Shamshiir-e-barhana maañg ghazab, baal'oñ ki mahak phir vaisii hii,
Juude ki guñdaavat qahr-e-Khuda, baal'oñ ki mahak phir vaisii hii
#Shair#BahadurShah_Zafar#maang
रोज़ अश्कों की नई फ़स्ल उगा देता है
एक बूढ़ा सा ज़मींदार है मेरे अंदर
कितना घनघोर अँधेरा है मिरी रग रग में
इस क़दर रौशनी दरकार है मेरे अंदर
दब के मर जाऊँगा इक रोज़ मैं अपने नीचे
एक गिरती हुई दीवार है मेरे अंदर