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न तिष्ठन्ति, न निमिषन्त्येते, देवानां स्पश इह चरन्त्यन्ये || लोकाभिरामं रणरंगधीरं, राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्

Katılım Şubat 2023
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Shwetank@Shwetank0·
कच्छा फटने तक तो बात चल गई लेकिन अब देखना है कि किडनी बिकने की बात आने तक कुछ होगा या उसको भी सह जायेंगे!
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Shwetank@Shwetank0·
@mudera1984 @ManeeshKothari मैंने भी! अगर बंगाल में ये चुनाव चोरी तो फिर केरल के लिए क्या कहा जाए!!
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Shwetank@Shwetank0·
अब सवाल ये है कि आप अलग कैसे हैं भाजपा से! यही जब पश्चिम बंगाल में हुआ तब कांग्रेस ने आलोचना की और तमाम रिवार्ड, अवार्ड वाली बात कह डाली और अब ख़ुद वही! वाह भाई! चुनाव खत्म होते ही केरल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी रतन यू. केलकर को सीधे मुख्यमंत्री का सचिव नियुक्त कर दिया गया। इसे सीधे दोगलापन कहा जाना चाहिए!
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Shwetank@Shwetank0·
सोशल मीडिया से मिला है ये वीडियो! पूरा सुनिए ग़ज़ब का क्रिटिक है इसमें 😂😂
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Shwetank@Shwetank0·
समाज का शक्तिशाली व्यक्ति ग़लत सही, कौन सी नॉलेज सही या कौन सी कम सही तय कर रहा है !! UPSC Prelims परीक्षा के पेपर को लेकर कई लोगों से अलग अलग बात हुई! कुछ लोगों ने कहा बहुत कठिन रहा लेकिन कुछ ने कहा की उतना नहीं था! लेकिन भारत में हो रही परीक्षाओं और नोशन को लेकर एक बात मानता रहा हूँ कि ये भी कल्चरल कैपिटल की तरफ़ बढ़ रहा है! सीसैट, ग्रामीण अंचल, अपनी भाषा से लेकर सोशल सोशल साइंसेज़ तक के डॉट कनेक्ट कीजिए, क्यों ये बच्चे बाहर होने लगते हैं! इसे ही बोर्डीयो ने कल्चरल कैपिटल कहा है! मुझे ये प्रतियोगी परीक्षाएं कभी न्यूट्रल लगी नहीं! जैसे एक वोट देने से अदानी और आम लोग समान नहीं हो जाते वैसे ही एक प्रश्न पत्र से अलग अलग बैकग्राउंड से आने वाले समान नहीं हो सकते! समझते हैं इसे, मतलब समाज में केवल पैसा ही डिस्पैरिटी नहीं बढ़ाता! कुछ खास तरह का ज्ञान, भाषा और रहन-सहन भी लोगों को दूसरों से आगे रखता है। हाँ इसका भी संबंध पैसे से जोड़ा जा सकता है! आज हो यही रहा है कि समाज का शक्तिशाली व्यक्ति ग़लत सही, कौन सी नॉलेज सही या कौन सी कम सही तय कर रहा है तो ऐसे में उससे महरूम हो जाने वाले लगभग सब हैं! ऐसे होता ये है कि ग्रामीण परिवेश से आने वाला बच्चा इसे अपनी गलती मान बैठता है, अपनी काबिलियत को कम मानता है और और वो ख़ुद को कोसता है और कई बार सुसाइड तक चीज़ें पहुंचती हैं! जबकि ऐसा है नहीं! अंत में, सीसैट जैसे बदलाव दरअसल परीक्षा को कठिन बनाने के लिए नहीं हैं, ये यह तय करने के लिए हैं कि एडमिनिस्ट्रेशन में कौन से वर्ग के कल्चरल कैपिटल का क़ब्ज़ा रहेगा! यह मेरिट के नाम पर प्रिविलेज क्लास को लाभ पहुंचाने का एक व्यवस्थित संस्थागत तरीका है! #IndianEducation
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Shwetank@Shwetank0·
किसी भी समाज और सरकार के लिए इससे शर्मनाक बात नहीं हो सकती कि वह अपने बच्चों की रक्षा न कर पाए! इसे सिर्फ एक रिपोर्ट की तरह देखने के बजाय सरकार को इसे एक इमरजेंसी की तरह लेना चाहिए। जब तक पुलिसिंग को जवाबदेह नहीं बनाया जाएगा और इन क्षेत्रों में बच्चों के लिए निगरानी केंद्र नहीं बनेंगे तब तक यह दर्द थमेगा नहीं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है लेकिन सच भी है कि जब तक कोई मुद्दा रसूखदार या राजनीतिक रूप से प्रभावशाली परिवारों से नहीं जुड़ता तब तक प्रशासन को कोई फर्क नहीं पड़ता! आम लोग जो रोज़ कुआं खोदकर रोज़ पानी पीते जैन उनके बच्चों का ग़ायब हो जाना अक्सर फ़ाइलों में नम्बर बनकर रह जाता है! ये घटनाएँ बिल्कुल संगठित तरीके से ही हो सकती हैं! शायद इसमें बड़े लोग भी शामिल हों! चाहे जो भी हो लेकिन ये आंदोलित करने वाला होना चाहिए किसी सभ्य समाज के लिए!
