Radharamanचंद्रहास तिवारी
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Radharamanचंद्रहास तिवारी
@RadharamanChan1
ग्राम्य किसान।धर्मोपदेश और धर्मरक्षा धर्मपालन में निहित है। सुराज,जहाँ जन निर्भय होता है। तत्त्वमसि।वंदे मातरम्



अरे चलता है। अरे अब ये चलने लगा है। अपसंस्कृति का शिकार हो रहा संशयात्मा हिंदू इन्हीं दो वाक्यों के सहारे अपने धार्मिक संस्कारो अथवा धार्मिक आयोजनों में कुछ भी प्रयोग या नकल कर रहा है। धार्मिक विधि उसके लिए अधिक महत्व नहीं रखती! नित नये नये रिवाज पनप रहे।






प्रिय 52 मिटरों, प्रतीक यादव के अंतिम संस्कार में किसने मुखाग्नि दी, किसने नहीं दी, किसको देना चाहिए था और किसको नहीं देना चाहिए था, इस नितांत व्यक्तिगत विषय पर अपनी ऊर्जा ना लगाएं, ये उनका पारिवारिक विषय है, इसका निर्णय उन पर छोड़ना श्रेयस्कर रहेगा। अनावश्यक पड़ी लकड़ी ना लें😦






पूरे राजस्थान में ज़िलेवार भी घूमें तो हर १०-१५ गाँव तक आते आते भाषा में बदलाव आ जाता है। हिंदी समझते सब हैं पर सब हिंदी नहीं बोलते








