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@mudera1984

मणि-धारी, फणीधर तुम्हें ढूंढ रहा है... हे रक्तालोकस्नात पुरूष अपनी उपस्थिति दर्ज करो...। GO TO 'ARTICALS and HIGHLIGHT...

Lucknow Katılım Temmuz 2024
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BHAGAT MUDERA@mudera1984·
बाहुबलीयो/माफियाओं की कहानी की शुरुआत गोरखपुर की राजनीति, धर्म और शिक्षा के एक ऐसे टकराव से होती है, जिसने आगे चलकर पूर्वांचल की सत्ता, छात्र राजनीति और बाहुबली संस्कृति तक को प्रभावित किया। महंत दिग्विजयनाथ तब तक गोरखनाथ मठ के प्रभावशाली चेहरे बन चुके थे। महात्मा गांधी की हत्या के मामले में उनका नाम भी आरोपियों के साथ चर्चा में आया था और उन्हें गिरफ्तार भी किया गया, हालांकि बाद में वे रिहा हो गए। इस विवाद ने उनके व्यक्तित्व को और ज्यादा चर्चित और प्रभावशाली बना दिया। मठ का असर बढ़ रहा था और महंत जी सिर्फ धार्मिक नेता नहीं, बल्कि गोरखपुर की सामाजिक और राजनीतिक ताकत के रूप में भी उभर रहे थे। उसी समय में गोरखपुर के पूर्व डीएम और बाद में प्रशासनिक प्रभाव रखने वाले सुरति नारायण मणि त्रिपाठी का सपना था कि पूर्वांचल में एक बड़ा विश्वविद्यालय बने, ताकि गोरखपुर, देवरिया, बस्ती, महाराजगंज और आसपास के छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए बनारस या इलाहाबाद का मुंह न देखना पड़े। उन्होंने इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाया और तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत तक पहुंचाया। कहा जाता है कि पंत ने इस विचार को गंभीरता से लिया और गोरखपुर विश्वविद्यालय की स्थापना का रास्ता खुला। लेकिन कहानी यहां सीधी नहीं रही। महंत दिग्विजयनाथ भी चाहते थे कि शिक्षा पर उनका प्रभाव बना रहे। उनकी इच्छा थी कि महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद के प्रभाव को कम न होने दिया जाए। धीरे-धीरे विश्वविद्यालय को लेकर महंत दिग्विजयनाथ और सुरति नारायण मणि त्रिपाठी के बीच खींचतान शुरू हुई। यह सब प्रभाव, प्रतिष्ठा और भविष्य की राजनीति का संघर्ष बनता जा रहा था। फिर आया साल 1957। गोरखपुर विश्वविद्यालय ने अपना पहला शैक्षणिक सत्र शुरू किया। लेकिन विश्वविद्यालय बनने के साथ ही कार्यकारिणी बैठकों में मतभेद बढ़ने लगे। महंत दिग्विजयनाथ और सुरति नारायण मणि त्रिपाठी के बीच बहसें चर्चा का विषय बनने लगीं। एक बैठक का जिक्र आज भी गोरखपुर की राजनीतिक कहानियों में सुनाई देता है। कहा जाता है कि बहस इतनी गरम हो गई कि महंत दिग्विजयनाथ ने अपनी छड़ी उठाकर सुरति नारायण मणि त्रिपाठी की ओर इशारा करते हुए गुस्सा जाहिर किया। सभागार कुछ पल के लिए सन्न रह गया। तभी दर्शक दीर्घा में बैठे एक युवा छात्र ने अचानक खड़े होकर विरोध किया। उसका नाम था- हरिशंकर तिवारी। महंत जैसे प्रभावशाली व्यक्ति के सामने बोलना आसान नहीं था। लेकिन यहीं से हरिशंकर तिवारी का नाम छात्र राजनीति और कैंपस की चर्चाओं में तेजी से फैलने लगा। इस घटना ने हरिशंकर तिवारी को अचानक चर्चा में ला दिया। हॉस्टलों, चाय की दुकानों और विश्वविद्यालय के गलियारों में एक नए नाम की चर्चा होने लगी। छात्रों के बीच उनकी छवि ऐसे युवक की बनने लगी जो दबाव में झुकता नहीं। धीरे-धीरे उनके आसपास युवाओं का एक घेरा बनने लगा। कुछ उन्हें छात्र नेता की तरह देखते, कुछ दबंग छात्र के रूप में। उधर एक और नाम उभर रहा था—रविंद्र सिंह। तेजतर्रार भाषण, छात्र राजनीति में पकड़ और राजपूत युवाओं के बीच लोकप्रियता ने उन्हें गोरखपुर विश्वविद्यालय का बड़ा चेहरा बना दिया। 