Radharamanचंद्रहास तिवारी

8.6K posts

Radharamanचंद्रहास तिवारी banner
Radharamanचंद्रहास तिवारी

Radharamanचंद्रहास तिवारी

@RadharamanChan1

ग्राम्य किसान।धर्मोपदेश और धर्मरक्षा धर्मपालन में निहित है। सुराज,जहाँ जन निर्भय होता है। तत्त्वमसि।वंदे मातरम्

धर्मभूमि भारतवर्ष Katılım Nisan 2019
170 Takip Edilen274 Takipçiler
Sabitlenmiş Tweet
Radharamanचंद्रहास तिवारी
#हिंदूराष्ट्र का एक शब्द में आशय है,#रामराज्य और रामराज्य की एक पंक्ति की व्याख्या है यह #चौपाई - सब नर करहिं परस्पर प्रीती।चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती।। स्मरण रहे, हिंदू राष्ट्र साध्य है।रामराज्य आदर्श।'रामराज्य' रामजी के राज में ही संभव है।और किसी भी योनिज के लिए असंभव है।
हिन्दी
1
8
20
5.1K
Radharamanचंद्रहास तिवारी
पुनः कह रहा हूँ, व्यक्ति व्यवस्था को उतना भ्रष्ट नहीं कर सकता जितना व्यवस्था व्यक्ति को भ्रष्ट कर देती है। वानरी लोकतांत्रिक व्यवस्था ने मनुष्यता को गर्त में ढकेल दिया।
हिन्दी
0
0
0
9
Radharamanचंद्रहास तिवारी
सभी राजनीतिक दल कांग्रेस के विकल्प में खडे़ हुए है और सभी दलों के नेताओं ने बडे़-बडे़ स्वप्न देखे और दिखाए।परिणाम वही ढांक के तीन पात।स्थिति बद से बदतर।न कोई नेता विश्वसनीय बचा और न कोई दल।सब लूटतंत्र के हिस्से होत गये।जनता न्याय और अपने अधिकार के लिए जूझ रही है। #कुराज
हिन्दी
0
0
1
9
Radharamanचंद्रहास तिवारी
जीवन कितना सरल था, उसे वानरी कानून ने जटिल बना दिया।पति के विलोप होने के चलते वह दूसरे परिजन के साथ रहने लगी।बाहर से आए पति ने जमीन और पत्नी के लिए पंचायत बुलाई।पत्नी संग को राजी न थी और पति भी छोड़ने को तैयार था। बात यह है कि वह पंच या दरोगा के सामने लिखापढी़ चाहता था।
हिन्दी
1
1
2
34
Radharamanचंद्रहास तिवारी
@AshwiniUpadhyay @PMOIndia @narendramodi सिविल सेवा से तो जवाबदेह और पारदर्शी ब्यरोक्रेट मिलते हैं न? इसीलिए तो नौकरशाही भ्रष्टाचार मुक्त है और सक्षम(समय से काम पूरा करने वाली) है?
हिन्दी
0
0
0
7
Ashwini Upadhyay
Ashwini Upadhyay@AshwiniUpadhyay·
भारतीय न्यायिक सेवा कब शुरू होगी? गुलामी की न्याय व्यवस्था कब बदलेगी? ‘एक देश-एक न्याय संहिता’ कब लागू होगी? जजों की जवाबदेही तय करने के लिए जुडिसियल चार्टर कब लागू होगा? न्यायपालिका को पारदर्शी और आधुनिक बनाने के लिए जुडिसियल रिफार्म कब होगा? @PMOIndia @narendramodi
हिन्दी
53
352
652
5.4K
Radharamanचंद्रहास तिवारी
और इस अपसंस्कृतिकरण में सबसे अधिक हाथ उन 'मात्र'ब्राह्मणों का है जो बस ब्राह्मण कुल में जन्म गये,जिन्हें न धर्म का कुछ ज्ञान है और न उससे कुछ लेना-देना है।बस भेड़चाल चलनी है।ये दंभी नपुंसक अपनी जातीय और कुल मर्यादा को भंग करके अपनी स्त्रियों को भी दूषित होने से भी नहीं बचा पाते।
Radharamanचंद्रहास तिवारी@RadharamanChan1