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Shwetank@Shwetank0·
अरे ओ हरजाई दोस्त डोनाल्ड! यह तुम्हारे यहाँ क्या हो रहा है! क्या तुम्हें याद नहीं रही वो हमारी झप्पियाँ, वो नमस्ते ट्रम्प और मेरा अबकी बार ट्रम्प सरकार कहकर के कर्णभेदी-गगनभेदी नारे लगवाना! इस एकतरफा प्रेम की लिए हमने क्या क्या नहीं सहा लेकिन तुम्हारे यहाँ से एक झटके में हमारे हज़ारों टेक प्रोफेशनल्स को नौकरी से निकालकर डिपोर्ट होने की कगार पर खड़ा कर दिया! ज़रा ठंडे दिमाग से सोचो डोनाल्ड, तुम्हारे प्रेम में हमने क्या क्या दांव पर नहीं लगाया, सब तो लगा दिया! चाहे अपने देश की अर्थव्यवस्था की बात हो या परंपरागत दोस्तों के साथ क्लियरली न खड़े होने की बात हो! तुम्हारे दबाव में हमने सब कुछ तो किया! अच्छा याद करो, जहाज़ से लेकर दुनिया के मंचों पर जब भी तुमने सीज़फायर को लेकर अजीबोगरीब झूठे दावे किए तब भी आँखें मूंदकर चुप रहा, कड़वा घूँट पीता रहा! कभी अपनी क्रिटिक और बदनामी की परवाह नहीं की! अपने कॉर्पोरेट दोस्त के साम्राज्य को बचाने के लिए इतिहास की सबसे बड़ी बदनामी भी सही! और बदले में तुमने क्या दिया डोनाल्ड, एक ऐसा क्रूर नियम जो बच्चों को अमेरिका से खदेड़ने पर आमादा है! ग्रीन कार्ड के लिए अब उन्हें वापस भारत आकर अंतहीन कतारों में लगना होगा! अच्छा, तुम्ही बताओ मैं कब तक और कितनी चीजों को संभालूँ? जब पैरलल मीडिया और आम लोग पूछेंगे कि नमस्ते ट्रम्प का रिटर्न क्या मिला तो मैं उन्हें क्या कहूँगा, ऐसे में मेरी विश्वगुरु वाली घुट्टी कैसे काम करेगी! वैसे गुनाह तुम्हारा भी नहीं है डोनाल्ड, गलती तो हमारी ही है जो अपनी सनक, अनंत काल के लिए कुर्सी की लालच और दोस्त के लाभ के लिए कुछ भी कर देने में नहीं हिचका, कभी यह नहीं सोचा कि एक तरफ़ पूरा देश है जो पहले से था और एक तरफ़ एक सेठ दोस्त!
