत्ता में आई, लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी पर केवल चार कांग्रेस चेहरे बैठे : आर शंकर, करुणाकरण, एंटनी और ओमन चांडी; इनमें भी पूर्ण पांच साल पूरा करने वाले केवल करुणाकरण और चांडी रहे। इस पृष्ठभूमि में वीडी सतीशन का चयन बहुत अहम है। वे केवल “एक और कांग्रेस नेता” नहीं हैं। वे 61 वर्ष के हैं, एर्नाकुलम जिले की परवूर सीट से लगातार छठी बार विधायक चुने गए हैं, कानून-शिक्षित हैं, NSUI से राजनीति में आए और विधानसभा में आक्रामक, तथ्य-समर्थ, बहसक्षम नेता के रूप में पहचाने गए। 2021 में कांग्रेस की हार के बाद जब पार्टी का मनोबल लगभग टूट गया था, तब उन्हें नेता प्रतिपक्ष बनाया गया। यह चयन उस समय पीढ़ीगत बदलाव का संकेत था; 2026 में वही प्रयोग सत्ता की सीढ़ी तक पहुंच गया। सतीशन की असली ताक़त यह रही कि उन्होंने पिनराई विजयन जैसे अत्यंत मज़बूत मुख्यमंत्री को विपक्ष से निरंतर चुनौती दी। उन्होंने विकास, भ्रष्टाचार, सत्ता के केंद्रीकरण और सामाजिक ध्रुवीकरण पर कांग्रेस को आक्रामक बनाया। उन्होंने कांग्रेस के बूथ कमेटियों को फिर सक्रिय कराया, जिला नेताओं से नियमित संपर्क रखा और चुनाव प्रचार में राज्य भर में लगातार घूमे। वे केवल अपने क्षेत्र के नेता की तरह नहीं, UDF के अभियान-चेहरे की तरह उभरे। वेणुगोपाल की तुलना में सतीशन का चयन इसलिए अधिक उपयुक्त दिखता है कि वे केरल की जमीन पर संघर्ष करते हुए निकले नेता हैं। वेणुगोपाल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव संगठन हैं, राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे के करीबी माने जाते हैं और संगठन में अत्यंत प्रभावशाली हैं। लेकिन यही उनकी सीमा भी थी। वे 2009 से केंद्रीय राजनीति में हैं, इसलिए राज्य कांग्रेस के बड़े हिस्से को वे “स्थानीय जनादेश के स्वाभाविक चेहरा” नहीं लगते थे। सतीशन नेता प्रतिपक्ष थे, चुनावी अभियान का सार्वजनिक चेहरा बने और केरल की राजनीतिक परंपरा में नेता प्रतिपक्ष को भावी मुख्यमंत्री के रूप में देखा जाता रहा है। वेणुगोपाल को मुख्यमंत्री बनाने में तकनीकी और राजनीतिक लागत भी थी। वे लोकसभा सांसद हैं; उन्हें मुख्यमंत्री बनाने पर एक लोकसभा उपचुनाव और फिर केरल विधानसभा में प्रवेश के लिए दूसरा उपचुनाव आवश्यक होता। साथ ही कांग्रेस को राष्ट्रीय स्तर पर महासचिव संगठन का नया चेहरा भी खोजना पड़ता। ऐसे समय में जब कांग्रेस केरल को अपने सबसे मज़बूत राज्यों में गिन रही है, दिल्ली के नेता को थोपना पार्टी के भीतर “हाईकमान बनाम केरल जनादेश” का विवाद बना सकता था। रमेश चेन्निथला का मामला भी अलग था। वे वरिष्ठ, अनुभवी और लंबे समय से राज्य राजनीति में हैं; लेकिन 2021 में वे विपक्ष के प्रमुख चेहरे थे और UDF सत्ता में नहीं लौट सकी। इसलिए कई लोगों को लगा कि उनका क्षण गुजर चुका है। सतीशन में उम्र, आक्रामकता, वैचारिक स्पष्टता और भविष्य की 10-15 वर्ष की राजनीति का संयोजन दिखा। केरल में नेता “महानायक” नहीं होता, “first among equals” होता है; सतीशन फिलहाल कांग्रेस-UDF के भीतर वही भूमिका निभाने की स्थिति में हैं। सतीशन के चयन का एक सामाजिक संकेत भी है। उन्होंने समुदाय-आधारित दबावों के सामने अपेक्षाकृत सख़्त रुख रखा, ध्रुवीकरण के खिलाफ स्पष्ट secular stand लिया और सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों से संवाद करते हुए UDF की पुरानी दूरी कम करने की कोशिश की। IUML जैसे सहयोगी दलों में भी उनके पक्ष में सकारात्मक संकेत दिखे, हालांकि NSS ने सहयोगी दलों के हस्तक्षेप पर आपत्ति भी जताई। यह बताता है कि सतीशन का चयन केवल कांग्रेस का अंदरूनी निर्णय नहीं, UDF की गठबंधन-संरचना की परीक्षा भी है। लब्बेलुबाब ये कि कांग्रेस ने इस बार करुणाकरण-एंटनी-चांडी युग के बाद केरल में अपना नया केंद्रीय चेहरा चुन लिया है। यह फै़सला अगर सफल हुआ तो सतीशन कांग्रेस को दक्षिण भारत में एक मज़बूत शासन-मॉडल दे सकते हैं। लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होगी: क्या वे गुटों को साथ रख पाएंगे, IUML-केरल कांग्रेस जैसे सहयोगियों को संतुलित कर पाएंगे और UDF की 102 सीटों की विराट जीत को स्थिर, ईमानदार और आधुनिक प्रशासन में बदल पाएंगे? कांग्रेस ने संकट से निकलने के लिए नाम चुन लिया है; अब सतीशन को साबित करना होगा कि वे सिर्फ संकट का समाधान नहीं, केरल कांग्रेस के नए युग की शुरुआत हैं। लेकिन इसका एक और मज़बूत संकेत राजस्थान के लिए है और वह यह कि अगर 2028 में काँग्रेस सत्ता में आती है और गोविंदसिंह डोटासरा तब तक अध्यक्ष बने रहते हैं तो फिर गोविंदसिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ही राजस्थान में मुख्यमंत्री पद के दावेदार होंगे। इसमें किसी तीसरे के आ पाने की संभावना उसी तरह कम हो जाएगी, जिस तरह केसी वेणुगोपाल की हालत नीचे के इस फ़ोटो में देखी जा सकती है। इसलिए अब राजस्थान के प्रदेश नेतृत्व के लिए झीना झपटी बढ़ेगी। डोटासरा अपने आपको प्रदेश अध्यक्ष पद पर बचा पाए तो यह उनके लिए बड़ी बात होगी। लेकिन कांग्रेस ने चुनाव से साल भर पहले तक अध्यक्ष बदला तो उसकी हालत सनी जोसेफ़ जैसी रहेगी। तो कांग्रेस के इस फ़ैसले के कई निहितार्थ हैं और वे बहुत ही गहरे हैं। अगर आज वेणुगोपाल की यह हालत है तो किसी और की ऐसी हालत नहीं होगी, यह सोचना ख़ामख़याली है। #VDSatheesan @vdsatheesan @kcvenugopalmp #Keral







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