AP Singh

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AP Singh

AP Singh

@apsdelhi

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Delhi Katılım Nisan 2010
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AP Singh
AP Singh@apsdelhi·
@JaikyYadav16 इसे कहते हैं "बाबाजी का ठुल्लू"
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Jaiky Yadav
Jaiky Yadav@JaikyYadav16·
लगता है सम्राट चौधरी को खुद अपनी बेइज्जती का एहसास हो गया।😄 संजीव श्रीवास्तव जो बिहार के कोई बिजनेसमैन हैं मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से मिलने आए थे, उन्होंने जो सम्राट चौधरी को स्केच भेंट किया है उसे देखकर हर कोई हंस रहा है, खुद सम्राट चौधरी भी इसे देखकर अपनी हंसी नहीं रोक पाए।😄 अगर आप इस स्केच को गौर से देखेंगे तो आपको कहीं से भी सम्राट चौधरी नजर नहीं आयेंगे। सम्राट चौधरी भी देखकर सोच ही रहे होंगे ये क्या बना दिए हो भाई? 😄
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Gurpreet Garry Walia
Gurpreet Garry Walia@garrywalia_·
जो जो उमा शंकर भाई साहेब से सहमत है रीट्वीट करो फटाफट
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Bolta Hindustan
Bolta Hindustan@BoltaHindustan·
क्या ऐसी 'लिस्ट' मिल सकती है जिसमें पिछले कुछ सालों में ED ने कभी किसी बीजेपी या उनके समर्थित नेताओं पर रेड मारी हो या एक्शन लिया हो ? : नरेंद्र नाथ मिश्र, पत्रकार
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Ajit Anjum
Ajit Anjum@ajitanjum·
सही ठोका इस तिहाड़ी को @umashankarsingh ब्लैकमेलिंग में जेल जा चुका आदमी हर रोज प्रवचन देता है . इसके कर्मों से हम सब वाकिफ हैं . एक नंबर का ... है. ( रिक्त स्थान में तीन अक्षर का शब्द भर लें )
Umashankar Singh उमाशंकर सिंह@umashankarsingh

(मैं अपने ‘राइट टू रिप्लाई’ के तहत ये X पोस्ट कर रहा हूं क्योंकि मेरे पास @DDNewsHindi जैसा प्लेटफ़ॉर्म नहीं है जिसका बेजा इस्तेमाल करते हुए @sudhirchaudhary ने मुझे टारगेट किया है) सुनो सुधीर चौधरी, तुम एक घटिया पत्रकार ही नहीं घटिया इंसान भी हो। जानता तो पहले से था, आज ये कहने को इसलिए मजबूर हुआ हूं क्योंकि तुमने मेरे साथ फिर एक घटियापन किया है। दूरदर्शन के प्रोग्राम में ‘समोसे जलेबी’ वाली स्टोरी का ज़िक्र कर तुमने मुझ पर निशाना साधा है। और ये तुमने पहली बार नहीं किया है। पहली बार तो तुमने तब किया था जब तुम ज़ी न्यूज़ में थे और तुमने प्रधानमंत्री मोदी का एक लल्लो चप्पो वाला इंटरव्यू किया था। 2019 चुनाव से पहले। और फिर जब तुम्हारी जगहंसाई शुरु हुई तो फिर तुमने अपना चेहरा बचाने के लिए एक DNA कार्यक्रम पूरी तरह मुझे और राजदीप सरदेसाई को समर्पित कर बनाया था। तब मेरी रिपोर्ट की क्लिपिंग्स भी लगायी थी। ख़ैर। तुम्हारा चेहरा तब भी नहीं बचा था। अब तो तुम्हारे पास कोई चेहरा है ही नहीं। तुमने हमेशा सरकारों की गोद में बैठ कर ही पत्रकारिता की है। कांग्रेस कार्यकाल में भी तुम जैसे पत्रकार ही बहुत बड़े