1967 के छात्रसंघ चुनावों में उनकी जीत ने उन्हें पूर्वांचल की छात्र राजनीति का प्रभावशाली नाम बना दिया। बाद में उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय तक अपनी पहचान बनाई और मुख्यधारा की राजनीति की तरफ कदम बढ़ाए। यहीं से गोरखपुर की राजनीति का स्वर बदलने लगा। अब यह सिर्फ छात्र नेतृत्व का संघर्ष नहीं रहा; यह प्रभाव, वर्चस्व और समर्थकों की ताकत का खेल बनने लगा। हरिशंकर तिवारी और रविंद्र सिंह के समर्थक अलग-अलग खेमों में दिखने लगे। शहर में चर्चा होने लगी कि गोरखपुर दो ध्रुवों में बंट रहा है। फिर आया 1977। आपातकाल खत्म हुआ था, राजनीतिक माहौल उफान पर था और रविंद्र सिंह विधायक बन चुके थे। इसी बीच उनके करीबी माने जाने वाले बलवंत सिंह की हत्या ने शहर को हिला दिया। आरोप-प्रत्यारोप शुरू हुए, समर्थकों के बीच तनाव बढ़ा और पहली बार गोरखपुर ने खुलकर ऐसा माहौल देखा जिसमें राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और व्यक्तिगत दुश्मनी गोली और बदले की भाषा में बदलती दिखी। बहुत से लोग इसी दौर को गोरखपुर में पहली संगठित गैंगवार की शुरुआत मानते हैं—एक ऐसा मोड़, जहां छात्र राजनीति, जातीय गोलबंदी, स्थानीय दबंगई और सत्ता की महत्वाकांक्षा मिलकर अपराध और राजनीति के नए गठजोड़ का रास्ता बनाने लगी। हरिशंकर तिवारी अब सिर्फ एक छात्र नेता या दबंग युवक नहीं रहे; वे उस बदलते दौर के केंद्रीय किरदार बनने लगे थे, जिसमें गोरखपुर की राजनीति हमेशा के लिए बदलने वाली थी। निचे इसी से जुड़ा मेरा अन्य ARTICAL x.com/i/status/20581… स्रोत संदीप के पांडे की किताब "वर्चस्व" से #mudera
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BHAGAT MUDERA
BHAGAT MUDERA@mudera1984·
@Wise_Stud मोह स्वामित्व चाहता है, प्रेम स्वतंत्रता। गहरी बात।
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TheWiseCritic
TheWiseCritic@Wise_Stud·
मोह बाँधना सिखाता है, और प्रेम… आज़ाद करना। 🖤 जो पकड़कर रखा जाए वो मोह है, जो उड़ने के बाद भी लौट आए… वही सच्चा प्रेम है। ✨ #goodnight ✨🌙🌃🌃
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Mukesh Kumar
Mukesh Kumar@Mukeshs222·
आम आदमी की जेब हो गई है सफा चट्ट 🇮🇳
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BHAGAT MUDERA
BHAGAT MUDERA@mudera1984·
@th_anonymouse विकल्प - अल-मस्त मस्तमौला रहें
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aree_shuklajii
aree_shuklajii@th_anonymouse·
When Heidegger said : You are thrown into this world with no explanation And Kafka said : And still expected to behave like it makes sense. 🖤🙂✌🏻
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Shwetank
Shwetank@Shwetank0·
अब सवाल ये है कि आप अलग कैसे हैं भाजपा से! यही जब पश्चिम बंगाल में हुआ तब कांग्रेस ने आलोचना की और तमाम रिवार्ड, अवार्ड वाली बात कह डाली और अब ख़ुद वही! वाह भाई! चुनाव खत्म होते ही केरल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी रतन यू. केलकर को सीधे मुख्यमंत्री का सचिव नियुक्त कर दिया गया। इसे सीधे दोगलापन कहा जाना चाहिए!
