amit singh

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@__amitsingh

आह जिस वक़्त सर उठाती है, अर्श पे बर्छियाँ चलाती है ! ~मीर तक़ी ‘मीर’ @meertaqimeerjee

Katılım Temmuz 2014
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amit singh
amit singh@__amitsingh·
कीजिए इश्क़ बन्दगी की जगह और फिर जानिए ख़ुदा क्या है #अमित_अब्र
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Archana Anirudh
Archana Anirudh@archana_anirudh·
संबंधों की गहराई जीत-हार से कहीं ऊपर होती है, कमज़ोर लोग ही अपनी नाकामी छुपाने के लिए बदनाम करते हैं। ~ अर्चना अनिरुद्ध #archana_anirudh
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amit singh
amit singh@__amitsingh·
उसे पढ़ो तो हर बार दिल में उतर के नया सफ़र करती है कविता है मगर ग़ज़ल कहती है #अमित_सिंह
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amit singh
amit singh@__amitsingh·
जज़्बात भी पिघलते हैं वक़्त की कड़ी धूप में जब वो लफ़्ज़ों का लिबास ओढ़कर धीरे से काग़ज़ पर उतरती है क्या ख़ुशी क्या ग़म क्या हक़ीक़त क्या फ़साना क्या रंज-ओ-ग़म-ए-मोहब्बत क्या रंज-ओ-ग़म-ए-ज़माना हर एहसास की सूरत सँवरती है तस्वीर हर शेर में मुकम्मल उतरती है 2/n
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amit singh
amit singh@__amitsingh·
कविता है मगर ग़ज़ल कहती है सागर बहता है सीने में नदी बन कर मगर वो बहती है हर मोड़ पे एक नई रौशनी हर लहर में एक नई आहट रहती है ख़्वाब और ख़याल साथ-साथ महकते हैं जब वो डूबकर ख़यालों में कोई नया ख़्वाब बुनती है 1/n
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amit singh
amit singh@__amitsingh·
@divya_sabaa @SensingSenses “काम” सही है अगर मीर जी के लहजे से देखें तो और मैं अली सरदार जी की बुक के साथ जाना भी चाहूँगा
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amit singh
amit singh@__amitsingh·
मीर जी दो अलग जगह दो अलग तरह से: होगा किसू दीवार के साये में पड़ा 'मीर' क्या काम महब्बत से उस आराम तलब को -दीवान ए मीर (by अली सरदार जाफ़री) — होगा किसू दीवार के साए में पड़ा 'मीर' क्या रब्त मोहब्बत से उस आराम-तलब को Rekhta.org
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amit singh
amit singh@__amitsingh·
वो ज़ेर-ए-आब कहाँ था जो सतह-ए-आब पे था मेरा यक़ीन तो जैसे किसी हबाब पे था नज़र को खूब ख़बर थी कि इक सराब है वो मगर नज़र को भरोसा इसी सराब पे था उतारा दिल के वरक़ पे तो कितना पछताया वो इंतिसाब जो पहले बस इक किताब पे था इंतिसाब = समर्पण / Dedication १/२
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amit singh
amit singh@__amitsingh·
ऐसे तब्दीली-ए-हालात नहीं हो सकती, यूँ बैठे-बैठे ये करामात नहीं हो सकती। दिल में ग़ैरत जो सलामत है तो फिर दामन में ख़ाक हो सकती है, ख़ैरात नहीं हो सकती। हाल दिल का न सुनाना किसी बेहिस को कभी, संग में नरमी-ए-जज़्बात नहीं हो सकती। 1/n
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amit singh
amit singh@__amitsingh·
कभी ख़ुद से भी तो छुपाये नहीं जो ग़म थे उन्हें भी निभा कर चले #अमित_सिंह
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amit singh
amit singh@__amitsingh·
@_Sukoon शुक्रिया दी 🙏
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amit singh
amit singh@__amitsingh·
@Kavya_Ras बहुत शुक्रिया आपका 🙏
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काव्यरस
काव्यरस@Kavya_Ras·
मौत अपना पता नहीं देती सुकूँ कोई फ़ज़ा नहीं देती ज़ख़्म खा कर भी मुस्कुराता हूँ ज़िन्दगी कुछ सिवा नहीं देती हर नज़र में है तीरगी का सफ़र चाँदनी भी *जिया नहीं देती (*चमक) कहती है बेवफ़ा मुझे लेकिन जाने क्यूँ बद-दुआ नहीं देती #अमित_सिंह @__amitsingh
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amit singh
amit singh@__amitsingh·
अपनी औलाद के हक़ में जो दुआ माँ कर दे, उससे बेहतर कोई सौग़ात नहीं हो सकती। मेहर-ए-उम्मीद है रोशन यहाँ जब तक, ऐ दिल, तेरी दुनिया में कभी रात नहीं हो सकती। रब जो चाहे तो हर एक बात है मुमकिन, यारो, और न चाहे तो कोई बात नहीं हो सकती। -बशर @basharsays
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amit singh
amit singh@__amitsingh·
चाहिए नक़्द-ए-अमल ख़ातिर-ए-मिहमान के लिए, सिर्फ़ बातों से मुदारात नहीं हो सकती। ये दिया फ़ैसला मुंसिफ़ ने बहुत वक़्त के बाद, हम से तस्दीक़-ए-बयानाात नहीं हो सकती। जान से आन जिन्हें अपनी ज़ियादा हो अज़ीज़, उन जियालों को कभी मात नहीं हो सकती। 2/n
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