बानाज़ी
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मेरे अजीज मित्र राजू चौधरी जी को नवदाम्पत्य जीवन की हार्दिक बधाई एवं ढेरों शुभकामनाएं 💐
@raju_balotra

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That's why baal vivaah is banned brain grow nahi kar pata naa. Isse hi dekh lo
Rajasthan Royals@rajasthanroyals
🫶
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@aviral_74 जो बोल रहा था। मेवाराम आयेगा तो पार्टी छोड़ दुगा उसका क्या हुआ ।
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@anurag_firoda झंडे की चर्चा हो रहीं थीं बाड़मेर के सुदूर सुन्दर धोरों में
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@aviral_74 नहीं वो उस्टंड गजेंद्र जी ने खर्चे पानी के लिए किया था
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जोगीदास, झिनझिनयाली थाना क्षेत्र, जैसलमेर में 21 अप्रैल की मध्य रात्रि को हुई दर्दनाक घटना ने इंसानियत को झकझोर कर रख दिया। घर में अकेली सो रही एक महिला की उसी के पड़ोसी द्वारा निर्मम हत्या कर दी गई। इस महिला का “अपराध” सिर्फ इतना था कि वह एक साधारण जाट किसान परिवार से थी, जिसने अपनी मेहनत और ईमानदारी से जमीन खरीदकर खेत-कुएं पर खेती करते हुए अपने परिवार का पालन-पोषण किया।
लेकिन गांव के कुछ जाति विशेष के लोगों को यह आत्मनिर्भर और मेहनती परिवार हमेशा खटकता रहा। कई बार उन्हें गांव से भगाने की कोशिशें की गईं। गांव में पहले से शरण लिए अपराधी तत्व, हथियार तस्कर, नशे के सौदागर, चोर-लुटेरे इस परिवार से आशंकित रहते थे कि कहीं उनकी गतिविधियों की जानकारी बाहर न पहुंच जाए। जबकि हकीकत यह थी कि यह परिवार सीधा-साधा, किसी से कोई मतलब न रखने वाला, अपनी मेहनत की रोटी खाने वाला था।
पड़ोसी, जिन्हें यह परिवार भाई समान मानता था, उन्हीं के बीच छुपी बदनीयती ने आखिरकार हत्या का रूप ले लिया। जब उन्हें गांव से नहीं निकाल पाए, तो इस कायरतापूर्ण वारदात को अंजाम दिया गया, ताकि पूरा परिवार डरकर गांव छोड़ दे।
इस मामले में पुलिस ने मुख्य आरोपी हिम्मतसिंह उर्फ हेमसिंह पुत्र पुरसिंह निवासी जोगीदास का गांव, थाना झिनझिनयाली, जिला जैसलमेर को गिरफ्तार कर लिया है। आरोपी ने टोपीदार बंदूक से वारदात को अंजाम देना स्वीकार किया है, और मामले में अन्य दो-तीन आरोपियों की संलिप्तता की भी आशंका जताई जा रही है।
सबसे बड़ा सवाल उन तथाकथित “हिंदू ठेकेदारों” पर उठता है, जो हर छोटी-बड़ी घटना पर सोशल मीडिया पर शोर मचाते हैं, लेकिन इस निर्मम हत्या पर एक शब्द तक नहीं बोले। घटना के तुरंत बाद जब यह साफ हो गया कि आरोपी भी उसी समाज का निकला, तो इन लोगों के मुंह पर जैसे ताला लग गया। न कोई आक्रोश, न कोई बयान, न कोई पीड़ित परिवार के साथ खड़े होने की हिम्मत।
अगर यही घटना किसी और नैरेटिव में फिट बैठती, तो “हिंदू खतरे में है” का शोर मच जाता। लेकिन यहां एक जाट महिला की हत्या हुई और उसे “हिंदू महिला” मानने तक की जहमत नहीं उठाई गई।
यह घटना साफ साबित करती है कि जाट समाज को सिर्फ नाम के लिए हिंदू कहा जाता है, लेकिन जब संकट आता है तो उसे अकेला छोड़ दिया जाता है। उस दिन जाट, सिर्फ जाट रह जाता है कोई ठेकेदार, कोई संगठन, कोई बड़ा चेहरा साथ नहीं खड़ा होता।
इस मामले में अगर किसी ने आवाज उठाई, तो वह गिने-चुने लोग हैं हनुमान बेनीवाल सांसद नागौर, हरीश चौधरी और सांसद उम्मेदाराम बेनीवाल। इनके अलावा न किसी बड़े नेता ने, न किसी संगठन ने, न ही समाज के तथाकथित ठेकेदारों ने कोई जिम्मेदारी निभाई।
और दुख की बात यह भी है कि जाट समाज के अपने ठेकेदार और संगठन भी इस समय कहीं नजर नहीं आए। कुकुरमुत्तों की तरह बने ये संगठन आखिर किस बिल में छिप गए? समाज की एक बेटी, बहन, मां की इतनी बेरहमी से हत्या हो जाती है और इन्हें फुर्सत तक नहीं कि पीड़ित परिवार के पास जाकर सांत्वना दे सकें।
मेरा सीधा सवाल है क्या अब भी जाट समाज को यह समझने की जरूरत नहीं है कि जब उस पर संकट आता है, तो उसे खुद ही खड़ा होना पड़ता है?
अगर थोड़ी भी शर्म बाकी है, तो अब वक्त है कि पीड़ित परिवार के साथ मजबूती से खड़ा हुआ जाए और उन सभी तथाकथित ठेकेदारों को करारा जवाब दिया जाए, जो सिर्फ दिखावे की राजनीति करते हैं।
यह सिर्फ एक हत्या नहीं है, यह समाज के दोहरे चरित्र का आईना है और अब फैसला जाट समाज को करना है कि वह इस आईने को देखकर जागेगा या फिर अनदेखा करेगा।