अरे चलता है। अरे अब ये चलने लगा है। अपसंस्कृति का शिकार हो रहा संशयात्मा हिंदू इन्हीं दो वाक्यों के सहारे अपने धार्मिक संस्कारो अथवा धार्मिक आयोजनों में कुछ भी प्रयोग या नकल कर रहा है। धार्मिक विधि उसके लिए अधिक महत्व नहीं रखती! नित नये नये रिवाज पनप रहे।

हिन्दी
0
1
3
22
Radharamanचंद्रहास तिवारी
जो वेदादि शास्त्रों को प्रमाण नहीं मानते, वे मत, पंथ और व्यक्ति नास्तिक माने जाते हैं। नास्तिक वह नहीं है जो ईश्वर को न माने, नास्तिक वह है जो कर्तव्य- अकर्तव्य की व्यवस्था में वेदादि शास्त्र को प्रमाण न माने।
हिन्दी
0
0
1
12
Radharamanचंद्रहास तिवारी
मध्यकाल में भक्ति की दो धाराएं बहीं।निर्गुण-निराकार और सगुण-साकार।तात्विक दृष्टि से दोनों एक हैं।एक में केवल नाम की प्रधानता है और दूसरें में नाम-रूप दोनों की।दोनों की वेदादि शास्त्रों में श्रद्धा है और कार्य- अकार्य में वेदादि शास्त्र को प्रमाण मानते है,अतः दोनों ही आस्तिक हैं।
हिन्दी
1
1
3
22
जुगुल किशोर बुन्देला IPS (Rtd)- जन सामान्य मंच
यदि किसी के पास अपनी आवश्यकता से अधिक धन, सम्पत्ति, साधन आदि है तो वह उसके लिए न होकर उनके लिए है जिन्हें इनकी अत्यन्त जरूरत है। यह आकलन कैसे करें कि कोई चीज आवश्यकता से अधिक है या नही ? इसका सीधा फार्मूला है कि हम यह देखें कि क्या इसके बिना हमारा काम चल सकता है ? यदि हैं तो वह फिर हमारे लिए नही है। इसके बावजूद हम उसका उयोग करते हैं तो वह उपयोग नही दुरुपयोग है और यह दुरुपयोग हमे और हमारे बच्चों को देर सबेर बर्बाद अवश्य करेगा। ईश्वर ने जो हमारी आवश्यकता से अधिक संपत्ति या विभूति दी है वह हम पर यह विश्वास करके दी है कि हम उसके अन्य जरूरतमंद बच्चों, जीव जंतुओं का ख्याल रखें। इस पर किया गया विश्वासघात आत्मघाती होता है।
जुगुल किशोर बुन्देला IPS (Rtd)- जन सामान्य मंच tweet media
हिन्दी
6
29
77
926
Radharamanचंद्रहास तिवारी
@ShieldOfMahadev लोकपटल पर जो घटना/कार्यक्रम है उसकी विधि और अविधि की चर्चा हो रही है। जब कोई कर्म लोक के समक्ष आता है तो उसको करने की विधि की प्रमाणिकता पर प्रश्न करना,चर्चा करना स्वभाविक है। दाह हुआ यानि कर्मकांड? लोक प्रसारण हुआ?तो लोक में उसकी उचित विधि की चर्चा करना ब्राह्मण का कर्तव्य है।
हिन्दी
0
0
0
13
The Deepak Shukla (कट्टर अवसरवादी)
@RadharamanChan1 उन्हें तुम्हारे कर्मकाण्ड पर आस्था नहीं है, वो अपने पंडित, आचार्य, कथावाचक स्वयं बना रहे हैं, तो इतना निर्लज्ज होना भी उचित नहीं है कि बिना मांगे ज्ञान बांचो और बिना बुलाए कर्मकाण्ड कराने पहुंच जाओ। और इन्हीं कारणों से ब्राह्मण गाली खाते हैं, तुम्हें गाली खाना अच्छा लगता है,खाओ😁
हिन्दी
1
0
1
28
Radharamanचंद्रहास तिवारी
यह वयक्तिगत विषय नहीं है। पुत्रः पौत्राश्च तत्पुत्रःपुत्रिकापुत्र एव च।पत्नी भ्राता च तज्जश्च पिता माता स्नुषा तथा।। भगिनी भागिनेयश्च सपिण्डःसोदकस्तथा।असन्निधाने पूर्वेषामुत्तरे पिण्डदाः स्मृताः।। *मातृपक्षसपिण्डेन सम्बद्धा ये जलेन वा।। *कुलद्वयेऽपि चोच्छिन्ने स्त्रीभिः ...।।
The Deepak Shukla (कट्टर अवसरवादी)@ShieldOfMahadev

