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अघोषित आपातकाल लागू है। जो भी बेआवाजों को आवाज देगा, समस्या खोजेगा, सवाल उठाएगा, वह जेल जाएगा। जेल नहीं गया तो मुकदमों के बोझ तले दबा दिया जाएगा।
'लोकतंत्र की मां' के रखवाले अपने ही लोक से भयानक डरे हुए हैं। बाहर से गरजते हैं, छाती ठोकते हैं, अंदर से कांपते हैं। अपने देश के नागरिकों पर, आम लड़कों पर सत्ता का रौब झाड़ते हैं, बाहर वाला कोई सिरफिरा फिरंगी आदेश देता है तो लेट जाते हैं।
युद्ध रोक दो, यस सर! उनसे तेल मत खरीदो, यस सर! उनसे खरीद लो, यस सर! खड़े हो जाओ, यस सर! बैठ जाओ, यस सर!
पत्रकारों और नागरिकों को डराने वाली यही सत्ता 90 बार बेइज्जत होकर ट्रंप के आगे रेंग रही है, लेकिन एक आम नौजवान पर सत्ता की हनक दिखाई जा रही है।
वे बेतरह डरे हुए हैं। इतना कि आप कहीं दीवार पर "सवाल" लिख दीजिए, सत्ता का बुलडोजर वह दीवार ही ढहाने पहुंच जाता है।
सोचिए, अगर सत्ता का बुलडोजर मनुष्य की सोच को रौंद पाता तो आज भारत में अंग्रेजों का साम्राज्य होता। फिर कोई भगत सिंह, कोई आजाद, कोई बिस्मिल हमारा हीरो न होता। लेकिन तानाशाह मूर्ख होते हैं। सत्ता का नशा उन्हें यह सोचने पर मजबूर करता है कि वे समय को, विचार को, मनुष्य की सोच को, मानवता के मूल्यों तक को कैद कर सकते हैं।
उन्हें याद दिलाना पड़ता है -
तुमसे पहले जो शख्स यहां तख्तनशीं था
उसको भी खुदा होने का इतना ही यकीं था...।
पत्रकार श्याम मीरा सिंह आज नोएडा में बिजली/LPG पर ग्राउंड रिपोर्टिंग कर रहे थे। पुलिस ने उन्हें डिटेन किया, थाने में बैठाया, अभद्रता की और फिर मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर दिया। हालांकि, उन्हें जमानत मिल गई है।
लेकिन यह हुआ क्यों? श्याम का अपराध क्या था? वही जो सोनम वांगचुक का था, जिन्हें बिना वजह महीनों तक जेल में ठूंस दिया गया। वही जो दर्जन भर लेखकों का था जिन्हें सालों तक मुकदमे और जेल की यातना दी गई। वही जो आज हर उस व्यक्ति का है जो सवाल करने की जुर्रत करता है। आज अपना काम करना ही अपराध बना दिया गया है।
बहुत से सुलतानों को गुमान था कि उनकी मर्जी के बगैर कोई सांस भी लेगा तो दीवार में चुनवा देंगे, हाथी के पाँव तले रौंदवा देंगे, कैदखाने में सड़ा देंगे। लेकिन हुजूर, ऐसा होता नहीं है। मनुष्य जबतक जीवित रहेगा, सोचेगा, सवाल करेगा।
व्यक्ति जिस दिन व्यक्त होना बंद कर देगा, दुनिया खत्म हो जाएगी।

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