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जो कार्यकर्ता सड़क पर है, कांग्रेस उसके साथ क्यों नहीं है?
उदयपुर नगर निगम के बाहर आठ मई को जो हुआ, वह केवल एक स्थानीय प्रदर्शन या एक एफ़आईआर की ख़बर भर नहीं है; यह कांग्रेस संगठन की उस पुरानी बीमारी का नया एक्स-रे है, जिसमें कार्यकर्ता को संघर्ष के समय आगे कर दिया जाता है और संकट के समय अकेला छोड़ दिया जाता है।
कांग्रेस ने नगर निगम की बदहाल सफाई, टूटी सड़कों, सीवरेज, बंद स्ट्रीट लाइटों, पर्यटन स्थलों की दुर्दशा, आयड़ नदी और 272 प्लॉट जैसे सवालों पर प्रदर्शन बुलाया। यानी मुद्दे जनता के थे, सड़क जनता की थी और जोखिम कार्यकर्ताओं का था। जिला कांग्रेस अध्यक्ष, पूर्व विधायक और कार्यकर्ता नगर निगम पहुंचे। नारेबाज़ी हुई, विवाद हुआ, ज्ञापन लेने से इनकार और देर-सबेर की स्थिति बनी, कार्यकर्ता उत्तेजित हुए और अंततः देर रात कांग्रेस के ही लोगों पर राजकार्य में बाधा का मुकदमा हो गया।
बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि आयुक्त या पुलिस ने केस क्यों किया; इसकी तो जांच होगी, वीडियो देखे जाएंगे, भूमिका तय होगी।लेकिन असली प्रश्न यह है कि कांग्रेस अपने ही कार्यकर्ताओं के साथ खड़ी क्यों नहीं दिखती? जो लोग विपक्ष की भूमिका निभाते हुए मैदान में उतरे, जिनके कंधों पर पार्टी अपनी “जनसंघर्ष” की राजनीति टिकाए रखना चाहती है, वे जब कानूनी शिकंजे में आए तो प्रदेश नेतृत्व की आवाज़ कहां गई? प्रदेश अध्यक्ष, नेता प्रतिपक्ष, प्रभारी, राष्ट्रीयप्रभारी महासचिव, पूर्व सीएम आदि क्या इन पदों का काम केवल चुनावी मंचों पर मालाएं पहनना है?
कांग्रेस की त्रासदी यही है कि वह कार्यकर्ता से बलिदान मांगती है; लेकिन उसके पीछे राजनीतिक ढाल बनकर खड़ी नहीं होती। कार्यकर्ता नारे लगाए, गिरफ्तारी झेले, मुकदमे झेले, सोशल मीडिया पर पार्टी की लड़ाई लड़े और जब वही कार्यकर्ता संकट में आए तो बड़े नेता प्रेसनोट तक जारी न करें; यह संगठन नहीं, भावनात्मक परित्याग है।
भाजपा पर आरोप लगाना आसान है कि केस राजनीतिक इशारे पर हुआ। हो भी सकता है, नहीं भी। लेकिन कांग्रेस पहले अपने घर में झांके। क्या उसने अपने जिला अध्यक्ष और कार्यकर्ताओं को कानूनी सहायता दी? क्या किसी वरिष्ठ नेता ने कहा कि हम जनता के मुद्दों पर प्रदर्शन करने वालों के साथ हैं? क्या किसी ने यह मांग की कि निष्पक्ष जांच हो, वीडियो सार्वजनिक हों और निर्दोष कार्यकर्ताओं को न फंसाया जाए? क्या जयपुर से किसी को उदयपुर भेजा?
सड़क पर संघर्ष करने वाला कार्यकर्ता कोई डिस्पोज़ेबल आइटम नहीं है कि प्रदर्शन के दिन उपयोग कर लिया और एफ़आईआर के बाद भूल गए। उदयपुर की घटना का सबसे कड़वा संदेश यही है: कांग्रेस अगर अपने सिपाहियों की चिंता नहीं करेगी, तो कल कोई सिपाही उसके लिए मैदान में क्यों उतरेगा?
मैंने उदयपुर में बहुत बार देखा है कि किसी भाजपा कार्यकर्ता के ख़िलाफ़ भी कोई ज़्यादती हो तो गुलाबचंद कटारिया जैसे वयोवृद्ध नेता भी ऐसे ताल ठोंकते थे, जैसे वह कोई सोलह साल के लड़के हों। और क्या मुंह से भाषा बोलते थे। वह हलकी होती थी, लेकिन प्रशासन पर बहुत भारी पड़ती थी। कटारिया कई बार तो अपने लोगों को थाने से उठाकर ऐसे ही ले आया करते थे और कांग्रेस सरकार में कभी किसी की सांस नहीं निकलती थी।
कटारिया ने इसी तरह से उदयपुर में भाजपा को बकरी से बाघ बना दिया और कांग्रेस के नेताओं ने उदयपुर की बघेरे जैसी कांग्रेस को भीगी बिल्ली बना दिया। यह कोई आज का मामला नहीं है। यह एक लंबी कहानी का एक आख़िरी सिरा है।
पार्टी कार्यालयों की दीवारों पर “संघर्ष” लिख देने से संघर्ष नहीं होता। संघर्ष की पहली शर्त है, अपने लोगों के साथ खड़ा होना। और उदयपुर में कांग्रेस की चुप्पी ने यही साबित किया कि उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी विरोधी दल नहीं, अपने कार्यकर्ताओं के प्रति उसकी बेपरवाही है। आख़िर प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष ऐसे मामलों को गंभीर क्यों नहीं मानते। प्रदेश अध्यक्ष ही नहीं, नेता प्रतिपक्ष भी कोई कमज़ोर नहीं हैं। वे बीच-बीच में बड़े मुद्दे उठाने की कोशिश करते रहते हैं, लेकिन उदयपुर के कांग्रेस कार्यकर्ताओं को इस तरह बेसहारा छोड़ने का संदेश अच्छा नहीं है।
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