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Shwetank
Shwetank@Shwetank0·
सोशल मीडिया से मिला है ये वीडियो! पूरा सुनिए ग़ज़ब का क्रिटिक है इसमें 😂😂
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CPI(M) Keralam
CPI(M) Keralam@CPIMKerala·
Kerala has never before witnessed such an appointment being made immediately after an election, almost as a reward for services rendered. The development now lends credence to the LDF’s allegation that the Election Commission had adopted several biased and dubious positions in favour of the UDF during the election period. It had earlier become controversial when the BJP’s seal appeared on a letter sent to political parties instead of the Election Commission’s official seal. When similar appointments were made in West Bengal, Rahul Gandhi had tweeted that “the bigger the theft in the black market dealings between the BJP and the Election Commission, the bigger the reward.” The AICC had also described the appointments as a shameless nexus and collusion. Rahul Gandhi and the All India Congress Committee must now clarify whether what happened in Kerala is not similarly a shameless collusion between the Congress, the BJP, and the Election Commission. In the name of SIR, millions of votes were deleted in Kerala. The Left had raised objections at the time itself against the Commission’s approach of deleting genuine voters while retaining ineligible names. The Commission had also insisted on ending voter registration a week before the previously announced deadline, without informing anyone in advance. The suspicion that this haste to finalise the voter list came only after ensuring the inclusion of all UDF votes has now become stronger. The BJP seal appearing on the Election Commission’s letter was another such intervention. There were also several confusions in allocating symbols to LDF candidates, including in the Palakkad constituency. Complaints were raised that many LDF symbols were printed on the voting machines in a manner that made them unclear. Kerala also witnessed lakhs of election duty staff being denied their voting rights. Even weeks after the election, the Commission was unwilling to accurately release the voting percentage. Allegations were also raised that strong rooms had been opened. This appointment strengthens the suspicion that there was a planned intervention behind all these developments. In West Bengal, the appointment of Chief Electoral Officer Manoj Agarwal as Chief Secretary and Subrata Gupta, who led the SIR exercise, as the Chief Minister’s Principal Advisor immediately after the elections had invited widespread criticism. Opposition parties, including the CPI(M), had raised the issue nationally. The AICC had then demanded the introduction of a cooling-off period before senior officials entrusted with election responsibilities could be appointed to high posts under the victorious government. The Congress party and Rahul Gandhi, who strongly criticised the Bengal appointments at the national level, must clarify how they view a similar move in Kerala. At a time when the BJP government at the Centre is attempting to undermine the neutrality of the Election Commission, Congress-led state governments are also carrying out similar interventions. Election Commissions are increasingly becoming systems that take decisions according to the wishes of political leadership. Strong protest is being registered against the interventions of both Union and State governments that undermine the very credibility of the Election Commission.
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BHAGAT MUDERA
BHAGAT MUDERA@mudera1984·
@ProffesorL60601 @Mukeshs222 फलाने ठिकाने नहीं चलेगा सीधा-सीधा नाम लिजीए...
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Amit Jain
Amit Jain@ProffesorL60601·
लिख लों अन्ना बाल भी टेड़ा नहीं होने देंगे फलाने का....
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Mukesh Kumar
Mukesh Kumar@Mukeshs222·
मध्य प्रदेश की घटना 🤔 जहां एक दलित व्यक्ति की चिता को सिर्फ इसलिए जलने से रोक दिया गया क्योंकि उसका धुआं ब्राह्मणों के श्मशान तक जाता है। 🇮🇳
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Shwetank
Shwetank@Shwetank0·