चापलूस थे। यहां पर एक प्रदेश की कांग्रेस सरकार का ज़िक्र करना बेमानी होगा जिसके बूते तुम तब पत्रकारिता में पले बढ़े। क़रीब सवा मिनट के क्लिप से तुम्हारा चेहरा बचता है तो बचा लो, जनता के टैक्स के पैसे से 15 करोड़ का सरकारी पैकेज जस्टिफ़ाई कर रहे हो कर लो। और ऐसा करने के लिए ही तुमने इस क्लिप के नीचे लिखे ‘राजनीति के हल्के फुल्के पल’ को नज़रअंदाज़ किया। क्योंकि तुम संपादक नहीं चंपादक हो। अरे वो एक मोमेंट था फील्ड रिपोर्टिंग का जब राहुल गांधी यूपीए सरकार के दौरान कथित घोटाले से जुड़े सवालों का जवाब नहीं दे रहे थे। फिर मैंने यही पूछना शुरु किया। इसकी डिटेलिंग फिर कभी। यहां तुमको सफ़ाई के तौर पर नहीं दूंगा। मैं जानता हूं कि तुम मुझसे सिर्फ़ इस बात का बदला ले रहे हो कि मैंने 2003 में एनडीटीवी में मेरी नौकरी लगने में तुम्हारी मदद नहीं कर पाया। 2002-03 में सहारा में तुम्हारे साथ मैंने चंद महीने काम किया था। तब तुम शेखी बघारा करते थे कि मैं तो एनडीटीवी जाने वाला हूं मेरी बात हो गई है। लेकिन तुम शेखी बघारते ही रहे लेकिन जा नहीं पाए। जब तुम्हें पता चला कि मेरी नौकरी वहां लग गई है तो पहले तो सहसा तुम्हें भरोसा नहीं हुआ... फिर तुमने कहा कि जब जा ही रहे हो तो मेरे लिए भी बात करना कि मामला कहां अटका है। मैंने कोशिश भी की और राजदीप सरदेसाई से अनुरोध भी किया था तुम्हारे लिए। लेकिन क्योंकि संस्थान में मैं ख़ुद नया था इसलिए तुम्हारे लिए ज़ोर नहीं डाल पाया था। तुम्हारी नौकरी वहां लगा नहीं पाया। आई एम सॉरी फॉर दैट। पर तुम अब कभी डीडी से निकाले जाओ तो एनडीटीवी जा सकते हो। अब माहौल तुम्हारे अनुरुप है वहां। अंत में एक बात। ये तुम ही हो जिसका 100 करोड़ वाला वीडियो क्लिप आज भी इंटरनेट तैर रहा है। जिस भी तरह तुमने समझौता कर लिया हो लेकिन वो एक ऐसा बदनुमा दाग़ है जो कभी तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ेगा। डीडी पर कभी उस क्लिप की बात भी करो। और हां। लाइव इंडिया में रहते हुए कैसे तुमने स्कूल टीचर को लेकर फर्ज़ी ख़बर चलायी वो भी पत्रकारिता जगत नहीं भूला है आज तक। जिनको नहीं पता वे गूगल का ग्रोक कर सकते हैं। दो बार जेल भी गए तुम। कोई तिहाड़ी शब्द का ज़िक्र करता है तो सभी समझ जाते हैं कि तुम्हारे बारे में कुछ कहा जाता है। और तुम हो कि समोसे जलेबी वाली स्टोरी का ज़िक्र कर महान बनने की कोशिश करते हो! बनो। और क्योंकि तुमने मेरी स्टोरी का ज़िक्र किया है, अगर क़ूवत है तो किसी दिन मुझे इसी डीडी के प्लेटफ़ॉर्म पर बहस के लिए आमंत्रित करो। तुम्हारी और मेरी पत्रकारिता का अंतर तुम्हारे प्रोग्राम के ज़रिए ही पता चल जाएगा। उन दर्शकों को जिनको तुम एक तरफ़ा तरीक़े से गुमराह कर रहे हो। ये मेरा हक़ भी बनता है क्योंकि तुमने मेरी स्टोरी का ज़िक्र किया। तुम्हारे जवाब का इंतज़ार रहेगा उमाशंकर सिंह (पुनश्च: प्रिय पाठकों, सुधीर चौधरी को संबोधित करते हुए मैंने ‘आप’ लिखने की बहुत कोशिश की, लेकिन सहज मानवीय मूल्यों और व्यवहार कुशलता का अनुपालक होते हुए भी ऐसा नहीं कर पाया हूं। इसके लिए मैं पाठकों से बहुत माफ़ी चाहता हूं)

