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बौद्धमय इतिहास कैसे बर्बाद होते-होते बचा : सारनाथ की अनोखी कहानी
▪️बात 1794 की है। तब काशी के राजा चेत सिंह थे और उनके दीवान जगत सिंह थे.
▪️ चेत सिंह और जगत सिंह के नाम पर बनारस में दो मुहल्ले हैं :- एक चेतगंज और दूसरा जगतगंज।
▪️ तब जगतगंज के इलाके में जगत सिंह को मार्केट और इमारतें बनवानी थीं, ईंट और पत्थरों की सख्त जरूरत थी.
▪️ सारनाथ के इलाके में सम्राट अशोक एवं अन्य बौद्ध राजाओं ने ईंट और पत्थरों को संजोकर अनेक स्तूप और बौद्ध इमारतें बनवाई थीं।
▪️ जगत सिंह को ईंट और पत्थरों का अकूत खजाना मिल गया, स्तूपों को ढाह - ढाहकर उनके मजदूर ईंट और पत्थर ले जाने लगे।
▪️ सारनाथ की अनेक बौद्ध इमारतें बर्बाद हो गईं।
▪️ इसी बर्बादी के दौर में धर्मराजिका स्तूप के गर्भ से पत्थर के बने बाक्स में हरे संगमरमर की अस्थि - मंजूषा मिली।
▪️ तब बनारस में ब्रिटिश सरकार के प्रतिनिधि जोनाथन डंकन थे, उन्होंने इस अप्रत्याशित घटनाक्रम पर एक लेख लिखा।
▪️ जोनाथन डंकन के लेख पढ़े जाने के बाद ब्रिटिश पुरातत्वविदों के बीच खलबली मच गई, अनेक इतिहास - मर्मज्ञ सारनाथ पहुँचने लगे।
▪️ लेकिन सारनाथ की पहली पुरातात्विक खुदाई कालिन मैकेंजी ने 1815 - 16 में कराई, मगर विशेष सफलता नहीं मिली।
▪️ तब 1834 के दिसंबर महीने में पुरातत्वविदों के बेताज बादशाह एलेक्जेंडर कनिंघम सारनाथ की पवित्र धरती की खुदाई प्रारंभ की तथा जनवरी, 1836 तक खुदाई जारी रखी।
▪️ धमेख स्तूप, धर्मराजिका स्तूप, चौखंडी स्तूप सामने आए एवं सारनाथ की प्राचीन गरिमा जिंदा हो उठी।
▪️ कनिंघम ने जगत सिंह की भर्त्सना करते हुए लिखा है कि सारनाथ के स्तूपों की दुर्दशा जगत सिंह के ओछेपन का परिणाम है, जिन्होंने अपने मार्केट और महल के लिए इतने सुंदर निर्माण को बर्बाद कर दिया।
▪️ कनिंघम ने आगे लिखा कि इसे बर्बाद करने से उनको कुल मिलाकर विशेष बचत नहीं हुई होगी, लेकिन उन्होंने इस अमूल्य ऐतिहासिक निर्माण को जो क्षति पहुँचाई, वह अवर्णनीय और अक्षम्य है।
▪️ इस प्रकार सारनाथ बौद्धमय था। मगर अंग्रेजों से पहले हमें नहीं पता था कि इतनी बड़ी बौद्ध विरासत जमीन के नीचे दफन है।
▪️ इसी सारनाथ की धरती से भारत के राजचिह्न की भी खोज हुई।




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