समाज का शक्तिशाली व्यक्ति ग़लत सही, कौन सी नॉलेज सही या कौन सी कम सही तय कर रहा है !! UPSC Prelims परीक्षा के पेपर को लेकर कई लोगों से अलग अलग बात हुई! कुछ लोगों ने कहा बहुत कठिन रहा लेकिन कुछ ने कहा की उतना नहीं था! लेकिन भारत में हो रही परीक्षाओं और नोशन को लेकर एक बात मानता रहा हूँ कि ये भी कल्चरल कैपिटल की तरफ़ बढ़ रहा है! सीसैट, ग्रामीण अंचल, अपनी भाषा से लेकर सोशल सोशल साइंसेज़ तक के डॉट कनेक्ट कीजिए, क्यों ये बच्चे बाहर होने लगते हैं! इसे ही बोर्डीयो ने कल्चरल कैपिटल कहा है! मुझे ये प्रतियोगी परीक्षाएं कभी न्यूट्रल लगी नहीं! जैसे एक वोट देने से अदानी और आम लोग समान नहीं हो जाते वैसे ही एक प्रश्न पत्र से अलग अलग बैकग्राउंड से आने वाले समान नहीं हो सकते! समझते हैं इसे, मतलब समाज में केवल पैसा ही डिस्पैरिटी नहीं बढ़ाता! कुछ खास तरह का ज्ञान, भाषा और रहन-सहन भी लोगों को दूसरों से आगे रखता है। हाँ इसका भी संबंध पैसे से जोड़ा जा सकता है! आज हो यही रहा है कि समाज का शक्तिशाली व्यक्ति ग़लत सही, कौन सी नॉलेज सही या कौन सी कम सही तय कर रहा है तो ऐसे में उससे महरूम हो जाने वाले लगभग सब हैं! ऐसे होता ये है कि ग्रामीण परिवेश से आने वाला बच्चा इसे अपनी गलती मान बैठता है, अपनी काबिलियत को कम मानता है और और वो ख़ुद को कोसता है और कई बार सुसाइड तक चीज़ें पहुंचती हैं! जबकि ऐसा है नहीं! अंत में, सीसैट जैसे बदलाव दरअसल परीक्षा को कठिन बनाने के लिए नहीं हैं, ये यह तय करने के लिए हैं कि एडमिनिस्ट्रेशन में कौन से वर्ग के कल्चरल कैपिटल का क़ब्ज़ा रहेगा! यह मेरिट के नाम पर प्रिविलेज क्लास को लाभ पहुंचाने का एक व्यवस्थित संस्थागत तरीका है! #IndianEducation
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BHAGAT MUDERA
BHAGAT MUDERA@mudera1984·
आदिवासी एकजुटता के नाम- देश की आजादी के महज पाँच महीने बाद खरसावां गोलीकांड में शहीद होने वाले सेकडों लोग न ईसाई थे न सरना थे न हिंदू थे बल्कि वे लोग सब आदिवासी थे और तब सब एकजुट थे। कोयलकारो जैसी विनाशकारी बाँध परियोजना के खिलाफ लगभग चालीस साल की बड़ी लड़ाई आदिवासी लड़ पाये और उसे रोकने में सफल हुए। क्योंकि तब आदिवासी एकजुट थे। फील्ड फायरिंग रेंज से होने वाले विस्थापन को आदिवासी रोक पाये, क्योंकि तब आदिवासी एकजुट थे। खरकई नदी बाँध परियोजना उस वक्त रोक दी गयी थी क्योंकि आदिवासी तब एकजुट थे। नियमगिरी में आदिवासियों ने दुनिया की सबसे बड़ी खनन कंपनी वेदंता को खदेड़ दिया था क्योंकि आदिवासी तब एकजुट थे। आदिवासियों के भारत जन आंदोलन ने भारत सरकार को विवश किया और हजारों साल पुरानी आदिवासी स्वशासन व्यवस्था को स्वीकृति देनी पड़ी और अंततः PESA Act बनाकर ग्राम सभाओं को शक्ति दी गयी। तब ये बात खूब चली - न लोक सभा न राज्य सभा, सबसे ऊँची ग्राम सभा। क्योंकि तब आदिवासी एकजुट। अलग झारखंड राज्य का सपना ही इसलिए पूरा हुआ क्योंकि तब आदिवासी - मूलनिवासी एकजुट थे। तब न सरना - ईसाई की लड़ाई थी न आदिवासी हिंदू - मुसलमान की। ये तो केवल आजादी के बाद के कुछ उदाहरण हैं। सोचिये! अगर ये एकजुटता नहीं होती तो आदिवासी अस्मिता और अस्तित्व का क्या होता? आदिवासियों ने इतिहास में साबित किया है कि आदिवासी केवल आदिवासी है। इतिहास में ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं जब आदिवासियों ने चट्टान की तरह एकजुट होकर अपनी अस्मिता और अस्तित्व की लड़ाई लड़ी है। आदिवासी एकता को हमेशा दिकू- सामंती- मनुवादी - बाहरी पुरोहितवादी- पूंजीवादी सत्ता ने तोड़ने की कोशिश की है। आज यही दिकू शक्तियाँ आदिवासियों में आदिवासियों के प्रति नफरत फैला रही हैं। और आदिवासी ही व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए उनके एजेंट बन रहे हैं। यह नफरत हमें अपनी ही जमीन से बेदखल कर देगा और अपने ही भाई- बहनों के खून का प्यासा बना देगा। तब हमारे पास कुछ नहीं बचेगा। कहाँ तो हमें अपने दुश्मनों की पहचान करनी थी और कहाँ तो हम अपनों के ही दुश्मन बन बैठे? सरना आदिवासी, ईसाई आदिवासी, हिंदू आदिवासी और मुसलमान होने की आपसी धर्म की लड़ाई बंद करिए। अपने पुरखों का सम्मान करिए और एकजुटता बना कर रखिये। ANUJ LUGUN के फेसबुक पोस्ट से facebook.com/share/18TKCMNm…
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BHAGAT MUDERA@mudera1984·
कविता पढ़ ही ले
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BHAGAT MUDERA
BHAGAT MUDERA@mudera1984·
@ProffesorL60601 यारों के बीच में है और कहते हैं "महफिल आपके काम की नहीं" ऐसा कैसे हो सकता है.. यारों के बीच "चाय, भी जाम" हो जाती है
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Amit Jain
Amit Jain@ProffesorL60601·
@mudera1984 कोई नहीं भगत सर... वैसे भी यें दुनिया यें महफ़िल मेरे क़ाम कि नहीं.... 😇
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Amit Jain
Amit Jain@ProffesorL60601·
मोहल्ले कि!! छत और वो मेरे यार.... रातों को जागना..... ❤️❤️😀
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Chaiwala
Chaiwala@chaiwalababu·
Ajeeb vidambana hai. Bharat desh ke saare musalman sarkaar se anurodh kar rahe hai ki Gaay ko “National Animal” declare kar diya jaaye. Par ek bhi hindu sangathan ya desh ki hinduvaadi sarkaar iska samarthan nahi kar rahe hain? Chakkar kya hai?