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Umashankar Singh उमाशंकर सिंह
(मैं अपने ‘राइट टू रिप्लाई’ के तहत ये X पोस्ट कर रहा हूं क्योंकि मेरे पास @DDNewsHindi जैसा प्लेटफ़ॉर्म नहीं है जिसका बेजा इस्तेमाल करते हुए @sudhirchaudhary ने मुझे टारगेट किया है) सुनो सुधीर चौधरी, तुम एक घटिया पत्रकार ही नहीं घटिया इंसान भी हो। जानता तो पहले से था, आज ये कहने को इसलिए मजबूर हुआ हूं क्योंकि तुमने मेरे साथ फिर एक घटियापन किया है। दूरदर्शन के प्रोग्राम में ‘समोसे जलेबी’ वाली स्टोरी का ज़िक्र कर तुमने मुझ पर निशाना साधा है। और ये तुमने पहली बार नहीं किया है। पहली बार तो तुमने तब किया था जब तुम ज़ी न्यूज़ में थे और तुमने प्रधानमंत्री मोदी का एक लल्लो चप्पो वाला इंटरव्यू किया था। 2019 चुनाव से पहले। और फिर जब तुम्हारी जगहंसाई शुरु हुई तो फिर तुमने अपना चेहरा बचाने के लिए एक DNA कार्यक्रम पूरी तरह मुझे और राजदीप सरदेसाई को समर्पित कर बनाया था। तब मेरी रिपोर्ट की क्लिपिंग्स भी लगायी थी। ख़ैर। तुम्हारा चेहरा तब भी नहीं बचा था। अब तो तुम्हारे पास कोई चेहरा है ही नहीं। तुमने हमेशा सरकारों की गोद में बैठ कर ही पत्रकारिता की है। कांग्रेस कार्यकाल में भी तुम जैसे पत्रकार ही बहुत बड़े चापलूस थे। यहां पर एक प्रदेश की कांग्रेस सरकार का ज़िक्र करना बेमानी होगा जिसके बूते तुम तब पत्रकारिता में पले बढ़े। क़रीब सवा मिनट के क्लिप से तुम्हारा चेहरा बचता है तो बचा लो, जनता के टैक्स के पैसे से 15 करोड़ का सरकारी पैकेज जस्टिफ़ाई कर रहे हो कर लो। और ऐसा करने के लिए ही तुमने इस क्लिप के नीचे लिखे ‘राजनीति के हल्के फुल्के पल’ को नज़रअंदाज़ किया। क्योंकि तुम संपादक नहीं चंपादक हो। अरे वो एक मोमेंट था फील्ड रिपोर्टिंग का जब राहुल गांधी यूपीए सरकार के दौरान कथित घोटाले से जुड़े सवालों का जवाब नहीं दे रहे थे। फिर मैंने यही पूछना शुरु किया। इसकी डिटेलिंग फिर कभी। यहां तुमको सफ़ाई के तौर पर नहीं दूंगा। मैं जानता हूं कि तुम मुझसे सिर्फ़ इस बात का बदला ले रहे हो कि मैंने 2003 में एनडीटीवी में मेरी नौकरी लगने में तुम्हारी मदद नहीं कर पाया। 2002-03 में सहारा में तुम्हारे साथ मैंने चंद महीने काम किया था। तब तुम शेखी बघारा करते थे कि मैं तो एनडीटीवी जाने वाला हूं मेरी बात हो गई है। लेकिन तुम शेखी बघारते ही रहे लेकिन जा नहीं पाए। जब तुम्हें पता चला कि मेरी नौकरी वहां लग गई है तो पहले तो सहसा तुम्हें भरोसा नहीं हुआ... फिर तुमने कहा कि जब जा ही रहे हो तो मेरे लिए भी बात करना कि मामला कहां अटका है। मैंने कोशिश भी की और राजदीप सरदेसाई से अनुरोध भी किया था तुम्हारे लिए। लेकिन क्योंकि संस्थान में मैं ख़ुद नया था इसलिए तुम्हारे लिए ज़ोर नहीं डाल पाया था। तुम्हारी नौकरी वहां लगा नहीं पाया। आई एम सॉरी फॉर दैट। पर तुम अब कभी डीडी से निकाले जाओ तो एनडीटीवी जा सकते हो। अब माहौल तुम्हारे अनुरुप है वहां। अंत में एक बात। ये तुम ही हो जिसका 100 करोड़ वाला वीडियो क्लिप आज भी इंटरनेट