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Shwetank@Shwetank0·
अख़बार की दो कतरने हैं, दोनों बिहार की हैं! पहले में परिणाम है और दूसरे में कारण! चमकते सचिवालय की गुत्थी कोई बहुत कठिन नहीं है! उजड़ते भविष्य को देखकर अंदाज़ा लगाना बिल्कुल आसान है, बस आँख खोलिए! लोगों को ज़रूरी है कि पहचाने जल्दी कि आपको बदतर बनाने में कौन ज़िम्मेदार है, आपके स्कूलों अस्पतालों में लगने वाले पैसे को कौन खा रहा है या वो पैसा कहाँ लगाया जा रहा है! एक तरफ़ हाल ऐसा कि मंत्रियों और अफ़सरों के कमरों को चमकाने के लिए करोड़ों स्वाहा कर दिए जाते हैं क्योंकि किसी VIP की सुख सुविधा में कोई कमी नहीं होनी चाहिए, भले ही आम लोग सूखा भात खायें! और दूसरी तरफ़! दूसरी तरफ़ ज़मीनी हकीकत, पश्चिम चंपारण के चनपटिया की। जहाँ हमारे नौनिहाल ज़मीन पर बैठकर, खुले आसमान के नीचे एक पड़ोसी के मकान की दीवार पर पुते ब्लैकबोर्ड के सहारे अपना भविष्य तलाश रहे हैं। स्कूल के पास खुद का एक ब्लैकबोर्ड टांगने तक की जगह नहीं है। इसे सामंती व्यवस्था और इन अफ़सरों-मंत्रियों को आधुनिक सामंत कहा जाना चाहिए! इसे ही बड़ी शान से डबल इंजन और राष्ट्रवादी सरकार का नाम दिया जाता है। जनता को राष्ट्रवाद और विश्वगुरु होने की घुट्टी पिलाकर उन्हें उनके बुनियादी हक़ से दूर कर दिया जाता है। पैसे और प्रोपोगैंडा के दम पर चुनाव जीतकर ऐश करने वाली इस व्यवस्था को पहचानिए यह लोकतंत्र के कपड़े में छिपी विशुद्ध सामंती सोच है! #Bihar #BiharReality
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“घर पे ठंडे चूल्हे पर, अगर ख़ाली पतीली है बताओं कैसे लिख दूँ धूप, फागुन की नशीली है”
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मिर्जापुर कईला गुलज़ार हो कचौड़ी गली सून कईला बलमू
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“वो जिसके हाथ में छाले हैं, पैरों में बिवाई है उसी के दम से रौनक, आपके बंगले में आई है”
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जल-जंगल-ज़मीन के असली मालिकों को प्यासा रखकर जो सरकारें Sustainable Development और अंत्योदय का ढोंग रचती हैं, उन्हें अपनी Priorities पर शर्म आनी चाहिए। मयूरभंज, उड़ीसा के आदिवासियों को अब झूठे आश्वासनों के अमृत नहीं चाहिए, उन्हें अपने हक के साफ पानी की जरूरत है। अगर सरकार एक अदद हैंडपंप या पाइपलाइन तक नहीं पहुंचा सकती तो यह बुनियादी ढांचे की खराबी नहीं है! इसे व्यवस्था की नस्लीय और सामाजिक संवेदनहीनता कहा जाना चाहिए!
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यहाँ महिलाएं न तो इलाज कराते वक्त सुरक्षित हैं और न ही अपने घर के बाहर खेलते हुए। यह कोई सामान्य अपराध नहीं है, यह उस पुरुषवादी श्रेष्ठता और बीमार मानसिकता के अहंकार का नतीजा है जिनके लिए महिलायें सिर्फ एक वस्तु हैं! जब तक समाज ऐसे दरिंदों को पैदा करने वाली दूषित सोच और इन्हें मूक संरक्षण देने वालों को नकार नहीं देता, तब तक आपकी कथित सभ्यता सिर्फ एक ढोंग है। बाहर भेड़िए और शैतान घूम रहे हैं! इनसे सावधानी जरूरी हैं! इनकी कोई पहचान नहीं है सिवाय इनकी सोच से पहचानकर और धकियाकर अंदर डाल देने के!