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रोहित शर्मा: धोनी दादा ये विराट कोहली किस मिट्टी का बना है कभी आउट ऑफ फॉर्म नहीं रहता है,किंग कोहली मनुष्य नहीं कोई अवतार है!
महेंद्र सिंह धोनी: कितना भी रन बना ले लेकिन टीम इंडिया के असफल कप्तानों में गिना जाएगा ! एक बार वर्ल्ड कप जीत भी लेता वहां मैने नहीं जीतने दिया !
Rohit Sharma: Thala श्री आपने अच्छा किया वरना मुझे तो कप्तानी भी नहीं मिलती!
Ms Dhoni: सफल कप्तानों में सिर्फ धोनी और रोहित ही गिने जाएंगे ! भले ही हमको ये क्रेडिट Virat Kohli की वजह से मिला है!


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@SauDeependra अरे यह तो Insta पर काफी वायरल है , अभी पोस्टर देखा ध्यान से यह तो आपके यहां का है......
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आधुनिकता के चश्मे से देखो तो ये “घूंघट वाली महिला” शायद किसी को गुलाम दिखे,
पर ज़रा नजर बदलो तो यही महिला एक ऐसे सफ़र की साथी है,
जहाँ उसके त्याग, धैर्य और समझदारी ने किसी को RAS टॉपर बना दिया।
आज दिनेश विश्नोई का नाम चमक रहा है,
पर उस चमक के पीछे एक शांत दीया भी है—जो खुद जलकर रोशनी देता रहा।
अब मज़ेदार बात ये है कि
दुनिया का एक वर्ग इस घूंघट को पिछड़ापन कहेगा,
और दूसरा वर्ग इंस्टाग्राम की “आज़ादी” को प्रगति मानेगा।
एक तरफ वो महिलाएं हैं जो परिवार की नींव मजबूत कर रही हैं,
दूसरी तरफ वो हैं जो फॉलोअर्स की गिनती बढ़ा रही हैं।
दोनों अपने-अपने तरीके से “आज़ाद” हैं—बस परिभाषा अलग-अलग है।
व्यंग्य यही है कि
हमने आज़ादी को प्रदर्शन समझ लिया
और संस्कार को बंधन।
सच तो ये है—
न घूंघट में कोई अपने आप महान बनता है,
न इंस्टाग्राम पर कोई अपने आप “आधुनिक”।
महान वही है
जो अपने कर्म से किसी को ऊपर उठाए,
और आधुनिक वही
जो अपनी मर्यादा खुद तय करे, ना कि ट्रेंड्स तय करें।
बाकी समाज तो हमारा वही है—
जो हर चीज़ में तुलना ढूंढ लेता है,
पर संतुलन नहीं।

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