तैर रहा है। जिस भी तरह तुमने समझौता कर लिया हो लेकिन वो एक ऐसा बदनुमा दाग़ है जो कभी तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ेगा। डीडी पर कभी उस क्लिप की बात भी करो। और हां। लाइव इंडिया में रहते हुए कैसे तुमने स्कूल टीचर को लेकर फर्ज़ी ख़बर चलायी वो भी पत्रकारिता जगत नहीं भूला है आज तक। जिनको नहीं पता वे गूगल का ग्रोक कर सकते हैं। दो बार जेल भी गए तुम। कोई तिहाड़ी शब्द का ज़िक्र करता है तो सभी समझ जाते हैं कि तुम्हारे बारे में कुछ कहा जाता है। और तुम हो कि समोसे जलेबी वाली स्टोरी का ज़िक्र कर महान बनने की कोशिश करते हो! बनो। और क्योंकि तुमने मेरी स्टोरी का ज़िक्र किया है, अगर क़ूवत है तो किसी दिन मुझे इसी डीडी के प्लेटफ़ॉर्म पर बहस के लिए आमंत्रित करो। तुम्हारी और मेरी पत्रकारिता का अंतर तुम्हारे प्रोग्राम के ज़रिए ही पता चल जाएगा। उन दर्शकों को जिनको तुम एक तरफ़ा तरीक़े से गुमराह कर रहे हो। ये मेरा हक़ भी बनता है क्योंकि तुमने मेरी स्टोरी का ज़िक्र किया। तुम्हारे जवाब का इंतज़ार रहेगा उमाशंकर सिंह (पुनश्च: प्रिय पाठकों, सुधीर चौधरी को संबोधित करते हुए मैंने ‘आप’ लिखने की बहुत कोशिश की, लेकिन सहज मानवीय मूल्यों और व्यवहार कुशलता का अनुपालक होते हुए भी ऐसा नहीं कर पाया हूं। इसके लिए मैं पाठकों से बहुत माफ़ी चाहता हूं)
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Awesh Tiwari
Awesh Tiwari@awesh29·
मद्रास हाईकोर्ट की आज की यह टिप्पणी आदरणीय सुप्रीम कोर्ट के सभी न्यायाधीशों और सीजेआई महोदय के ध्यानार्थ प्रस्तुत है। "न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है और न्यायाधीशों को पवित्र गायों की तरह नहीं माना जाना चाहिए। ऐसे "काले भेड़ों" को मद्रास उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ द्वारा नियमित रूप से बाहर का रास्ता दिखाया जाता है। न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की बात से कोई इनकार नहीं कर सकता। भ्रष्ट न्यायाधीश थे और हैं.।हमें न्यायिक भ्रष्टाचार के कई उदाहरण पता हैं और हमने देखे भी हैं। न्यायपालिका में भ्रष्टाचार तब तक नहीं हो सकता जब तक कि बार के कुछ सदस्य भ्रष्ट गतिविधियों में शामिल न हों। उच्च न्यायालय की सतर्क निगरानी भ्रष्टों को पकड़ने और स्थिति से उचित ढंग से निपटने का एक निरंतर माध्यम है। न्याय कोई एकांत सद्गुण नहीं है; उसे आम लोगों की जांच-पड़ताल और सम्मानजनक टिप्पणियों का सामना करने की अनुमति दी जानी चाहिए" -मद्रास हाईकोर्ट
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AP Singh
AP Singh@apsdelhi·
@rohini_sgh इस मोटू ने अपनी गर्दन को गोल्ड की कई चेन से बांधा हुआ है. हाथों में भी सोने की हथकड़ियां पहनी हुई हैं. इसके कुछ बालों पर भी सोने का पानी चढ़ा हुआ है. सोने से लदे लोग ही मुख्यमंत्री से भेंट कर पाते हैं. जनतंत्र ऐसे ही घुटने टेक देता है अमीरों के आगे.
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Rohini Singh
Rohini Singh@rohini_sgh·
Can’t. Stop. Laughing.