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Shwetank@Shwetank0·
यूपी-बिहार में काम की बात नहीं, ख़ाली चाहिए फुल बकैती और फिर रोना भी है! "आपने नीतीश कुमार का चेहरा देखकर वोट दिया तो उनका बेटा मंत्री बनेगा। आपने मोदी जी के नाम पर वोट दिया तो जिसको वो चाहेंगे वो मुख्यमंत्री बनेगा।" "आपने (वोट देते वक्त) अपने बच्चों का चेहरा नहीं देखा तो आपका बच्चा मज़दूर बनेगा। आपके बच्चे अनपढ़ रहेंगे। आपके बच्चों को बेरोज़गारी का दर्द झेलना पड़ेगा। इसमें कोई रॉकेट साइंस नहीं है" ~ प्रशांत किशोर
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Dreams2023
Dreams2023@Dreams202393482·
Unbelievable 🙄 victim-blaming dressed in cultural analysis. It weaponizes her personal choices against her. Correlation isn’t causation. Millions of women marry late, use apps, have careers, or choose abortions without tragic outcomes. Highlighting them here frames Twisha as architect of her own vulnerability rather than a victim of alleged marital abuse. Ignores case specifics. Police ruled suicide (not murder), but in-laws (including a retired judge) face accusations of harassment; husband is absconding. In-laws’ troubled personality/drug addict” narrative was contradicted by tests. The draft sidesteps this messy reality to push a pre-existing ideology about “modern empowered script” vs tradition. A fair pattern discussion would acknowledge both sides , not pivot straight to “traditional safeguards existed for a reason.” Romanticizes “traditional safeguards : Family-vetted matches, early marriage & community pressure have statistical upsides (lower reported divorce in some data) but massive downsides in India: high dowry deaths, domestic violence, honor-based abuse, forced adjustments (“adjust kar lo”) women trapped with no exit. Data from NCRB shows thousands of dowry suicides/homicides yearly, often in “traditional” setups. The draft presents one side as obviously superior without nuance. True honesty requires evidence over ideology & empathy that doesn’t require blaming the victim to critique cultural trends. May her soul rest in peace; may the investigation deliver real answers.
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Shwetank@Shwetank0·
इस फोटो में PM के पीछे जो बिल्डिंग दिख रही है वही कोलोसियम है जिसके बारे में नीचे पोस्ट में लिखा गया है!
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Shwetank@Shwetank0

रोटी और सर्कस रोम के सम्राटों ने अपनी जनता का ध्यान अनस्टैबिलिटी, इकोनॉमिक प्रॉब्लम्स और अधिकारों की मांग से भटकाने के लिए मुफ्त रोटी मतलब अनाज और कोलोसियम में खूनी खेलों का सहारा लिया था। भारत में आज मीडिया, ध्रुवीकरण, धर्म, चुनावी रैलियां और डिस्प्यूटेड डिस्कोर्स एक वैसा ही सर्कस तैयार करते हैं! बुनियादी आर्थिक समस्याओं और बेरोजगारी का ठोस सॉल्यूशन खोजने की जगह पैसा बाँटने की स्कीम, मुफ्त योजनाओं और राशन को एक बड़े राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है जो बहुसंख्य आबादी की तात्कालिक जरूरतों को तो पूरा करता है लेकिन उन्हें कभी अपने पैरों पर खड़ा नहीं होने देता! भारत की जनता ऐसे ही सर्कसों में उलझायी गई है, जहाँ आदिवासियों से लेकर महिलाओं तक और नौकरी से लेकर फ़ैक्ट्री तक हर मुद्दे धरे रह जा रहे हैं।जब तक जनता इस सर्कस में खोई रहती है, सत्ता को जवाबदेही की जरूरत नहीं पड़ेगी। तो कोलोसियम दरअसल रोमन जनता की राजनीतिक उदासीनता का स्मारक है और आज का भारत भी खड़ा नजर आता है।

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Shwetank@Shwetank0·
रुको भाई! ज़रा बैंड बाजा रोको और ज़रा उन बेचारे, मजलूम पिताओं, पतियों और पीड़ित ससुराल वालों के आंसू पोंछो! देश में पुरुषों के अधिकारों पर इतना बड़ा खतरा मंडरा रहा है कि संघी ब्रीड की नई पौध MRA के रूप में मुँह से गोबर उगल रही है! जिस देश में बेटियां चिता पर जलकर भी दोषी साबित कर दी जाती हैं ताकि किसी का वंश और मर्दानगी बची रहे! वहां कानून को नहीं! इस सड़ चुकी मानसिकता को ICU की ज़रूरत है। धिक्कार है ऐसी सोच पर जो खून से सनी व्यावहारिक सच्चाई को देखकर भी अपनी आँखों पर विशेषाधिकार की पट्टी बांधे बैठी है।
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