प्रिय 52 मिटरों, प्रतीक यादव के अंतिम संस्कार में किसने मुखाग्नि दी, किसने नहीं दी, किसको देना चाहिए था और किसको नहीं देना चाहिए था, इस नितांत व्यक्तिगत विषय पर अपनी ऊर्जा ना लगाएं, ये उनका पारिवारिक विषय है, इसका निर्णय उन पर छोड़ना श्रेयस्कर रहेगा। अनावश्यक पड़ी लकड़ी ना लें😦

हिन्दी
2
0
1
80
Radharamanचंद्रहास तिवारी
मातृ और पितृ दोनों कुल में कोई न हो तो स्त्री (पत्नी)ही करे अथवा साथी करे या बान्धव हीन मृतक के धन से राजा ही उसके सब प्रेतकर्म कराये। (अन्त्यकर्म श्राद्धप्रकाश,गीताप्रेस,पृ 9)
हिन्दी
0
0
1
43
Radharamanचंद्रहास तिवारी
अन्त्यकर्म सहित श्राद्ध केअधिकारी- पुत्र,पौत्र,प्रपौत्र,दौहित्र,पत्नी,भाई,भतीजा,पिता,माता,पुत्रवधु,बहन,भानजा,सपिण्ड तथा सोदक हैं। पुत्र,पौत्र,प्रपौत्र,भ्राता,भतीजा अथवा सपिण्ड में उत्पन्न पुरुष ही अधिकारी है। इनके अभाव में सोदक अथवा मातृपक्ष के सपिण्ड व सोदक।
हिन्दी
1
0
1
70
Radharamanचंद्रहास तिवारी
@ipsjkishore08 @JyotiDevSpeaks उसकी वाणी सत्य की पक्षधर होती है। किसी भी प्रकार का वाद उसे छू भी नहीं सकता। सत्य की पक्षधरता ब्राह्मण का जातीय स्वभाव है।
हिन्दी
0
0
0
26
Vishal JyotiDev Agarwal 🇮🇳
"उपाध्याय, चौबे, त्रिगुणाइत, दीक्षित और पाठक अच्छे ब्राम्हण नहीं माने जाते, ऊँचे कुल के लोग उनके यहाँ बेटी नहीं देते" रामभद्राचार्य के इस बयान पर किसी ब्राम्हण ने तो छोड़िये... किसी उपाध्याय, चौबे, त्रिगुणाइत, दीक्षित और पाठक तक ने विरोध नहीं किया!
हिन्दी
56
809
2.2K
56K
Akhilesh Yadav
Akhilesh Yadav@yadavakhilesh·
दुख में सब साथ हैं।
Akhilesh Yadav tweet mediaAkhilesh Yadav tweet mediaAkhilesh Yadav tweet media
हिन्दी
346
1.1K
10.2K
251K
Radharamanचंद्रहास तिवारी
@divyamittal_IAS कुछ भी! तनिक भी विवेक-विचार नहीं? यूपीएससी को अपनी चयन प्रक्रिया बदलनी चाहिए। काॅपी-पेस्ट क्या ही कर सकते हैं।
हिन्दी
0
0
4
866
Divya Mittal
Divya Mittal@divyamittal_IAS·
एक ही आदमी। एक ही भाई। दो बिलकुल अलग फैसले। पहला फैसला — जुए की चौसर पर। युधिष्ठिर ने सबसे पहले नकुल को दांव पर लगाया। शायद इसलिए कि वह "सौतेला" था, "कमज़ोर" था, "अपना" नहीं था। दूसरा फैसला — वनवास की एक झील के किनारे। यक्ष ने चारों भाइयों को मार दिया। कहा — "एक को जीवित कर सकते हो।" युधिष्ठिर ने फिर नकुल को चुना। लेकिन इस बार दांव पर लगाने के लिए नहीं — बचाने के लिए। यक्ष ने पूछा — "अर्जुन को क्यों नहीं? भीम को क्यों नहीं?" युधिष्ठिर का जवाब — "मेरी माँ कुंती का एक पुत्र मैं ज़िंदा हूँ। मेरी दूसरी माँ माद्री का भी एक पुत्र ज़िंदा रहना चाहिए।" एक ही नकुल। पहले — सबसे पहले त्यागने योग्य। बाद में — सबसे पहले बचाने योग्य। बीच में सिर्फ़ एक चीज़ थी — वनवास। बारह साल का तप। जंगलों में भटकना। राजसी वस्त्र छोड़कर वल्कल पहनना। ज़मीन पर सोना। कोयला कोयला रहता है — जब तक उसे तपाया न जाए। तप कर ही वह हीरा बनता है। युधिष्ठिर इंद्रप्रस्थ के राजमहल में "धर्मराज" नहीं बने थे। वे जंगल में बने। और शायद आप भी अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा संस्करण किसी आरामदायक कुर्सी पर बैठकर नहीं बनेंगे। बनेंगे — किसी ऐसे दौर में, जिसे आज आप कोस रहे हैं। कठिनाइयों से डरिए मत। यही वह भट्टी है जिसमें कोयला हीरा बनता है।
हिन्दी
49
229
1.4K
72.8K
अक्षरा
अक्षरा@Akshara75u·
North was always a difficult region for missionaries while south was an easy one. I know people won't agree, but missionaries accounts confirm it. They sent their best to the North but failed miserably, they could only convert some orphans and beggars.
English
1
3
12
548
Radharamanचंद्रहास तिवारी
कोस कोस पै पानी और चार कोस पै वानी। मतलब कोस भर के फांसले पर पानी की उपलब्धता,प्रकार व स्वाद बदल जाता है और चार कोस के अंतराल पर बोली बदल जाती है।
गरिमा तिवारी 🌱@Garima1907