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Lutyens Media
Lutyens Media@LutyensMediaIN·
दुखद है कि सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की खामियों पर कोई टिप्पणी नहीं की - अभिषेक मनु सिंघवी
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The Live TV
The Live TV@thelivetvnews·
पत्रकार श्वेता सिंह ने कहा कि UAE की तरह भारत में ऑनलाइन कुर्बानी क्यों नहीं? इसपर लेखक अशोक पांडेय ने कहा कि नार्वे की तरह भारत में प्रधानमंत्री से सवाल क्यों नहीं? #UAE #Bakrid #Eid #GodiMedia
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Anjali Bhardwaj
Anjali Bhardwaj@AnjaliB_·
Supreme Court’s stamp of approval on the SIR is deeply disappointing & extremely dangerous for our democracy. The SIR has been marked by arbitrariness & lack of transparency - till date the ECI has not disclosed the basis on which the SIR was undertaken or how the decision, that has disenfranchised millions of citizens, was taken. Dark day for the judiciary and for our republic.
Live Law@LiveLawIndia

#BREAKING| #SupremeCourt Upholds Election Commission's Power To Conduct #SIR Of Electoral Rolls, Says It Advances Free & Fair Elections |@1Simranbakshi The Court held that the procedure adopted by the ECI in conducting SIR did not violate the law. livelaw.in/top-stories/su…

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AP Singh
AP Singh@apsdelhi·
@MediaHarshVT लोग सदियों से यह सब करते आये हैं. प्रश्न यह है कि प्रवचन देने वाली सरकार क्या कर रही है? दैनिक जीवन को मुश्किल बना रही महंगाई से लोग खुद ही लड़ रहे हैं. सरकार उनकी सहायता में कहीं नजर नहीं आ रही है. ऊपर से प्रदूषण, मिलावट, नकली दवाईयां, सायबर क्राइम, भ्रष्टाचार. जीवन नर्क है.
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हर्ष वर्धन त्रिपाठी 🇮🇳Harsh Vardhan Tripathi
इतना तो हम सब कर ही सकते हैं
Narendra Modi@narendramodi

देश के अलग-अलग हिस्सों में तापमान लगातार बढ़ रहा है और इसके साथ ही दैनिक जीवन में गर्मी से होने वाली कई कठिनाइयां भी बढ़ रही हैं। मैं सभी देशवासियों से आग्रह करता हूं कि जितनी अधिक सावधानी बरत सकें, अवश्य बरतें। कृपया स्वयं को हाइड्रेटेड रखें, घर से बाहर निकलते समय पानी साथ रखें। ऐसे मौसम में आपकी संवेदनशीलता भी बहुत बड़ा सहारा बन जाती है। यदि संभव हो, तो किसी प्यासे व्यक्ति को एक गिलास पानी अवश्य दें। मैं ऐसे लोगों की सराहना भी करूँगा जो अपने घरों के और दुकानों के बाहर मटके में जल रखते हैं ताकि कोई भी उनसे पानी पी सके।

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AP Singh
AP Singh@apsdelhi·
@awesh29 Justice Kant can't take side of the people whose rights have been snatched through a design which ensures power to a particular party. Constitution mandates him to act against ulterior motives of the system highjacked by a party.
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Awesh Tiwari
Awesh Tiwari@awesh29·
फिर आज इन्हीं साहेबान की बेंच थी। इसी बेंच ने आदेश दिया था कि बंगाल में जो लाखों लोग वोट नहीं कर पा रहे हैं अगली बार कर सकते हैं। यही सीजेआई महोदय थे जिन्होंने युवाओं को कॉकरोच कहा। यही बेंच है जिन्होंने आज SIR को मान्यता दे दी और कहा कि यह चुनाव आयोग का अधिकार है जिससे स्वतंत्र चुनाव कराए जा सकें। दुहाई है सरकार है,दुहाई है
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AP Singh
AP Singh@apsdelhi·
@JaikyYadav16 ये सिद्धारमैया क्या कांग्रेस को रमैया वस्ता वैया समझ रहा है जो कांग्रेस हाईकमान के फैसले पर ताथा थैया करने की सोच रहा है. कांग्रेस को जरूरी फैसले कड़ाई से करने चाहिए. ढ़ीले रवैए से कई प्रदेश हाथ से चले गये. Attention to @kharge @RahulGandhi @priyankagandhi
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Jaiky Yadav
Jaiky Yadav@JaikyYadav16·
कर्नाटक में CM सिद्धारमैया और डिप्टी CM डीके शिवकुमार के बीच 2.5 साल पुराना सत्ता संघर्ष चरम पर है। कांग्रेस हाईकमान शिवकुमार को CM बनाने की तैयारी में है। लेकिन सिद्धारमैया गुट ने शर्त रखी है कि अगर डी के शिवकुमार CM बने तो एक नहीं, कई डिप्टी CM बनाए जाएं। इससे सत्ता संतुलन बरकरार रहेगा, अब कल-परसों में बड़ा फैसला हो सकता है।