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BHAGAT MUDERA@mudera1984·
@Imsafur20 ई दोनों गाजीपुर से है न तो एक ही जबान और बयान है
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Mohd Safur
Mohd Safur@Imsafur20·
“ NEET एग्जाम को लेकर बोले UP के मंत्री ओम प्रकाश राजभर, पेपर लीक नहीं हुआ है बस कुछ क्वेश्चन बाहर आए है ! ये तो वही बात हो गई जैसे इंडिया के T20 के कप्तान सूर्या ने कहा था की “ में फॉर्म में तो हूँ “ बस रन नहीं आ रहे है बल्ले से ! UP के मंत्री को कोई बताए की पेपर क्वेश्चन से ही बनता है वरना अगर उस पेपर पर कुछ लिखा होगा ही नहीं तो वो कैसा पेपर??? लेकिन अगर कभी कोई एग्जाम दिया हो तो पता भी हो ?? की पेपर क्या होता है ???
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BHAGAT MUDERA@mudera1984·
@FayanExpress @13ajeetyadav भाई आखिर में डिजिटल दुनिया है यानी आभासी दुनिया, के आभासी काम
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FAYAN
FAYAN@FayanExpress·
आजकल कुछ service apps का हाल ऐसा हो गया है कि आदमी काम कम करवाता है और guidelines ज्यादा सुनता है एक लड़के ने cleaning service बुलाई थी लड़का – आप बर्तन धो दीजिए 2–3 दिन से नहीं धुला गया है Service वाली लड़की – Sorry sir 12 घंटे पहले वाले बर्तन ही धो सकती हूं लड़का – Bathroom साफ कर दीजिए Service वाली लड़की – Sir, bathroom साफ कर देंगे लेकिन toilet touch नहीं कर सकते लड़का – अच्छा sink और नीचे का पानी ही साफ कर दो Service वाली लड़की – Sir, वो deep cleaning में आएगा लड़का – ठीक है, ऊपर लगा fan साफ कर दो Service वाली लड़की – Sir, 6 feet से ऊपर health hazard है लड़का – तो stool लेकर कर लो Service वाली लड़की – Sir, कल मैं stool से गिर गई थी लड़का – अच्छा कपड़े ही रख दो ऊपर Service वाली लड़की – Sir, personal belongings touch नहीं कर सकते लड़का – तो आखिर कर क्या सकते हो ? Service वाली लड़की – Sir, cleaning, dusting, meal prep, everything लड़का – मतलब “everything” में कुछ भी नहीं आता क्या ? फिर लड़के ने कहा — “चलो खाना ही बना दो” Service वाली लड़की – Sir, सब्जी काट देंगे लेकिन कुछ चीजें touch नहीं कर सकते लड़के का दिमाग वहीं घूम गया 45 मिनट तक काम से ज्यादा rules चलते रहे हर बात पर बस एक ही जवाब — “Sir guidelines allow नहीं करती” और सबसे मजेदार बात जब लड़का irritate हो गया तो Service वाली लड़की बोली — “Sir आपका 45 minutes complete हो गया Please दूसरा OTP बताइए” सच कहें तो आजकल कुछ apps वाले “Everything available” बोलकर आते हैं लेकिन असली काम के टाइम guidelines निकाल देते हैं
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BHAGAT MUDERA@mudera1984·
अरुण कमल जी की कविता "अमर फल"
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