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बाहुबलीयो/माफियाओं की कहानी की शुरुआत गोरखपुर की राजनीति, धर्म और शिक्षा के एक ऐसे टकराव से होती है, जिसने आगे चलकर पूर्वांचल की सत्ता, छात्र राजनीति और बाहुबली संस्कृति तक को प्रभावित किया।
महंत दिग्विजयनाथ तब तक गोरखनाथ मठ के प्रभावशाली चेहरे बन चुके थे। महात्मा गांधी की हत्या के मामले में उनका नाम भी आरोपियों के साथ चर्चा में आया था और उन्हें गिरफ्तार भी किया गया, हालांकि बाद में वे रिहा हो गए। इस विवाद ने उनके व्यक्तित्व को और ज्यादा चर्चित और प्रभावशाली बना दिया।
मठ का असर बढ़ रहा था और महंत जी सिर्फ धार्मिक नेता नहीं, बल्कि गोरखपुर की सामाजिक और राजनीतिक ताकत के रूप में भी उभर रहे थे।
उसी समय में गोरखपुर के पूर्व डीएम और बाद में प्रशासनिक प्रभाव रखने वाले सुरति नारायण मणि त्रिपाठी का सपना था कि पूर्वांचल में एक बड़ा विश्वविद्यालय बने, ताकि गोरखपुर, देवरिया, बस्ती, महाराजगंज और आसपास के छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए बनारस या इलाहाबाद का मुंह न देखना पड़े।
उन्होंने इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाया और तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत तक पहुंचाया। कहा जाता है कि पंत ने इस विचार को गंभीरता से लिया और गोरखपुर विश्वविद्यालय की स्थापना का रास्ता खुला।
लेकिन कहानी यहां सीधी नहीं रही।
महंत दिग्विजयनाथ भी चाहते थे कि शिक्षा पर उनका प्रभाव बना रहे। उनकी इच्छा थी कि महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद के प्रभाव को कम न होने दिया जाए।
धीरे-धीरे विश्वविद्यालय को लेकर महंत दिग्विजयनाथ और सुरति नारायण मणि त्रिपाठी के बीच खींचतान शुरू हुई। यह सब प्रभाव, प्रतिष्ठा और भविष्य की राजनीति का संघर्ष बनता जा रहा था।
फिर आया साल 1957। गोरखपुर विश्वविद्यालय ने अपना पहला शैक्षणिक सत्र शुरू किया। लेकिन विश्वविद्यालय बनने के साथ ही कार्यकारिणी बैठकों में मतभेद बढ़ने लगे। महंत दिग्विजयनाथ और सुरति नारायण मणि त्रिपाठी के बीच बहसें चर्चा का विषय बनने लगीं।
एक बैठक का जिक्र आज भी गोरखपुर की राजनीतिक कहानियों में सुनाई देता है। कहा जाता है कि बहस इतनी गरम हो गई कि महंत दिग्विजयनाथ ने अपनी छड़ी उठाकर सुरति नारायण मणि त्रिपाठी की ओर इशारा करते हुए गुस्सा जाहिर किया। सभागार कुछ पल के लिए सन्न रह गया।
तभी दर्शक दीर्घा में बैठे एक युवा छात्र ने अचानक खड़े होकर विरोध किया। उसका नाम था- हरिशंकर तिवारी।
महंत जैसे प्रभावशाली व्यक्ति के सामने बोलना आसान नहीं था। लेकिन यहीं से हरिशंकर तिवारी का नाम छात्र राजनीति और कैंपस की चर्चाओं में तेजी से फैलने लगा।
इस घटना ने हरिशंकर तिवारी को अचानक चर्चा में ला दिया। हॉस्टलों, चाय की दुकानों और विश्वविद्यालय के गलियारों में एक नए नाम की चर्चा होने लगी। छात्रों के बीच उनकी छवि ऐसे युवक की बनने लगी जो दबाव में झुकता नहीं। धीरे-धीरे उनके आसपास युवाओं का एक घेरा बनने लगा। कुछ उन्हें छात्र नेता की तरह देखते, कुछ दबंग छात्र के रूप में।
उधर एक और नाम उभर रहा था—रविंद्र सिंह। तेजतर्रार भाषण, छात्र राजनीति में पकड़ और राजपूत युवाओं के बीच लोकप्रियता ने उन्हें गोरखपुर विश्वविद्यालय का बड़ा चेहरा बना दिया।
1967 के छात्रसंघ चुनावों में उनकी जीत ने उन्हें पूर्वांचल की छात्र राजनीति का प्रभावशाली नाम बना दिया। बाद में उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय तक अपनी पहचान बनाई और मुख्यधारा की राजनीति की तरफ कदम बढ़ाए।
यहीं से गोरखपुर की राजनीति का स्वर बदलने लगा। अब यह सिर्फ छात्र नेतृत्व का संघर्ष नहीं रहा; यह प्रभाव, वर्चस्व और समर्थकों की ताकत का खेल बनने लगा।
हरिशंकर तिवारी और रविंद्र सिंह के समर्थक अलग-अलग खेमों में दिखने लगे। शहर में चर्चा होने लगी कि गोरखपुर दो ध्रुवों में बंट रहा है।
फिर आया 1977।
आपातकाल खत्म हुआ था, राजनीतिक माहौल उफान पर था और रविंद्र सिंह विधायक बन चुके थे। इसी बीच उनके करीबी माने जाने वाले बलवंत सिंह की हत्या ने शहर को हिला दिया।
आरोप-प्रत्यारोप शुरू हुए, समर्थकों के बीच तनाव बढ़ा और पहली बार गोरखपुर ने खुलकर ऐसा माहौल देखा जिसमें राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और व्यक्तिगत दुश्मनी गोली और बदले की भाषा में बदलती दिखी।
बहुत से लोग इसी दौर को गोरखपुर में पहली संगठित गैंगवार की शुरुआत मानते हैं—एक ऐसा मोड़, जहां छात्र राजनीति, जातीय गोलबंदी, स्थानीय दबंगई और सत्ता की महत्वाकांक्षा मिलकर अपराध और राजनीति के नए गठजोड़ का रास्ता बनाने लगी।
हरिशंकर तिवारी अब सिर्फ एक छात्र नेता या दबंग युवक नहीं रहे; वे उस बदलते दौर के केंद्रीय किरदार बनने लगे थे, जिसमें गोरखपुर की राजनीति हमेशा के लिए बदलने वाली थी।
निचे इसी से जुड़ा मेरा अन्य ARTICAL x.com/i/status/20581…
स्रोत संदीप के पांडे की किताब "वर्चस्व" से
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