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Prashant Bhushan
Prashant Bhushan@pbhushan1·
By the SIR judgement, the SC virtually gives a blank cheque to a totally Partisan ECI to do what it wants with electoral rolls without even any transparency. It portends ill for our democracy & is a dark day for the SC
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Narendra Nath Mishra
Narendra Nath Mishra@iamnarendranath·
क्या ऐसी लिस्ट/सूचना मिल सकती है जिसमें पिछले कुछ सालों में ED ने कभी किसी बीजेपी या उनके समर्थित नेताओं पर रेड मारी हो! एक्शन लिया हो । या विपक्ष के उस नेताओं पर अपनी एक्शन जारी रखी हो जो केस के बीच में बीजेपी में शामिल हो गए हो! मैं ऐसी लिस्ट दे सकता हूँ जिनपर ED एक्शन हुआ और वे बाद में बीजेपी शामिल हुए। जाँच एजेंसी ने निष्पक्ष दिखाने की कोई कोशिश तक नहीं की!
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AP Singh
AP Singh@apsdelhi·
@dineshbohrabmr सिद्धारमैया राज्यपाल से मिलकर इस्तीफा भले ही दे दें लेकिन मुख्यमंत्री वही बनेंगे. भाजपा के समर्थन से और कांग्रेस में विभाजन के कारण. @DKShivakumar should keep close watch. I may be wrong but politics is the name of uncertainty.
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Dinesh Bohra
Dinesh Bohra@dineshbohrabmr·
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया कल सुबह 9 बजे अपने सरकारी आवास ‘कावेरी’ में मंत्रिमंडल सहयोगियों और कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के साथ नाश्ता बैठक करेंगे। इसके बाद वे दोपहर 2 बजे राज्यपाल को इस्तीफा सौंपने जा सकते हैं। हालांकि, सिद्धारमैया ने अभी तक राज्यपाल से औपचारिक समय नहीं लिया है। माना जा रहा है कि कांग्रेस नेतृत्व सत्ता परिवर्तन को लेकर “सॉफ्ट एग्जिट प्लान” पर काम कर रहा है, ताकि संगठन और सरकार के बीच संतुलन बना रहे।
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Dayashankar Mishra
Dayashankar Mishra@DayashankarMi·
जब सरकार का ध्यान केवल नफ़रत पर टिका हो। RBI ‘स्वयं सेवक’ बन जाए तो वही होता है जो HDFC बैंक में हुआ। मार्च 2026 में HDFC बैंक के चेयरमैन Atanu Chakraborty ने ‘एथिक्स’ का हवाला देकर इस्तीफ़ा दे दिया था। RBI जांच की जगह सब कुछ चंगा है, कहते हुए ताली बजाता रहा। • अब सारी पोल खुल गई है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार HDFC बैंक ने महाराष्ट्र स्टेट रोड डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (MSRDC) को ऊंची ब्याज दर देने के लिए करोड़ों रुपये को मार्केटिंग खर्च के रूप में छिपाया। • 2021 में HDFC बैंक ने MSRDC (महाराष्ट्र सरकार की एजेंसी) से 25,000 करोड़ की डिपॉजिट के लिए बात की। • MSRDC ने कहा : उसे 6 % ब्याज पहले मिल रहा है । • HDFC बैंक 6.01% ब्याज के लिए तैयार हो गया । जबकि सामान्य ग्राहकों के लिए यह ब्याज दर 3.5% थी )। • आश्चर्यजनक रूप से HDFC बैंक MSRDC को 2. 51 % की अतिरिक्त ब्याज दर के लिए तैयार हो गया । लेकिन इसका भुगतान ब्याज के रूप में न करके मार्केटिंग/स्पॉन्सरशिप खर्च के रूप में दिखाया गया। • अतिरिक्त ब्याज की ₹45 करोड़ FY2023-24 और FY2024-25 में MSRDC को ‘रोड सेफ्टी अवेयरनेस कैंपेन’ के नाम पर चार लोकल वेंडर्स के जरिए दिए गए। • RBI के नियमों के अनुसार यह सब नहीं किया जा सकता है । बैंक किसी खास कस्टमर को नेगोशिएटेड/ऊंचा ब्याज नहीं दे सकते, जो दूसरे कस्टमर्स को नहीं मिल रहा हो । यहां MSRDC को ‘स्पेशल रेट’ दिया गया, जो नियमों के खिलाफ है। 2. कोई कोई लिखित अप्रूवल, लीगल/कंप्लायंस रिव्यू नहीं हुआ। CEO और CFO ने इसे मौखिक तौर पर मंज़ूरी दी जो सरासर ग़लत है। अफसरों है माना है : मार्केटिंग खर्च के रूप में ब्याज का भुगतान, अतिरिक्त ब्याज की बात ‘camouflage’ (छिपाने) के लिए किया गया । महाराष्ट्र की राजनीति में बैंकिंग घोटाले लगा तार सामने आते रहे हैं । महाराष्ट्र और देश में एक ही पार्टी की सरकार है। ऐसे में नेताओं की भूमिका कैसे संदेह से परे हो सकती है ? आज किस चैनल में आपको इस खबर पर बहस दिखेगी ?