पूरे राजस्थान में ज़िलेवार भी घूमें तो हर १०-१५ गाँव तक आते आते भाषा में बदलाव आ जाता है। हिंदी समझते सब हैं पर सब हिंदी नहीं बोलते

हिन्दी
0
0
1
43
Radharamanचंद्रहास तिवारी
@ArvindKrC कौन जगत के कल्याण हेतु समर्पित है, यह हम तब जान पाएंगे जब हम कल्याण क्या है और अकल्याण क्या है जान जाएंगे? अन्यथा हमें दिग्भ्रमित भी महापुरुष नजर आएंगे।
हिन्दी
0
0
1
11
Arvind Kumar (Chauhan)
@RadharamanChan1 श्रेष्ठ महापुरुष - जो व्यक्ति, समाज, देश और जगत के कल्याण हेतु समर्पित और और कार्यरत हैं ।
हिन्दी
1
0
1
12
Arvind Kumar (Chauhan)
तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो विभिन्नाः
नैको मुनि र्यस्य वचः प्रमाणम् ।
धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम्
महाजनो येन गतः स पन्थाः ॥ - महाभारत, वनपर्व (313/117) अर्थ - तर्क स्थिर नहीं है ; श्रुतियाँ भी भिन्न भिन्न कहती हैं; एक भी ऐसा ऋषि नहीं जिनका मत अन्तिम प्रमाण के तौर पर लिया जा सके; उसपर धर्म का तत्त्व भी अत्यन्त गूढ (अन्तर्मन की गुहा में छुपा हुआ) है । इसलिए महापुरुष जिस मार्ग पर चले, उसी मार्ग का अनुसरण करना चाहिए । "Arguments are inconclusive, and the sacred scriptures differ from one another. There is no single sage whose word can be taken as the final authority. The true essence of righteousness (Dharma) is deeply hidden within a cave. Therefore, the path to follow is the one walked by great personalities."
हिन्दी
1
0
0
37
Radharamanचंद्रहास तिवारी
आत्मीय स्वजन की मृत्यु से शोक संतप्त परिवार से प्रेस/मीडिया द्वारा प्रश्न पूछने से कौन सा लोकहित सधता है? वानरी संस्कृति के अनुसरण से इतनी बुद्धि भी नहीं बची कि कुसमय में चुप रहा जाता है। परिवार को शांति से अन्त्यकर्म करने दो, फिर समय ढलने के बाद प्रश्न कर लेना।
हिन्दी
0
0
1
33