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Sakshi
Sakshi@ShadowSakshi·
कृपया मन में ही रखे अब नहीं झेल पाएंगे ।🙏
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Rajdeep Sardesai
Rajdeep Sardesai@sardesairajdeep·
LATEST ED files: Enforcement Directorate conducts raids at former Kerala CM @pinarayivijayan home and 10 other sites in connection with money laundering cases. Pattern striking once again : ED hyper-active in opposition ruled states against opposition leaders, missing mostly elsewhere. Note: An extensive @IndianExpress investigation in 2024 revealed that out of 121 prominent politicians investigated by the ED since 2014, 115 (95 per cent) were Opposition leaders. In contrast, during the UPA government's tenure (2004–2014), the percentage of ED cases involving Opposition leaders was around 54 per cent. Are all equal before rule of ED?
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Yogendra Yadav
Yogendra Yadav@_YogendraYadav·
I did not to go to the Supreme Court today to hear its order in the SIR case. As a litigant in this case, and as someone who was given the honour of addressing the court, I should have been hopeful, anxious, or at least curious. I was not. The case was decided long ago. We were only waiting for the transcript and its fine print. The course of this case was settled in August last year. Having heard arguments against SIR for three days, the court moved away from examining the constitutionality of SIR and effectively converted itself into a Consumer Forum, focused on grievance redressal and arbitration, rather than constitutional principles. The case was effectively decided when the apex court allowed the ECI to rush through the Bihar elections without first deciding the matter, and without requiring the ECI to rectify even the most glaring defects in post-SIR rolls. There was little left of this case once the ECI proceeded with the second and then the third phase of SIR, while the Hon’ble Court leisurely heard arguments about its constitutionality. SIR had become a fait accompli. Any remaining doubt disappeared when the Hon’ble judges observed in open court that no one would be allowed to obstruct SIR. The final nail in the coffin of this petition was hammered during the hearing of another petition before the same Bench, when an Hon’ble judge remarked that millions denied their right to vote need not fret, since they could vote in the next election. At that moment, the court abdicated its constitutional responsibility. Shorn of legalese, the simple truth is that the highest court of a constitutional democracy has already authorised the disenfranchisement of millions of citizens — at least 59 million so far, could go up eventually to 100 million. It was inconceivable that the court would now declare SIR unconstitutional and annul all post-SIR elections. The lawyers were waiting for the the exact legal reasoning deployed to arrive at a conclusion that was already known. Such legal gymnastics did not interest me. Some friends were looking for some crumbs in the hope that the court might at least wish to save face, if not save the voters. Eventually that too did not happen. Polite noises apart, the Court has handed over a carteblac to the ECI to do what it pleases with the voters list. ADR vs Union of India (2026) is to our times what ADM Jabalpur vs Shivkant Shukla (1976) was to the previous assault on our democracy. We must hope that the SIR judgment does not mark the crumbling of the last constitutional wall, as ADM Jabalpur once did. We must believe that one day this constitutional abdication by the guardian of the Constitution will be recognised for what it was. And reversed. Jai Hind!
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